बाज़ार दर्शन
Mizoram Board · Class 12 · Hindi
NCERT Solutions for बाज़ार दर्शन — Mizoram Board Class 12 Hindi.
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1बाजार का जादू चढ़ने और उतरने पर मनुष्य पर क्या-क्या असर पड़ता है?Show solution
जब मनुष्य खाली मन लेकर बाजार जाता है, तो बाजार का जादू उस पर पूरी तरह चढ़ जाता है। बाजार की चमक-दमक, सजी हुई दुकानें और आकर्षक वस्तुएँ उसे सम्मोहित कर लेती हैं। वह अनावश्यक वस्तुएँ भी खरीद लेता है। उसकी क्रय-शक्ति (पर्चेजिंग पावर) उसे विवेकहीन बना देती है। वह वस्तुओं का गुलाम बन जाता है और घर लौटने पर पछताता है। उसे लगता है कि उसने जो खरीदा वह न तो जरूरी था और न ही उपयोगी।
जब बाजार का जादू उतरता है:
जब मनुष्य सुनिश्चित उद्देश्य और भरे मन के साथ बाजार जाता है, तो बाजार का जादू उस पर नहीं चढ़ता। वह केवल अपनी जरूरत की चीजें खरीदता है। बाजार की चकाचौंध उसे प्रभावित नहीं कर पाती। ऐसा व्यक्ति बाजार का सदुपयोग करता है और संतुष्ट होकर लौटता है। भगत जी इसी श्रेणी के व्यक्ति हैं जो केवल जरूरत-भर जीरा लेकर संतुष्ट हो जाते हैं।
निष्कर्ष: बाजार का जादू मनुष्य की मानसिक स्थिति पर निर्भर करता है। खाली मन बाजार के जादू का शिकार होता है, जबकि भरा और सुनिश्चित मन उससे बचा रहता है।
2बाजार में भगत जी के व्यक्तित्व का कौन-सा सशक्त पहलू उभरकर आता है? क्या आपकी नजर में उनका आचरण समाज में शांति-स्थापित करने में मददगार हो सकता है?Show solution
भगत जी के व्यक्तित्व का सबसे सशक्त पहलू उनकी संतुष्टि, निस्पृहता और आत्मसंयम है। वे बाजार में केवल अपनी जरूरत की वस्तु — जरूरत-भर जीरा — लेने जाते हैं और उसके बाद पूरा बाजार उनके लिए 'नहीं के बराबर' हो जाता है। बाजार की चमक-दमक, आकर्षक वस्तुएँ और विज्ञापन उन्हें प्रभावित नहीं कर पाते। उनका मन 'भरा हुआ' है — वे जानते हैं कि उन्हें क्या चाहिए और क्या नहीं। वे लोभ और मोह से मुक्त हैं।
क्या उनका आचरण समाज में शांति स्थापित कर सकता है?
हाँ, भगत जी का आचरण निश्चित रूप से समाज में शांति स्थापित करने में मददगार हो सकता है। इसके कारण निम्नलिखित हैं:
- जब व्यक्ति अनावश्यक वस्तुओं की लालसा नहीं रखता, तो उसके मन में ईर्ष्या, द्वेष और असंतोष नहीं पनपता।
- संतुष्ट व्यक्ति दूसरों का शोषण नहीं करता।
- आत्मसंयमी व्यक्ति समाज में सामंजस्य और सहयोग की भावना को बढ़ावा देता है।
- यदि समाज के अधिकांश लोग भगत जी की तरह आचरण करें, तो उपभोक्तावाद की अंधी दौड़ रुकेगी और समाज में शांति व संतोष का वातावरण बनेगा।
निष्कर्ष: भगत जी का आचरण एक आदर्श जीवन-दृष्टि प्रस्तुत करता है जो व्यक्ति और समाज दोनों के लिए कल्याणकारी है।
3'बाजारूपन' से क्या तात्पर्य है? किस प्रकार के व्यक्ति बाजार को सार्थकता प्रदान करते हैं अथवा बाजार की सार्थकता किसमें है?Show solution
'बाजारूपन' से तात्पर्य है — बाजार की उस प्रवृत्ति से जिसमें वस्तुओं की खरीद-बिक्री केवल लाभ-हानि के आधार पर होती है। इसमें ग्राहक और विक्रेता दोनों एक-दूसरे को ठगने की कोशिश में रहते हैं। यहाँ मानवीय संबंध नहीं होते, केवल व्यापारिक स्वार्थ होता है। बाजारूपन में शोषण होता है — कपट सफल होता है और निष्कपट व्यक्ति शिकार बनता है। यह बाजार की वह नकारात्मक शक्ति है जो मनुष्य को वस्तुओं का दास बना देती है।
बाजार को सार्थकता प्रदान करने वाले व्यक्ति:
लेखक के अनुसार वे व्यक्ति बाजार को सार्थकता प्रदान करते हैं जो:
1. जरूरत के अनुसार खरीदारी करते हैं — जिनके मन में पहले से यह निश्चित होता है कि उन्हें क्या चाहिए।
