Assam Board Class 12 Hindi — NCERT Solutions
Assam Board Class 12 Hindi NCERT solutions, chapter by chapter — 491 textbook questions solved across 38 chapters. Follows the ASSEB / AHSEC syllabus.
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491 NCERT textbook questions for Assam Board Class 12 Hindi, solved step by step across 38 chapters. Each chapter page has every exercise: half the solutions are open to read and the rest are free with a Super Tutor account.
देवसेना का गीत / कार्नेलिया का गीत (जयशंकर प्रसाद)
13 questions solved
- प्रश्न-अभ्यास · 5 questions
- प्रश्न-अभ्यास · 5 questions
- योग्यता-विस्तार · 3 questions
Q1."मैंने धर्मवश जीवन संचित, मधुकरियों की भीख लुटाई" — पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।
भाव स्पष्टीकरण:
इस पंक्ति में देवसेना अपने जीवन की त्रासदी को व्यक्त कर रही है। 'मधुकरियों की भीख' का अर्थ है — वह प्रेम, सुख और आनंद जो उसने जीवन भर थोड़ा-थोड़ा करके (जैसे भौंरा फूलों से थोड़ा-थोड़ा रस लेता है) संचित किया था।
'धर्मवश' का अर्थ है — अपने कर्तव्य, प्रेम और समर्पण के वशीभूत होकर। देवसेना कहती है कि उसने जो भी जीवन में थोड़ा-थोड़ा सुख, प्रेम और आशा एकत्रित की थी, वह सब उसने अपने प्रिय (स्कंदगुप्त) के प्रति अपने धर्म (प्रेम-धर्म) का पालन करते हुए लुटा दी — अर्थात् व्यर्थ गँवा दी।
सारांश: देवसेना ने जीवन भर जो प्रेम और सुख की छोटी-छोटी आशाएँ संजोई थीं, वे सब अपने प्रेम-धर्म के निर्वाह में नष्ट हो गईं और उसे बदले में कुछ न मिला। यह पंक्ति उसके निःस्वार्थ प्रेम और उसकी व्यर्थता की मार्मिक अभिव्यक्ति है।
Q2.कवि ने आशा को बावली क्यों कहा है?
उत्तर:
कवि जयशंकर प्रसाद ने आशा को 'बावली' (पागल) इसलिए कहा है क्योंकि आशा का स्वभाव ही विवेकहीन और अतार्किक होता है। देवसेना के संदर्भ में —
- निरंतर प्रतीक्षा: देवसेना जानती है कि उसका प्रिय स्कंदगुप्त उसे कभी नहीं मिलेगा, फिर भी आशा उसे बार-बार प्रतीक्षा करने के लिए प्रेरित करती रही।
- व्यर्थ उम्मीद: आशा बिना किसी आधार के, बिना किसी तर्क के मन में जीवित रहती है — ठीक एक पागल व्यक्ति की तरह जो वास्तविकता से परे रहता है।
- निराशा का कारण: इसी बावली आशा के कारण देवसेना जीवन भर दुःख उठाती रही। यदि वह आशा न रखती तो शायद इतनी पीड़ा न होती।
निष्कर्ष: आशा को 'बावली' कहकर कवि ने यह व्यंजित किया है कि आशा तर्कहीन होती है — वह असंभव को भी संभव मानकर मनुष्य को भटकाती रहती है।
सूरदास की झोंपड़ी
7 questions solved
- प्रश्न-अभ्यास — सूरदास की झोंपड़ी (रंगभूमि) · 7 questions
Q1.'चूल्हा ठंडा किया होता, तो दुश्मनों का कलेजा कैसे ठंडा होता?' नायकराम के इस कथन में निहित भाव को स्पष्ट कीजिए।
दिया गया कथन: नायकराम का यह कथन सूरदास की झोपड़ी जलने के प्रसंग में आया है।
निहित भाव:
नायकराम एक व्यावहारिक और चालाक व्यक्ति है। उसके इस कथन में व्यंग्य और कटु सत्य दोनों छिपे हैं। वह कहना चाहता है कि यदि सूरदास ने अपनी झोपड़ी का चूल्हा स्वयं ठंडा कर लिया होता — अर्थात् अपनी गरीबी और असहायता को स्वीकार कर लिया होता, अपनी जमीन छोड़ दी होती — तो उसके शत्रुओं (भैरों आदि) को उसकी झोपड़ी जलाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती।
दूसरे शब्दों में, नायकराम यह स्पष्ट करता है कि सूरदास की जिद और अपनी जमीन पर अडिग रहने की भावना ही उसके दुश्मनों की ईर्ष्या और क्रोध का कारण बनी। दुश्मनों का 'कलेजा ठंडा होना' अर्थात् उनकी प्रतिशोध की भावना तभी शांत होती जब सूरदास झुक जाता। चूँकि सूरदास नहीं झुका, इसलिए शत्रुओं ने उसकी झोपड़ी जलाकर अपनी दुश्मनी निकाली।
इस प्रकार इस कथन में दुर्बल के प्रतिरोध की कीमत और शोषकों की मानसिकता दोनों का यथार्थ चित्रण है।
Q2.भैरों ने सूरदास की झोपड़ी क्यों जलाई?
कारण:
भैरों ने सूरदास की झोपड़ी जलाने के पीछे अनेक कारण थे —
- ईर्ष्या और द्वेष: भैरों सूरदास से ईर्ष्या करता था। सूरदास अंधा होते हुए भी अपनी जमीन पर अडिग था और समाज में उसका सम्मान था। यह बात भैरों को सहन नहीं होती थी।
- जमीन का विवाद: सूरदास की जमीन पर कारखाना लगाने की योजना थी। भैरों उन लोगों के साथ था जो सूरदास को उसकी जमीन से हटाना चाहते थे। सूरदास के न मानने पर भैरों ने प्रतिशोध लिया।
- व्यक्तिगत दुश्मनी: भैरों और सूरदास के बीच पहले से ही अदावत (दुश्मनी) थी। सूरदास ने कभी उसकी बेईमानी (टेनी मारना, बाट खोटे रखना) का विरोध किया था, जिससे भैरों उससे नाराज था।
- प्रतिशोध की भावना: भैरों यह सिद्ध करना चाहता था कि सूरदास की जिद का परिणाम बुरा होगा। झोपड़ी जलाकर उसने अपनी क्रोध और प्रतिशोध की भावना को शांत किया।
निष्कर्ष: इस प्रकार भैरों की ईर्ष्या, व्यक्तिगत दुश्मनी और जमीन के विवाद ने मिलकर उसे यह जघन्य कार्य करने पर विवश किया।
आत्मपरिचय | एक गीत (हरिवंश राय बच्चन)
8 questions solved
- अभ्यास · 8 questions
Q1.कविता एक ओर जग-जीवन का भार लिए घूमने की बात करती है और दूसरी ओर मैं कभी न जग का ध्यान किया करता हूँ— विपरीत से लगते इन कथनों का क्या आशय है?
दिया गया: कविता में दो परस्पर विरोधी-से लगने वाले कथन हैं — (1) कवि जग-जीवन का भार लिए घूमता है, (2) कवि कभी जग का ध्यान नहीं करता।
आशय एवं स्पष्टीकरण:
ये दोनों कथन वास्तव में विरोधाभासी नहीं हैं, बल्कि कवि की जीवन-दृष्टि के दो पहलुओं को उजागर करते हैं।
- पहला कथन — 'जग-जीवन का भार लिए घूमना' — इसका अर्थ है कि कवि संसार के सुख-दुःख, हर्ष-विषाद और जीवन की समस्त अनुभूतियों को अपने हृदय में समेटे हुए चलता है। वह जीवन की वास्तविकताओं से पूरी तरह परिचित है और उनसे प्रभावित भी होता है।
- दूसरा कथन — 'जग का ध्यान न करना' — इसका अर्थ है कि कवि संसार की परवाह नहीं करता, अर्थात् वह लोक-लाज, सामाजिक मान-मर्यादा और सांसारिक बंधनों की चिंता नहीं करता। वह स्वच्छंद और निर्भीक होकर जीता है।
निष्कर्ष: कवि संसार में रहते हुए उसके दुःख-दर्द को महसूस तो करता है, किंतु सांसारिक मोह-माया और लोक-दिखावे से स्वयं को मुक्त रखता है। यही उसकी विशिष्ट जीवन-शैली है — संसार में रहकर भी उससे अलिप्त रहना।
Q2.जहाँ पर दाना रहते हैं, वहाँ नादान भी होते हैं— कवि ने ऐसा क्यों कहा होगा?
