कुटज (हजारी प्रसाद द्विवेदी) — NCERT Solutions
Jharkhand Board · Class 12 · Hindi
NCERT Solutions for कुटज (हजारी प्रसाद द्विवेदी), Jharkhand Board Class 12 Hindi: 18 textbook questions solved step by step.
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प्रश्न-अभ्यास — कुटज (हजारी प्रसाद द्विवेदी)
1कुटज को 'गाढ़े के साथी' क्यों कहा गया है?Show solution
दिया गया है: हजारी प्रसाद द्विवेदी का ललित निबंध 'कुटज'।
उत्तर:
'गाढ़े के साथी' उसे कहते हैं जो विपत्ति और कठिनाई के समय साथ न छोड़े। कुटज का पौधा उन पहाड़ी, पथरीली, बंजर और सूखी भूमि पर उगता है जहाँ भीषण गर्मी में लू के थपेड़े चलते हैं, जल का नामोनिशान नहीं होता और जीवन-यापन अत्यंत कठिन होता है। ऐसे विकट वातावरण में भी कुटज न केवल जीवित रहता है, बल्कि हरा-भरा रहकर खिलता भी है। जब सब कुछ सूख जाता है, तब भी कुटज अपनी जीवनी-शक्ति से भरपूर रहता है। इसीलिए लेखक ने उसे 'गाढ़े के साथी' कहा है — वह संकट और विपत्ति में भी साथ देता है, हिम्मत नहीं हारता।
2'नाम' क्यों बड़ा है? लेखक के विचार अपने शब्दों में लिखिए।Show solution
दिया गया है: लेखक हजारी प्रसाद द्विवेदी का 'कुटज' निबंध।
उत्तर:
लेखक के अनुसार 'रूप' व्यक्ति-सत्य है और 'नाम' समाज-सत्य। रूप तो क्षणिक और नश्वर होता है — वह बदलता रहता है, नष्ट हो जाता है। किंतु नाम स्थायी होता है। नाम वह पद है जिस पर समाज की मुहर लगी होती है, जिसे इतिहास प्रमाणित करता है और जो समष्टि-मानव की चित्त-गंगा में स्नात होता है। नाम को 'सोशल सैंक्शन' (सामाजिक स्वीकृति) प्राप्त होती है। इसीलिए नाम बड़ा है — वह व्यक्ति की मृत्यु के बाद भी जीवित रहता है, पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता है। लेखक का मन नाम के लिए व्याकुल है क्योंकि नाम में समाज की सामूहिक स्मृति और स्वीकृति निहित होती है, जो रूप से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण और टिकाऊ है।
3'कुट', 'कुटज' और 'कुटनी' शब्दों का विश्लेषण कर उनमें आपसी संबंध स्थापित कीजिए।Show solution
दिया गया है: 'कुटज' निबंध में इन तीनों शब्दों की व्युत्पत्ति।
शब्द-विश्लेषण:
- कुट — संस्कृत में 'कुट' का अर्थ है घड़ा, पर्वत-शिखर अथवा घर। यह मूल शब्द है।
- कुटज — 'कुट' (घड़े/पर्वत) से 'ज' (जन्मा हुआ) अर्थात् जो घड़े से या पर्वत पर जन्मा हो। यह उस पौधे का नाम है जो पहाड़ी और कठिन भूमि पर उगता है। एक कथा के अनुसार यह पौधा अगस्त्य मुनि के कमंडल (घड़े) से उत्पन्न हुआ था, इसलिए भी इसे 'कुटज' कहते हैं।
- कुटनी — 'कुट' से बना यह शब्द उस स्त्री के लिए प्रयुक्त होता है जो कूटनीति करती है, षड्यंत्र रचती है, दूसरों के घरों में दलाली करती है।
आपसी संबंध: तीनों शब्दों का मूल 'कुट' है। 'कुटज' में 'कुट' का सकारात्मक और प्राकृतिक अर्थ है — पर्वत पर जन्मा, निर्मल और स्वाभिमानी। 'कुटनी' में 'कुट' का नकारात्मक अर्थ है — कूटनीति करने वाली, छल-कपट में लिप्त। लेखक इस विरोधाभास के माध्यम से यह बताना चाहते हैं कि एक ही मूल से उत्पन्न शब्द कितने भिन्न अर्थ ग्रहण कर सकते हैं।
4कुटज किस प्रकार अपनी अपराजेय जीवनी-शक्ति की घोषणा करता है?Show solution
दिया गया है: 'कुटज' निबंध — हजारी प्रसाद द्विवेदी।
उत्तर:
कुटज अपनी अपराजेय जीवनी-शक्ति की घोषणा निम्नलिखित प्रकार से करता है —
- विषम परिस्थितियों में जीवित रहना: भीषण गर्मी, लू के थपेड़े, पानी का अभाव और पथरीली बंजर भूमि — इन सब विपरीत परिस्थितियों में भी कुटज हरा-भरा रहता है और फूलों से लद जाता है।
