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Chapter 11 of 38
NCERT Solutions

कविता के बहाने | बात सीधी थी पर

Assam Board · Class 12 · Hindi

NCERT Solutions for कविता के बहाने | बात सीधी थी पर — Assam Board Class 12 Hindi.

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13 Questions Solved · 5 Sections

कविता के साथ — कविता के बहाने / बात सीधी थी पर

1इस कविता के बहाने बताएँ कि 'सब घर एक कर देने के माने' क्या है?Show solution
दिया गया संदर्भ: 'कविता के बहाने' कविता में कवि कुँवर नारायण ने कविता की असीमित शक्ति का वर्णन किया है।

अवधारणा: कविता की सार्वभौमिकता और उसकी सीमाहीनता।

उत्तर:
'सब घर एक कर देने के माने' से अभिप्राय है कि कविता में इतनी शक्ति होती है कि वह सभी सीमाओं, भेदभावों और दूरियों को मिटा देती है। जिस प्रकार एक बच्चा खेलते-खेलते सभी घरों में बेरोकटोक जाता है और सभी उसे अपना मान लेते हैं, उसी प्रकार कविता भी भाषा, जाति, धर्म, देश-काल की सीमाओं को लाँघकर सभी मनुष्यों के हृदय को एक सूत्र में बाँध देती है। कविता किसी एक घर (परिवार, समाज, देश) की नहीं होती, वह सार्वभौमिक होती है। वह सभी के दिलों में एक जैसी भावनाएँ जगाती है और समस्त मानवता को एकता के बंधन में जोड़ देती है। इस प्रकार 'सब घर एक कर देना' कविता की वह अद्भुत क्षमता है जो समस्त मानव-जाति को एकजुट कर देती है।
2'उड़ने' और 'खिलने' का कविता से क्या संबंध बनता है?Show solution
दिया गया संदर्भ: कविता में चिड़िया के उड़ने और फूल के खिलने की तुलना कविता की रचना-प्रक्रिया से की गई है।

अवधारणा: कविता की स्वतंत्रता और स्वाभाविकता।

उत्तर:
'उड़ने' और 'खिलने' का कविता से गहरा संबंध है —

- उड़ना: जिस प्रकार चिड़िया स्वतंत्र रूप से आकाश में उड़ती है और किसी सीमा को नहीं मानती, उसी प्रकार कविता भी स्वच्छंद रूप से विचरण करती है। कविता की कोई भौगोलिक, भाषाई या सामाजिक सीमा नहीं होती। वह कल्पना के पंखों पर उड़कर असीमित आकाश में विचरती है।

- खिलना: जिस प्रकार फूल बिना किसी बाहरी दबाव के स्वाभाविक रूप से खिलता है और अपनी सुगंध चारों ओर फैलाता है, उसी प्रकार कविता भी स्वाभाविक रूप से रचनाकार के हृदय से उत्पन्न होती है और अपने भावों की सुगंध से पाठकों के मन को महका देती है।

इस प्रकार 'उड़ना' कविता की स्वतंत्रता और असीमितता का प्रतीक है, जबकि 'खिलना' उसकी स्वाभाविकता और सौंदर्य का प्रतीक है।
3कविता और बच्चे को समानांतर रखने के क्या कारण हो सकते हैं?Show solution
दिया गया संदर्भ: कवि ने कविता की तुलना एक बच्चे से की है।

अवधारणा: कविता और बच्चे के स्वभाव में समानता।

उत्तर:
कविता और बच्चे को समानांतर रखने के निम्नलिखित कारण हो सकते हैं —

1. स्वच्छंदता: जिस प्रकार बच्चा किसी नियम-कानून को नहीं मानता और स्वतंत्र रूप से खेलता है, उसी प्रकार कविता भी व्याकरण और नियमों की सीमाओं से परे होती है।

2. निश्छलता और सहजता: बच्चे का स्वभाव निश्छल और सहज होता है। कविता भी हृदय की सहज और निश्छल अभिव्यक्ति होती है।

3. सीमाहीनता: बच्चा सभी घरों में बेरोकटोक जाता है, कोई उसे नहीं रोकता। कविता भी सभी सीमाओं को लाँघकर सबके हृदय तक पहुँचती है।

4. ताज़गी और नवीनता: बच्चे में सदा ताज़गी और नवीनता होती है। कविता भी हर बार नए भाव और नई अनुभूति लेकर आती है।

5. खेल-भावना: बच्चा खेल-खेल में बड़ी-बड़ी बातें सीख लेता है। कविता भी शब्दों के खेल के माध्यम से गहरे जीवन-सत्यों को उजागर करती है।

