कविता के बहाने | बात सीधी थी पर -( कुवर नारायण) (Part 3) — NCERT Solutions
Assam Board · Class 12 · Hindi
NCERT Solutions for कविता के बहाने | बात सीधी थी पर -( कुवर नारायण) (Part 3), Assam Board Class 12 Hindi: 13 textbook questions solved step by step.
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कविता के बहाने / बात सीधी थी पर
1इस कविता के बहाने बताएँ कि 'सब घर एक कर देने के माने' क्या है?Show solution
दिया गया संदर्भ: 'कविता के बहाने' कविता में कवि कुँवर नारायण ने कविता की असीमित शक्ति का वर्णन किया है।
अवधारणा: कविता की सार्वभौमिकता और उसकी सीमाहीनता।
उत्तर:
'सब घर एक कर देने के माने' से अभिप्राय है कि कविता में इतनी शक्ति होती है कि वह सभी सीमाओं, भेदभावों और दूरियों को मिटा देती है। जिस प्रकार एक बच्चा खेलते-खेलते सभी घरों में बेरोकटोक जाता है और सभी उसे अपना मान लेते हैं, उसी प्रकार कविता भी भाषा, जाति, धर्म, देश-काल की सीमाओं को लाँघकर सभी मनुष्यों के हृदय को एक सूत्र में बाँध देती है। कविता किसी एक घर (परिवार, समाज, देश) की नहीं होती, वह सार्वभौमिक होती है। वह सभी के दिलों में एक जैसी भावनाएँ जगाती है और समस्त मानवता को एकता के बंधन में जोड़ देती है। इस प्रकार 'सब घर एक कर देना' कविता की वह अद्भुत क्षमता है जो समस्त मानव-जाति को एकजुट कर देती है।
2'उड़ने' और 'खिलने' का कविता से क्या संबंध बनता है?Show solution
दिया गया संदर्भ: कविता में चिड़िया के उड़ने और फूल के खिलने की तुलना कविता की रचना-प्रक्रिया से की गई है।
अवधारणा: कविता की स्वतंत्रता और स्वाभाविकता।
उत्तर:
'उड़ने' और 'खिलने' का कविता से गहरा संबंध है —
- उड़ना: जिस प्रकार चिड़िया स्वतंत्र रूप से आकाश में उड़ती है और किसी सीमा को नहीं मानती, उसी प्रकार कविता भी स्वच्छंद रूप से विचरण करती है। कविता की कोई भौगोलिक, भाषाई या सामाजिक सीमा नहीं होती। वह कल्पना के पंखों पर उड़कर असीमित आकाश में विचरती है।
- खिलना: जिस प्रकार फूल बिना किसी बाहरी दबाव के स्वाभाविक रूप से खिलता है और अपनी सुगंध चारों ओर फैलाता है, उसी प्रकार कविता भी स्वाभाविक रूप से रचनाकार के हृदय से उत्पन्न होती है और अपने भावों की सुगंध से पाठकों के मन को महका देती है।
इस प्रकार 'उड़ना' कविता की स्वतंत्रता और असीमितता का प्रतीक है, जबकि 'खिलना' उसकी स्वाभाविकता और सौंदर्य का प्रतीक है।
3कविता और बच्चे को समानांतर रखने के क्या कारण हो सकते हैं?Show solution
दिया गया संदर्भ: कवि ने कविता की तुलना एक बच्चे से की है।
अवधारणा: कविता और बच्चे के स्वभाव में समानता।
उत्तर:
कविता और बच्चे को समानांतर रखने के निम्नलिखित कारण हो सकते हैं —
- स्वच्छंदता: जिस प्रकार बच्चा किसी नियम-कानून को नहीं मानता और स्वतंत्र रूप से खेलता है, उसी प्रकार कविता भी व्याकरण और नियमों की सीमाओं से परे होती है।