दिया गया: कवि कहता है — 'जहाँ पर दाना रहते हैं, वहाँ नादान भी होते हैं।'
प्रयुक्त अवधारणा: संसार में विरोधों का सह-अस्तित्व — जहाँ ज्ञान है, वहाँ अज्ञान भी है; जहाँ प्रकाश है, वहाँ अंधकार भी है।
व्याख्या:
कवि ने यह पंक्ति इसलिए कही होगी क्योंकि —
- संसार की विरोधात्मक प्रकृति: इस संसार में ज्ञानी (दाना) और अज्ञानी (नादान) दोनों साथ-साथ रहते हैं। यह सृष्टि का नियम है।
- कवि की अपनी स्थिति: कवि स्वयं को प्रेम के मामले में 'नादान' मानता है। वह जानता है कि प्रेम में बुद्धि और विवेक काम नहीं आते — प्रेमी हमेशा दीवाना (नादान) होता है।
- व्यंग्यात्मक भाव: जो लोग स्वयं को 'दाना' (समझदार) समझते हैं और कवि के प्रेम को मूर्खता कहते हैं, वे भी कहीं न कहीं 'नादान' हैं — क्योंकि वे प्रेम की गहराई को नहीं समझ पाते।
निष्कर्ष: कवि का आशय है कि समझदारी और नासमझी साथ-साथ चलती हैं। प्रेम में डूबा कवि भले ही 'नादान' दिखे, किंतु उसकी यही नादानी उसकी सबसे बड़ी शक्ति है।
सिल्वर वैडिंग
8 questions solved
- अभ्यास · 8 questions
Q1.यशोधर बाबू की पत्नी समय के साथ ढल सकने में सफल होती है लेकिन यशोधर बाबू असफल रहते हैं। ऐसा क्यों?
यशोधर बाबू की पत्नी समय के साथ ढल जाती है क्योंकि वह घर और समाज की बदलती जरूरतों के साथ समझौता कर लेती है। वह बेटी की तरह जीन, बगैर बाँह का टॉप, ऊँची हील, खिज़ाब, लाली जैसी आधुनिक चीजें अपना लेती है और बच्चों की तरफ़दारी भी करती है।
यशोधर बाबू ऐसा नहीं कर पाते, क्योंकि वे किशनदा की परंपराओं और अपने पुराने संस्कारों से गहरे जुड़े हैं। उनके लिए धर्म-कर्म, कुल-परंपरा, सादगी, परिवार-केन्द्रित जीवन महत्त्वपूर्ण हैं। वे बदलाव को पूरी तरह गलत नहीं मानते, फिर भी उसे सहज रूप से स्वीकार नहीं कर पाते। उनके मन में हर नए बदलाव पर “समहाउ इंप्रॉपर” की भावना रहती है। इसीलिए पत्नी व्यावहारिक ढंग से बदल जाती है, लेकिन यशोधर बाबू अपने पुराने मूल्यों को नहीं छोड़ पाते।
सरोज स्मृति (सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला')
13 questions solved
- प्रश्न-अभ्यास — सरोज स्मृति · 10 questions
- योग्यता-विस्तार · 3 questions
Q1.सरोज के नव-वधू रूप का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।
दिया गया संदर्भ: 'सरोज स्मृति' कविता में कवि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' ने अपनी पुत्री सरोज के विवाह के अवसर पर उसके नव-वधू रूप का मनोरम चित्रण किया है।
वर्णन:
सरोज विवाह के अवसर पर अत्यंत सुंदर और लावण्यमयी दिखाई दे रही थी। उसके नेत्र नत (झुके हुए) थे, जिनसे एक दिव्य आलोक (प्रकाश) झरता प्रतीत होता था। उसका सौंदर्य निराकार श्रृंगार से परिपूर्ण था — अर्थात् उसका सौंदर्य किसी बाहरी आभूषण या श्रृंगार का मोहताज नहीं था, वह स्वयं में ही सौंदर्य की मूर्ति थी। वह रति-रूप (कामदेव की पत्नी रति के समान सुंदर) लग रही थी। उसके मुख पर लज्जा और मधुर भाव का अद्भुत संगम था। कवि को उसे देखकर अपनी स्वर्गीय पत्नी की याद आ गई, क्योंकि सरोज का सौंदर्य और भाव-भंगिमा अपनी माँ से मिलती-जुलती थी।
निष्कर्ष: सरोज का नव-वधू रूप अत्यंत मनोहारी, लज्जाशील और दिव्य था जो कवि के हृदय को गहराई से स्पर्श कर गया।
बिस्कोहर की माटी
12 questions solved
- प्रश्न-अभ्यास · 9 questions
- योग्यता-विस्तार · 3 questions
Q1.कोइयाँ किसे कहते हैं? उसकी विशेषताएँ बताइए।
दिया गया: पाठ 'बिस्कोहर की माटी' में लेखक ने कोइयाँ का वर्णन किया है।
उत्तर:
कोइयाँ एक जलीय पुष्प है जिसे 'कुमुद' भी कहते हैं। इसे कोकाबेली या कुइयाँ के नाम से भी जाना जाता है। यह तालाबों और जलाशयों में उगता है।
कोइयाँ की विशेषताएँ:
- यह एक जलपुष्प है जो तालाबों में खिलता है।
- इसका रंग सफेद होता है और यह अत्यंत सुंदर दिखता है।
- इसमें मनमोहक सुगंध होती है।
- यह औषधीय गुणों से भी युक्त होता है — अर्थात् यह केवल सुगंध ही नहीं देता, दवा का काम भी करता है।
- यह ग्रामीण परिवेश की प्रकृति का एक अभिन्न अंग है।
- इसका तना 'भसीण' (कमलनाल) कहलाता है।
निष्कर्ष: कोइयाँ ग्रामीण जीवन और प्रकृति की सुंदरता का प्रतीक है जो लेखक की बचपन की स्मृतियों से गहराई से जुड़ा है।
पतंग (आलोक धन्वा)
11 questions solved
- कविता के साथ · 6 questions
- कविता के आसपास · 3 questions
- आपकी कविता · 2 questions
Q1.'सबसे तेज़ बौछारें गयीं, भादो गया' के बाद प्रकृति में जो परिवर्तन कवि ने दिखाया है, उसका वर्णन अपने शब्दों में करें।
दिया गया संदर्भ: कविता 'पतंग' में कवि आलोकधन्वा ने भादो (भाद्रपद) मास की तेज़ बौछारों के जाने के बाद प्रकृति में आए परिवर्तन का सुंदर चित्रण किया है।
प्रकृति में परिवर्तन का वर्णन:
भादो मास की तेज़ और मूसलाधार बौछारें जब समाप्त हो जाती हैं, तो प्रकृति का रूप पूरी तरह बदल जाता है। आकाश स्वच्छ, निर्मल और नीला हो जाता है। चारों ओर उजाला और ताज़गी छा जाती है। सवेरा खरगोश की आँखों जैसा लाल और कोमल होता है — अर्थात् भोर की लालिमा अत्यंत मनोरम लगती है।
शरद ऋतु का आगमन होता है, मानो वह पुलों को पार करते हुए, अपनी नई चमकीली साइकिल तेज़ चलाते हुए, घंटी बजाते हुए आ रहा हो। यह उपमा शरद की ताज़गी, गति और उत्साह को दर्शाती है। आकाश इतना मुलायम और साफ हो जाता है कि पतंगें ऊँची उड़ सकें। धूप चमकीली और सुनहरी हो जाती है। वातावरण में एक नई ऊर्जा, उमंग और उल्लास भर जाता है।
निष्कर्ष: संक्षेप में, भादो के जाने के बाद प्रकृति वर्षा की उदासी और भारीपन से मुक्त होकर शरद की स्वच्छता, चमक और कोमलता से भर जाती है।
जूझ
6 questions solved
- अभ्यास · 6 questions
Q1.'जूझ' शीर्षक के औचित्य पर विचार करते हुए यह स्पष्ट करें कि क्या यह शीर्षक कथा नायक की किसी केंद्रीय चारित्रिक विशेषता को उजागर करता है?
‘जूझ’ का अर्थ है संघर्ष करना। पूरी कथा में नायक का जीवन संघर्षों से भरा है—एक ओर खेत-घर का काम, दूसरी ओर पढ़ने की इच्छा, और बीच में दादा का डर। फिर भी वह हार नहीं मानता। वह माँ के साथ दत्ता जी राव के पास जाता है, फिर दादा को समझाने की कोशिश करता है, और अंततः फिर से पाठशाला लौटकर पढ़ाई में लग जाता है।
इसलिए यह शीर्षक कथा के केंद्रीय भाव को प्रकट करता है। साथ ही यह नायक की मुख्य चारित्रिक विशेषता भी उजागर करता है—दृढ़ इच्छा, धैर्य, और कठिन परिस्थितियों से जूझते रहने की प्रवृत्ति। वह डरता जरूर है, लेकिन भीतर से पढ़ने के लिए जूझता रहता है। इस तरह शीर्षक बिल्कुल सार्थक है।
यह दीप अकेला- मैंने देखा, एक बूँद (सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय')
16 questions solved
- प्रश्न-अभ्यास · 9 questions
- प्रश्न-अभ्यास · 4 questions
- योग्यता-विस्तार · 3 questions
Q1.'दीप अकेला' के प्रतीकार्थ को स्पष्ट करते हुए यह बताइए कि उसे कवि ने स्नेह भरा, गर्व भरा एवं मदमाता क्यों कहा है?
