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Chapter 4 of 38
NCERT Solutions

सिल्वर वैडिंग

Himachal Pradesh Board · Class 12 · Hindi

NCERT Solutions for सिल्वर वैडिंग — Himachal Pradesh Board Class 12 Hindi.

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यशोधर बाबू को अपने दफ्तर में आखिरी फाइल का लाल फीता बांधते हुए दिखाया गया है, पुरानी दीवार घड़ी 5:25 बजा रही है, और उनके मातहत कर्मचारी उनके कारण देर तक बैठे हैं।
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8 Questions Solved · 1 Section

अभ्यास — सिल्वर वैडिंग (वितान, कक्षा 12)

1यशोधर बाबू की पत्नी समय के साथ ढल सकने में सफल होती है लेकिन यशोधर बाबू असफल रहते हैं। ऐसा क्यों?Show solution
दिया गया है: यशोधर बाबू और उनकी पत्नी दोनों एक ही परिवेश में रहते हैं, फिर भी उनकी प्रतिक्रियाएँ भिन्न हैं।

कारण एवं विश्लेषण:

1. यशोधर बाबू की असफलता के कारण:
- यशोधर बाबू किशनदा के आदर्शों और पुरानी परंपराओं से गहराई से जुड़े हैं। उनके लिए पुराने मूल्य — सादगी, संयुक्त परिवार, त्याग, मर्यादा — ही जीवन का आधार हैं।
- वे 'समहाउ इंप्रापर' कहकर हर नई बात को अनुचित ठहराते हैं। उनका व्यक्तित्व कठोर और परिवर्तन-विरोधी है।
- उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी एक निश्चित ढाँचे में जी है, इसलिए उस ढाँचे को तोड़ना उन्हें अपनी पहचान खोने जैसा लगता है।

2. पत्नी की सफलता के कारण:
- पत्नी व्यावहारिक दृष्टिकोण रखती हैं। वे बच्चों की खुशी और सुविधा को प्राथमिकता देती हैं।
- उन्होंने नई पीढ़ी के साथ तालमेल बिठाना सीख लिया — चाहे वह पार्टी हो, आधुनिक रहन-सहन हो या बच्चों की स्वतंत्रता।
- स्त्री होने के कारण उन्होंने जीवन में अनेक परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढालने का अभ्यास किया है।

निष्कर्ष: यशोधर बाबू की असफलता का मूल कारण उनकी वैचारिक कठोरता और अतीत से अत्यधिक लगाव है, जबकि उनकी पत्नी परिवर्तन को स्वीकार करने में लचीलापन दिखाती हैं।
2पाठ में 'जो हुआ होगा' वाक्य की आप कितनी अर्थ छवियाँ खोज सकते / सकती हैं?Show solution
दिया गया है: 'जो हुआ होगा' — यह वाक्यांश कहानी में एक महत्त्वपूर्ण स्थान पर प्रयुक्त हुआ है।

विभिन्न अर्थ-छवियाँ:

1. उदासीनता और निराशा की अभिव्यक्ति: यशोधर बाबू जब अपने परिवार के व्यवहार से आहत होते हैं तो 'जो हुआ होगा' कहकर अपनी पीड़ा को दबा लेते हैं — यह उनकी बेबसी और हार मान लेने की स्थिति है।

2. नियतिवाद (Fatalism): इस वाक्य में यह भाव भी है कि जो होना था, हो गया — अब इसे बदला नहीं जा सकता। यह एक प्रकार का भाग्यवादी दृष्टिकोण है।

3. पीढ़ी-अंतराल की स्वीकृति: यशोधर बाबू यह मानकर चलते हैं कि नई पीढ़ी उनकी बात नहीं मानेगी — 'जो हुआ होगा' इस स्वीकृति का प्रतीक है।

4. आत्मसंघर्ष और दमन: वे अपनी भावनाओं को व्यक्त नहीं कर पाते, इसलिए इस वाक्य के पीछे एक गहरा आंतरिक संघर्ष छिपा है।

5. व्यंग्य और कटाक्ष: कभी-कभी यह वाक्य परिस्थितियों पर एक मौन व्यंग्य भी है — जैसे 'अब क्या कहें, जो होना था हो गया।'

6. संवादहीनता का प्रतीक: परिवार के सदस्यों से उनकी बातचीत न हो पाने की स्थिति में यह वाक्य उनकी अकेलेपन की पीड़ा को दर्शाता है।

