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Chapter 27 of 38
NCERT Solutions

सुमिरिनी के मनके (पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी) — NCERT Solutions

Jharkhand Board · Class 12 · Hindi

NCERT Solutions for सुमिरिनी के मनके (पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी), Jharkhand Board Class 12 Hindi: 27 textbook questions solved step by step.

43 questions28 flashcards5 concepts

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27 Questions Solved · 6 Sections

The first 14 solutions are open to read. The other 13 are free with a Super Tutor account.

प्रश्न-अभ्यास — (क) बालक बच गया

1बालक से उसकी उम्र और योग्यता से ऊपर के कौन-कौन से प्रश्न पूछे गए?Show solution

दिया गया है: पाठ 'सुमिरिनी के मनके' में एक बालक से वार्षिकोत्सव के अवसर पर प्रश्न पूछे जाते हैं।

उत्तर:
बालक से उसकी उम्र और योग्यता से कहीं ऊपर के निम्नलिखित प्रश्न पूछे गए—

  1. देश की वर्तमान राजनीतिक स्थिति के बारे में प्रश्न।
  2. स्वराज्य और राष्ट्रसेवा के बारे में प्रश्न।
  3. जीवन का लक्ष्य क्या है — इस प्रकार के दार्शनिक प्रश्न।
  4. बड़े होकर क्या करोगे — इस प्रकार के भविष्य-संबंधी प्रश्न जो एक छोटे बालक की समझ से परे थे।

ये सभी प्रश्न उस बालक की आयु और मानसिक स्तर के अनुकूल नहीं थे। ये प्रश्न बड़े-बड़े नेताओं और विद्वानों के लिए उचित होते, किसी छोटे बच्चे के लिए नहीं।

2बालक ने क्यों कहा कि मैं यावज्जन्म लोकसेवा करूँगा?Show solution

दिया गया है: बालक से उसके जीवन के लक्ष्य के बारे में पूछा गया।

उत्तर:
बालक ने 'यावज्जन्म लोकसेवा करूँगा' इसलिए कहा क्योंकि—

  1. उसे बड़ों द्वारा रटाया-पढ़ाया गया था। वह स्वयं इस उत्तर का अर्थ नहीं जानता था।
  2. वार्षिकोत्सव जैसे सार्वजनिक अवसरों पर बच्चों को ऐसे 'आदर्श' उत्तर देने के लिए तैयार किया जाता था जो बड़ों को प्रभावित करें।
  3. यह उत्तर उसकी अपनी स्वाभाविक इच्छा नहीं थी, बल्कि बड़ों की अपेक्षाओं के अनुरूप रटा हुआ जवाब था।
  4. बच्चे पर समाज और परिवार का दबाव था कि वह 'बड़ी-बड़ी' बातें करे, जिससे सभी उसकी प्रशंसा करें।

इस प्रकार यह उत्तर बालक की स्वाभाविक प्रवृत्ति का नहीं, बल्कि थोपी गई मानसिकता का परिणाम था।

3बालक द्वारा इनाम में लड्डू माँगने पर लेखक ने सुख की साँस क्यों भरी?Show solution

दिया गया है: बालक ने इनाम में लड्डू माँगा, जिस पर लेखक ने राहत की साँस ली।

उत्तर:
लेखक ने सुख की साँस इसलिए भरी क्योंकि—

  1. लड्डू माँगना बालक की स्वाभाविक, निर्दोष और उम्र के अनुकूल इच्छा थी। इससे सिद्ध हुआ कि बालक के भीतर का बच्चा अभी जीवित है।
  2. इससे लेखक को विश्वास हुआ कि बालक की प्राकृतिक प्रवृत्तियाँ पूरी तरह नष्ट नहीं हुई हैं।
  3. लेखक के अनुसार यह 'जीवित वृक्ष के हरे पत्तों का मधुर मर्मर' था — अर्थात् बालक में जीवन की स्वाभाविक स्पंदन अभी शेष थी।
  4. यदि बालक ने कोई 'आदर्शवादी' या रटा हुआ उत्तर दिया होता, तो वह 'मरे काठ की अलमारी की खड़खड़ाहट' होती।