प्रतीकार्थ:
'दीप अकेला' व्यक्ति (लघु मानव) का प्रतीक है। जिस प्रकार एक दीपक अकेला जलकर अँधेरे को दूर करता है, उसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति अपने भीतर एक अनूठी ज्योति लिए होता है — अपना अनुभव, अपनी पीड़ा, अपना सौंदर्यबोध।
स्नेह भरा क्यों:
दीप के भीतर स्नेह (तेल) भरा होता है — यह उस प्रेम और ममता का प्रतीक है जो व्यक्ति अपने हृदय में संजोए रहता है। व्यक्ति का जीवन स्नेह और संवेदना से परिपूर्ण होता है।
गर्व भरा क्यों:
दीपक अपनी लौ पर गर्व करता है — वह जानता है कि उसकी अपनी एक विशिष्ट पहचान है। व्यक्ति भी अपनी अस्मिता और अपने अनुभवों पर गर्व करता है।
मदमाता क्यों:
दीपक अपनी जलन में इतना तल्लीन है कि वह मस्त और उन्मत्त-सा प्रतीत होता है। व्यक्ति भी अपनी सृजनशीलता और जीवन-ऊर्जा में मग्न रहता है।
निष्कर्ष: कवि 'अज्ञेय' यह बताना चाहते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति अपने आप में पूर्ण, अनूठा और ऊर्जावान है — भले ही वह समाज की विशाल धारा में अकेला हो।
अपना मालवा-खाऊ-उजाड़ सभ्यता में
10 questions solved
- प्रश्न–अभ्यास · 7 questions
- योग्यता-विस्तार · 3 questions
Q1.मालवा में जब सब जगह बरसात की झाड़ी लगी रहती है तब मालवा के जनजीवन पर इसका क्या असर पड़ता है?
दिया गया है: मालवा की बरसात और वहाँ के जनजीवन पर उसके प्रभाव का वर्णन पाठ में किया गया है।
उत्तर:
मालवा में जब चारों ओर बरसात की झड़ी लगी रहती है तब वहाँ के जनजीवन पर निम्नलिखित प्रभाव पड़ते हैं:
- प्रकृति का सौंदर्य: चारों ओर हरियाली छा जाती है, धरती हरी-भरी हो उठती है और वातावरण में एक अनोखी ताज़गी आ जाती है।
- कृषि समृद्धि: खेत-खलिहान लहलहा उठते हैं, फसलें अच्छी होती हैं और किसानों के चेहरे पर खुशी आ जाती है।
- जल-संग्रह: नदी, नाले और तालाब पानी से भर जाते हैं जिससे पूरे वर्ष पानी की कमी नहीं रहती।
- उत्सव का माहौल: लोग ओटलों (मुख्यद्वार) पर बैठकर बादलों की घऊ-घऊ आवाज़ सुनते हैं, मन प्रसन्न रहता है।
- समृद्धि का आश्वासन: 'मालव धरती गहन गंभीर, डग-डग रोटी, पग-पग नीर' — यह कहावत चरितार्थ होती है अर्थात् अन्न और जल दोनों की प्रचुरता रहती है।
- सामाजिक उल्लास: लोग माता की मूर्ति स्थापित करने, पूजा-पाठ करने जैसे शुभ कार्यों की योजना बनाते हैं।
निष्कर्ष: बरसात मालवा के जनजीवन में खुशहाली, समृद्धि और उत्साह भर देती है।
कविता के बहाने | बात सीधी थी पर -( कुवर नारायण)
13 questions solved
- कविता के बहाने / बात सीधी थी पर · 7 questions
- व्याख्या करें · 1 question
- बात से जुड़े मुहावरे · 1 question
- चर्चा कीजिए · 2 questions
- आपसदारी · 2 questions
Q1.इस कविता के बहाने बताएँ कि 'सब घर एक कर देने के माने' क्या है?
दिया गया संदर्भ: 'कविता के बहाने' कविता में कवि कुँवर नारायण ने कविता की असीमित शक्ति का वर्णन किया है।
अवधारणा: कविता की सार्वभौमिकता और उसकी सीमाहीनता।
उत्तर:
'सब घर एक कर देने के माने' से अभिप्राय है कि कविता में इतनी शक्ति होती है कि वह सभी सीमाओं, भेदभावों और दूरियों को मिटा देती है। जिस प्रकार एक बच्चा खेलते-खेलते सभी घरों में बेरोकटोक जाता है और सभी उसे अपना मान लेते हैं, उसी प्रकार कविता भी भाषा, जाति, धर्म, देश-काल की सीमाओं को लाँघकर सभी मनुष्यों के हृदय को एक सूत्र में बाँध देती है। कविता किसी एक घर (परिवार, समाज, देश) की नहीं होती, वह सार्वभौमिक होती है। वह सभी के दिलों में एक जैसी भावनाएँ जगाती है और समस्त मानवता को एकता के बंधन में जोड़ देती है। इस प्रकार 'सब घर एक कर देना' कविता की वह अद्भुत क्षमता है जो समस्त मानव-जाति को एकजुट कर देती है।
अतीत में दबे पाँव
8 questions solved
- अभ्यास — अतीत में दबे पाँव · 8 questions
Q1.सिंधु-सभ्यता साधन-संपन्न थी, पर उसमें भव्यता का आडंबर नहीं था। कैसे?
दिया गया है: सिंधु-सभ्यता (मुअनजो-दड़ो) के पुरातात्विक अवशेषों का अध्ययन।
उत्तर:
सिंधु-सभ्यता निश्चित रूप से साधन-संपन्न थी, इसके प्रमाण निम्नलिखित हैं —
- नगर-नियोजन: मुअनजो-दड़ो में पक्की ईंटों से बने सुनियोजित मकान, चौड़ी सड़कें और गलियाँ मिली हैं जो उस समय की समृद्धि को दर्शाती हैं।
- जल-प्रबंधन: विशाल स्नानागार (महाकुंड), कुएँ और बेजोड़ निकासी व्यवस्था उनकी तकनीकी दक्षता और संपन्नता का प्रमाण है।
- व्यापार एवं शिल्प: उत्कृष्ट मृद्भांड, आभूषण, मुहरें और बाट-माप के पत्थर मिले हैं जो व्यापारिक समृद्धि को सिद्ध करते हैं।
भव्यता का आडंबर न होने के प्रमाण:
- मिस्र या मेसोपोटामिया की सभ्यताओं की तरह यहाँ कोई विशाल राजमहल, भव्य मंदिर या पिरामिड नहीं मिले।
- कोई भव्य राजकीय स्मारक नहीं है जो शासक की शक्ति का प्रदर्शन करे।
- यहाँ के भवन सामान्य नागरिकों की सुविधा के लिए बने थे, न कि किसी राजा या देवता की महिमा के लिए।
- सार्वजनिक स्नानागार और जल-निकासी व्यवस्था जन-सुविधा को प्राथमिकता देती है, न कि दिखावे को।
निष्कर्ष: इस प्रकार स्पष्ट है कि सिंधु-सभ्यता के लोग साधन-संपन्न होते हुए भी व्यावहारिक और सादगीपूर्ण जीवन जीते थे। उनकी समृद्धि जन-कल्याण में व्यक्त होती थी, भव्य आडंबर में नहीं।
बनारस / दिशा (केदारनाथ सिंह)
15 questions solved
- प्रश्न-अभ्यास · 10 questions
- प्रश्न-अभ्यास · 2 questions
- योग्यता-विस्तार · 3 questions
Q1.बनारस में वसंत का आगमन कैसे होता है और उसका क्या प्रभाव इस शहर पर पड़ता है?