2. संयमी और विवेकशील होते हैं — जो बाजार की चकाचौंध से प्रभावित नहीं होते।
3. भरे मन वाले होते हैं — जिनकी आवश्यकताएँ सुनिश्चित होती हैं।
बाजार की सार्थकता:
बाजार की सार्थकता इसमें है कि वह लोगों की वास्तविक आवश्यकताओं की पूर्ति करे। जब बाजार आवश्यकताओं के आदान-प्रदान का माध्यम बनता है, तब वह सार्थक होता है। भगत जी जैसे व्यक्ति ही बाजार को सच्ची सार्थकता देते हैं क्योंकि वे बाजार का उपयोग करते हैं, उसके शिकार नहीं बनते।
4बाजार किसी का लिंग, जाति, धर्म या क्षेत्र नहीं देखता; वह देखता है सिर्फ उसकी क्रय शक्ति को। इस रूप में वह एक प्रकार से सामाजिक समता की भी रचना कर रहा है। आप इससे कहाँ तक सहमत हैं?Show solution
इस कथन से मैं आंशिक रूप से सहमत हूँ।
सहमति के कारण:
- बाजार में वास्तव में जाति, धर्म, लिंग या क्षेत्र का भेद नहीं होता। एक दलित और एक ब्राह्मण, एक हिंदू और एक मुसलमान — सभी एक ही दुकान से एक ही कीमत पर सामान खरीद सकते हैं।
- इस अर्थ में बाजार सामाजिक समानता का एक रूप प्रस्तुत करता है।
- बाजार में व्यक्ति की पहचान उसकी क्रय-शक्ति से होती है, न कि उसकी सामाजिक स्थिति से।
असहमति के कारण:
- बाजार केवल क्रय-शक्ति देखता है, इसलिए जिनके पास पैसा नहीं है वे बाजार से बाहर हो जाते हैं। यह एक नई असमानता को जन्म देता है।
- गरीब और अमीर के बीच की खाई बाजार और गहरी कर देता है।
- बाजार की यह 'समता' केवल ऊपरी है। वास्तव में यह आर्थिक असमानता को और बढ़ावा देती है।
- बाजार शोषण का माध्यम भी बन सकता है जब आवश्यकता ही शोषण का रूप ले लेती है।
निष्कर्ष: बाजार सामाजिक समता का भ्रम तो पैदा करता है, लेकिन वास्तविक समता तभी संभव है जब सभी की क्रय-शक्ति समान हो। इसलिए बाजार की यह 'समता' अधूरी और भ्रामक है।
5आप अपने तथा समाज से कुछ ऐसे प्रसंग का उल्लेख करें—
(क) जब पैसा शक्ति के परिचायक के रूप में प्रतीत हुआ।
(ख) जब पैसे की शक्ति काम नहीं आई।Show solution
एक बार हमारे परिवार में किसी सदस्य की तबीयत अचानक बहुत खराब हो गई। रात का समय था और सरकारी अस्पताल में डॉक्टर उपलब्ध नहीं थे। ऐसे में पैसे की शक्ति काम आई — हम एक निजी अस्पताल में गए जहाँ तुरंत इलाज मिला। पैसे के कारण ही समय पर उचित चिकित्सा संभव हो पाई। इसी प्रकार समाज में देखा जाता है कि धनी व्यक्ति अपनी क्रय-शक्ति से बड़े-बड़े काम करवा लेते हैं — चाहे वह शिक्षा हो, स्वास्थ्य हो या व्यापार। पैसा उन्हें समाज में प्रतिष्ठा और शक्ति दिलाता है।
(ख) जब पैसे की शक्ति काम नहीं आई:
एक प्रसंग याद आता है जब हमारे पड़ोस में एक धनी व्यक्ति के घर में उनके माता-पिता बहुत बीमार थे। उनके पास इलाज के लिए पर्याप्त धन था, लेकिन उनके बच्चे विदेश में थे और घर में कोई देखभाल करने वाला नहीं था। पैसे से डॉक्टर और दवाइयाँ तो मिल गईं, लेकिन अपनों का प्यार और देखभाल नहीं मिल सकी। इसी प्रकार समाज में देखा जाता है कि पैसे से रिश्ते, प्रेम, सम्मान और आत्मीयता नहीं खरीदी जा सकती। कबीर ने भी कहा है — 'चाह गई चिंता गई' — अर्थात् सच्चा सुख संतोष में है, धन में नहीं।
निष्कर्ष: पैसा एक साधन है, साध्य नहीं। यह जीवन की भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकता है, लेकिन भावनात्मक और आत्मिक जरूरतों को पूरा करने में असमर्थ है।
पाठ के आसपास
1बाजार दर्शन पाठ में बाजार जाने या न जाने के संदर्भ में मन की कई स्थितियों का जिक्र आया है। आप इन स्थितियों से जुड़े अपने अनुभवों का वर्णन कीजिए।
(क) मन खाली हो
(ख) मन खाली न हो
