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Chapter 21 of 38
NCERT Solutions

पद (विद्यापति) — NCERT Solutions

Mizoram Board · Class 12 · Hindi

NCERT Solutions for पद (विद्यापति), Mizoram Board Class 12 Hindi: 13 textbook questions solved step by step. Covers प्रश्न-अभ्यास and योग्यता-विस्तार.

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विद्यापति के जन्म, मृत्यु, आश्रयदाता राजा शिवसिंह के साथ संबंध, और उनके साहित्यिक काल को दर्शाने वाली एक समयरेखा।
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One of 5 illustrations for पद (विद्यापति) in Super Tutor — alongside flashcards, concept maps and practice questions.

13 Questions Solved · 2 Sections

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प्रश्न-अभ्यास

1प्रियतमा के दुख के क्या कारण हैं?Show solution

दिया गया है: विद्यापति के पदों में नायिका की विरह-दशा का वर्णन है।

उत्तर:
प्रियतमा के दुख के निम्नलिखित कारण हैं—

  1. प्रियतम का वियोग: नायिका का प्रिय (माधव) उससे दूर है। उसके बिना भवन में अकेले रहना उसे असह्य लगता है।
  2. सावन का महीना: सावन का मास प्रेम और मिलन का प्रतीक है, किंतु प्रियतम के बिना यह ऋतु नायिका की पीड़ा को और बढ़ा देती है।
  3. प्रकृति का विरोधाभासी प्रभाव: कुसुमित वन, कोयल का कलरव और भौरों की गुनगुनाहट — ये सब मिलन के प्रतीक हैं, परंतु विरह में ये नायिका की वेदना को और तीव्र कर देते हैं।
  4. नयनों की अतृप्ति: जन्म भर प्रिय को देखते रहने पर भी नेत्र तृप्त नहीं हुए और अब प्रिय सामने नहीं है।
  5. शरीर का क्षीण होना: प्रियतम के विरह में नायिका का शरीर चतुर्दशी के चाँद की तरह दिन-प्रतिदिन घटता जा रहा है।

निष्कर्ष: प्रियतम का वियोग ही प्रियतमा के समस्त दुखों का मूल कारण है।

2कवि 'नयन न तिरपित भेल' के माध्यम से विरहिणी नायिका की किस मनोदशा को व्यक्त करना चाहता है?Show solution

दिया गया है: पंक्ति — 'जनम अवधि हम रूप निहारल नयन न तिरपित भेल।'

प्रयुक्त भाव: विरह-वेदना एवं प्रेम की अनंतता।

उत्तर:
इस पंक्ति के माध्यम से कवि विद्यापति विरहिणी नायिका की अतृप्त प्रेम-पिपासा को व्यक्त करना चाहते हैं। नायिका कहती है कि उसने जन्म भर अपने प्रिय का रूप निहारा, फिर भी उसके नेत्र तृप्त नहीं हुए। इसका आशय यह है कि सच्चा प्रेम कभी तृप्त नहीं होता — जितना अधिक प्रिय को देखो, उतनी ही और देखने की लालसा बढ़ती जाती है।

नायिका की मनोदशा यह है कि —

  • प्रिय का सौंदर्य इतना अपार है कि आँखें उसे देखते-देखते कभी संतुष्ट नहीं हो सकीं।
  • अब जब प्रिय सामने नहीं है, तो यह अतृप्ति और भी पीड़ादायक हो गई है।
  • नायिका की विरह-वेदना इसी अतृप्ति के कारण असह्य है।

निष्कर्ष: कवि यह बताना चाहता है कि प्रेम की कोई सीमा नहीं होती; वह जितना मिलता है, उतनी ही उसकी चाह बढ़ती जाती है।