- निश्छलता और सहजता: बच्चे का स्वभाव निश्छल और सहज होता है। कविता भी हृदय की सहज और निश्छल अभिव्यक्ति होती है।
- सीमाहीनता: बच्चा सभी घरों में बेरोकटोक जाता है, कोई उसे नहीं रोकता। कविता भी सभी सीमाओं को लाँघकर सबके हृदय तक पहुँचती है।
- ताज़गी और नवीनता: बच्चे में सदा ताज़गी और नवीनता होती है। कविता भी हर बार नए भाव और नई अनुभूति लेकर आती है।
- खेल-भावना: बच्चा खेल-खेल में बड़ी-बड़ी बातें सीख लेता है। कविता भी शब्दों के खेल के माध्यम से गहरे जीवन-सत्यों को उजागर करती है।
इस प्रकार बच्चे और कविता दोनों में स्वाभाविकता, स्वतंत्रता और सार्वभौमिकता का गुण समान रूप से विद्यमान है।
4कविता के संदर्भ में 'बिना मुरझाए महकने के माने' क्या होते हैं?Show solution
दिया गया संदर्भ: 'कविता के बहाने' कविता में फूल और कविता की तुलना की गई है।
अवधारणा: कविता की शाश्वतता और चिरस्थायी प्रभाव।
उत्तर:
'बिना मुरझाए महकने के माने' से अभिप्राय कविता की शाश्वतता और उसके चिरस्थायी प्रभाव से है।
फूल प्रकृति में खिलता है, महकता है, परंतु कुछ समय बाद मुरझा जाता है। उसकी सुगंध और सौंदर्य क्षणिक होता है। किंतु कविता एक ऐसा फूल है जो कभी मुरझाता नहीं। कविता में जो भाव, विचार और सौंदर्य होता है, वह युगों-युगों तक ताज़ा और प्रभावशाली बना रहता है।
उदाहरण के लिए — तुलसीदास, कबीर, मीराबाई की कविताएँ सैकड़ों वर्ष बाद भी उतनी ही प्रासंगिक और प्रभावशाली हैं जितनी उस समय थीं। यही कविता का 'बिना मुरझाए महकना' है।
इस प्रकार कविता की शाश्वतता, उसका कालातीत सौंदर्य और उसका चिरस्थायी भावात्मक प्रभाव ही 'बिना मुरझाए महकने के माने' हैं।
5'भाषा को सहूलियत' से बरतने से क्या अभिप्राय है?Show solution
दिया गया संदर्भ: 'बात सीधी थी पर' कविता में कवि कुँवर नारायण ने भाषा और कथ्य के संबंध पर विचार किया है।
अवधारणा: भाषा का सहज और उचित प्रयोग।
उत्तर:
'भाषा को सहूलियत से बरतने' से अभिप्राय है — भाषा का सहज, स्वाभाविक और उचित प्रयोग करना।
कवि का मानना है कि जब हम कोई बात कहना चाहते हैं तो हमें भाषा पर जबरदस्ती नहीं करनी चाहिए। भाषा को कथ्य (बात) के अनुसार ढालना चाहिए, न कि कथ्य को भाषा के अनुसार। जब हम भाषा को 'सहूलियत से बरतते' हैं तो —
- बात सरल और स्पष्ट हो जाती है।
- कथ्य और भाषा में सामंजस्य बन जाता है।
- पाठक/श्रोता तक बात सीधे और प्रभावशाली ढंग से पहुँचती है।
- भाषा में कसावट और ताकत आती है।
इसके विपरीत जब हम भाषा पर जोर-जबरदस्ती करते हैं, उसे अनावश्यक रूप से जटिल बनाते हैं, तो 'बात की चूड़ी मर जाती है' अर्थात् बात अपना प्रभाव खो देती है।
इस प्रकार 'भाषा को सहूलियत से बरतना' का अर्थ है — भाषा का सहज, स्वाभाविक और कथ्यानुकूल प्रयोग करना।
6बात और भाषा परस्पर जुड़े होते हैं, किंतु कभी-कभी भाषा के चक्कर में 'सीधी बात भी टेढ़ी हो जाती है' कैसे?Show solution
दिया गया संदर्भ: 'बात सीधी थी पर' कविता में कवि ने बताया है कि भाषा के अनुचित प्रयोग से सरल बात भी जटिल हो जाती है।