इस प्रकार बच्चे और कविता दोनों में स्वाभाविकता, स्वतंत्रता और सार्वभौमिकता का गुण समान रूप से विद्यमान है।
4कविता के संदर्भ में 'बिना मुरझाए महकने के माने' क्या होते हैं?Show solution
दिया गया संदर्भ: 'कविता के बहाने' कविता में फूल और कविता की तुलना की गई है।

अवधारणा: कविता की शाश्वतता और चिरस्थायी प्रभाव।

उत्तर:
'बिना मुरझाए महकने के माने' से अभिप्राय कविता की शाश्वतता और उसके चिरस्थायी प्रभाव से है।

फूल प्रकृति में खिलता है, महकता है, परंतु कुछ समय बाद मुरझा जाता है। उसकी सुगंध और सौंदर्य क्षणिक होता है। किंतु कविता एक ऐसा फूल है जो कभी मुरझाता नहीं। कविता में जो भाव, विचार और सौंदर्य होता है, वह युगों-युगों तक ताज़ा और प्रभावशाली बना रहता है।

उदाहरण के लिए — तुलसीदास, कबीर, मीराबाई की कविताएँ सैकड़ों वर्ष बाद भी उतनी ही प्रासंगिक और प्रभावशाली हैं जितनी उस समय थीं। यही कविता का 'बिना मुरझाए महकना' है।

इस प्रकार कविता की शाश्वतता, उसका कालातीत सौंदर्य और उसका चिरस्थायी भावात्मक प्रभाव ही 'बिना मुरझाए महकने के माने' हैं।
5'भाषा को सहूलियत' से बरतने से क्या अभिप्राय है?Show solution
दिया गया संदर्भ: 'बात सीधी थी पर' कविता में कवि कुँवर नारायण ने भाषा और कथ्य के संबंध पर विचार किया है।

अवधारणा: भाषा का सहज और उचित प्रयोग।

उत्तर:
'भाषा को सहूलियत से बरतने' से अभिप्राय है — भाषा का सहज, स्वाभाविक और उचित प्रयोग करना।

कवि का मानना है कि जब हम कोई बात कहना चाहते हैं तो हमें भाषा पर जबरदस्ती नहीं करनी चाहिए। भाषा को कथ्य (बात) के अनुसार ढालना चाहिए, न कि कथ्य को भाषा के अनुसार। जब हम भाषा को 'सहूलियत से बरतते' हैं तो —

- बात सरल और स्पष्ट हो जाती है।
- कथ्य और भाषा में सामंजस्य बन जाता है।
- पाठक/श्रोता तक बात सीधे और प्रभावशाली ढंग से पहुँचती है।
- भाषा में कसावट और ताकत आती है।

इसके विपरीत जब हम भाषा पर जोर-जबरदस्ती करते हैं, उसे अनावश्यक रूप से जटिल बनाते हैं, तो 'बात की चूड़ी मर जाती है' अर्थात् बात अपना प्रभाव खो देती है।

इस प्रकार 'भाषा को सहूलियत से बरतना' का अर्थ है — भाषा का सहज, स्वाभाविक और कथ्यानुकूल प्रयोग करना।
6बात और भाषा परस्पर जुड़े होते हैं, किंतु कभी-कभी भाषा के चक्कर में 'सीधी बात भी टेढ़ी हो जाती है' कैसे?Show solution
दिया गया संदर्भ: 'बात सीधी थी पर' कविता में कवि ने बताया है कि भाषा के अनुचित प्रयोग से सरल बात भी जटिल हो जाती है।

अवधारणा: कथ्य और भाषा का संबंध तथा भाषा के दुरुपयोग का प्रभाव।

उत्तर:
बात (कथ्य) और भाषा का संबंध पेंच और चूड़ी जैसा है — दोनों एक-दूसरे के अनुकूल होने चाहिए। जब यह सामंजस्य बिगड़ता है तो सीधी बात भी टेढ़ी हो जाती है। यह निम्नलिखित कारणों से होता है —

1. अनावश्यक जटिलता: जब हम सरल बात को कहने के लिए कठिन, दुरूह और अलंकृत भाषा का प्रयोग करते हैं, तो बात का मूल अर्थ दब जाता है।

2. जोर-जबरदस्ती: जब भाषा पर जबरदस्ती की जाती है — जैसे कविता में 'पेंच को कील की तरह ठोकना' — तो बात की चूड़ी मर जाती है और वह भाषा में बेकार घूमने लगती है।