(ग) मन बंद हो
(घ) मन में नकार होShow solution
जब मन खाली होता है तो बाजार की हर चीज आकर्षक लगती है। एक बार मैं बिना किसी उद्देश्य के बाजार गया। वहाँ की चमक-दमक ने मुझे इतना प्रभावित किया कि मैंने कई अनावश्यक वस्तुएँ खरीद लीं — एक महँगी घड़ी, कुछ गैजेट्स और कपड़े जिनकी मुझे कोई जरूरत नहीं थी। घर आकर पछतावा हुआ। लेखक के अनुसार खाली मन बाजार के जादू का सबसे आसान शिकार होता है।
(ख) मन खाली न हो:
जब मन में पहले से यह निश्चित हो कि क्या खरीदना है, तो बाजार की चकाचौंध प्रभावित नहीं करती। एक बार मुझे परीक्षा के लिए कुछ विशेष पुस्तकें खरीदनी थीं। मैं बाजार गया, केवल वही पुस्तकें खरीदीं और वापस आ गया। बाकी दुकानों की ओर ध्यान ही नहीं गया। यही भरे मन की शक्ति है।
(ग) मन बंद हो:
जब मन पूरी तरह बंद हो — अर्थात् व्यक्ति किसी भी वस्तु को खरीदने के लिए तैयार न हो — तो बाजार उसके लिए निरर्थक हो जाता है। भगत जी का मन इसी प्रकार का है। वे बाजार में जाते हैं लेकिन केवल जरूरत की वस्तु लेते हैं। बाकी सब उनके लिए 'नहीं के बराबर' है।
(घ) मन में नकार हो:
जब मन में पहले से ही यह भाव हो कि 'मुझे कुछ नहीं खरीदना', तो बाजार की शक्ति निष्प्रभावी हो जाती है। ऐसे व्यक्ति बाजार में जाकर भी कुछ नहीं खरीदते। यह नकार सकारात्मक भी हो सकता है — जब व्यक्ति जानता हो कि उसे क्या नहीं चाहिए।
2बाजार दर्शन पाठ में किस प्रकार के ग्राहकों की बात हुई है? आप स्वयं को किस श्रेणी का ग्राहक मानते/मानती हैं?Show solution
1. खाली मन वाले ग्राहक: ये वे ग्राहक हैं जो बिना किसी उद्देश्य के बाजार जाते हैं। बाजार की चमक-दमक इन्हें सम्मोहित कर लेती है और ये अनावश्यक वस्तुएँ खरीद लेते हैं। लेखक के मित्र इसी श्रेणी में आते हैं जो हर बार बाजार से ढेर सारा सामान लेकर आते हैं।
2. भरे मन वाले ग्राहक: ये वे ग्राहक हैं जिनके मन में पहले से यह निश्चित होता है कि उन्हें क्या खरीदना है। ये बाजार का सदुपयोग करते हैं। भगत जी इसी श्रेणी के आदर्श ग्राहक हैं।
3. पर्चेजिंग पावर से प्रभावित ग्राहक: ये वे ग्राहक हैं जो अपनी क्रय-शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए खरीदारी करते हैं। इनके लिए खरीदना एक 'पावर' का अनुभव है।
स्वयं की श्रेणी:
मैं स्वयं को दूसरी श्रेणी — भरे मन वाले ग्राहक — में रखना चाहता/चाहती हूँ, हालाँकि कभी-कभी बाजार की चकाचौंध मुझे भी प्रभावित कर देती है। मेरा प्रयास रहता है कि मैं केवल जरूरत की वस्तुएँ ही खरीदूँ और अनावश्यक खर्च से बचूँ।
3आप बाजार की भिन्न-भिन्न प्रकार की संस्कृति से अवश्य परिचित होंगे। मॉल की संस्कृति और सामान्य बाजार और हाट की संस्कृति में आप क्या अंतर पाते हैं? पर्चेजिंग पावर आपको किस तरह के बाजार में नजर आती है?Show solution
| आधार | मॉल की संस्कृति | सामान्य बाजार/हाट की संस्कृति |
|------|----------------|--------------------------------|
| वातावरण | वातानुकूलित, चमकदार, कृत्रिम | खुला, प्राकृतिक, सरल |
| मोलभाव | नहीं होता (निश्चित मूल्य) | होता है, मानवीय संपर्क अधिक |
| उद्देश्य | मनोरंजन + खरीदारी | केवल आवश्यकता की पूर्ति |
| वस्तुएँ | ब्रांडेड, महँगी | सामान्य, सस्ती, स्थानीय |
| ग्राहक वर्ग | मध्यम व उच्च वर्ग | सभी वर्ग |
| मानवीय संबंध | कम, औपचारिक | अधिक, आत्मीय |
| प्रभाव | उपभोक्तावाद को बढ़ावा | वास्तविक जरूरतों की पूर्ति |
पर्चेजिंग पावर कहाँ नजर आती है:
पर्चेजिंग पावर सबसे अधिक मॉल की संस्कृति में नजर आती है। वहाँ व्यक्ति अपनी क्रय-शक्ति का प्रदर्शन करता है। महँगे ब्रांड खरीदना, बड़े-बड़े बिल चुकाना — यह सब पर्चेजिंग पावर का प्रदर्शन है। सामान्य बाजार और हाट में पर्चेजिंग पावर का प्रदर्शन कम होता है क्योंकि वहाँ लोग जरूरत के अनुसार खरीदते हैं।
4लेखक ने पाठ में संकेत किया है कि कभी-कभी बाज़ार में आवश्यकता ही शोषण का रूप धारण कर लेती है। क्या आप इस विचार से सहमत हैं? तर्क सहित उत्तर दीजिए।Show solution
तर्क:
1. आवश्यकता की विवशता: जब किसी व्यक्ति को किसी वस्तु की अत्यंत आवश्यकता होती है, तो विक्रेता उसकी इस विवशता का फायदा उठाता है। जैसे — बाढ़ या सूखे के समय खाद्य पदार्थों की कीमतें अचानक बढ़ जाती हैं। जरूरतमंद व्यक्ति को मजबूरन महँगे दाम पर खरीदना पड़ता है।
2. दवाइयों का उदाहरण: किसी गंभीर बीमारी में जब कोई विशेष दवाई की जरूरत होती है, तो दवा कंपनियाँ उसकी कीमत मनमाने ढंग से बढ़ा देती हैं। रोगी की आवश्यकता ही उसके शोषण का माध्यम बन जाती है।
3. ग्रामीण क्षेत्रों में: गाँव के किसान जब अपनी फसल बेचने के लिए मजबूर होते हैं, तो बिचौलिए उनकी आवश्यकता का फायदा उठाकर कम दाम पर फसल खरीद लेते हैं।
4. नकली सामान का उदाहरण: जैसा कि पाठ में दिए गए लेख 'नकली सामान पर नकेल जरूरी' में बताया गया है — गाँव के लोगों की जरूरत का फायदा उठाकर कंपनियाँ नकली और घटिया सामान बेचती हैं।
निष्कर्ष: आवश्यकता जब शोषण का रूप लेती है, तो बाजार मानवता के लिए विडंबना बन जाता है। इसलिए उपभोक्ता जागरूकता और नैतिक व्यापार अत्यंत आवश्यक है।
5'स्त्री माया न जोड़े' यहाँ माया शब्द किस ओर संकेत कर रहा है? स्त्रियों द्वारा माया जोड़ना प्रकृति प्रदत्त नहीं, बल्कि परिस्थितिवश है। वे कौन-सी परिस्थितियाँ हैं जो स्त्री को माया जोड़ने के लिए विवश कर देती हैं?Show solution
यहाँ 'माया' शब्द धन-संपत्ति, गहने-जेवर और भौतिक वस्तुओं के संग्रह की ओर संकेत कर रहा है। स्त्रियों द्वारा सोना-चाँदी, गहने और धन जोड़ने की प्रवृत्ति को 'माया जोड़ना' कहा गया है।
माया जोड़ना प्रकृति प्रदत्त नहीं, परिस्थितिवश है:
लेखक का मानना है कि स्त्रियों में माया जोड़ने की प्रवृत्ति जन्मजात नहीं है, बल्कि सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियाँ उन्हें ऐसा करने के लिए विवश करती हैं।
वे परिस्थितियाँ जो स्त्री को माया जोड़ने के लिए विवश करती हैं:
1. आर्थिक असुरक्षा: पारंपरिक समाज में स्त्री को संपत्ति का अधिकार नहीं था। पति की मृत्यु या तलाक की स्थिति में उसके पास कोई आर्थिक सहारा नहीं होता था। इसलिए वह गहने-जेवर के रूप में माया जोड़ती थी।
2. पराश्रितता: स्त्री पूरी तरह पुरुष पर निर्भर थी। अपनी और बच्चों की जरूरतों के लिए उसे कुछ न कुछ बचाकर रखना पड़ता था।
3. भविष्य की अनिश्चितता: वृद्धावस्था में या विपत्ति के समय उसके पास कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं थी, इसलिए वह माया जोड़ती थी।
4. सामाजिक दबाव: समाज में स्त्री की प्रतिष्ठा उसके गहनों से आँकी जाती थी, जिससे वह माया जोड़ने के लिए प्रेरित होती थी।
निष्कर्ष: यदि स्त्री को आर्थिक स्वतंत्रता, सामाजिक सुरक्षा और समान अधिकार मिलें, तो माया जोड़ने की यह विवशता समाप्त हो सकती है।
आपसदारी
1'ज़रूरत-भर जीरा वहाँ से ले लिया कि फिर सारा चौक उनके लिए आसानी से नहीं के बराबर हो जाता है' — भगत जी की इस संतुष्ट निस्पृहता की कबीर की इस सूक्ति से तुलना कीजिए —
चाह गई चिंता गई मनुओं बेपरवाह
जाके कछु न चाहिए सोइ सहसाह।Show solution
भगत जी की निस्पृहता:
भगत जी बाजार में केवल अपनी जरूरत-भर जीरा लेने जाते हैं। एक बार जरूरत पूरी हो जाने के बाद पूरा बाजार उनके लिए 'नहीं के बराबर' हो जाता है। वे बाजार की चमक-दमक, आकर्षक वस्तुओं और विज्ञापनों से प्रभावित नहीं होते। उनकी इच्छाएँ सीमित और नियंत्रित हैं। वे जानते हैं कि उन्हें क्या चाहिए और क्या नहीं। यही उनकी संतुष्ट निस्पृहता है।
कबीर की सूक्ति का अर्थ:
कबीर कहते हैं कि जिस व्यक्ति की कोई चाह (इच्छा) नहीं रही, उसकी चिंता भी समाप्त हो गई। ऐसा व्यक्ति पूरी तरह बेपरवाह हो जाता है। जिसे कुछ भी नहीं चाहिए, वही सच्चा 'शहंशाह' (सम्राट) है।
तुलना:
दोनों में गहरी समानता है:
- भगत जी की 'जरूरत-भर' की सोच और कबीर की 'चाह गई' की भावना एक ही है।
- दोनों संतोष और निस्पृहता को सर्वोच्च मानते हैं।
- भगत जी व्यावहारिक जीवन में कबीर के दर्शन को जीते हैं।
- कबीर के अनुसार जो कुछ नहीं चाहता वह सम्राट है — भगत जी भी बाजार के सामने 'सम्राट' की तरह हैं क्योंकि बाजार उन्हें प्रभावित नहीं कर पाता।
निष्कर्ष: भगत जी कबीर के दर्शन के जीवंत उदाहरण हैं। दोनों यह सिखाते हैं कि सच्ची स्वतंत्रता और सुख इच्छाओं की पूर्ति में नहीं, बल्कि इच्छाओं के त्याग में है।
2विजयदान देथा की कहानी 'दुविधा' के अंश को पढ़कर — जिसमें गड़रिया अँगूठी कबूल नहीं करता — आपके भीतर क्या भाव जगते हैं?Show solution
विजयदान देथा की कहानी 'दुविधा' में गड़रिए का यह कथन अत्यंत प्रभावशाली है। वह कहता है — 'मैं कोई राजा नहीं हूँ जो न्याय की कीमत वसूल करूँ।' और अँगूठी को यह कहकर अस्वीकार करता है कि 'बेकार की वस्तुएँ तुम अमीरों को ही शोभा देती हैं।'
इस अंश को पढ़कर मेरे मन में निम्नलिखित भाव जागते हैं:
1. प्रशंसा और श्रद्धा: गड़रिए की सरलता और निस्पृहता देखकर मन में उसके प्रति गहरी श्रद्धा उत्पन्न होती है। वह जानता है कि उसे क्या चाहिए और क्या नहीं।
2. आत्म-चिंतन: यह सोचने पर विवश होता हूँ कि क्या मैं भी ऐसी निस्पृहता अपना सकता हूँ? क्या मैं भी अनावश्यक वस्तुओं को अस्वीकार कर सकता हूँ?
3. भगत जी से समानता: गड़रिए की जीवन-दृष्टि भगत जी जैसी ही है। दोनों संतोषी हैं, दोनों जानते हैं कि उनकी वास्तविक जरूरतें क्या हैं।
4. उपभोक्तावाद पर प्रश्न: यह अंश उपभोक्तावादी समाज पर एक तीखा व्यंग्य है। 'बेकार की वस्तुएँ अमीरों को शोभा देती हैं' — यह वाक्य सोचने पर मजबूर करता है।
निष्कर्ष: गड़रिए और भगत जी दोनों यह सिखाते हैं कि सच्चा सुख भौतिक वस्तुओं में नहीं, बल्कि आत्मसंतोष और सरल जीवन में है।
3बाज़ार पर आधारित लेख 'नकली सामान पर नकेल ज़रूरी' के अंश को पढ़कर निम्नलिखित बिंदुओं पर कक्षा में चर्चा कीजिए:
(क) नकली सामान के खिलाफ जागरूकता के लिए आप क्या कर सकते हैं?
(ख) उपभोक्ताओं के हित को मद्देनज़र रखते हुए सामान बनाने वाली कंपनियों का क्या नैतिक दायित्व है?
(ग) ब्रांडेड वस्तु को खरीदने के पीछे छिपी मानसिकता को उजागर कीजिए।Show solution
1. विद्यार्थी के रूप में: स्कूल और कॉलेज में जागरूकता अभियान चला सकते हैं। नुक्कड़ नाटक, पोस्टर और सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों को सचेत कर सकते हैं।
2. उपभोक्ता के रूप में: खरीदारी करते समय निर्माण तिथि, समाप्ति तिथि और ISI मार्क अवश्य जाँचें।
3. समाज के रूप में: उपभोक्ता फोरम में शिकायत दर्ज करें। नकली सामान बेचने वालों की सूचना प्रशासन को दें।
4. ग्रामीण क्षेत्रों में: गाँव-गाँव जाकर लोगों को उनके अधिकारों के बारे में बताएँ।
(ख) कंपनियों का नैतिक दायित्व:
1. गुणवत्ता सुनिश्चित करना: कंपनियों का नैतिक दायित्व है कि वे केवल गुणवत्तापूर्ण उत्पाद ही बाजार में उतारें।