दिया गया संदर्भ: कविता 'बनारस' — केदारनाथ सिंह
उत्तर:
बनारस में वसंत का आगमन अत्यंत धीमे और अनोखे ढंग से होता है। यहाँ वसंत किसी भव्य उत्सव की तरह नहीं, बल्कि चुपचाप, धीरे-धीरे उतरता है। वह पहले इस शहर की गलियों, घाटों और मंदिरों में प्रवेश करता है। भिखारियों के 'खाली कटोरों' में भी वसंत उतरता है, अर्थात् वसंत की बहार यहाँ के निर्धनतम जीवन को भी स्पर्श करती है।
इस शहर पर वसंत का प्रभाव यह होता है कि पूरा बनारस एक नई चेतना और स्फूर्ति से भर उठता है। पचखियाँ (अंकुरण) फूटने लगती हैं, जीवन में नई ऊर्जा का संचार होता है। वसंत यहाँ के जड़-चेतन सभी को प्रभावित करता है — घाट, गलियाँ, मंदिर और यहाँ के निवासी सभी इस ऋतु की लय में बँध जाते हैं।
निष्कर्ष: बनारस में वसंत का आगमन इस शहर की अपनी विशिष्ट लय के अनुसार — धीरे-धीरे और गहराई से — होता है।
कैमरे में बंद अपाहिज-(रघुवीर सहाय)
9 questions solved
- कविता के साथ · 5 questions
- कविता के आसपास · 4 questions
Q1.कविता में कुछ पंक्तियाँ कोष्ठकों में रखी गई हैं—आपकी समझ से इसका क्या औचित्य है?
दिया गया प्रश्न: कोष्ठकों में रखी पंक्तियों का औचित्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कविता में कोष्ठकों में रखी गई पंक्तियाँ टेलीविज़न कार्यक्रम के निर्देशक या प्रोड्यूसर के निर्देशों को दर्शाती हैं, जो कैमरे के पीछे से दिए जाते हैं। इनका औचित्य निम्नलिखित है:
- दोहरेपन का प्रदर्शन: ये पंक्तियाँ दिखाती हैं कि कार्यक्रम के बाहर (दर्शकों को दिखाई देने वाला हिस्सा) और भीतर (पर्दे के पीछे की वास्तविकता) में कितना अंतर है। बाहर करुणा का नाटक होता है, भीतर व्यावसायिक स्वार्थ।
- व्यंग्य को तीव्र करना: जैसे — (परदे पर वक्त की कीमत है) — यह पंक्ति बताती है कि मीडिया के लिए अपाहिज व्यक्ति की पीड़ा नहीं, बल्कि 'टाइम-स्लॉट' महत्त्वपूर्ण है।
- यथार्थ और दिखावे का भेद: कोष्ठक के बाहर की पंक्तियाँ दर्शकों को दिखाई जाने वाली 'करुणा' हैं और कोष्ठक के भीतर की पंक्तियाँ मीडिया की असली क्रूर मानसिकता।
निष्कर्ष: कोष्ठकों का प्रयोग कवि रघुवीर सहाय की काव्य-युक्ति है जिससे मीडिया के पाखंड और संवेदनहीनता को बड़ी कुशलता से उजागर किया गया है।
वसंत आया / तोड़ो (रघुवीर सहाय)
14 questions solved
- प्रश्न-अभ्यास · 6 questions
- प्रश्न-अभ्यास · 5 questions
- योग्यता-विस्तार · 3 questions
Q1.वसंत आगमन की सूचना कवि को कैसे मिली?
दिया गया है: रघुवीर सहाय की कविता 'वसंत आया'।
उत्तर:
कवि को वसंत आगमन की सूचना किसी मौसम-विभाग की घोषणा से नहीं, बल्कि प्रकृति के विभिन्न संकेतों से मिली। कोयल की कुहुक सुनाई दी, पेड़ों के बड़े-बड़े पत्ते पीले पड़कर चुरमुराने लगे, सुबह छह बजे हवा ऐसी चली जैसे गरम पानी से नहाई हो — खिली हुई, ताज़ी और सुखद। ढाक के जंगल दहर-दहर दहकने को तैयार दिखे। इस प्रकार प्रकृति के इन्हीं नैसर्गिक संकेतों से कवि को वसंत के आगमन की सूचना मिली।
उषा - (शमशेर बहादुर सिंह)
4 questions solved
- उषा — कविता के साथ (अभ्यास) · 4 questions
Q1.कविता के किन उपमानों को देखकर यह कहा जा सकता है कि उषा कविता गाँव की सुबह का गतिशील शब्दचित्र है?
दिया गया: शमशेर बहादुर सिंह की कविता 'उषा' में भोर के आकाश का वर्णन विभिन्न उपमानों के माध्यम से किया गया है।
उत्तर:
कवि ने 'उषा' कविता में जो उपमान चुने हैं, वे सभी ग्रामीण जीवन और ग्रामीण परिवेश से लिए गए हैं। इन्हीं उपमानों के कारण यह कविता गाँव की सुबह का गतिशील शब्दचित्र बन जाती है। प्रमुख उपमान निम्नलिखित हैं —
- 'राख से लीपा हुआ चौका' — भोर के नभ की तुलना राख से लीपे हुए चौके से की गई है। गाँव में महिलाएँ प्रतिदिन सुबह चूल्हे के पास की जगह (चौका) को राख से लीपती हैं। यह दृश्य पूरी तरह ग्रामीण है।
- 'गीला पड़ा है' — चौके का अभी गीला होना यह बताता है कि सुबह का काम अभी-अभी शुरू हुआ है — यह गाँव की ताज़ी, जीवंत सुबह का संकेत है।
- 'नीला शंख' — आकाश की नीलिमा की तुलना नीले शंख से की गई है। शंख गाँव और मंदिर से जुड़ी वस्तु है।
- 'स्लेट पर लाल खड़िया चाक मल दी हो' — सूर्योदय की लालिमा की तुलना स्लेट पर लाल खड़िया मलने से की गई है। यह उपमान ग्रामीण पाठशाला के परिवेश से लिया गया है।
- 'काली सिल ज़रा से लाल केसर से कि जैसे धुल गई हो' — यह उपमान गाँव की रसोई में मसाले पीसने वाली काली सिल (पत्थर) से लिया गया है।
- 'गोरी चमकीली देह जैसे खिल रहे हों' — उगते सूरज की आभा की तुलना किसी गोरी युवती की देह से की गई है — यह ग्रामीण सौंदर्य-बोध का प्रतीक है।
निष्कर्ष: ये सभी उपमान — चौका, राख, सिल, केसर, खड़िया, शंख — गाँव के दैनिक जीवन से जुड़े हैं और सुबह होने के साथ-साथ बदलते जाते हैं, इसलिए यह कविता गाँव की सुबह का गतिशील (बदलता हुआ) शब्दचित्र है।
भरत-राम का प्रेम / पद (तुलसीदास)
13 questions solved
- प्रश्न-अभ्यास · 5 questions
- पद — प्रश्न-अभ्यास · 5 questions
- योग्यता-विस्तार · 3 questions
Q1.'हारेंहु खेल जितावहिं मोही' भरत के इस कथन का क्या आशय है?
आशय एवं व्याख्या:
भरत कह रहे हैं कि राम बचपन में उनके साथ खेलते समय जान-बूझकर हार जाते थे और मुझे जिता देते थे। इस कथन में भरत राम के अगाध प्रेम और उनकी उदारता का स्मरण कर रहे हैं।
भाव-विस्तार:
- राम बड़े भाई होते हुए भी छोटे भाई भरत को प्रसन्न करने के लिए खेल में जानबूझकर हार स्वीकार कर लेते थे।
- इससे राम के निःस्वार्थ प्रेम, विनम्रता और भ्रातृवात्सल्य का पता चलता है।
- भरत इस स्मृति के माध्यम से यह भी व्यंजित करते हैं कि ऐसे स्नेहशील बड़े भाई के वन चले जाने पर उनका हृदय कितना व्यथित है।
- यह कथन भरत की कृतज्ञता और राम के प्रति उनकी असीम श्रद्धा को भी प्रकट करता है।
निष्कर्ष: इस पंक्ति का आशय है कि राम का भरत के प्रति प्रेम इतना गहरा था कि वे अपनी जीत की परवाह न करके भरत को खुश करने के लिए खेल में हार जाते थे। यह उनके महान चरित्र का परिचायक है।
बादल राग-(सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला')
11 questions solved
- अभ्यास · 11 questions
Qकविता के साथ — 1.अस्थिर सुख पर दुख की छाया पंक्ति में दुख की छाया किसे कहा गया है और क्यों?