3. शब्दाडंबर: अनावश्यक शब्दों के प्रयोग से बात का सार खो जाता है और पाठक/श्रोता भ्रमित हो जाता है।

4. कथ्य और भाषा का असंतुलन: जब भाषा कथ्य के अनुरूप नहीं होती, तो बात अपना प्रभाव खो देती है।

कवि ने स्वयं अनुभव किया कि जब उन्होंने सीधी बात को भाषा के चक्कर में डाला तो वह टेढ़ी हो गई। अंततः जब उन्होंने भाषा को सहूलियत से बरता, तो बात सहज और प्रभावशाली हो गई।

इस प्रकार भाषा का अनुचित प्रयोग सीधी बात को भी जटिल और अस्पष्ट बना देता है।
7बात (कथ्य) के लिए नीचे दी गई विशेषताओं का उचित बिंबों/मुहावरों से मिलान करें।

| बिंब/मुहावरा | विशेषता |
|---|---|
| (क) बात की चूड़ी मर जाना | कथ्य और भाषा का सही सामंजस्य बनना |
| (ख) बात की पेंच खोलना | बात का पकड़ में न आना |
| (ग) बात का शरारती बच्चे की तरह खेलना | बात का प्रभावहीन हो जाना |
| (घ) पेंच को कील की तरह ठोक देना | बात में कसावट का न होना |
| (ङ) बात का बन जाना | बात को सहज और स्पष्ट करना |
Show solution
दिया गया संदर्भ: 'बात सीधी थी पर' कविता में प्रयुक्त बिंब और मुहावरे।

अवधारणा: बिंबों और मुहावरों का अर्थ-बोध।

सही मिलान:

| बिंब/मुहावरा | विशेषता |
|---|---|
| (क) बात की चूड़ी मर जाना | बात का प्रभावहीन हो जाना |
| (ख) बात की पेंच खोलना | बात को सहज और स्पष्ट करना |
| (ग) बात का शरारती बच्चे की तरह खेलना | बात का पकड़ में न आना |
| (घ) पेंच को कील की तरह ठोक देना | बात में कसावट का न होना |
| (ङ) बात का बन जाना | कथ्य और भाषा का सही सामंजस्य बनना |

स्पष्टीकरण:

- (क) जब बात की चूड़ी मर जाती है तो वह भाषा में बेकार घूमती रहती है — अर्थात् बात प्रभावहीन हो जाती है।
- (ख) पेंच खोलना अर्थात् बात को सुलझाना, सहज और स्पष्ट करना।
- (ग) शरारती बच्चे की तरह बात पकड़ में नहीं आती — वह इधर-उधर भागती रहती है।
- (घ) पेंच को कील की तरह ठोकना अर्थात् जबरदस्ती करना जिससे बात में कसावट नहीं रहती।
- (ङ) बात का बन जाना अर्थात् कथ्य और भाषा में सही सामंजस्य स्थापित हो जाना।

कविता के आसपास — व्याख्या करें

1व्याख्या करें —
जोर जबरदस्ती से
बात की चूड़ी मर गई
और वह भाषा में बेकार घूमने लगी।
Show solution
दिया गया संदर्भ: ये पंक्तियाँ कुँवर नारायण की कविता 'बात सीधी थी पर' से ली गई हैं।

प्रसंग: कवि बताते हैं कि जब उन्होंने अपनी सीधी बात को भाषा के माध्यम से कहने का प्रयास किया तो भाषा पर जोर-जबरदस्ती करने से बात अपना प्रभाव खो बैठी।

व्याख्या:
इन पंक्तियों में कवि ने 'चूड़ी' और 'पेंच' के मूर्त बिंब के माध्यम से कथ्य और भाषा के संबंध को स्पष्ट किया है। जिस प्रकार किसी पेंच को उसकी चूड़ी के अनुसार ही कसा जाता है — यदि जबरदस्ती की जाए तो चूड़ी मर जाती है और पेंच बेकार हो जाता है — ठीक उसी प्रकार जब कवि ने अपनी सीधी और सरल बात को भाषा के साँचे में जबरदस्ती ढालने का प्रयास किया, तो बात अपनी धार और प्रभाव खो बैठी।

'बात की चूड़ी मर जाना' — अर्थात् बात का प्रभावहीन हो जाना, उसकी पकड़ और कसावट का समाप्त हो जाना।

'भाषा में बेकार घूमने लगी' — अर्थात् बात भाषा के शब्दों में इधर-उधर भटकती रही, उसे सही स्थान नहीं मिला, वह संप्रेषणीय नहीं रही।