- पाषाण को चीरकर जल खींचना: वह कठोर पत्थरों की छाती फाड़कर किसी अज्ञात गहरे जलस्रोत से रस खींच लेता है। यह उसकी अदम्य जिजीविषा का प्रमाण है।
- 'हृद्येनापराजित' की घोषणा: वह अपने हृदय से अपराजित है — सुख-दुख, प्रिय-अप्रिय किसी से भी विचलित नहीं होता।
- अकुतोभय वृत्ति: उसे किसी से भी भय नहीं है। वह निर्भय होकर अपना जीवन जीता है।
- वशी और वैरागी: वह अपने मन का स्वामी है, मन उसका स्वामी नहीं। इस प्रकार कुटज अपने अस्तित्व मात्र से यह घोषणा करता है कि जीवन-शक्ति किसी भी बाधा से पराजित नहीं होती।
5'कुटज' हम सभी को क्या उपदेश देता है? टिप्पणी कीजिए।Show solution
दिया गया है: 'कुटज' निबंध — हजारी प्रसाद द्विवेदी।
उत्तर:
कुटज का जीवन स्वयं एक उपदेश है। वह बिना कुछ कहे अपने अस्तित्व से हमें निम्नलिखित शिक्षाएँ देता है —
- विपरीत परिस्थितियों में भी जीना सीखो: कुटज कठिन से कठिन परिस्थिति में भी जीवित रहता है और खिलता है। हमें भी जीवन की कठिनाइयों से घबराना नहीं चाहिए।
- स्वाभिमान के साथ जियो: कुटज न किसी के सामने झुकता है, न किसी की खुशामद करता है। वह अपनी शर्तों पर जीता है।
- मन को वश में रखो: कुटज मन का स्वामी है, दास नहीं। हमें भी अपने मन को नियंत्रित करना चाहिए।
- वैराग्य और भोग का संतुलन: राजा जनक की भाँति कुटज संसार में रहकर भी उससे मुक्त है। हमें भी सांसारिक भोगों में लिप्त हुए बिना जीना चाहिए।
- निर्भयता: कुटज अकुतोभय है — उसे किसी का भय नहीं। हमें भी निर्भय होकर जीवन जीना चाहिए।
निष्कर्ष: कुटज का उपदेश है — 'जियो, स्वाभिमान से जियो, निर्भय होकर जियो और अपने मन के स्वामी बनो।'
6कुटज के जीवन से हमें क्या सीख मिलती है?Show solution
दिया गया है: 'कुटज' निबंध — हजारी प्रसाद द्विवेदी।
उत्तर:
कुटज के जीवन से हमें निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण सीखें मिलती हैं —
- संघर्षशीलता: कुटज पथरीली, बंजर और सूखी भूमि पर भी जीवित रहता है। यह हमें सिखाता है कि परिस्थितियाँ चाहे जितनी कठिन हों, हार नहीं माननी चाहिए।
- आत्मनिर्भरता: वह किसी पर निर्भर नहीं रहता, स्वयं अपना भोजन (रस) पत्थरों से खींच लेता है। हमें भी आत्मनिर्भर बनना चाहिए।
- सादगी और निश्छलता: कुटज में कोई आडंबर नहीं है, कोई दिखावा नहीं। वह जो है, वही दिखता है।
- मानसिक दृढ़ता: सुख-दुख, अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियों में वह विचलित नहीं होता। यह मानसिक दृढ़ता हमें भी अपनानी चाहिए।
- जीवन का आनंद: विपरीत परिस्थितियों में भी कुटज फूलों से लद जाता है — यह सिखाता है कि जीवन का आनंद परिस्थितियों पर नहीं, अपनी वृत्ति पर निर्भर करता है।
सार: कुटज का जीवन यह सिखाता है कि सच्चा जीवन वह है जो स्वाभिमान, निर्भयता और आत्मशक्ति के साथ जिया जाए।
7कुटज क्या केवल जी रहा है — लेखक ने यह प्रश्न उठाकर किन मानवीय कमजोरियों पर टिप्पणी की है?Show solution
दिया गया है: 'कुटज' निबंध — हजारी प्रसाद द्विवेदी।
उत्तर:
लेखक ने 'कुटज क्या केवल जी रहा है?' — यह प्रश्न उठाकर यह स्पष्ट किया है कि कुटज केवल जी नहीं रहा, बल्कि वह पूरी शान और स्वाभिमान के साथ जी रहा है। इस प्रश्न के माध्यम से लेखक ने निम्नलिखित मानवीय कमजोरियों पर व्यंग्यात्मक टिप्पणी की है —
- स्वार्थपरता: मनुष्य अपने स्वार्थ के लिए दूसरों के मन में घुसता रहता है, षड्यंत्र रचता है।