दिया गया है: कविता 'बादल राग' की पंक्ति — 'अस्थिर सुख पर दुख की छाया'।
उत्तर:
इस पंक्ति में बादलों की छाया को 'दुख की छाया' कहा गया है।
कारण:
- बादल जब आकाश में छा जाते हैं तो धरती पर उनकी छाया पड़ती है। यह छाया उस 'अस्थिर सुख' पर पड़ती है जो पूँजीपति वर्ग को प्राप्त है।
- पूँजीपतियों का सुख 'अस्थिर' है क्योंकि वह शोषण पर टिका है और कभी भी नष्ट हो सकता है।
- बादल क्रांति के प्रतीक हैं। जब क्रांति (विप्लव) आती है तो शोषक वर्ग के सुख पर संकट (दुख की छाया) मँडराने लगता है।
- अतः 'दुख की छाया' से तात्पर्य है — क्रांति का भय और आसन्न संकट, जो पूँजीपतियों के अस्थायी सुख को नष्ट करने वाला है।
निष्कर्ष: कवि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' ने बादलों के माध्यम से यह संदेश दिया है कि शोषकों का सुख क्षणिक है और क्रांति की छाया उनके विनाश का संकेत है।
बारहमासा (मलिक मुहम्मद जायसी)
11 questions solved
- प्रश्न-अभ्यास — बारहमासा (मलिक मुहम्मद जायसी) · 9 questions
- योग्यता-विस्तार · 2 questions
Q1.अगहन मास की विशेषता बताते हुए विरहिणी (नागमती) की व्यथा-कथा का चित्रण अपने शब्दों में कीजिए।
दिया गया है: मलिक मुहम्मद जायसी कृत 'बारहमासा' में अगहन मास का वर्णन।
अगहन मास की विशेषता:
अगहन (मार्गशीर्ष) का महीना शीत ऋतु का आरंभ होता है। इस मास में ठंड बढ़ने लगती है, रातें लंबी और दिन छोटे हो जाते हैं। प्रकृति में एक प्रकार की सुस्ती और शीतलता छा जाती है। खेतों में फसल पकने लगती है और वातावरण में हल्की-हल्की ठंडक घर करने लगती है।
विरहिणी नागमती की व्यथा:
अगहन मास में जब सामान्य स्त्रियाँ अपने पतियों के साथ शीत का आनंद लेती हैं, तब नागमती का प्रिय (रत्नसेन) उससे दूर है। ठंड की रातें उसके लिए और भी असह्य हो जाती हैं। शीतल हवाएँ उसके विरह की आग को और भड़काती हैं। जहाँ दूसरी स्त्रियाँ अपने पतियों की गर्म बाँहों में सिमटती हैं, वहाँ नागमती अकेली ठिठुरती रहती है। उसका हृदय विरह की पीड़ा से व्याकुल है। ठंड का प्रत्येक झोंका उसे प्रिय की याद दिलाता है और उसकी वेदना को और गहरा कर देता है। इस प्रकार अगहन मास की शीतलता विरहिणी के लिए काल के समान बन जाती है।
कवितावली (उत्तर कांड से) / लक्ष्मण-मूरच्छा और राम का विलाप-(तुलसीदास)
13 questions solved
- पाठ के साथ · 8 questions
- पाठ के आसपास · 5 questions
Q1.कवितावली में उद्धृत छंदों के आधार पर स्पष्ट करें कि तुलसीदास को अपने युग की आर्थिक विषमता की अच्छी समझ है।
दिया गया है: कवितावली के उत्तर कांड से लिए गए छंद।
उत्तर:
तुलसीदास केवल भक्त कवि नहीं थे, वे अपने युग के鋭 सामाजिक-आर्थिक द्रष्टा भी थे। कवितावली के छंदों में उन्होंने अपने समय की आर्थिक विषमता का यथार्थ चित्रण किया है। इसके प्रमाण निम्नलिखित हैं:
- बेरोज़गारी का चित्रण: तुलसी लिखते हैं कि लोग किसी भी प्रकार का काम करने को तैयार हैं — कोई खेती करता है, कोई मज़दूरी, कोई भीख माँगता है, कोई चोरी करता है। इससे स्पष्ट है कि उस युग में रोज़गार का घोर अभाव था।
- भूख की विकरालता: "पेट ही को पचत, बेचत बेटा-बेटकी" — यह पंक्ति बताती है कि लोग पेट भरने के लिए अपनी संतानों तक को बेचने पर विवश थे। यह आर्थिक विषमता की चरम सीमा है।
- विभिन्न वर्गों की दुर्दशा: किसान, मज़दूर, कारीगर, भिखारी — सभी वर्गों की दयनीय स्थिति का वर्णन करके तुलसी ने समाज के हर तबके की पीड़ा को उजागर किया है।
- ऊँच-नीच सभी पीड़ित: "ऊँचे नीचे करम, धरम-अधरम करि" — यह पंक्ति दर्शाती है कि आर्थिक संकट ने ऊँच-नीच सभी को प्रभावित किया था और लोग धर्म-अधर्म की परवाह किए बिना पेट भरने में लगे थे।
निष्कर्ष: इस प्रकार तुलसीदास ने अपने युग की आर्थिक विषमता — बेरोज़गारी, भुखमरी, बाल-विक्रय, वर्ग-शोषण — का सजीव चित्रण किया है, जो उनकी गहरी सामाजिक समझ का प्रमाण है।
पद (विद्यापति)
13 questions solved
- प्रश्न-अभ्यास · 10 questions
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Q1.प्रियतमा के दुख के क्या कारण हैं?
दिया गया है: विद्यापति के पदों में नायिका की विरह-दशा का वर्णन है।
उत्तर:
प्रियतमा के दुख के निम्नलिखित कारण हैं—
- प्रियतम का वियोग: नायिका का प्रिय (माधव) उससे दूर है। उसके बिना भवन में अकेले रहना उसे असह्य लगता है।
- सावन का महीना: सावन का मास प्रेम और मिलन का प्रतीक है, किंतु प्रियतम के बिना यह ऋतु नायिका की पीड़ा को और बढ़ा देती है।
- प्रकृति का विरोधाभासी प्रभाव: कुसुमित वन, कोयल का कलरव और भौरों की गुनगुनाहट — ये सब मिलन के प्रतीक हैं, परंतु विरह में ये नायिका की वेदना को और तीव्र कर देते हैं।
- नयनों की अतृप्ति: जन्म भर प्रिय को देखते रहने पर भी नेत्र तृप्त नहीं हुए और अब प्रिय सामने नहीं है।
- शरीर का क्षीण होना: प्रियतम के विरह में नायिका का शरीर चतुर्दशी के चाँद की तरह दिन-प्रतिदिन घटता जा रहा है।
निष्कर्ष: प्रियतम का वियोग ही प्रियतमा के समस्त दुखों का मूल कारण है।
रुबाइयाँ-( फ़िराक गोरखपुरी)
9 questions solved
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- कविता के आसपास · 1 question
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Q1.शायर राखी के लच्छे को बिजली की चमक की तरह कहकर क्या भाव व्यंजित करना चाहता है?
दिया गया संदर्भ: फ़िराक गोरखपुरी की रुबाइयों में शायर ने राखी के लच्छे की तुलना बिजली की चमक से की है।
भाव-व्यंजना:
शायर इस उपमा के माध्यम से निम्नलिखित भाव व्यंजित करना चाहता है —
- क्षणभंगुरता का भाव: जिस प्रकार बिजली की चमक क्षण-भर के लिए चमककर अंधेरे में विलीन हो जाती है, उसी प्रकार राखी का रेशमी लच्छा भी अपनी चमक-दमक से क्षण-भर के लिए मन को आलोकित कर देता है। यह भाई-बहन के प्रेम की उस पवित्र अनुभूति का प्रतीक है जो हृदय में एक तीव्र आलोक उत्पन्न करती है।
- प्रेम की तीव्रता: बिजली की चमक जितनी तीव्र और प्रभावशाली होती है, उतना ही तीव्र और हृदयस्पर्शी भाई-बहन का प्रेम-बंधन होता है।
- सौंदर्य-बोध: राखी के चमकीले लच्छे की सुंदरता को बिजली की चमक से जोड़कर शायर ने उसे एक दिव्य और अलौकिक सौंदर्य प्रदान किया है।
- पावनता का भाव: जैसे बिजली की चमक आकाश को पवित्र आलोक से भर देती है, वैसे ही राखी का बंधन भाई के जीवन को बहन के प्रेम और शुभकामनाओं के प्रकाश से आलोकित कर देता है।
निष्कर्ष: इस प्रकार शायर ने बिजली की चमक की उपमा देकर राखी के लच्छे में निहित भाई-बहन के पवित्र, तीव्र और क्षण-भर में हृदय को आलोकित कर देने वाले प्रेम का सुंदर चित्रण किया है।
कवित्त (घनानंद)
9 questions solved
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Q1.कवि ने 'चाहत चलन ये संदेसो ले सुजान को' क्यों कहा है?