निष्कर्ष: 'जो हुआ होगा' एक बहुआयामी वाक्यांश है जो यशोधर बाबू की मनोदशा, उनके अकेलेपन, नियतिवाद और पीढ़ी-अंतराल की पीड़ा को एक साथ व्यक्त करता है।
3'समहाउ इंप्रापर' वाक्यांश का प्रयोग यशोधर बाबू लगभग हर वाक्य के प्रारंभ में तकिया कलाम की तरह करते हैं। इस वाक्यांश का उनके व्यक्तित्व और कहानी के कथ्य से क्या संबंध बनता है?Show solution
दिया गया है: 'समहाउ इंप्रापर' (Somehow Improper) — यशोधर बाबू का तकिया कलाम।

व्यक्तित्व से संबंध:

1. यह वाक्यांश यशोधर बाबू की परंपरावादी सोच का प्रतीक है। वे हर नई बात, हर बदलाव को 'किसी तरह अनुचित' मानते हैं।
2. यह उनकी असहमति व्यक्त करने का अप्रत्यक्ष तरीका है — वे सीधे विरोध नहीं करते, बल्कि इस वाक्यांश के पीछे अपनी आपत्ति छुपा लेते हैं।
3. यह उनके द्वंद्वग्रस्त व्यक्तित्व को दर्शाता है — वे जानते हैं कि नया जमाना बदल रहा है, पर स्वीकार नहीं कर पाते।
4. यह वाक्यांश उनकी आत्मकेंद्रितता और कठोरता का भी परिचायक है — वे अपने मानदंडों को ही सही मानते हैं।

कहानी के कथ्य से संबंध:

1. कहानी का मूल कथ्य पीढ़ी-अंतराल है। 'समहाउ इंप्रापर' इसी अंतराल को बार-बार रेखांकित करता है।
2. यह वाक्यांश पुरानी और नई पीढ़ी के बीच की खाई का प्रतीक बन जाता है।
3. इसके माध्यम से लेखक आधुनिकता बनाम परंपरा के संघर्ष को उजागर करते हैं।
4. यह वाक्यांश हाशिए पर जाते मानवीय मूल्यों की पीड़ा को भी व्यक्त करता है।

निष्कर्ष: 'समहाउ इंप्रापर' केवल एक तकिया कलाम नहीं, बल्कि यशोधर बाबू के पूरे व्यक्तित्व और कहानी के केंद्रीय संघर्ष का सार है।
4यशोधर बाबू की कहानी को दिशा देने में किशनदा की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। आपके जीवन को दिशा देने में किसका महत्वपूर्ण योगदान रहा और कैसे?Show solution
दिया गया है: किशनदा ने यशोधर बाबू को दिल्ली में आश्रय, संस्कार और जीवन-दर्शन दिया।

किशनदा की भूमिका (संदर्भ):
किशनदा ने यशोधर बाबू को न केवल नौकरी दिलाई, बल्कि उन्हें जीवन जीने का तरीका सिखाया — सादगी, परोपकार, संयुक्त परिवार की भावना और पुराने मूल्यों का सम्मान। यशोधर बाबू ने किशनदा को अपना आदर्श मान लिया और उनके जीवन-दर्शन को अपना लिया।

व्यक्तिगत अनुभव (नमूना उत्तर — छात्र अपने अनुभव से लिखें):

मेरे जीवन को दिशा देने में मेरे गुरुजी / माता-पिता / किसी प्रिय व्यक्ति का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है।

- उन्होंने मुझे सिखाया कि परिश्रम और ईमानदारी ही सफलता की नींव है।
- जब मैं निराश होता/होती था/थी, तो उनके शब्द मुझे प्रेरणा देते थे।
- उन्होंने मुझे सही-गलत की पहचान करना सिखाया।
- उनके आदर्श जीवन को देखकर मैंने अनुशासन और सेवा-भाव सीखा।

निष्कर्ष: जिस प्रकार किशनदा यशोधर बाबू के जीवन के मार्गदर्शक बने, उसी प्रकार हर व्यक्ति के जीवन में कोई न कोई ऐसा व्यक्ति होता है जो उसे सही दिशा दिखाता है। ऐसे लोगों का ऋण कभी नहीं चुकाया जा सकता।

*(नोट: छात्र इस प्रश्न का उत्तर अपने व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर लिखें।)*
5वर्तमान समय में परिवार की संरचना, स्वरूप से जुड़े आपके अनुभव इस कहानी से कहाँ तक सामंजस्य बिठा पाते हैं?Show solution
दिया गया है: कहानी में संयुक्त परिवार के टूटने, एकल परिवार के उदय और पीढ़ी-अंतराल का चित्रण है।