इस प्रकार लड्डू माँगना इस बात का प्रमाण था कि बालक की बाल-सुलभ स्वाभाविकता अभी जीवित है और उसे बचाया जा सकता है।

4बालक की प्रवृत्तियों का गला घोटना अनुचित है, पाठ में ऐसा आभास किन स्थलों पर होता है कि उसकी प्रवृत्तियों का गला घोटा जाता है?Show solution

दिया गया है: पाठ में बालक की स्वाभाविक प्रवृत्तियों को दबाने के संकेत मिलते हैं।

उत्तर:
पाठ में निम्नलिखित स्थलों पर बालक की प्रवृत्तियों का गला घोटने का आभास होता है—

  1. उम्र से बड़े प्रश्न पूछना: बालक से राष्ट्रसेवा, स्वराज्य जैसे विषयों पर प्रश्न पूछे जाते हैं जो उसकी समझ से परे हैं। इससे उसकी बाल-सुलभ जिज्ञासा दब जाती है।
  1. रटे-रटाए उत्तर देना: बालक को 'यावज्जन्म लोकसेवा करूँगा' जैसे उत्तर रटाए जाते हैं। इससे उसकी मौलिक सोच और स्वतंत्र अभिव्यक्ति का गला घुटता है।
  1. सार्वजनिक प्रदर्शन: वार्षिकोत्सव में बालक को नुमाइश की वस्तु बनाया जाता है। उससे बड़ों को प्रभावित करने वाले उत्तर दिलवाए जाते हैं।
  1. स्वाभाविक इच्छाओं की उपेक्षा: बालक की स्वाभाविक इच्छाएँ — खेलना, खाना, मस्ती करना — इन सबको दबाकर उसे 'आदर्श बालक' बनाने की कोशिश की जाती है।

इस प्रकार शिक्षा और समाज दोनों मिलकर बालक की स्वाभाविक प्रवृत्तियों का गला घोटते हैं, जो अनुचित है।

5'बालक बच गया। उसके बचने की आशा है क्योंकि वह लड्डू की पुकार जीवित वृक्ष के हरे पत्तों का मधुर मर्मर था, मरे काठ की अलमारी की सिर दुखानेवाली खड़खड़ाहट नहीं' — कथन के आधार पर बालक की स्वाभाविक प्रवृत्तियों का उल्लेख कीजिए।Show solution

दिया गया है: उपर्युक्त कथन लेखक गुलेरी जी का है जो बालक की स्वाभाविकता के बारे में है।

प्रयुक्त प्रतीक:

  • 'जीवित वृक्ष के हरे पत्तों का मधुर मर्मर' = बालक की स्वाभाविक, निर्दोष, जीवंत प्रवृत्तियाँ।
  • 'मरे काठ की अलमारी की खड़खड़ाहट' = रटे-रटाए, कृत्रिम, थोपे गए विचार।

बालक की स्वाभाविक प्रवृत्तियाँ:

  1. भोजन की स्वाभाविक इच्छा: लड्डू माँगना — यह उसकी उम्र के अनुकूल, निर्दोष और प्राकृतिक इच्छा है।
  1. सरलता और निश्छलता: बालक में कोई दिखावा नहीं है। वह जो चाहता है, सीधे माँग लेता है।
  1. मौलिकता: रटे हुए उत्तरों के बावजूद उसके भीतर का बच्चा अपनी असली इच्छा व्यक्त कर देता है।
  1. जिज्ञासा और खेल-भावना: बच्चे की स्वाभाविक प्रवृत्ति खेलना, खाना और आनंद लेना है।
  1. स्वतंत्र अभिव्यक्ति: बड़ों के दबाव के बावजूद वह अपनी असली भावना व्यक्त कर देता है।

