सरोज स्मृति (सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला')
Jharkhand Board · Class 12 · Hindi
NCERT Solutions for सरोज स्मृति (सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला') — Jharkhand Board Class 12 Hindi.
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Get startedप्रश्न-अभ्यास — सरोज स्मृति
1सरोज के नव-वधू रूप का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।Show solution
वर्णन:
सरोज विवाह के अवसर पर अत्यंत सुंदर और लावण्यमयी दिखाई दे रही थी। उसके नेत्र नत (झुके हुए) थे, जिनसे एक दिव्य आलोक (प्रकाश) झरता प्रतीत होता था। उसका सौंदर्य निराकार श्रृंगार से परिपूर्ण था — अर्थात् उसका सौंदर्य किसी बाहरी आभूषण या श्रृंगार का मोहताज नहीं था, वह स्वयं में ही सौंदर्य की मूर्ति थी। वह रति-रूप (कामदेव की पत्नी रति के समान सुंदर) लग रही थी। उसके मुख पर लज्जा और मधुर भाव का अद्भुत संगम था। कवि को उसे देखकर अपनी स्वर्गीय पत्नी की याद आ गई, क्योंकि सरोज का सौंदर्य और भाव-भंगिमा अपनी माँ से मिलती-जुलती थी।
निष्कर्ष: सरोज का नव-वधू रूप अत्यंत मनोहारी, लज्जाशील और दिव्य था जो कवि के हृदय को गहराई से स्पर्श कर गया।
2कवि को अपनी स्वर्गीय पत्नी की याद क्यों आई?Show solution
कारण:
जब कवि ने अपनी पुत्री सरोज को नव-वधू के रूप में सजी-धजी देखा, तो उसके रूप, लावण्य और भाव-भंगिमा में उन्हें अपनी स्वर्गीय पत्नी की झलक दिखाई दी। सरोज की आँखों की चमक, उसका लज्जायुक्त मुखमंडल और उसका समग्र सौंदर्य उसकी माँ से इतना मिलता-जुलता था कि कवि का मन भूतकाल में खिंच गया।
इसके अतिरिक्त, विवाह जैसे पवित्र और भावनात्मक अवसर पर माँ की अनुपस्थिति कवि को और भी अधिक खलती थी। एक पुत्री के विवाह में माँ की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण होती है — श्रृंगार करना, आशीर्वाद देना, विदाई देना — ये सब कार्य माँ के बिना अधूरे लग रहे थे। इसी कारण कवि को अपनी स्वर्गीय पत्नी की गहरी याद आई और वे भावविह्वल हो उठे।
निष्कर्ष: पुत्री के रूप में माँ की छवि देखना और विवाह के अवसर पर माँ की अनुपस्थिति — ये दोनों कारण कवि को पत्नी की याद दिलाने के लिए पर्याप्त थे।
3'आकाश बदल कर बना मही' में 'आकाश' और 'मही' शब्द किनकी ओर संकेत करते हैं?Show solution
संकेत:
- 'आकाश' शब्द कवि की स्वर्गीय पत्नी की ओर संकेत करता है। पत्नी का निधन हो चुका था, अतः वह अब इस संसार में नहीं, बल्कि आकाश (स्वर्ग/परलोक) में है।
- 'मही' (पृथ्वी) शब्द पुत्री सरोज की ओर संकेत करता है। सरोज इस धरती पर जीवित है और माँ का ही प्रतिरूप है।
भाव: इस पंक्ति का आशय यह है कि जो माँ (आकाश) थी, वही अब पुत्री (मही/पृथ्वी) के रूप में बदल गई है। अर्थात् सरोज अपनी माँ का ही पृथ्वी पर अवतरित रूप है। माँ का सौंदर्य, गुण और भाव सरोज में जीवित हैं। यह एक अत्यंत भावपूर्ण और काव्यात्मक उपमा है जो माँ और पुत्री की एकात्मकता को व्यक्त करती है।
निष्कर्ष: 'आकाश' = स्वर्गीय माँ (पत्नी), 'मही' = पुत्री सरोज।