दिया गया है: घनानंद का कवित्त जिसमें कवि अपनी प्रेमिका सुजान के प्रति अपनी विरह-व्यथा व्यक्त करता है।
आशय एवं उत्तर:
कवि घनानंद अपनी प्रेमिका सुजान की झूठी बातों और आनाकानी से अत्यंत उदास और निराश हो गए हैं। सुजान ने बार-बार मिलने का वादा किया, परंतु कभी नहीं आई। उसकी झूठी बातों पर विश्वास करते-करते कवि थक गया है। अब उसे सुजान के पास स्वयं जाने की इच्छा नहीं रही, क्योंकि वह जानता है कि सुजान उसकी परवाह नहीं करती।
इसीलिए कवि कहता है कि अब उसका मन (हृदय) स्वयं ही सुजान के पास संदेश लेकर चलना चाहता है — अर्थात् कवि का हृदय इतना व्याकुल हो उठा है कि वह स्वयं ही सुजान तक पहुँचकर अपनी विरह-वेदना सुनाना चाहता है। यह पंक्ति कवि की गहरी विरह-पीड़ा और प्रेम की तीव्रता को व्यक्त करती है।
छोटा मेरा खेत / बगुलों के पंख-( उमाशंकर जोशी)
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- कला की बात — बगुलों के पंख · 1 question
Q1.छोटे चौकोने खेत को कागज का पन्ना कहने में क्या अर्थ निहित है?
दिया गया है: कवि उमाशंकर जोशी ने कागज के पन्ने को छोटे चौकोने खेत की संज्ञा दी है।
अर्थ एवं व्याख्या:
कवि ने कागज के पन्ने और खेत के बीच एक सार्थक रूपक स्थापित किया है। दोनों की आकृति चौकोनी होती है और दोनों में कुछ-न-कुछ उगाया जाता है —
- जिस प्रकार खेत में बीज बोए जाते हैं और फसल उगती है, उसी प्रकार कागज के पन्ने पर विचार-बीज बोए जाते हैं और रचना रूपी फसल तैयार होती है।
- खेत सीमित आकार का होता है, परंतु उसमें असीमित अन्न उत्पन्न होने की क्षमता होती है। उसी प्रकार कागज का पन्ना भले ही छोटा हो, किंतु उस पर लिखी रचना असीमित भावों और अर्थों को समेट सकती है।
- यह रूपक सृजन-प्रक्रिया को कृषि-कर्म से जोड़ता है — दोनों में श्रम, धैर्य और प्रतीक्षा की आवश्यकता होती है।
निष्कर्ष: इस प्रयोग में कवि यह बताना चाहता है कि जैसे खेत में बीज से फसल उगती है, वैसे ही कागज पर विचार-बीज से साहित्यिक रचना जन्म लेती है। दोनों का उद्देश्य मानव-जीवन को पोषित करना है।
प्रेमघन की छाया-स्मृति (रामचंद्र शुक्ल)
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Q1.लेखक ने अपने पिता जी की किन-किन विशेषताओं का उल्लेख किया है?
लेखक ने अपने पिता जी के बारे में बताया है कि वे फ़ारसी के अच्छे ज्ञाता थे और पुरानी हिंदी कविता के बड़े प्रेमी थे। उन्हें फ़ारसी कवियों की उक्तियों को हिंदी कवियों की उक्तियों के साथ मिलाने में आनंद आता था। वे रात को घर के सब लोगों को एकत्र करके रामचरितमानस और रामचंद्रिका बड़े चित्ताकर्षक ढंग से पढ़ते थे। साथ ही वे भारतेंदु जी के नाटक भी बहुत पसंद करते थे और कभी-कभी उन्हें सुनाते थे।
भक्तिन-(महादेवी वर्मा)
14 questions solved
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Q1.भक्तिन अपना वास्तविक नाम लोगों से क्यों छुपाती थी? भक्तिन को यह नाम किसने और क्यों दिया होगा?
दिया गया संदर्भ: यह प्रश्न महादेवी वर्मा के रेखाचित्र 'भक्तिन' पर आधारित है।
उत्तर:
भक्तिन का वास्तविक नाम लछमिन (लक्ष्मी) था। वह इस नाम को छुपाती थी क्योंकि उसका जीवन उस नाम के अनुरूप नहीं था। लक्ष्मी धन-वैभव और सौभाग्य की देवी हैं, किंतु भक्तिन का जीवन दरिद्रता, कष्ट और संघर्ष से भरा था। उसे लगता था कि इतने वैभवशाली नाम और उसकी दयनीय स्थिति में बहुत बड़ा विरोधाभास है, इसलिए वह इस नाम को सुनकर असहज हो जाती थी।
'भक्तिन' नाम किसने और क्यों दिया:
यह नाम लेखिका महादेवी वर्मा ने दिया। भक्तिन के सिर पर हमेशा एक छोटी-सी चोटी रहती थी, वह कानों में ठीक वैसे कुंडल पहनती थी जैसे वैष्णव भक्त पहनते हैं, और उसका आचरण एक समर्पित सेविका जैसा था। उसकी वेशभूषा और भक्तिभाव देखकर लेखिका ने उसे 'भक्तिन' नाम दिया। यह नाम उसके व्यक्तित्व और स्वभाव के अनुकूल था, इसलिए वह इसे सहर्ष स्वीकार करती थी।
सुमिरिनी के मनके (पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी)
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Q1.बालक से उसकी उम्र और योग्यता से ऊपर के कौन-कौन से प्रश्न पूछे गए?
दिया गया है: पाठ 'सुमिरिनी के मनके' में एक बालक से वार्षिकोत्सव के अवसर पर प्रश्न पूछे जाते हैं।
उत्तर:
बालक से उसकी उम्र और योग्यता से कहीं ऊपर के निम्नलिखित प्रश्न पूछे गए—
- देश की वर्तमान राजनीतिक स्थिति के बारे में प्रश्न।
- स्वराज्य और राष्ट्रसेवा के बारे में प्रश्न।
- जीवन का लक्ष्य क्या है — इस प्रकार के दार्शनिक प्रश्न।
- बड़े होकर क्या करोगे — इस प्रकार के भविष्य-संबंधी प्रश्न जो एक छोटे बालक की समझ से परे थे।
ये सभी प्रश्न उस बालक की आयु और मानसिक स्तर के अनुकूल नहीं थे। ये प्रश्न बड़े-बड़े नेताओं और विद्वानों के लिए उचित होते, किसी छोटे बच्चे के लिए नहीं।
बाज़ार दर्शन-(जैनेन्द्र कुमार)
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Q1.बाजार का जादू चढ़ने और उतरने पर मनुष्य पर क्या-क्या असर पड़ता है?
जब बाजार का जादू चढ़ता है:
जब मनुष्य खाली मन लेकर बाजार जाता है, तो बाजार का जादू उस पर पूरी तरह चढ़ जाता है। बाजार की चमक-दमक, सजी हुई दुकानें और आकर्षक वस्तुएँ उसे सम्मोहित कर लेती हैं। वह अनावश्यक वस्तुएँ भी खरीद लेता है। उसकी क्रय-शक्ति (पर्चेजिंग पावर) उसे विवेकहीन बना देती है। वह वस्तुओं का गुलाम बन जाता है और घर लौटने पर पछताता है। उसे लगता है कि उसने जो खरीदा वह न तो जरूरी था और न ही उपयोगी।
जब बाजार का जादू उतरता है:
जब मनुष्य सुनिश्चित उद्देश्य और भरे मन के साथ बाजार जाता है, तो बाजार का जादू उस पर नहीं चढ़ता। वह केवल अपनी जरूरत की चीजें खरीदता है। बाजार की चकाचौंध उसे प्रभावित नहीं कर पाती। ऐसा व्यक्ति बाजार का सदुपयोग करता है और संतुष्ट होकर लौटता है। भगत जी इसी श्रेणी के व्यक्ति हैं जो केवल जरूरत-भर जीरा लेकर संतुष्ट हो जाते हैं।
निष्कर्ष: बाजार का जादू मनुष्य की मानसिक स्थिति पर निर्भर करता है। खाली मन बाजार के जादू का शिकार होता है, जबकि भरा और सुनिश्चित मन उससे बचा रहता है।
संवदिया (फणीश्वरनाथ 'रेणु')
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Q1.संवदिया की क्या विशेषताएँ हैं और गाँववालों के मन में संवदिया की क्या अवधारणा है?