निष्कर्ष: लेखक का मानना है कि ऐसी स्वाभाविक प्रवृत्तियाँ ही बालक के सच्चे विकास का आधार हैं। इन्हें दबाना उचित नहीं।

6उम्र के अनुसार बालक में योग्यता का होना आवश्यक है किन्तु उसका ज्ञानी या दार्शनिक होना जरूरी नहीं। 'लर्निंग आउटकम' के बारे में विचार कीजिए।Show solution

दिया गया है: शिक्षा में 'लर्निंग आउटकम' (अधिगम परिणाम) की अवधारणा।

विचार:

'लर्निंग आउटकम' का अर्थ है — शिक्षा के बाद बालक में क्या परिवर्तन आया, उसने क्या सीखा और वह उसे व्यावहारिक जीवन में कैसे उपयोग कर सकता है।

मुख्य बिंदु:

  1. उम्र के अनुकूल शिक्षा: प्रत्येक आयु-वर्ग के लिए अलग-अलग 'लर्निंग आउटकम' निर्धारित होने चाहिए। छोटे बच्चे से दार्शनिक प्रश्नों की अपेक्षा रखना अनुचित है।
  1. रटना बनाम समझना: वास्तविक 'लर्निंग आउटकम' तब प्राप्त होता है जब बालक रटे नहीं, बल्कि समझे। रटी हुई बातें 'मरे काठ की खड़खड़ाहट' हैं।
  1. समग्र विकास: 'लर्निंग आउटकम' केवल परीक्षा में अंक नहीं है, बल्कि बालक का शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक विकास है।
  1. स्वाभाविक प्रवृत्तियों का सम्मान: सच्चा 'लर्निंग आउटकम' वही है जो बालक की स्वाभाविक जिज्ञासा और रचनात्मकता को बढ़ावा दे।
  1. व्यावहारिक ज्ञान: बालक को ऐसी शिक्षा मिलनी चाहिए जो उसके दैनिक जीवन में काम आए।

निष्कर्ष: गुलेरी जी का संदेश यही है कि शिक्षा बालक की उम्र, रुचि और स्वाभाविक प्रवृत्तियों के अनुकूल होनी चाहिए। तभी सच्चा 'लर्निंग आउटकम' प्राप्त होगा।

प्रश्न-अभ्यास — (ख) घड़ी के पुर्जे

1लेखक ने धर्म का रहस्य जानने के लिए 'घड़ी के पुर्जे' का दृष्टांत क्यों दिया है?Show solution

दिया गया है: लेखक गुलेरी जी ने धर्म को समझाने के लिए 'घड़ी के पुर्जे' का उदाहरण दिया है।

उत्तर:
लेखक ने 'घड़ी के पुर्जे' का दृष्टांत निम्नलिखित कारणों से दिया है—

  1. धर्म की जटिलता को सरल बनाना: जिस प्रकार घड़ी के पुर्जों को समझना एक विशेष कला है, उसी प्रकार धर्म के रहस्य को समझना भी जटिल है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि आम आदमी इसे समझ ही नहीं सकता।
  1. एकाधिकार पर व्यंग्य: जैसे कोई घड़ी को बंद करके रख दे और दूसरों को हाथ न लगाने दे, वैसे ही कुछ धर्माचार्य धर्म को अपनी मुट्ठी में बंद रखते हैं। यह दृष्टांत इस एकाधिकार पर व्यंग्य करता है।
  1. सामान्य जन का अधिकार: घड़ी का उपयोग सभी करते हैं, उसके पुर्जे जानना सबके लिए आवश्यक नहीं। किंतु जो जानना चाहे, उसे रोकना अनुचित है। इसी प्रकार धर्म पर सबका अधिकार है।
  1. व्यावहारिक उदाहरण: घड़ी एक ऐसी वस्तु है जिसे सभी समझते हैं। इसके माध्यम से लेखक ने धर्म की जटिल बात को सरल और प्रभावशाली ढंग से समझाया है।