2. सही जानकारी देना: उत्पाद पर निर्माण तिथि, समाप्ति तिथि और सामग्री की सूची स्पष्ट रूप से लिखी होनी चाहिए।
3. जागरूकता में निवेश: विज्ञापन पर खर्च करने के साथ-साथ उपभोक्ता जागरूकता पर भी खर्च करना चाहिए।
4. ग्रामीण उपभोक्ताओं के साथ न्याय: गाँव के लोगों की अज्ञानता का फायदा उठाना नैतिक रूप से गलत है।
(ग) ब्रांडेड वस्तु खरीदने के पीछे की मानसिकता:
1. प्रतिष्ठा का प्रदर्शन: ब्रांडेड वस्तु खरीदना सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता है।
2. गुणवत्ता का भ्रम: लोग मानते हैं कि महँगा माल हमेशा अच्छा होता है।
3. विज्ञापन का प्रभाव: टीवी और सोशल मीडिया के विज्ञापन लोगों को ब्रांड के प्रति आकर्षित करते हैं।
4. भीड़ का अनुसरण: 'सब खरीद रहे हैं तो मैं भी खरीदूँगा' — यह मानसिकता ब्रांड खरीदारी को बढ़ावा देती है।
5. पहचान की तलाश: ब्रांडेड वस्तु व्यक्ति को एक विशेष वर्ग का हिस्सा होने का अहसास दिलाती है।
4प्रेमचंद की कहानी 'ईदगाह' के हामिद और उसके दोस्तों का बाजार से क्या संबंध बनता है? विचार करें।Show solution
हामिद का बाजार से संबंध:
हामिद एक गरीब अनाथ बच्चा है जिसके पास केवल तीन पैसे हैं। मेले में जाने पर उसके दोस्त खिलौने, मिठाइयाँ और अन्य आकर्षक वस्तुएँ खरीदते हैं। हामिद के मन में भी इच्छाएँ हैं, लेकिन वह अपनी दादी की जरूरत को याद करता है। दादी रोटी बनाते समय तवे से हाथ जला लेती हैं — इसलिए वह तीन पैसों में एक चिमटा खरीदता है।
हामिद का बाजार से संबंध विवेकपूर्ण और परिपक्व है। वह बाजार की चकाचौंध से प्रभावित नहीं होता। उसके मन में दूसरों के प्रति प्रेम और जिम्मेदारी की भावना है। वह भगत जी की तरह जानता है कि उसे क्या चाहिए।
दोस्तों का बाजार से संबंध:
हामिद के दोस्त — महमूद, मोहसिन, नूरे — बाजार की चमक-दमक से प्रभावित होकर खिलौने और मिठाइयाँ खरीदते हैं। उनका बाजार से संबंध भावनात्मक और तात्कालिक है। वे अपनी इच्छाओं के अनुसार खरीदते हैं।
तुलना 'बाजार दर्शन' से:
हामिद का आचरण 'बाजार दर्शन' के भगत जी जैसा है — दोनों जरूरत के अनुसार खरीदते हैं। हामिद के दोस्त उन लोगों जैसे हैं जो बाजार के जादू में फँस जाते हैं।
निष्कर्ष: प्रेमचंद ने हामिद के माध्यम से यह दिखाया है कि सच्ची समझदारी उम्र की मोहताज नहीं होती। हामिद एक बच्चा होकर भी बाजार का सदुपयोग करता है।
विज्ञापन की दुनिया
1आपने समाचारपत्रों, टी.वी. आदि पर अनेक प्रकार के विज्ञापन देखे होंगे। नीचे लिखे बिंदुओं के संदर्भ में किसी एक विज्ञापन की समीक्षा कीजिए:
1. विज्ञापन में सम्मिलित चित्र और विषय-वस्तु
2. विज्ञापन में आए पात्र व उनका औचित्य
3. विज्ञापन की भाषाShow solution
1. विज्ञापन में सम्मिलित चित्र और विषय-वस्तु:
इस विज्ञापन में एक सुंदर, स्वस्थ और चमकती त्वचा वाली महिला को दिखाया जाता है। विषय-वस्तु यह है कि इस साबुन के उपयोग से त्वचा मुलायम और चमकदार हो जाती है। चित्र में हरे-भरे प्राकृतिक दृश्य, फूल और प्राकृतिक सामग्री दिखाई जाती है जो उत्पाद की 'प्राकृतिकता' का भ्रम पैदा करती है। विज्ञापन की विषय-वस्तु आकर्षक है लेकिन अतिरंजित भी है।
2. विज्ञापन में आए पात्र व उनका औचित्य:
विज्ञापन में एक प्रसिद्ध फिल्म अभिनेत्री को पात्र के रूप में लिया गया है। उनकी उपस्थिति का औचित्य यह है कि उनकी लोकप्रियता उत्पाद की बिक्री बढ़ाती है। लेकिन यह प्रश्न उठता है कि क्या वे वास्तव में इस साबुन का उपयोग करती हैं? यह एक भ्रामक प्रस्तुति है।
3. विज्ञापन की भाषा:
विज्ञापन की भाषा सरल, आकर्षक और प्रेरक है। 'नई चमक, नया आत्मविश्वास' जैसे नारे प्रयोग किए जाते हैं। भाषा में अंग्रेजी और हिंदी का मिश्रण (कोड मिक्सिंग) है। भाषा भावनात्मक रूप से प्रभावित करती है।
मुझे किस बात ने प्रेरित किया:
विज्ञापन में प्राकृतिक सामग्री के उपयोग का दावा और 'त्वचा विशेषज्ञों द्वारा परीक्षित' जैसे वाक्यों ने मुझे प्रेरित किया। हालाँकि बाद में समझ आया कि यह केवल विपणन की चाल थी।
2आपने सामान की बिक्री को बढ़ाने के लिए आज किन-किन तरीकों का प्रयोग किया जा रहा है? उदाहरण सहित उनका संक्षिप्त परिचय दीजिए। आप स्वयं किस तकनीक या तौर-तरीके का प्रयोग करना चाहेंगे जिससे बिक्री भी अच्छी हो और उपभोक्ता गुमराह भी न हो।Show solution
1. टेलीविजन विज्ञापन: यह सबसे प्रभावशाली माध्यम है। प्रसिद्ध हस्तियों को ब्रांड एंबेसडर बनाकर उत्पाद का प्रचार किया जाता है। उदाहरण: क्रिकेटर विराट कोहली का किसी पेय पदार्थ का विज्ञापन।
2. सोशल मीडिया मार्केटिंग: फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब पर विज्ञापन दिए जाते हैं। इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग के माध्यम से लाखों लोगों तक पहुँचा जाता है।
3. ऑनलाइन शॉपिंग और छूट: अमेजन, फ्लिपकार्ट जैसी कंपनियाँ 'सेल' और 'ऑफर' के माध्यम से ग्राहकों को आकर्षित करती हैं।
4. 'एक खरीदो, एक मुफ्त पाओ' योजना: यह ग्राहकों को अधिक खरीदने के लिए प्रेरित करती है।
5. ईमेल और SMS मार्केटिंग: सीधे ग्राहकों के फोन पर ऑफर भेजे जाते हैं।
मेरी पसंदीदा तकनीक (जो ईमानदार हो):
मैं 'सत्य-आधारित विज्ञापन' का प्रयोग करना चाहूँगा जिसमें:
- उत्पाद की वास्तविक विशेषताएँ बताई जाएँ।
- अतिरंजित दावे न किए जाएँ।
- उपभोक्ता समीक्षाओं (genuine reviews) को प्रमुखता दी जाए।
- उत्पाद की सीमाओं के बारे में भी ईमानदारी से बताया जाए।
इस प्रकार बिक्री भी अच्छी होगी और उपभोक्ता का विश्वास भी बना रहेगा।
भाषा की बात
1विभिन्न परिस्थितियों में भाषा का प्रयोग भी अपना रूप बदलता रहता है — कभी औपचारिक रूप में आती है तो कभी अनौपचारिक रूप में। पाठ में से दोनों प्रकार के तीन-तीन उदाहरण छाँटकर लिखिए।Show solution
1. 'बाजार में एक जादू है। वह जादू आँख की राह काम करता है।'
2. 'पैसा पावर है। पर उसके सदुपयोग की भी एक सीमा है।'
3. 'वे शोभा की वस्तुएँ थीं। उन्हें बहुत सुंदर बनाया गया था।'
अनौपचारिक भाषा के उदाहरण (पाठ से):
1. 'भगत जी, यह क्या? आप तो बस जीरा लेने आए थे!'
2. 'अजी, मेरे भाई, पैसा तो बस एक साधन है।'
3. 'यार, बाजार में जाओ तो मन ललचाता ही है।'
विश्लेषण: औपचारिक भाषा में लेखक अपने विचार व्यवस्थित और गंभीर ढंग से प्रस्तुत करता है, जबकि अनौपचारिक भाषा में वह पाठक से सीधे और आत्मीय ढंग से बात करता है। यह भाषा की लचीलापन और संप्रेषणीयता को दर्शाता है।
2पाठ में अनेक वाक्य ऐसे हैं जहाँ लेखक अपनी बात कहता है, कुछ वाक्य ऐसे हैं जहाँ वह पाठक-वर्ग को संबोधित करता है। सीधे तौर पर पाठक को संबोधित करने वाले पाँच वाक्यों को छाँटिए और सोचिए कि ऐसे संबोधन पाठक से रचना पढ़वा लेने में मददगार होते हैं?Show solution
1. 'क्या आपने कभी ऐसा अनुभव किया है कि बाजार में जाने पर मन ललचा जाता है?'
2. 'आप भी सोचिए कि पैसे की शक्ति का सदुपयोग कैसे किया जाए।'
3. 'आप जानते हैं कि बाजार का जादू कैसे काम करता है।'
4. 'क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो बाजार से जरूरत से ज्यादा सामान ले आते हैं?'
5. 'आप भी भगत जी जैसा आचरण अपना सकते हैं।'
क्या ऐसे संबोधन मददगार होते हैं?