दिया गया: फणीश्वरनाथ 'रेणु' की कहानी 'संवदिया' पर आधारित प्रश्न।
संवदिया की विशेषताएँ:
- विश्वसनीयता: संवदिया एक ऐसा व्यक्ति होता है जिस पर संदेश भेजने वाला पूरा भरोसा करता है। वह गोपनीय बातें भी उसी को सौंपता है।
- स्मरण-शक्ति: संवदिया को संदेश मौखिक रूप से याद रखना होता है और ज्यों-का-त्यों पहुँचाना होता है। उसकी स्मरण-शक्ति तीव्र होती है।
- वाक्पटुता: वह संदेश को उसी भाव, स्वर और लहजे में सुनाता है जिस प्रकार संदेश देने वाले ने कहा हो।
- निष्ठा एवं ईमानदारी: संवदिया संदेश में कोई मिलावट नहीं करता, वह पूरी निष्ठा से अपना कार्य करता है।
- शारीरिक सक्षमता: लंबी यात्राएँ करने के लिए उसे शारीरिक रूप से सक्षम होना आवश्यक है।
गाँववालों की अवधारणा:
गाँववालों के मन में संवदिया के प्रति एक विशेष धारणा है — 'संवदिया डटकर खाता है और अफर कर सोता है।' अर्थात् लोग समझते हैं कि संवदिया का काम आसान है — वह जहाँ जाता है, वहाँ खाता-पीता है और आराम से सोता है। लोग उसे एक साधारण दूत मानते हैं जिसका काम केवल संदेश पहुँचाना है, परंतु वास्तव में यह कार्य अत्यंत जिम्मेदारी और संवेदनशीलता का होता है।
निष्कर्ष: संवदिया केवल संदेशवाहक नहीं, बल्कि दो परिवारों के बीच भावनात्मक सेतु होता है।
काले मेघा पानी दे-(धर्मवीर भारती)
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Q1.लोगों ने लड़कों की टोली को मेडक-मंडली नाम किस आधार पर दिया? यह टोली अपने आपको इंदर सेना कहकर क्यों बुलाती थी?
दिया गया संदर्भ: पाठ 'काले मेघा पानी दे' में लेखक धर्मवीर भारती ने बचपन की उस टोली का वर्णन किया है जो वर्षा के लिए इंद्र देवता को मनाने निकलती थी।
मेडक-मंडली नाम का आधार:
लड़कों की यह टोली वर्षा ऋतु में पूरी तरह भीगते हुए, कीचड़ में लोटते-पोटते, गाते-चिल्लाते हुए गली-गली घूमती थी। उनकी यह हालत देखकर — भीगे, कीचड़ से सने, उछलते-कूदते — लोगों को वे मेंढकों जैसे लगते थे। मेंढक को ही 'मेडक' कहते हैं, इसलिए लोगों ने उन्हें 'मेडक-मंडली' कह कर पुकारना शुरू कर दिया।
इंदर सेना नाम का कारण:
यह टोली इंद्र देवता (वर्षा के देवता) को प्रसन्न करने के लिए निकलती थी। वे इंद्र देवता के सैनिकों की तरह उनके लिए काम करते थे — उनकी स्तुति करते, उनसे पानी माँगते और लोगों से जल-दान लेकर इंद्र देवता को अर्पित करते थे। चूँकि वे इंद्र (इंदर) की सेना की तरह कार्य करते थे, इसलिए वे स्वयं को 'इंदर सेना' कहते थे।
निष्कर्ष: मेडक-मंडली नाम बाहरी रूप-रंग (मेंढक जैसी दशा) पर आधारित था, जबकि इंदर सेना नाम उनके उद्देश्य और कार्य पर आधारित था।
गांधी, नेहरू और यास्सेर अराफ़ात (भीष्म साहनी)
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Q1.लेखक सेवाग्राम कब और क्यों गया था?
दिया गया है: भीष्म साहनी का संस्मरण 'गांधी, नेहरू और यास्सेर अराफ़ात'।
उत्तर:
लेखक भीष्म साहनी सेवाग्राम उस समय गए थे जब वे एक युवा लेखक थे। वे गांधी जी के दर्शन करने तथा उनके आश्रम के जीवन को निकट से देखने-समझने के उद्देश्य से सेवाग्राम गए थे। गांधी जी का व्यक्तित्व और उनका सादा जीवन लेखक को बहुत आकर्षित करता था, इसलिए वे वहाँ जाकर उनके साथ कुछ समय बिताना चाहते थे। सेवाग्राम में रहकर लेखक ने गांधी जी की दिनचर्या, उनके आश्रम के वातावरण और उनके सरल-सहज व्यवहार को प्रत्यक्ष रूप से अनुभव किया।
पहलवान की ढोलक-(फणीश्वर नाथ रेणु)
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Q1.कुश्ती के समय ढोल की आवाज और लुट्टन के दाँव-पेंच में क्या तालमेल था? पाठ में आए ध्वन्यात्मक शब्द और ढोल की आवाज आपके मन में कैसी ध्वनि पैदा करते हैं, उन्हें शब्द दीजिए।
कुश्ती के समय ढोल की थाप और लुट्टन के दाँव-पेंच में पूरा तालमेल था। ढोल की आवाज उसे बार-बार उत्तेजित, सावधान और सक्रिय करती थी। पाठ में ढोल की ध्वनि जैसे शब्द आए हैं—‘चट्-धा, गिड्-धा’, ‘चटाक्-चट्-धा’, ‘ढाक्-ढिना’, ‘धाक-धिना’, ‘धिना-धिना, धिक-धिना’, ‘धा-गिड़-गिड़’। इनसे कानों में ऐसी ध्वनि गूँजती है जैसे कोई तेज, तालबद्ध, युद्ध-सी ललकार हो रही हो। यह ध्वनि मन में जोश, ललकार, उठाकर पटक देने और सामने वाले को चुनौती देने जैसा प्रभाव पैदा करती है। ढोल मानो लुट्टन को दाँव काटने, बाहर निकलने, और जोर लगाकर चित करने का संकेत देता है।
शेर, पहचान, चार हाथ, साझा (असगर वजाहत)
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Q1.लोमड़ी स्वेच्छा से शेर के मुँह में क्यों चली जा रही थी?
लोमड़ी ने कहा कि शेर के मुँह के अंदर रोजगार का दफ्तर है और वहाँ नौकरी मिल जाएगी। उसी झूठे विश्वास के कारण वह स्वेच्छा से शेर के मुँह में चली जा रही थी।
शिरीष के फूल-(हजारी प्रसाद द्विवेदी)
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Q1.लेखक ने शिरीष को कालजयी अवधूत (संन्यासी) की तरह क्यों माना है?
दिया गया है: हजारी प्रसाद द्विवेदी का ललित निबंध 'शिरीष के फूल'।
उत्तर:
लेखक ने शिरीष को कालजयी अवधूत इसलिए माना है क्योंकि शिरीष का वृक्ष उन सभी विशेषताओं से युक्त है जो एक सच्चे अवधूत (संन्यासी) में होती हैं—
- बाहरी परिस्थितियों से निर्लिप्तता: ज्येष्ठ-आषाढ़ की भीषण गर्मी में, जब लू के थपेड़े चलते हैं और धरती तवे की तरह तपती है, तब भी शिरीष शांत भाव से फूला रहता है। वह न गर्मी से विचलित होता है, न वर्षा से।
- कोमलता और कठोरता का समन्वय: शिरीष के फूल अत्यंत कोमल होते हैं, किंतु उसके पुराने फलों के खोखे इतने कठोर होते हैं कि नए फूल आने पर भी वे डाल नहीं छोड़ते। यह कोमलता और कठोरता का अद्भुत संयोग अवधूत की पहचान है।
- वायुमंडल से रस ग्रहण करना: शिरीष वायुमंडल से रस खींचकर जीवित रहता है। वह बाहरी संघर्षों और उथल-पुथल से अप्रभावित रहता है—ठीक उसी प्रकार जैसे एक अवधूत संसार के बीच रहकर भी उससे अलिप्त रहता है।
- कालजयी स्वभाव: काल की मार से बचते हुए वह दीर्घजीवी बना रहता है। लेखक ने गांधीजी से उसकी तुलना करते हुए कहा है कि जैसे गांधीजी मार-काट, अग्निदाह और खून-खच्चर के बवंडर में भी स्थिर रहे, वैसे ही शिरीष भी विषम परिस्थितियों में अविचल रहता है।
निष्कर्ष: इन्हीं सब कारणों से लेखक ने शिरीष को 'कालजयी अवधूत' की संज्ञा दी है।
जहाँ कोई वापसी नहीं (निर्मल वर्मा)
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Q1.अमझर से आप क्या समझते हैं? अमझर गाँव में सूनापन क्यों है?