निष्कर्ष: यह दृष्टांत धर्म पर कुछ लोगों के एकाधिकार का विरोध करता है और आम आदमी के धर्म-संबंधी अधिकार की पुष्टि करता है।

2'धर्म का रहस्य जानना वेदशास्त्रज्ञ धर्माचार्यों का ही काम है।' आप इस कथन से कहाँ तक सहमत हैं? धर्म संबंधी अपने विचार व्यक्त कीजिए।Show solution

दिया गया है: उपर्युक्त कथन धर्म पर धर्माचार्यों के एकाधिकार की बात करता है।

मेरे विचार:

मैं इस कथन से आंशिक रूप से सहमत हूँ। मेरे विचार निम्नलिखित हैं—

सहमति के बिंदु:

  • वेदशास्त्रों का गहन अध्ययन करने वाले विद्वान धर्म के सूक्ष्म रहस्यों को बेहतर समझ सकते हैं।
  • धर्म-ग्रंथों की व्याख्या के लिए विशेष ज्ञान आवश्यक है।

असहमति के बिंदु:

  1. धर्म केवल कर्मकांड और शास्त्र-ज्ञान तक सीमित नहीं है। धर्म का मूल अर्थ है — सत्य, अहिंसा, करुणा, न्याय — जिन्हें कोई भी सामान्य व्यक्ति समझ और अपना सकता है।
  2. यदि धर्म केवल धर्माचार्यों की मुट्ठी में रहे तो आम आदमी उससे कट जाएगा और धर्म का उद्देश्य ही विफल हो जाएगा।
  3. कबीर, तुलसी, मीरा जैसे संतों ने बिना किसी विशेष शास्त्र-ज्ञान के धर्म के सच्चे स्वरूप को समझा और समाज को दिखाया।
  4. धर्म व्यक्तिगत आचरण और नैतिकता का विषय है, जो प्रत्येक व्यक्ति के जीवन से जुड़ा है।

निष्कर्ष: धर्म का रहस्य जानने का अधिकार सबको है। धर्माचार्य मार्गदर्शक हो सकते हैं, एकाधिकारी नहीं।

3घड़ी समय का ज्ञान कराती है। क्या धर्म संबंधी मान्यताएँ या विचार अपने समय का बोध नहीं कराते?Show solution

दिया गया है: घड़ी और धर्म की तुलना के संदर्भ में यह प्रश्न है।

उत्तर:
हाँ, धर्म संबंधी मान्यताएँ और विचार निश्चित रूप से अपने समय का बोध कराते हैं। इसे निम्न प्रकार समझा जा सकता है—

  1. सामाजिक दर्पण: प्रत्येक युग की धर्म-संबंधी मान्यताएँ उस युग की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियों को प्रतिबिंबित करती हैं। जैसे वैदिक काल की मान्यताएँ उस समय के कृषि-प्रधान समाज को दर्शाती हैं।
  1. परिवर्तन का संकेत: जब धर्म में सुधार आंदोलन होते हैं — जैसे भक्ति आंदोलन, आर्य समाज — तो वे अपने समय की सामाजिक आवश्यकताओं का बोध कराते हैं।
  1. नैतिक मानदंड: धर्म की मान्यताएँ बताती हैं कि उस समय समाज में क्या उचित और क्या अनुचित माना जाता था।
  1. किंतु सीमा भी है: जब धर्म की मान्यताएँ समय के साथ नहीं बदलतीं और पुरानी रूढ़ियों से चिपकी रहती हैं, तो वे 'बंद घड़ी' की तरह हो जाती हैं — जो समय नहीं बताती।

निष्कर्ष: धर्म की जीवंत मान्यताएँ समय का बोध कराती हैं, किंतु जड़ और रूढ़िवादी मान्यताएँ समय से पीछे रह जाती हैं।

4धर्म अगर कुछ विशेष लोगों — वेदशास्त्रज्ञ धर्माचार्यों, मठाधीशों, पंडे-पुजारियों की मुट्ठी में है तो आम आदमी और समाज का उससे क्या संबंध होगा? अपनी राय लिखिए।Show solution

