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Chapter 28 of 38
NCERT Solutions

बाज़ार दर्शन-(जैनेन्द्र कुमार)

Himachal Pradesh Board · Class 12 · Hindi

NCERT Solutions for बाज़ार दर्शन-(जैनेन्द्र कुमार) — Himachal Pradesh Board Class 12 Hindi.

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जैनेंद्र कुमार के जन्म, निधन, प्रमुख रचनाओं (उपन्यास, कहानी-संग्रह, निबंध-संग्रह) और प्राप्त पुरस्कारों को दर्शाने वाला एक इन्फोग्राफिक।
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पाठ के साथ

1बाजार का जादू चढ़ने और उतरने पर मनुष्य पर क्या-क्या असर पड़ता है?Show solution
बाजार का जादू चढ़ने पर मनुष्य की आँखों और मन पर असर पड़ता है। उसे लगता है कि उसे और-और चीज़ें चाहिए; वह असंतोष, तृष्णा और ईर्ष्या से भर सकता है। यदि वह ठीक से न जाने कि क्या चाहता है, तो वह हर वस्तु की ओर खिंचता चला जाता है, खोया-सा और कभी-कभी पागल-सा हो जाता है।

बाजार का जादू उतरने पर उसे समझ में आता है कि बहुत-सी फैंसी चीज़ें वास्तव में आराम नहीं बढ़ातीं, बल्कि खलल डालती हैं। तब मनुष्य को अपनी वास्तविक ज़रूरत याद आती है और वह अनावश्यक सामान से बच सकता है।

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2बाजार में भगत जी के व्यक्तित्व का कौन-सा सशक्त पहलू उभरकर आता है? क्या आपकी नजर में उनका आचरण समाज में शांति-स्थापित करने में मददगार हो सकता है?Show solution
बाजार में भगत जी के व्यक्तित्व का सबसे सशक्त पहलू उनकी संतुष्टि, निस्पृहता और आत्मिक दृढ़ता है। वे केवल ज़रूरत भर लेते हैं; बाकी चमक-दमक से प्रभावित नहीं होते। उनके मन में लोभ नहीं, बल्कि आंतरिक तुष्टि है।

हाँ, उनका आचरण समाज में शांति-स्थापित करने में मददगार हो सकता है, क्योंकि यदि लोग केवल आवश्यकता भर लें और अनावश्यक संग्रह तथा दिखावे से बचें तो ईर्ष्या, प्रतिस्पर्धा, कपट और शोषण कम होंगे। ऐसे आचरण से बाजार और समाज दोनों में सद्भाव बढ़ेगा।

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3'बाजारूपन' से क्या तात्पर्य है? किस प्रकार के व्यक्ति बाजार को सार्थकता प्रदान करते हैं अथवा बाजार की सार्थकता किसमें है?Show solution
बाजारूपन से तात्पर्य है बाजार का वह रूप जिसमें लोभ, दिखावा, कपट, संग्रह-प्रवृत्ति और शोषण बढ़ जाता है। ऐसे बाजार में आवश्यकताओं का आदान-प्रदान नहीं होता, बल्कि लोग एक-दूसरे को ठगने की घात में रहते हैं।

बाजार को सार्थकता वे व्यक्ति देते हैं जो जानते हैं कि वे क्या चाहते हैं और ज़रूरत भर खरीदते हैं। अर्थात, बाजार की सार्थकता आवश्यकता के समय काम आने में है। जब ग्राहक अपनी वास्तविक जरूरत के अनुसार खरीदारी करता है, तभी बाजार उपयोगी और अर्थपूर्ण बनता है।

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4बाजार किसी का लिंग, जाति, धर्म या क्षेत्र नहीं देखता; वह देखता है सिर्फ उसकी क्रय शक्ति को। इस रूप में वह एक प्रकार से सामाजिक समता की भी रचना कर रहा है। आप इससे कहाँ तक सहमत हैं?Show solution
इस बात से मैं आंशिक रूप से सहमत हूँ। बाजार वास्तव में लिंग, जाति, धर्म या क्षेत्र नहीं देखता; वह केवल क्रय शक्ति को देखता है। इस अर्थ में वह सभी को एक ही कसौटी पर रखता है।