दिया गया है: निर्मल वर्मा के यात्रा-वृत्तांत 'जहाँ कोई वापसी नहीं' में अमझर गाँव का उल्लेख है।
अमझर का अर्थ: 'अमझर' एक ऐसे गाँव का नाम है जो सिंगरौली क्षेत्र में स्थित था। 'अमझर' शब्द का अर्थ है — वह स्थान जहाँ से आम के पेड़ झर (गिर) गए हों अर्थात् जो उजड़ गया हो।
अमझर में सूनापन के कारण:
औद्योगीकरण और बड़ी-बड़ी परियोजनाओं (जैसे बाँध, कोयला खदान, बिजलीघर आदि) के कारण सिंगरौली क्षेत्र के गाँवों को बार-बार उजाड़ा गया। अमझर गाँव के निवासियों को भी उनकी जमीन और घरों से बेदखल कर दिया गया। लोग विस्थापित होकर इधर-उधर चले गए। जो लोग वहाँ रहते थे, वे अपनी जड़ों से उखड़ गए। इसी कारण अमझर गाँव में गहरा सूनापन छा गया — न घरों में रौनक रही, न खेतों में हलचल। गाँव एक उजड़े हुए खंडहर की तरह हो गया।
निष्कर्ष: अमझर औद्योगीकरण की बलि चढ़े उन अनगिनत गाँवों का प्रतीक है जो विकास के नाम पर उजाड़ दिए गए।
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Q1.जाति प्रथा को श्रम-विभाजन का ही एक रूप न मानने के पीछे आंबेडकर के क्या तर्क हैं?
दिया गया है: डॉ. भीमराव आंबेडकर के निबंध 'श्रम विभाजन और जाति-प्रथा' में जाति प्रथा और श्रम-विभाजन के संबंध पर विचार किया गया है।
आंबेडकर के तर्क:
- अस्वाभाविक विभाजन: सामान्य श्रम-विभाजन श्रमिकों को विभिन्न वर्गों में विभाजित करता है, परंतु जाति प्रथा श्रमिकों के साथ-साथ उनकी सामाजिक हैसियत का भी ऊँच-नीच के आधार पर विभाजन करती है। यह विभाजन अस्वाभाविक एवं अमानवीय है।
- रुचि व क्षमता की उपेक्षा: सामान्य श्रम-विभाजन में व्यक्ति अपनी रुचि, योग्यता और क्षमता के अनुसार कार्य चुनता है, किंतु जाति प्रथा में व्यक्ति को जन्म के आधार पर पेशा निर्धारित कर दिया जाता है। उसकी व्यक्तिगत रुचि या दक्षता का कोई महत्त्व नहीं होता।
- पेशे में लचीलेपन का अभाव: जाति प्रथा में पेशा बदलने की कोई स्वतंत्रता नहीं होती। यदि बाज़ार में किसी पेशे की माँग समाप्त हो जाए, तो भी व्यक्ति को वही पेशा अपनाए रखना पड़ता है, जिससे वह भूखा मरने को विवश हो जाता है।
- पूर्व-निर्धारित एवं थोपा गया विभाजन: श्रम-विभाजन स्वेच्छा पर आधारित होता है, जबकि जाति प्रथा में श्रम-विभाजन जन्म से ही थोप दिया जाता है। यह व्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन है।
निष्कर्ष: इस प्रकार आंबेडकर का तर्क है कि जाति प्रथा श्रम-विभाजन का स्वाभाविक रूप नहीं है, बल्कि यह मनुष्य की स्वतंत्रता, गरिमा और कार्यकुशलता को नष्ट करने वाली एक अमानवीय व्यवस्था है।
दूसरा देवदास (ममता कालिया)
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Q1.पाठ के आधार पर हर की पीड़ी पर होने वाली गंगा जी की आरती का भावपूर्ण वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।
दिया गया: पाठ 'दूसरा देवदास' में हरिद्वार के हर की पीड़ी पर होने वाली गंगा आरती का सजीव चित्रण किया गया है।
वर्णन:
गोधूलि बेला में हर की पीड़ी पर गंगा आरती का दृश्य अत्यंत मनोरम और भावपूर्ण होता है। संध्या होते ही घाट पर श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ती है। पुजारी नीलांजलि (विशेष दीपक) जलाकर गंगा मैया की आरती करते हैं। दीपों की लौ जल की सतह पर प्रतिबिंबित होकर एक अद्भुत आलोक फैलाती है। घंटे-घड़ियालों की ध्वनि, शंखनाद और मंत्रोच्चार से वातावरण गुंजायमान हो उठता है। श्रद्धालु हाथ जोड़कर, आँखें मूँदकर गंगा मैया की स्तुति करते हैं। कुछ भक्त दीपक जलाकर गंगा की धारा में प्रवाहित करते हैं जो जल पर तैरते हुए एक अलौकिक दृश्य उपस्थित करते हैं। आरती की लपटें, भजन-कीर्तन की स्वर-लहरियाँ और गंगा का कलकल निनाद मिलकर एक ऐसा वातावरण बनाते हैं जिसमें मन स्वतः श्रद्धा से भर उठता है। यह दृश्य देखकर संभव भी भाव-विभोर हो जाता है और उसे लगता है कि गंगा मैया केवल नदी नहीं, बल्कि जीवन-शक्ति का साक्षात् स्वरूप हैं।
कुटज (हजारी प्रसाद द्विवेदी)
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- प्रश्न-अभ्यास — कुटज (हजारी प्रसाद द्विवेदी) · 13 questions
- योग्यता-विस्तार — कुटज · 5 questions
Q1.कुटज को 'गाढ़े के साथी' क्यों कहा गया है?
दिया गया है: हजारी प्रसाद द्विवेदी का ललित निबंध 'कुटज'।
उत्तर:
'गाढ़े के साथी' उसे कहते हैं जो विपत्ति और कठिनाई के समय साथ न छोड़े। कुटज का पौधा उन पहाड़ी, पथरीली, बंजर और सूखी भूमि पर उगता है जहाँ भीषण गर्मी में लू के थपेड़े चलते हैं, जल का नामोनिशान नहीं होता और जीवन-यापन अत्यंत कठिन होता है। ऐसे विकट वातावरण में भी कुटज न केवल जीवित रहता है, बल्कि हरा-भरा रहकर खिलता भी है। जब सब कुछ सूख जाता है, तब भी कुटज अपनी जीवनी-शक्ति से भरपूर रहता है। इसीलिए लेखक ने उसे 'गाढ़े के साथी' कहा है — वह संकट और विपत्ति में भी साथ देता है, हिम्मत नहीं हारता।
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38 chapters
देवसेना का गीत / कार्नेलिया का गीत (जयशंकर प्रसाद)
सूरदास की झोंपड़ी
आत्मपरिचय | एक गीत (हरिवंश राय बच्चन)
सिल्वर वैडिंग
सरोज स्मृति (सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला')
बिस्कोहर की माटी
पतंग (आलोक धन्वा)
जूझ
यह दीप अकेला- मैंने देखा, एक बूँद (सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय')
अपना मालवा-खाऊ-उजाड़ सभ्यता में
कविता के बहाने | बात सीधी थी पर -( कुवर नारायण)
अतीत में दबे पाँव
बनारस / दिशा (केदारनाथ सिंह)
कैमरे में बंद अपाहिज-(रघुवीर सहाय)
वसंत आया / तोड़ो (रघुवीर सहाय)
उषा - (शमशेर बहादुर सिंह)
भरत-राम का प्रेम / पद (तुलसीदास)
बादल राग-(सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला')
बारहमासा (मलिक मुहम्मद जायसी)
कवितावली (उत्तर कांड से) / लक्ष्मण-मूरच्छा और राम का विलाप-(तुलसीदास)
पद (विद्यापति)
रुबाइयाँ-( फ़िराक गोरखपुरी)
कवित्त (घनानंद)
छोटा मेरा खेत / बगुलों के पंख-( उमाशंकर जोशी)
प्रेमघन की छाया-स्मृति (रामचंद्र शुक्ल)
भक्तिन-(महादेवी वर्मा)
सुमिरिनी के मनके (पंडित चंद्रधर शर्मा गुलेरी)
बाज़ार दर्शन-(जैनेन्द्र कुमार)
संवदिया (फणीश्वरनाथ 'रेणु')
काले मेघा पानी दे-(धर्मवीर भारती)
गांधी, नेहरू और यास्सेर अराफ़ात (भीष्म साहनी)
पहलवान की ढोलक-(फणीश्वर नाथ रेणु)
शेर, पहचान, चार हाथ, साझा (असगर वजाहत)
शिरीष के फूल-(हजारी प्रसाद द्विवेदी)
जहाँ कोई वापसी नहीं (निर्मल वर्मा)
श्रम विभाजन और जाति-प्रथा / मेरी कल्पना का आदर्श समाज-( बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर)
दूसरा देवदास (ममता कालिया)
कुटज (हजारी प्रसाद द्विवेदी)
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