दिया गया है: धर्म पर कुछ विशेष लोगों के एकाधिकार की स्थिति।

मेरी राय:

यदि धर्म केवल कुछ विशेष लोगों की मुट्ठी में रहे तो आम आदमी और समाज पर इसके निम्नलिखित दुष्प्रभाव होंगे—

  1. अंधविश्वास का प्रसार: आम आदमी धर्म को समझे बिना केवल अंधे विश्वास से उसका पालन करेगा। इससे समाज में अंधविश्वास और पाखंड बढ़ेगा।
  1. शोषण: धर्म के ठेकेदार आम आदमी का शोषण करेंगे। पंडे-पुजारी और मठाधीश अपने स्वार्थ के लिए धर्म का दुरुपयोग करेंगे।
  1. सामाजिक विभाजन: धर्म पर एकाधिकार से समाज में ऊँच-नीच और जाति-भेद बढ़ेगा।
  1. धर्म का संकुचन: धर्म का वास्तविक स्वरूप — सत्य, करुणा, न्याय — छिप जाएगा और केवल कर्मकांड रह जाएगा।
  1. आम आदमी की दूरी: आम आदमी धर्म से कट जाएगा या उसके प्रति विद्रोही हो जाएगा।

निष्कर्ष: धर्म समाज की संपत्ति है। उसे किसी की मुट्ठी में बंद नहीं रहना चाहिए। धर्म का संबंध प्रत्येक व्यक्ति के जीवन और आचरण से है।

5'जहाँ धर्म पर कुछ मुट्ठीभर लोगों का एकाधिकार धर्म को संकुचित अर्थ प्रदान करता है वहीं धर्म का आम आदमी से संबंध उसके विकास एवं विस्तार का द्योतक है।' तर्क सहित व्याख्या कीजिए।Show solution

दिया गया है: उपर्युक्त कथन धर्म के दो पक्षों — एकाधिकार और जन-संबंध — की बात करता है।

व्याख्या:

प्रथम भाग — एकाधिकार से धर्म का संकुचन:

जब धर्म केवल वेदशास्त्रज्ञों, मठाधीशों और पंडे-पुजारियों तक सीमित रहता है, तो—

  • धर्म का अर्थ केवल कर्मकांड, यज्ञ, पूजा-पाठ तक सिमट जाता है।
  • धर्म के व्यापक मानवीय मूल्य — सत्य, अहिंसा, करुणा, न्याय — उपेक्षित हो जाते हैं।
  • धर्म एक 'बंद घड़ी' बन जाता है जो समय नहीं बताती।
  • समाज में पाखंड और अंधविश्वास पनपते हैं।

द्वितीय भाग — आम आदमी से संबंध से धर्म का विकास:

जब धर्म आम आदमी के जीवन से जुड़ता है, तो—

  • धर्म व्यावहारिक और जीवंत बनता है।
  • कबीर, तुलसी, मीरा जैसे संतों ने आम जनता से जुड़कर धर्म को नया अर्थ और विस्तार दिया।
  • भक्ति आंदोलन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है — जिसने धर्म को जाति और वर्ग की सीमाओं से मुक्त किया।
  • धर्म सामाजिक न्याय और मानवीय गरिमा का साधन बनता है।

निष्कर्ष: धर्म का सच्चा विकास और विस्तार तभी संभव है जब वह आम आदमी के जीवन से जुड़े और उसकी मुट्ठीभर लोगों की कैद से मुक्त हो।

6(क)निम्नलिखित का आशय स्पष्ट कीजिए — 'वेदशास्त्रज्ञ धर्माचार्यों का ही काम है कि घड़ी के पुर्जे जानें, तुम्हें इससे क्या?'Show solution

आशय:

इस कथन में लेखक उन धर्माचार्यों और पंडे-पुजारियों पर व्यंग्य कर रहे हैं जो आम आदमी को धर्म के रहस्य से दूर रखते हैं।

विस्तृत आशय:

'घड़ी के पुर्जे' धर्म के रहस्यों और शास्त्रों का प्रतीक है। धर्माचार्य कहते हैं कि धर्म की गहराई को समझना केवल उन्हीं का काम है, आम आदमी को इसमें दखल देने की आवश्यकता नहीं।

यह कथन उस मानसिकता का प्रतिनिधित्व करता है जो—

  1. धर्म को आम जनता की पहुँच से दूर रखना चाहती है।
  2. अपने ज्ञान और अधिकार को सुरक्षित रखने के लिए आम आदमी को अज्ञानी बनाए रखती है।
  3. धर्म को एक विशेषाधिकार बना देती है।

लेखक इस मानसिकता का विरोध करते हैं। उनका मानना है कि धर्म सबका है और सबको उसे समझने का अधिकार है।

6(ख)निम्नलिखित का आशय स्पष्ट कीजिए — 'अनाड़ी के हाथ में चाहे घड़ी मत दो पर जो घड़ीसाजी का इम्तहान पास कर आया है, उसे तो देखने दो।'Show solution

आशय:

इस कथन में लेखक एक तर्कसंगत और न्यायपूर्ण बात कह रहे हैं।

विस्तृत आशय:

'घड़ी' = धर्म, 'अनाड़ी' = अज्ञानी व्यक्ति, 'घड़ीसाजी का इम्तहान पास करना' = धर्म-शास्त्रों का अध्ययन करना।

लेखक का तर्क है—

  1. यदि कोई व्यक्ति सच में अज्ञानी है और धर्म को नहीं समझता, तो उसे धर्म की व्याख्या करने से रोका जा सकता है — यह उचित है।
  2. किंतु जो व्यक्ति शास्त्रों का अध्ययन कर चुका है, जिसने धर्म को समझने की योग्यता प्राप्त की है — उसे धर्म पर विचार करने और अपनी राय देने से रोकना सर्वथा अनुचित है।
  3. यह कथन उन धर्माचार्यों पर व्यंग्य है जो अपने से बाहर किसी को भी — चाहे वह कितना भी विद्वान हो — धर्म पर बोलने का अधिकार नहीं देते।

निष्कर्ष: लेखक का संदेश है कि ज्ञान और योग्यता के आधार पर धर्म-चर्चा का अधिकार सबको मिलना चाहिए।

6(ग)निम्नलिखित का आशय स्पष्ट कीजिए — 'हमें तो धोखा होता है कि परदादा की घड़ी जेब में डाले फिरते हो, वह बंद हो गई है, तुम्हें न चाबी देना आता है न पुर्जे सुधारना, तो भी दूसरों को हाथ नहीं लगाने देते।'Show solution

आशय:

यह कथन पाठ का सबसे महत्त्वपूर्ण और व्यंग्यपूर्ण कथन है।

प्रतीकार्थ:

  • 'परदादा की घड़ी' = पूर्वजों से मिला धर्म और उसकी परंपराएँ।
  • 'बंद हो गई है' = धर्म की मान्यताएँ पुरानी और अप्रासंगिक हो गई हैं।
  • 'चाबी देना न आना' = धर्म को नए युग के अनुसार व्याख्यायित करने में असमर्थता।
  • 'पुर्जे सुधारना न आना' = धर्म में आवश्यक सुधार करने की इच्छाशक्ति और क्षमता का अभाव।
  • 'दूसरों को हाथ न लगाने देना' = सुधारकों और विद्वानों को धर्म पर विचार करने से रोकना।

विस्तृत आशय:

लेखक का व्यंग्य यह है कि धर्म के ठेकेदार पुरानी परंपराओं को जस का तस लेकर चल रहे हैं। वे न तो उन्हें नए युग के अनुसार बदल सकते हैं और न ही किसी सुधारक को बदलने देते हैं। यह स्थिति उस व्यक्ति जैसी है जो बंद पड़ी घड़ी को जेब में रखे घूमता है — न खुद ठीक करता है, न किसी घड़ीसाज को देता है।

निष्कर्ष: यह कथन धार्मिक रूढ़िवाद और सुधार-विरोध पर तीखा व्यंग्य है।

प्रश्न-अभ्यास — (ग) ढेले चुन लो

1वैदिककाल में हिंदुओं में कैसी लाटरी चलती थी जिसका जिक्र लेखक ने किया है?