काव्य-सौंदर्य: कवि ने 'चूड़ी मरना' जैसे यांत्रिक बिंब का प्रयोग करके भाषा और कथ्य के संबंध की अमूर्त अवधारणा को मूर्त रूप दिया है। यह पंक्तियाँ इस सत्य को उजागर करती हैं कि भाषा पर जबरदस्ती करने से अभिव्यक्ति कमज़ोर हो जाती है।

कविता के आसपास — बात से जुड़े मुहावरे

1बात से जुड़े कई मुहावरे प्रचलित हैं। कुछ मुहावरों का प्रयोग करते हुए लिखें।Show solution
दिया गया संदर्भ: हिंदी भाषा में 'बात' से जुड़े अनेक मुहावरे प्रचलित हैं।

'बात' से जुड़े प्रमुख मुहावरे और उनका वाक्य-प्रयोग:

1. बात का बतंगड़ बनाना (छोटी बात को बड़ा रूप देना)
— *वाक्य:* राम ने एक छोटी-सी बात का बतंगड़ बना दिया और पूरे परिवार में झगड़ा हो गया।

2. बात काटना (किसी की बात के बीच में बोलना)
— *वाक्य:* बड़ों की बात काटना अशिष्टता की निशानी है।

3. बात बनाना (झूठी बात गढ़ना)
— *वाक्य:* वह हमेशा बात बनाकर काम से बचता रहता है।

4. बात पलटना (अपनी कही बात से मुकरना)
— *वाक्य:* उसने वादा करके बात पलट ली, इसलिए कोई उस पर विश्वास नहीं करता।

5. बात का धनी होना (अपनी बात पर दृढ़ रहना)
— *वाक्य:* महात्मा गांधी बात के धनी थे, उन्होंने जो कहा वही किया।

6. दो बात सुनाना (डाँटना/फटकारना)
— *वाक्य:* माँ ने देर से घर आने पर बेटे को दो बात सुना दीं।

चर्चा कीजिए

1आधुनिक युग में कविता की संभावनाओं पर चर्चा कीजिए।Show solution
आधुनिक युग में कविता की संभावनाएँ:

आधुनिक युग में जहाँ एक ओर भौतिकवाद, तकनीक और व्यस्त जीवन-शैली ने मनुष्य को संवेदनहीन बनाया है, वहीं कविता की संभावनाएँ और भी अधिक बढ़ गई हैं —

1. डिजिटल माध्यम: इंटरनेट, सोशल मीडिया और ब्लॉग के माध्यम से कविता अब घर-घर तक पहुँच रही है। नए कवियों को अपनी रचनाएँ प्रकाशित करने के लिए प्रकाशकों पर निर्भर नहीं रहना पड़ता।

2. संवेदनशीलता की पुनर्स्थापना: आधुनिक जीवन की यांत्रिकता में कविता मनुष्य की संवेदनशीलता को जीवित रखती है।

3. सामाजिक सरोकार: आधुनिक कविता सामाजिक अन्याय, पर्यावरण, स्त्री-विमर्श, दलित-विमर्श जैसे महत्त्वपूर्ण विषयों पर मुखर है।

4. नई विधाएँ: हाइकू, माइक्रो-पोएट्री, स्लैम पोएट्री जैसी नई विधाओं ने युवा पीढ़ी को कविता से जोड़ा है।

5. वैश्विक संवाद: अनुवाद के माध्यम से भारतीय कविता विश्व-स्तर पर पहचान बना रही है।

निष्कर्ष: आधुनिक युग में कविता की संभावनाएँ असीमित हैं। जब तक मनुष्य में भावनाएँ हैं, कविता जीवित रहेगी और नए रूपों में विकसित होती रहेगी।
2चूड़ी, कौल, पेंच आदि मूर्त उपमानों के माध्यम से कवि ने कथ्य की अमूर्तता को साकार किया है। भाषा को समृद्ध एवं संप्रेषणीय बनाने में बिंबों और उपमानों के महत्व पर परिसंवाद आयोजित करें।Show solution
भाषा को समृद्ध बनाने में बिंबों और उपमानों का महत्व:

पक्ष में तर्क:

1. अमूर्त को मूर्त बनाना: बिंब और उपमान अमूर्त विचारों को मूर्त रूप देते हैं। जैसे 'बात की चूड़ी मरना' — यह एक यांत्रिक बिंब है जो भाषा और कथ्य के संबंध की अमूर्त अवधारणा को स्पष्ट करता है।