कहानी में परिवार का स्वरूप:
- यशोधर बाबू संयुक्त परिवार और पुराने मूल्यों के समर्थक हैं।
- उनके बच्चे आधुनिक जीवनशैली अपना चुके हैं — पार्टी, फैशन, स्वतंत्रता।
- परिवार में संवाद की कमी है; हर सदस्य अपनी दुनिया में व्यस्त है।

वर्तमान समय से सामंजस्य:

1. एकल परिवार का बढ़ता चलन: आज अधिकांश शहरी परिवार एकल हो गए हैं। बुजुर्ग अकेले रह जाते हैं — यह कहानी से पूरी तरह मेल खाता है।

2. पीढ़ी-अंतराल: आज भी माता-पिता और बच्चों के बीच विचारों का अंतर स्पष्ट दिखता है — संगीत, पहनावा, खान-पान, करियर सभी में।

3. संवादहीनता: मोबाइल और इंटरनेट के युग में परिवार के सदस्य एक छत के नीचे रहते हुए भी एक-दूसरे से दूर हैं।

4. मूल्यों का संघर्ष: पुरानी पीढ़ी त्याग, सादगी और परंपरा को महत्त्व देती है, जबकि नई पीढ़ी व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आधुनिकता को।

निष्कर्ष: यह कहानी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी लिखे जाने के समय थी। वर्तमान परिवारों की संरचना और उनमें उत्पन्न तनाव इस कहानी से गहरा सामंजस्य रखते हैं।
6निम्नलिखित में से किसे आप कहानी की मूल संवेदना कहेंगे / कहेंगी और क्यों?
(क) हाशिए पर धकेले जाते मानवीय मूल्य
(ख) पीढ़ी का अंतराल
(ग) पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव
Show solution
दिया गया है: तीन विकल्पों में से कहानी की मूल संवेदना चुननी है।

उत्तर: (ख) पीढ़ी का अंतराल

तर्क एवं विश्लेषण:

यद्यपि तीनों विकल्प कहानी में किसी न किसी रूप में उपस्थित हैं, किंतु पीढ़ी का अंतराल ही कहानी की मूल संवेदना है, क्योंकि:

1. कहानी का केंद्रीय संघर्ष यशोधर बाबू (पुरानी पीढ़ी) और उनके बच्चों (नई पीढ़ी) के बीच है। दोनों के मूल्य, सोच और जीवनशैली बिल्कुल भिन्न हैं।

2. यशोधर बाबू पुरानी परंपराओं, सादगी और संयुक्त परिवार में विश्वास रखते हैं, जबकि उनके बच्चे आधुनिक जीवनशैली — पार्टी, फैशन, स्वतंत्रता — को अपना चुके हैं।

3. सिल्वर वैडिंग का आयोजन इसी अंतराल का प्रतीक है — यशोधर बाबू इसे 'समहाउ इंप्रापर' मानते हैं, पर बच्चे इसे उत्सव की तरह मनाते हैं।

4. मानवीय मूल्यों का हाशिए पर जाना और पाश्चात्य प्रभाव दोनों इसी पीढ़ी-अंतराल के परिणाम हैं, अतः ये गौण संवेदनाएँ हैं।

निष्कर्ष: कहानी की मूल संवेदना पीढ़ी का अंतराल है, जो परिवार के भीतर संवादहीनता, अकेलेपन और मूल्य-संघर्ष को जन्म देती है।
7अपने घर और विद्यालय के आस-पास हो रहे उन बदलावों के बारे में लिखें जो सुविधाजनक और आधुनिक होते हुए भी बुजुर्गों को अच्छे नहीं लगते। अच्छा न लगने के क्या कारण होंगे?Show solution
दिया गया है: आधुनिक बदलाव जो बुजुर्गों को अच्छे नहीं लगते।

ऐसे बदलाव:

| बदलाव | बुजुर्गों की आपत्ति |
|---|---|
| मोबाइल फोन का अत्यधिक उपयोग | परिवार में आमने-सामने बातचीत कम हो गई |
| ऑनलाइन शॉपिंग | बाजार जाने की परंपरा और सामाजिकता खत्म हो रही है |
| फास्ट फूड और रेस्तराँ संस्कृति | घर का खाना और पारंपरिक व्यंजन पीछे छूट रहे हैं |
| पार्टी और डीजे संस्कृति | शोर-शराबा और अश्लीलता बढ़ रही है |
| एकल परिवार | बुजुर्ग अकेले और उपेक्षित महसूस करते हैं |
| पाश्चात्य पहनावा | संस्कृति और मर्यादा का ह्रास लगता है |
| OTT प्लेटफॉर्म | अनुचित सामग्री का बच्चों पर बुरा प्रभाव |