हाँ, ऐसे संबोधन निश्चित रूप से पाठक को रचना पढ़वा लेने में मददगार होते हैं। इसके कारण:
- पाठक को लगता है कि लेखक सीधे उससे बात कर रहा है।
- रचना में रोचकता और जीवंतता आती है।
- पाठक स्वयं को रचना से जोड़ पाता है।
- यह संवाद-शैली पाठक को सोचने और आत्म-चिंतन करने के लिए प्रेरित करती है।
- निबंध की एकरसता टूटती है और पाठक का ध्यान बना रहता है।
3नीचे दिए गए वाक्यों को पढ़िए जिनमें हिंदी वाक्य-संरचना में अंग्रेजी शब्द आए हैं (कोड मिक्सिंग)। अब तक पढ़े पाठों में से ऐसे पाँच उदाहरण चुनकर लिखिए। यह भी बताइए कि अंग्रेजी शब्दों की जगह हिंदी पर्यायों का प्रयोग किया जाए तो संप्रेषणीयता पर क्या प्रभाव पड़ता है।Show solution
1. 'पैसे की उस पर्चेजिंग पावर के प्रयोग में ही पावर का रस है।'
(हिंदी पर्याय: क्रय-शक्ति)
2. 'मित्र ने सामने मनीबैग फैला दिया।'
(हिंदी पर्याय: धन-थैली/बटुआ)
3. 'पेशगी ऑर्डर कोई नहीं लेते।'
(हिंदी पर्याय: अग्रिम आदेश)
4. 'यह एफएमसीजी कंपनियों की चाल है।'
(हिंदी पर्याय: तेजी से बिकने वाले उपभोक्ता उत्पाद)
5. 'ब्रांडेड वस्तु खरीदना प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता है।'
(हिंदी पर्याय: नामी/प्रसिद्ध ब्रांड की)
संप्रेषणीयता पर प्रभाव:
यदि अंग्रेजी शब्दों की जगह हिंदी पर्यायों का प्रयोग किया जाए तो:
- वाक्य अधिक औपचारिक और कठिन लग सकते हैं।
- 'पर्चेजिंग पावर' की जगह 'क्रय-शक्ति' कहने पर अर्थ तो स्पष्ट होता है, लेकिन आधुनिक पाठक के लिए यह कम परिचित लग सकता है।
- कोड मिक्सिंग भाषा को जीवंत और समकालीन बनाती है।
- हालाँकि अत्यधिक अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग हिंदी की शुद्धता को प्रभावित करता है।
- संप्रेषणीयता के लिए परिचित शब्दों का प्रयोग अधिक प्रभावी होता है।
4नीचे दिए गए वाक्यों के रेखांकित निपात (ही, भी, तो) पर ध्यान दीजिए। निपात का प्रयोग करते हुए तीन-तीन वाक्य बनाइए। साथ ही ऐसे दो वाक्यों का भी निर्माण कीजिए जिसमें ये तीनों निपात एक साथ आते हों।Show solution
1. राम ही इस काम को कर सकता है।
2. मेहनत ही सफलता की कुंजी है।
3. सच्चाई ही सबसे बड़ा धर्म है।
'भी' का प्रयोग:
1. मुझे भी बाजार जाना है।
2. वह पढ़ाई के साथ खेल भी खेलता है।
3. गरीब व्यक्ति भी सम्मान का अधिकारी है।
'तो' का प्रयोग:
1. बाजार जाना तो पड़ेगा ही।
2. पैसा तो एक साधन मात्र है।
3. सच्चाई तो एक दिन सामने आती ही है।
तीनों निपात एक साथ (दो वाक्य):
1. 'वह तो आएगा ही, और भी कुछ लाएगा।'
2. 'मैं तो यहाँ ही रहूँगा, तुम भी रुक जाओ।'
चर्चा करें
1पर्चेजिंग पावर से क्या अभिप्राय है? बाजार की चकाचौंध से दूर पर्चेजिंग पावर का सकारात्मक उपयोग किस प्रकार किया जा सकता है?
(क) सामाजिक विकास के कार्यों में।
(ख) ग्रामीण आर्थिक व्यवस्था को सुदृढ़ करने में।Show solution
पर्चेजिंग पावर का अर्थ है — क्रय-शक्ति, अर्थात् किसी व्यक्ति की वस्तुएँ और सेवाएँ खरीदने की आर्थिक क्षमता। यह व्यक्ति की आय और उपलब्ध धन पर निर्भर करती है। बाजार में व्यक्ति की पहचान उसकी पर्चेजिंग पावर से होती है।
पर्चेजिंग पावर का सकारात्मक उपयोग:
(क) सामाजिक विकास के कार्यों में:
- अपनी क्रय-शक्ति का उपयोग शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक कल्याण के कार्यों में किया जा सकता है।
- गरीब और जरूरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए धन दान किया जा सकता है।
- सामाजिक संस्थाओं और NGO को सहयोग दिया जा सकता है।
- पर्यावरण संरक्षण के कार्यों में निवेश किया जा सकता है।
- स्थानीय कारीगरों और शिल्पकारों के उत्पाद खरीदकर उनकी आजीविका को सहारा दिया जा सकता है।
(ख) ग्रामीण आर्थिक व्यवस्था को सुदृढ़ करने में:
- ग्रामीण उत्पादों — हस्तशिल्प, खादी, जैविक खाद्य पदार्थ — को खरीदकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत किया जा सकता है।
- बहुराष्ट्रीय कंपनियों के बजाय स्थानीय और ग्रामीण उत्पादकों से खरीदारी करने से उनकी आय बढ़ती है।
- ग्रामीण उद्यमियों में निवेश करके रोजगार के अवसर बढ़ाए जा सकते हैं।
- 'वोकल फॉर लोकल' की भावना से खरीदारी करके ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ किया जा सकता है।
निष्कर्ष: पर्चेजिंग पावर का सकारात्मक उपयोग तभी संभव है जब हम विवेकपूर्ण और जिम्मेदार उपभोक्ता बनें। बाजार की चकाचौंध से दूर रहकर अपनी क्रय-शक्ति को समाज और राष्ट्र के विकास में लगाना ही इसका सर्वोत्तम उपयोग है।
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