3नायिका के प्राण तृप्त न हो पाने का कारण अपने शब्दों में लिखिए।Show solution

दिया गया है: विद्यापति के पदों में नायिका की विरह-दशा।

उत्तर:
नायिका के प्राण तृप्त न हो पाने के निम्नलिखित कारण हैं—

  1. नेत्रों की अतृप्ति: नायिका ने जन्म भर प्रिय का रूप देखा, परंतु नेत्र कभी तृप्त नहीं हुए। प्रिय का सौंदर्य इतना अनंत था कि देखते-देखते भी मन नहीं भरा।
  1. कानों की अतृप्ति: प्रिय की मधुर वाणी को कानों से सुना, किंतु वह मधुर ध्वनि कानों के रास्ते हृदय तक पहुँचकर भी प्राणों को तृप्त न कर सकी — 'सुति पथ परस न गेल' अर्थात् श्रुति-मार्ग से वह स्पर्श नहीं हो पाया जो आत्मा को तृप्त करे।
  1. प्रेम की अनंतता: सच्चे प्रेम की यही विशेषता है कि वह जितना मिलता है, उतनी ही और पाने की इच्छा जागती है। इसलिए प्रिय के साथ बिताए क्षण भी प्राणों को पूर्ण तृप्ति नहीं दे सके।

निष्कर्ष: प्रेम की असीमितता और प्रिय के अनंत सौंदर्य के कारण नायिका के प्राण कभी तृप्त नहीं हो पाए।

4'सेह पिरित अनुराग बखानिअ तिल-तिल नूतन होए' से लेखक का क्या आशय है?Show solution

दिया गया है: विद्यापति की पंक्ति — 'सेह पिरित अनुराग बखानिअ तिल-तिल नूतन होए।'

शब्दार्थ: पिरित = प्रीत/प्रेम; अनुराग = अनुराग; बखानिअ = बखान करना/वर्णन करना; तिल-तिल = पल-पल; नूतन = नया।

आशय:
इस पंक्ति में कवि विद्यापति उस प्रेम और अनुराग का वर्णन कर रहे हैं जो पल-पल नया होता रहता है। आशय यह है कि —

  • सच्चा प्रेम कभी पुराना नहीं पड़ता; वह प्रतिपल नवीन और ताज़ा बना रहता है।
  • जिस प्रेम और अनुराग की बात की जा रही है, वह इतना विशेष है कि उसका जितना भी बखान किया जाए, वह कम है — क्योंकि वह प्रेम हर क्षण नए रूप में प्रकट होता है।
  • नायिका और माधव के बीच का प्रेम-संबंध ऐसा ही है — वह समय के साथ घटता नहीं, बल्कि और अधिक गहरा और नवीन होता जाता है।

निष्कर्ष: कवि का आशय है कि सच्चा प्रेम शाश्वत और नित्य नूतन होता है — वह जितना पुराना होता है, उतना ही अधिक ताज़ा और प्रगाढ़ लगता है।

5कोयल और भौरों के कलरव का नायिका पर क्या प्रभाव पड़ता है?Show solution

दिया गया है: पंक्तियाँ — 'कोकिल-कलरव, मधुकर-धुनि सुनि, कर देइ झाँपइ कान।'

उत्तर:
सामान्यतः कोयल का कलरव और भौरों की गुनगुनाहट प्रेम और मिलन के प्रतीक माने जाते हैं तथा मन को आनंदित करते हैं। परंतु विरहिणी नायिका पर इनका विपरीत और पीड़ादायक प्रभाव पड़ता है —

  1. कानों पर हाथ रख लेना: कोयल का मधुर स्वर और भौरों की गुनगुनाहट सुनकर नायिका अपने कानों पर हाथ रख लेती है, क्योंकि ये ध्वनियाँ उसे प्रिय के साथ बिताए सुखद क्षणों की याद दिलाती हैं।
  1. विरह-वेदना का तीव्र होना: ये मधुर ध्वनियाँ नायिका की विरह-पीड़ा को और अधिक बढ़ा देती हैं। जो वस्तु दूसरों के लिए आनंददायक है, वही विरहिणी के लिए असह्य यंत्रणा का कारण बन जाती है।
  1. नेत्रों का मुँदना: फूलों से भरे वन को देखकर भी नायिका की आँखें बंद हो जाती हैं, क्योंकि यह सौंदर्य उसे प्रिय की याद दिलाता है।

निष्कर्ष: विरह की स्थिति में प्रकृति की मधुर ध्वनियाँ और सौंदर्य नायिका की पीड़ा को और गहरा कर देते हैं।

6कातर दृष्टि से चारों तरफ प्रियतम को ढूँढ़ने की मनोदशा को कवि ने किन शब्दों में व्यक्त किया है?Show solution

दिया गया है: विद्यापति के पद में नायिका की विरह-दशा का वर्णन।

उत्तर:
कवि विद्यापति ने नायिका की इस मनोदशा को निम्नलिखित शब्दों में व्यक्त किया है —