अच्छा न लगने के कारण:

1. सांस्कृतिक जुड़ाव: बुजुर्ग अपनी परंपराओं और संस्कृति से गहराई से जुड़े होते हैं। बदलाव उन्हें अपनी पहचान खोने जैसा लगता है।
2. अनुभव का भय: उन्होंने जीवन में कठिनाइयाँ देखी हैं, इसलिए वे सुविधाओं के दुष्प्रभावों को लेकर सचेत रहते हैं।
3. पारिवारिक मूल्यों की चिंता: वे चाहते हैं कि परिवार एकजुट रहे, संवाद बना रहे।
4. अनुकूलन की कठिनाई: उम्र के साथ नई तकनीक और बदलावों को समझना कठिन हो जाता है।

निष्कर्ष: बुजुर्गों की आपत्तियाँ केवल रूढ़िवादिता नहीं, बल्कि उनके गहरे अनुभव और पारिवारिक चिंता का प्रतिफल हैं। उनकी बात सुनना और सम्मान देना आवश्यक है।
8यशोधर बाबू के बारे में आपकी क्या धारणा बनती है? दिए गए तीन कथनों में से आप जिसके समर्थन में हैं, अपने अनुभवों और सोच के आधार पर उसके लिए तर्क दीजिए—
(क) यशोधर बाबू के विचार पूरी तरह से पुराने हैं और वे सहानुभूति के पात्र नहीं हैं।
(ख) यशोधर बाबू में एक तरह का द्वंद्व है जिसके कारण नया उन्हें कभी-कभी खींचता तो है पर पुराना छोड़ता नहीं। इसलिए उन्हें सहानुभूति के साथ देखने की जरूरत है।
(ग) यशोधर बाबू एक आदर्श व्यक्तित्व है और नयी पीढ़ी द्वारा उनके विचारों का अपनाना ही उचित है।
Show solution
दिया गया है: यशोधर बाबू के व्यक्तित्व के बारे में तीन दृष्टिकोण।

समर्थित कथन: (ख) — यशोधर बाबू में एक तरह का द्वंद्व है...

तर्क एवं विश्लेषण:

यशोधर बाबू का द्वंद्व:

1. नए का आकर्षण: यशोधर बाबू कभी-कभी नई चीजों की ओर खिंचते हैं — जैसे जब वे बच्चों की पार्टी में शामिल होते हैं, या जब उन्हें नई पीढ़ी की सफलता पर गर्व होता है। यह दर्शाता है कि वे पूरी तरह कठोर नहीं हैं।

2. पुराने का बंधन: किशनदा के आदर्शों ने उन्हें इतना प्रभावित किया है कि वे उनसे मुक्त नहीं हो पाते। यह उनकी कमजोरी नहीं, बल्कि उनकी निष्ठा है।

3. सहानुभूति के पात्र क्यों:
- वे अपने परिवार से प्रेम करते हैं, पर अपनी भावनाएँ व्यक्त नहीं कर पाते।
- वे अकेले पड़ते जा रहे हैं — न परिवार उन्हें समझता है, न समाज।
- उनकी पीड़ा वास्तविक है — वे एक ऐसे युग में जी रहे हैं जो उन्हें पीछे छोड़ता जा रहा है।

4. कथन (क) क्यों नहीं: यशोधर बाबू के विचार पूरी तरह गलत नहीं हैं — सादगी, परोपकार, परिवार के प्रति समर्पण — ये मूल्य आज भी प्रासंगिक हैं।

5. कथन (ग) क्यों नहीं: वे पूर्ण आदर्श भी नहीं हैं — उनकी कठोरता और परिवर्तन-विरोधी सोच कभी-कभी परिवार को कष्ट देती है।

निष्कर्ष: यशोधर बाबू न पूरी तरह गलत हैं, न पूरी तरह सही। वे एक द्वंद्वग्रस्त मानव हैं जो दो युगों के बीच फँसे हैं। उनके प्रति सहानुभूति रखना और उनकी पीड़ा को समझना ही मानवीय दृष्टिकोण है।

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