4सरोज का विवाह अन्य विवाहों से किस प्रकार भिन्न था?Show solution
भिन्नता के कारण:
1. माँ की अनुपस्थिति: सरोज की माँ का निधन बचपन में ही हो गया था, इसलिए विवाह के इस पवित्र अवसर पर माँ उपस्थित नहीं थी। सामान्यतः विवाह में माँ की केंद्रीय भूमिका होती है।
2. पिता द्वारा श्रृंगार: कवि (पिता) ने स्वयं अपनी पुत्री का श्रृंगार किया, जो सामान्यतः माँ या अन्य महिलाओं का कार्य होता है। यह अत्यंत असामान्य और भावनात्मक दृश्य था।
3. पारंपरिक रीति-रिवाजों का अभाव: सरोज का विवाह पारंपरिक वैदिक रीति-रिवाजों और धूमधाम से नहीं हुआ। कवि स्वयं निर्धन और संघर्षशील जीवन जी रहे थे, अतः विवाह सादगी से संपन्न हुआ।
4. कवि का दोहरी भूमिका निभाना: कवि ने माँ और पिता दोनों की भूमिका एक साथ निभाई — यह किसी भी सामान्य विवाह से सर्वथा भिन्न था।
5. भावनात्मक पीड़ा: इस विवाह में उत्सव के साथ-साथ कवि के हृदय में गहरी वेदना और करुणा भी थी।
निष्कर्ष: सरोज का विवाह माँ की अनुपस्थिति, पिता द्वारा श्रृंगार, सादगी और भावनात्मक पीड़ा के कारण अन्य विवाहों से सर्वथा भिन्न था।
5'वह लता वहीं की, जहाँ कली तू खिली' पंक्ति के द्वारा किस प्रसंग को उद्घाटित किया गया है?Show solution
प्रसंग:
इस पंक्ति के द्वारा कवि ने सरोज और उसकी माँ के संबंध के प्रसंग को उद्घाटित किया है।
- 'लता' से तात्पर्य सरोज की माँ (कवि की स्वर्गीय पत्नी) से है।
- 'कली' से तात्पर्य सरोज से है।
- 'वहीं की' का अर्थ है — उसी स्थान की, उसी मूल की।
भाव: कवि कह रहे हैं कि सरोज वही कली है जो उसी लता (माँ) से खिली है। अर्थात् सरोज अपनी माँ की ही संतान है — उसी के गुण, सौंदर्य और भाव उसमें विद्यमान हैं। जिस प्रकार एक लता से कली खिलती है और उसी लता के गुण उस कली में होते हैं, उसी प्रकार सरोज में उसकी माँ के सभी गुण और सौंदर्य समाहित हैं।
यह पंक्ति माँ-पुत्री के अटूट संबंध और उनकी समानता को रेखांकित करती है। साथ ही इसमें कवि की वह पीड़ा भी छिपी है कि लता (माँ) तो चली गई, परंतु उसकी कली (सरोज) इस धरती पर खिली रही।
निष्कर्ष: यह पंक्ति माँ और पुत्री की एकात्मकता तथा माँ की स्मृति के प्रसंग को उद्घाटित करती है।
6'मुझ भाग्यहीन की तू संबल' निराला की यह पंक्ति क्या 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' जैसे कार्यक्रम की माँग करती है।Show solution
विश्लेषण:
हाँ, निराला की यह पंक्ति 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' जैसे कार्यक्रम की भावना से पूर्णतः मेल खाती है और उसकी माँग करती है।
कारण:
1. बेटी का महत्त्व: इस पंक्ति में कवि ने स्वीकार किया है कि उनकी पुत्री सरोज उनके जीवन का 'संबल' (सहारा) है। यह भाव बताता है कि बेटी परिवार की शक्ति और आधार होती है — वह बोझ नहीं, बल्कि सहारा है।
2. बेटी बचाओ: जब एक पिता अपनी बेटी को अपना 'संबल' मानता है, तो यह स्वाभाविक रूप से बेटियों को बचाने की प्रेरणा देता है। जो समाज बेटियों को बोझ समझता है, उसे यह पंक्ति चुनौती देती है।