- मिथ्याचार और आडंबर: मनुष्य अपनी कमजोरियाँ छिपाने के लिए झूठा दिखावा करता है, जबकि कुटज में कोई आडंबर नहीं।
- मन की दासता: मनुष्य अपने मन को वश में नहीं कर पाता और मन का दास बन जाता है। कुटज इसके विपरीत मन का स्वामी है।
- भय और कायरता: मनुष्य परिस्थितियों से डरता है, जबकि कुटज अकुतोभय है।
- खुशामद और चापलूसी: मनुष्य अपने स्वार्थ के लिए दूसरों की खुशामद करता है (निपोरना), जबकि कुटज किसी के सामने नहीं झुकता।
निष्कर्ष: लेखक यह बताना चाहते हैं कि मनुष्य इन कमजोरियों के कारण 'जी' तो रहा है, किंतु सच्चे अर्थों में जीवन नहीं जी रहा। कुटज का जीवन इन सब कमजोरियों से मुक्त है।
8लेखक क्यों मानता है कि स्वार्थ से भी बढ़कर जिजीविषा से भी प्रचंड कोई न कोई शक्ति अवश्य है? उदाहरण सहित उत्तर दीजिए।Show solution
दिया गया है: 'कुटज' निबंध — हजारी प्रसाद द्विवेदी।
उत्तर:
लेखक का मानना है कि मनुष्य के जीवन में स्वार्थ और जिजीविषा (जीने की इच्छा) दो बड़ी शक्तियाँ हैं, किंतु इनसे भी परे कोई और महान शक्ति है जो मनुष्य को महान कार्य करने के लिए प्रेरित करती है।
कारण:
- यदि मनुष्य केवल स्वार्थ के लिए जीता, तो वह कभी परोपकार नहीं करता।
- यदि केवल जिजीविषा (जीने की इच्छा) होती, तो वह केवल अपने प्राण बचाने तक सीमित रहता।
- किंतु मनुष्य इससे आगे जाकर दूसरों के लिए अपना जीवन न्योछावर करता है, सत्य के लिए लड़ता है, सौंदर्य की सृष्टि करता है।
उदाहरण:
- कुटज का उदाहरण: कुटज केवल जीने के लिए नहीं जीता — वह पत्थरों को चीरकर रस खींचता है, फूलों से लद जाता है और अपनी सुंदरता से सबको आनंदित करता है। यह केवल जिजीविषा नहीं, कुछ और है।
- महापुरुषों का उदाहरण: गाँधी, बुद्ध जैसे महापुरुषों ने स्वार्थ और जिजीविषा से ऊपर उठकर मानवता की सेवा की।
निष्कर्ष: लेखक के अनुसार यह शक्ति है — प्रेम, सौंदर्य-बोध और परमार्थ की भावना — जो मनुष्य को पशु से देवता बनाती है।
9'कुटज' पाठ के आधार पर सिद्ध कीजिए कि 'दुख और सुख तो मन के विकल्प हैं।'Show solution
दिया गया है: 'कुटज' निबंध — हजारी प्रसाद द्विवेदी।
उत्तर:
लेखक ने 'कुटज' पाठ में यह सिद्ध किया है कि सुख और दुख वस्तुतः बाहरी परिस्थितियों पर नहीं, बल्कि मन की अवस्था पर निर्भर करते हैं —
1. कुटज का उदाहरण:
कुटज भीषण गर्मी, लू, पानी के अभाव और पथरीली भूमि जैसी दुखद परिस्थितियों में रहता है, फिर भी वह हरा-भरा और प्रसन्न रहता है। यदि सुख-दुख बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर होते, तो कुटज को दुखी होना चाहिए था। किंतु वह 'हृद्येनापराजित' है — हृदय से अपराजित।
2. मन की भूमिका:
लेखक कहते हैं कि जो मन को वश में कर लेता है, वह सुख-दुख दोनों से परे हो जाता है। कुटज मन का स्वामी है, इसलिए वह न सुख से उत्तेजित होता है, न दुख से विचलित।
3. राजा जनक का उदाहरण:
जनक संसार के समस्त भोगों को भोगते हुए भी उनसे मुक्त थे — यह इसलिए संभव था क्योंकि उनका मन विकल्पों से परे था।
4. द्वंद्वातीत स्थिति:
कुटज द्वंद्वातीत है — वह सुख-दुख, प्रिय-अप्रिय के द्वंद्व से ऊपर उठ चुका है।
निष्कर्ष: इस प्रकार 'कुटज' पाठ यह सिद्ध करता है कि सुख और दुख वस्तुतः मन के विकल्प हैं — मन जैसा सोचे, वैसा ही अनुभव होता है।
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योग्यता-विस्तार — कुटज
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Frequently Asked Questions
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