’कातर दिठि करि, चौदिस हेरि-हेरि, नयन गरए जल-धारा।’\text{'कातर दिठि करि, चौदिस हेरि-हेरि, नयन गरए जल-धारा।'}

भावार्थ:

  • 'कातर दिठि करि' — नायिका की दृष्टि दुखी और व्याकुल है। उसकी आँखों में आतुरता और पीड़ा है।
  • 'चौदिस हेरि-हेरि' — वह चारों दिशाओं में बार-बार देखती है, प्रियतम को ढूँढ़ती है, परंतु वह कहीं नहीं मिलता।
  • 'नयन गरए जल-धारा' — प्रिय के न मिलने पर उसके नेत्रों से अश्रुधारा बह निकलती है।

इसके अतिरिक्त — 'धरनी धरि धनि कत बेरि बइसइ, पुनि तहि उठइ न पारा' — नायिका बार-बार धरती पर बैठ जाती है और फिर उठ भी नहीं पाती — यह उसकी शारीरिक और मानसिक दुर्बलता को दर्शाता है।

निष्कर्ष: कवि ने अत्यंत मार्मिक शब्दों में नायिका की व्याकुल, कातर और अश्रुपूर्ण दशा का चित्रण किया है।

7निम्नलिखित शब्दों के तत्सम रूप लिखिए— तिरपित, छन, बिदगध, निहारल, पिरित, साओन, अपजस, छिन, तोहारा, कातिकShow solution

दिया गया है: मैथिली/अपभ्रंश के शब्द।

नियम: तत्सम रूप वह संस्कृत मूल शब्द होता है जिससे ये प्रादेशिक/अपभ्रंश रूप बने हैं।

मैथिली/अपभ्रंश शब्दतत्सम रूप
तिरपिततृप्त
छनक्षण
बिदगधविदग्ध
निहारलनिहारना (दृष्टि/निरीक्षण)
पिरितप्रीति
साओनश्रावण
अपजसअपयश
छिनक्षीण
तोहारातुम्हारा (युष्मद्)
कातिककार्तिक
8(क)निम्नलिखित का आशय स्पष्ट कीजिए— (क) एकसरि भवन पिआ बिनु रे मोहि रहलो न जाए। सखि अनकर दुख दारून रे जग के पतिआए।।

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8(ख)निम्नलिखित का आशय स्पष्ट कीजिए— (ख) जनम अवधि हम रूप निहारल नयन न तिरपित भेल।। सेहो मधुर बोल स्वनहि सूनल सुति पथ परस न गेल।।

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8(ग)निम्नलिखित का आशय स्पष्ट कीजिए— (ग) कुसुमित कानन हेरि कमलमुखि, मृदि रहए दु नयान। कोकिल-कलरव, मधुकर-धुनि सुनि, कर देइ झाँपइ कान।।

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योग्यता-विस्तार

1पठित पाठ के आधार पर विद्यापति के काव्य में प्रयुक्त भाषा की पाँच विशेषताएँ उदाहरण सहित लिखिए।

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2विद्यापति के गीतों का आडियो रिकार्ड बाजार में उपलब्ध हैं, उसको सुनिए।

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3विद्यापति और जायसी प्रेम के कवि हैं। दोनों की तुलना कीजिए।

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6 more solved questions in पद (विद्यापति)

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Frequently Asked Questions

What are the important topics in पद (विद्यापति) for Mizoram Board Class 12 Hindi?
Key topics in पद (विद्यापति) include विद्यापति का परिचय, तीनों पदों का सार, महत्त्वपूर्ण भाव और काव्य-विशेषताएँ, पद 1 का भावार्थ. Study these first, then practise questions on each for the Mizoram Board Class 12 board exam.
Are these NCERT Solutions for पद (विद्यापति) free?
The first 7 of the 13 solutions on this page are open to read. The other 6 are free with a Super Tutor account — signing up is free and needs no card.
How should I revise पद (विद्यापति) for the Mizoram Board Class 12 board exam?
Learn the core ideas first, then work through the 46 practice questions on पद (विद्यापति). Revise definitions regularly and use flashcards for quick recall before the exam.

Sources & Official References

Content is aligned to the official syllabus. Refer to the board website for the latest curriculum.

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