2. संप्रेषणीयता: बिंबों के माध्यम से जटिल विचार सरलता से संप्रेषित होते हैं। पाठक तुरंत अर्थ ग्रहण कर लेता है।

3. भावात्मक प्रभाव: उपमान भाषा में भावात्मक गहराई लाते हैं और पाठक के मन पर स्थायी प्रभाव छोड़ते हैं।

4. सौंदर्य-वृद्धि: बिंब भाषा को सजीव, चित्रात्मक और सौंदर्यपूर्ण बनाते हैं।

5. स्मरणीयता: बिंब-युक्त भाषा अधिक समय तक स्मृति में रहती है।

उदाहरण: कुँवर नारायण ने 'पेंच', 'चूड़ी', 'कील' जैसे साधारण यांत्रिक उपमानों का प्रयोग करके भाषा और कथ्य के संबंध को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से व्यक्त किया है।

निष्कर्ष: बिंब और उपमान भाषा की आत्मा हैं। वे भाषा को जीवंत, संप्रेषणीय और प्रभावशाली बनाते हैं।

आपसदारी

1सुंदर है सुमन, विहग सुंदर / मानव तुम सबसे सुंदरतम। — पंत की इस कविता में प्रकृति की तुलना में मनुष्य को अधिक सुंदर और समर्थ बताया गया है। 'कविता के बहाने' कविता में से इस आशय को अभिव्यक्त करने वाले बिंदुओं की तलाश करें।Show solution
दिया गया संदर्भ: पंत की पंक्तियों में मनुष्य को प्रकृति से श्रेष्ठ बताया गया है। 'कविता के बहाने' में भी यही भाव निहित है।

'कविता के बहाने' में मनुष्य की श्रेष्ठता के बिंदु:

1. कविता की रचना: चिड़िया उड़ सकती है, फूल खिल सकता है, परंतु कविता की रचना केवल मनुष्य ही कर सकता है। यह मनुष्य की अद्वितीय क्षमता है।

2. कल्पना की शक्ति: मनुष्य अपनी कल्पना-शक्ति से चिड़िया से भी ऊँचा उड़ सकता है और फूल से भी अधिक महक सकता है — कविता के माध्यम से।

3. सीमाओं का अतिक्रमण: चिड़िया की उड़ान की एक सीमा है, फूल के खिलने की एक सीमा है, परंतु मनुष्य की कविता असीमित है — वह 'सब घर एक कर देती है'।

4. शाश्वतता: फूल मुरझा जाता है, परंतु मनुष्य की कविता 'बिना मुरझाए महकती' रहती है — यह मनुष्य की प्रकृति पर श्रेष्ठता का प्रमाण है।

5. सार्वभौमिकता: मनुष्य कविता के माध्यम से समस्त मानवता को एकजुट कर सकता है — यह क्षमता न चिड़िया में है, न फूल में।

निष्कर्ष: 'कविता के बहाने' में कवि ने स्पष्ट किया है कि कविता-रचना की क्षमता मनुष्य को प्रकृति की समस्त सुंदरता से श्रेष्ठ बनाती है — यही पंत के 'मानव तुम सबसे सुंदरतम' का भाव है।
2प्रतापनारायण मिश्र का निबंध 'बात' और नागार्जुन की कविता 'बातें' ढूँढ़ कर पढ़ें।Show solution
निर्देश: यह एक स्वाध्याय-आधारित गतिविधि है।

मार्गदर्शन:

प्रतापनारायण मिश्र का निबंध 'बात':
प्रतापनारायण मिश्र हिंदी के प्रसिद्ध निबंधकार हैं। उनका निबंध 'बात' हिंदी साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण ललित निबंध है जिसमें उन्होंने 'बात' के विभिन्न रूपों, उसकी शक्ति और महत्त्व पर विचार किया है। यह निबंध भारतेंदु-युगीन हिंदी गद्य का उत्कृष्ट उदाहरण है।

नागार्जुन की कविता 'बातें':
नागार्जुन प्रगतिशील धारा के प्रमुख कवि हैं। उनकी कविता 'बातें' में सामान्य जन-जीवन की बातों को काव्यात्मक रूप दिया गया है।

तुलनात्मक अध्ययन के बिंदु:
- तीनों रचनाओं में 'बात' की अवधारणा किस प्रकार भिन्न है?
- भाषा और कथ्य का संबंध तीनों में कैसे व्यक्त हुआ है?
- तीनों रचनाकारों की शैली में क्या अंतर है?

*छात्र इन रचनाओं को पुस्तकालय या इंटरनेट से प्राप्त करके पढ़ें और कक्षा में चर्चा करें।*

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