3. बेटी पढ़ाओ: निराला ने सरोज को शिक्षित किया, उसे जीवन के संघर्षों के लिए तैयार किया। यह भाव बेटियों की शिक्षा की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
4. सामाजिक संदेश: यह पंक्ति उस पितृसत्तात्मक सोच को चुनौती देती है जो बेटियों को कमज़ोर या पराया धन मानती है।
निष्कर्ष: 'मुझ भाग्यहीन की तू संबल' — यह पंक्ति न केवल एक पिता की भावना है, बल्कि यह उस सामाजिक चेतना का प्रतीक है जो 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' जैसे कार्यक्रमों की नींव है। निराला ने दशकों पहले ही बेटी के महत्त्व को पहचाना था।
7(क)निम्नलिखित पंक्ति का अर्थ स्पष्ट कीजिए — नत नयनों से आलोक उतरShow solution
शब्दार्थ:
- नत नयन = झुकी हुई आँखें (लज्जावश)
- आलोक = प्रकाश, दीप्ति
- उतर = उतरना, प्रवाहित होना
अर्थ:
इस पंक्ति का अर्थ है — सरोज की झुकी हुई (लज्जायुक्त) आँखों से एक दिव्य प्रकाश झर रहा था। विवाह के अवसर पर नव-वधू की आँखें लज्जावश नीची थीं, परंतु उन नत नयनों से भी एक अद्भुत आभा और तेज प्रवाहित हो रहा था।
काव्य-सौंदर्य: यह पंक्ति सरोज के सौंदर्य और लज्जाशीलता का एक साथ चित्रण करती है। लज्जा और सौंदर्य का यह संयोजन अत्यंत काव्यात्मक है। झुकी आँखों से प्रकाश का उतरना — यह विरोधाभास जैसा प्रतीत होता है, परंतु यही इस पंक्ति की सुंदरता है।
7(ख)निम्नलिखित पंक्ति का अर्थ स्पष्ट कीजिए — शृंगार रहा जो निराकारShow solution
शब्दार्थ:
- शृंगार = सजावट, सौंदर्य-प्रसाधन
- निराकार = जिसका कोई आकार न हो, अमूर्त
अर्थ:
इस पंक्ति का अर्थ है — सरोज का श्रृंगार (सौंदर्य) किसी बाहरी आभूषण, वस्त्र या प्रसाधन पर निर्भर नहीं था, बल्कि वह एक अमूर्त, आंतरिक और दिव्य सौंदर्य था जिसे किसी आकार में नहीं बाँधा जा सकता। उसका सौंदर्य स्वाभाविक और नैसर्गिक था — वह स्वयं में ही श्रृंगार थी।
काव्य-सौंदर्य: यह पंक्ति सरोज के आंतरिक सौंदर्य की प्रशंसा करती है। कवि यह कहना चाहते हैं कि बाहरी श्रृंगार तो आकार में होता है, परंतु सरोज का सौंदर्य उससे परे — निराकार और दिव्य था। यह भाव भारतीय काव्य-परंपरा में 'स्वाभाविक सौंदर्य' की अवधारणा से जुड़ा है।
7(ग)निम्नलिखित पंक्ति का अर्थ स्पष्ट कीजिए — पर पाठ अन्य यह, अन्य कलाShow solution
शब्दार्थ:
- पाठ = शिक्षा, सीख
- अन्य = अलग, भिन्न
- कला = विद्या, हुनर
अर्थ:
इस पंक्ति का अर्थ है — परंतु यह (जीवन का) पाठ अलग है और यह कला भी अलग है। कवि यहाँ यह कहना चाहते हैं कि पुस्तकीय ज्ञान और जीवन का व्यावहारिक ज्ञान — ये दोनों अलग-अलग हैं। जो शिक्षा पुस्तकों से मिलती है वह एक प्रकार की है, परंतु जीवन के संघर्षों, दुखों और अनुभवों से जो सीख मिलती है वह सर्वथा भिन्न है।
संभवतः कवि यह भी कह रहे हैं कि सरोज को जो जीवन-पाठ पढ़ना पड़ा — माँ के बिना बड़े होने का, संघर्षों से जूझने का — वह किसी विद्यालय में नहीं पढ़ाया जाता।
काव्य-सौंदर्य: यह पंक्ति जीवन-अनुभव और पुस्तकीय ज्ञान के अंतर को रेखांकित करती है तथा जीवन की जटिलता की ओर संकेत करती है।