अवधारणा: कथ्य और भाषा का संबंध तथा भाषा के दुरुपयोग का प्रभाव।
उत्तर:
बात (कथ्य) और भाषा का संबंध पेंच और चूड़ी जैसा है — दोनों एक-दूसरे के अनुकूल होने चाहिए। जब यह सामंजस्य बिगड़ता है तो सीधी बात भी टेढ़ी हो जाती है। यह निम्नलिखित कारणों से होता है —
- अनावश्यक जटिलता: जब हम सरल बात को कहने के लिए कठिन, दुरूह और अलंकृत भाषा का प्रयोग करते हैं, तो बात का मूल अर्थ दब जाता है।
- जोर-जबरदस्ती: जब भाषा पर जबरदस्ती की जाती है — जैसे कविता में 'पेंच को कील की तरह ठोकना' — तो बात की चूड़ी मर जाती है और वह भाषा में बेकार घूमने लगती है।
- शब्दाडंबर: अनावश्यक शब्दों के प्रयोग से बात का सार खो जाता है और पाठक/श्रोता भ्रमित हो जाता है।
- कथ्य और भाषा का असंतुलन: जब भाषा कथ्य के अनुरूप नहीं होती, तो बात अपना प्रभाव खो देती है।
कवि ने स्वयं अनुभव किया कि जब उन्होंने सीधी बात को भाषा के चक्कर में डाला तो वह टेढ़ी हो गई। अंततः जब उन्होंने भाषा को सहूलियत से बरता, तो बात सहज और प्रभावशाली हो गई।
इस प्रकार भाषा का अनुचित प्रयोग सीधी बात को भी जटिल और अस्पष्ट बना देता है।
7बात (कथ्य) के लिए नीचे दी गई विशेषताओं का उचित बिंबों/मुहावरों से मिलान करें।
| बिंब/मुहावरा | विशेषता |
|---|---|
| (क) बात की चूड़ी मर जाना | कथ्य और भाषा का सही सामंजस्य बनना |
| (ख) बात की पेंच खोलना | बात का पकड़ में न आना |
| (ग) बात का शरारती बच्चे की तरह खेलना | बात का प्रभावहीन हो जाना |
| (घ) पेंच को कील की तरह ठोक देना | बात में कसावट का न होना |
| (ङ) बात का बन जाना | बात को सहज और स्पष्ट करना |Show solution
दिया गया संदर्भ: 'बात सीधी थी पर' कविता में प्रयुक्त बिंब और मुहावरे।
अवधारणा: बिंबों और मुहावरों का अर्थ-बोध।
सही मिलान:
| बिंब/मुहावरा | विशेषता |
|---|---|
| (क) बात की चूड़ी मर जाना | बात का प्रभावहीन हो जाना |
| (ख) बात की पेंच खोलना | बात को सहज और स्पष्ट करना |
| (ग) बात का शरारती बच्चे की तरह खेलना | बात का पकड़ में न आना |
| (घ) पेंच को कील की तरह ठोक देना | बात में कसावट का न होना |
| (ङ) बात का बन जाना | कथ्य और भाषा का सही सामंजस्य बनना |
स्पष्टीकरण:
- (क) जब बात की चूड़ी मर जाती है तो वह भाषा में बेकार घूमती रहती है — अर्थात् बात प्रभावहीन हो जाती है।
- (ख) पेंच खोलना अर्थात् बात को सुलझाना, सहज और स्पष्ट करना।
- (ग) शरारती बच्चे की तरह बात पकड़ में नहीं आती — वह इधर-उधर भागती रहती है।
- (घ) पेंच को कील की तरह ठोकना अर्थात् जबरदस्ती करना जिससे बात में कसावट नहीं रहती।
- (ङ) बात का बन जाना अर्थात् कथ्य और भाषा में सही सामंजस्य स्थापित हो जाना।
व्याख्या करें
जोर जबरदस्ती से
बात की चूड़ी मर गई
और वह भाषा में बेकार घूमने लगी।
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Frequently Asked Questions
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