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2'दुर्लभ बंधु' की पेटियों की कथा लिखिए।

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3'जीवन साथी' का चुनाव मिट्टी के ढेलों पर छोड़ने के कौन-कौन से फल प्राप्त होते हैं?

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4मिट्टी के ढेलों के संदर्भ में कबीर की साखी की व्याख्या कीजिए — पत्थर पूजे हरि मिलें तो तू पूज पहार। इससे तो चक्की भली, पीस खाय संसार।।

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5जन्मभर के साथी का चुनाव मिट्टी के ढेले पर छोड़ना बुद्धिमानी नहीं है। इसलिए बेटी का शिक्षित होना अनिवार्य है। 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' के संदर्भ में विचार कीजिए।

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6(क)निम्नलिखित का आशय स्पष्ट कीजिए — 'अपनी आँखों से जगह देखकर, अपने हाथ से चुने हुए मिट्टी के डगलों पर भरोसा करना क्यों बुरा है और लाखों करोड़ों कोस दूर बैठे बड़े-बड़े मट्टी और आग के ढेलों — मंगल, शनिश्चर और बृहस्पति की कल्पित चाल के कल्पित हिसाब का भरोसा करना क्यों अच्छा है।'

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6(ख)निम्नलिखित का आशय स्पष्ट कीजिए — 'आज का कबूतर अच्छा है कल के मोर से, आज का पैसा अच्छा है कल की मोहर से। आँखों देखा ढेला अच्छा ही होना चाहिए लाखों कोस के तेज पिंड से।'

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योग्यता-विस्तार — (क) बालक बच गया

1बालक की स्वाभाविक प्रवृत्तियों के विकास में 'रटना' बाधक है — कक्षा में संवाद कीजिए।

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2ज्ञान के क्षेत्र में 'रटने' का निषेध है किंतु क्या आप रटने में विश्वास करते हैं। अपने विचार प्रकट कीजिए।

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योग्यता-विस्तार — (ख) घड़ी के पुर्जे

1धर्म संबंधी अपनी मान्यता पर लेख/निबंध लिखिए।

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2'धर्म का रहस्य जानना सिर्फ धर्माचार्यों का काम नहीं, कोई भी व्यक्ति अपने स्तर पर उस रहस्य को जानने की कोशिश कर सकता है, अपनी राय दे सकता है' — टिप्पणी कीजिए।

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योग्यता-विस्तार — (ग) ढेले चुन लो

1समाज में धर्म संबंधी अंधविश्वास पूरी तरह व्याप्त है। वैज्ञानिक प्रगति के संदर्भ में धर्म, विश्वास और आस्था पर निबंध लिखिए।

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2अपने घर में या आस-पास दिखाई देने वाले किसी रिवाज या अंधविश्वास पर एक लेख लिखिए।

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13 more solved questions in सुमिरिनी के मनके (पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी)

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Frequently Asked Questions

What are the important topics in सुमिरिनी के मनके (पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी) for Jharkhand Board Class 12 Hindi?
Key topics in सुमिरिनी के मनके (पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी) include लेखक परिचय और रचना-परिचय, ‘बालक बच गया’ — मूल भाव और अर्थ, ‘बालक बच गया’ — घटनाक्रम और संदेश, ‘घड़ी के पुर्जे’ — धर्म और जिज्ञासा. Study these first, then practise questions on each for the Jharkhand Board Class 12 board exam.
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Sources & Official References

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