7(घ)निम्नलिखित पंक्ति का अर्थ स्पष्ट कीजिए — यदि धर्म, रहे नत सदा माथShow solution
शब्दार्थ:
- धर्म = कर्तव्य, नैतिकता, सत्य का मार्ग
- नत माथ = झुका हुआ मस्तक, विनम्रता
- सदा = हमेशा
अर्थ:
इस पंक्ति का अर्थ है — यदि (जीवन में) धर्म (सत्य, कर्तव्य और नैतिकता का पालन) हो, तो मस्तक सदा नत (विनम्र) रहना चाहिए। अर्थात् जो व्यक्ति सच्चे धर्म का पालन करता है, वह कभी अहंकारी नहीं होता — उसका मस्तक विनम्रता से सदा झुका रहता है।
कवि यहाँ यह भी कह सकते हैं कि यदि ईश्वर के प्रति, समाज के प्रति और अपने कर्तव्यों के प्रति सच्ची निष्ठा हो, तो विनम्रता स्वाभाविक रूप से आती है।
काव्य-सौंदर्य: यह पंक्ति धर्म और विनम्रता के अटूट संबंध को व्यक्त करती है। यह भारतीय दर्शन की उस परंपरा से जुड़ी है जिसमें सच्चे ज्ञान और धर्म का परिणाम अहंकार नहीं, बल्कि विनम्रता होती है।
योग्यता-विस्तार
1निराला के जीवन से संबंधित जानकारी प्राप्त करने के लिए रामविलास शर्मा की पुस्तक 'महाकवि निराला' पढ़िए।Show solution
निर्देश: विद्यार्थी रामविलास शर्मा द्वारा लिखित पुस्तक 'महाकवि निराला' पढ़ें। इस पुस्तक में निराला के जीवन के विभिन्न पहलुओं — उनके संघर्ष, उनकी रचनाएँ, उनका व्यक्तित्व और उनके जीवन की त्रासदियों — का विस्तृत वर्णन है।
संक्षिप्त जानकारी: सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' (1896–1961) हिंदी साहित्य के छायावाद के चार प्रमुख स्तंभों में से एक हैं। उनका जीवन अत्यंत संघर्षपूर्ण रहा — पत्नी का असमय निधन, पुत्री सरोज की मृत्यु, आर्थिक कठिनाइयाँ — इन सबके बावजूद उन्होंने अमर साहित्य की रचना की।
2अपने बचपन की स्मृतियों को आधार बनाकर एक छोटी सी कविता लिखने का प्रयास कीजिए।Show solution
नमूना कविता:
बचपन की वो गलियाँ,
माँ की वो लोरियाँ,
दादी के किस्से पुराने,
यादों में बस जाने।
नदी किनारे खेलना,
मिट्टी में लोटना,
बारिश में भीगना,
बेफ़िक्र होकर जीना।
वो दिन थे सुनहरे,
वो पल थे अनमोल,
बचपन की यादें मेरी,
मन का अनमोल बोल।
निर्देश: विद्यार्थी अपनी व्यक्तिगत स्मृतियों के आधार पर स्वयं कविता लिखें।
3'सरोज स्मृति' पूरी पढ़कर आम आदमी के जीवन-संघर्षों पर चर्चा कीजिए।Show solution
संकेत-बिंदु:
1. आर्थिक संघर्ष: निराला का जीवन निर्धनता से भरा था। 'सरोज स्मृति' में यह स्पष्ट है कि वे अपनी पुत्री का विवाह धूमधाम से नहीं कर सके। यह आम आदमी की आर्थिक विवशता का प्रतीक है।
2. पारिवारिक वियोग: पत्नी का असमय निधन, पुत्री की मृत्यु — ये वे दुख हैं जो किसी भी सामान्य व्यक्ति के जीवन में आ सकते हैं।
3. एकाकीपन: समाज और परिवार से अलगाव का दर्द 'सरोज स्मृति' में स्पष्ट रूप से दिखता है।
4. जिजीविषा: इन सब संघर्षों के बावजूद निराला टूटे नहीं — यह आम आदमी की जीवट और जिजीविषा का प्रतीक है।
निष्कर्ष: 'सरोज स्मृति' केवल एक पिता का विलाप नहीं, बल्कि यह उस आम आदमी की कहानी है जो जीवन के हर मोड़ पर संघर्ष करता है, फिर भी जीता रहता है।
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