लेकिन यह सामाजिक समता पूरी तरह नहीं है, क्योंकि यहाँ समानता मानवता के आधार पर नहीं, बल्कि पैसे के आधार पर है। जिसके पास अधिक क्रय शक्ति है, वही अधिक खरीद सकता है। इसलिए यह समता बाहरी और सीमित है। यह सामाजिक न्याय नहीं, बल्कि आर्थिक क्षमता पर आधारित व्यवस्था है।

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5आप अपने तथा समाज से कुछ ऐसे प्रसंग का उल्लेख करें—Show solution
अपने जीवन में ऐसे प्रसंग हो सकते हैं जब पैसा शक्ति का परिचायक लगा हो—जैसे किसी महँगी वस्तु को खरीद लेने, बेहतर सुविधा पाने, या किसी समस्या को तुरंत हल कर लेने में पैसा प्रभावी लगा हो। समाज में भी बड़े आयोजनों, इलाज, यात्रा या शिक्षा के अवसरों में पैसे की ताकत स्पष्ट दिखाई देती है।

लेकिन ऐसे प्रसंग भी होते हैं जब पैसे की शक्ति काम नहीं आती—जैसे किसी अपने की बीमारी में केवल धन से मन की शांति नहीं मिलती, या किसी नैतिक/भावनात्मक संबंध को पैसे से नहीं खरीदा जा सकता। कई बार प्रेम, सम्मान, विश्वास और आत्म-संतोष के सामने पैसा बेअसर हो जाता है।

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पाठ के आसपास

1बाजार दर्शन पाठ में बाजार जाने या न जाने के संदर्भ में मन की कई स्थितियों का जिक्र आया है। आप इन स्थितियों से जुड़े अपने अनुभवों का वर्णन कीजिए।Show solution
पाठ में मन की कई स्थितियाँ दिखाई गई हैं—खाली मन, भरा हुआ मन, बंद मन और नकार वाला मन

- खाली मन हो तो बाजार का जादू जल्दी असर करता है; मनुष्य अनावश्यक चीज़ों की ओर खिंच सकता है।
- भरा हुआ मन हो, यानी लक्ष्य और जरूरत स्पष्ट हो, तो बाजार का आकर्षण कम हो जाता है।
- बंद मन रखना उचित नहीं, क्योंकि यह जड़ता है; मनुष्य की स्वाभाविक अपूर्णता को स्वीकार करना चाहिए।
- नकार वाला मन भी ठीक नहीं, क्योंकि केवल इच्छाओं का दमन समाधान नहीं है।

इन स्थितियों से यह सीख मिलती है कि बाजार में तभी जाना चाहिए जब मन लक्ष्य से भरा हो और खरीदारी की स्पष्ट जरूरत हो।

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2बाजार दर्शन पाठ में किस प्रकार के ग्राहकों की बात हुई है? आप स्वयं को किस श्रेणी का ग्राहक मानते/मानती हैं?Show solution
पाठ में मुख्यतः दो तरह के ग्राहकों की बात हुई है—

1. वे ग्राहक जो अपनी जरूरत जानते हैं और उतना ही खरीदते हैं जितना आवश्यक है।
2. वे ग्राहक जो बाजार की चमक-दमक में फँस जाते हैं और बिना जरूरत के चीजें खरीदते चले जाते हैं।

मैं स्वयं को पहली श्रेणी का ग्राहक मानना/मानती हूँ, क्योंकि मैं आवश्यकता और उपयोगिता देखकर ही खरीदने की कोशिश करता/करती हूँ।

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3आप बाजार की भिन्न-भिन्न प्रकार की संस्कृति से अवश्य परिचित होंगे। मॉल की संस्कृति और सामान्य बाजार और हाट की संस्कृति में आप क्या अंतर पाते हैं? पर्चेजिंग पावर आपको किस तरह के बाजार में नजर आती है?Show solution
मॉल की संस्कृति में चमक-दमक, ब्रांड, सजावट, मनोरंजन और बड़ी क्रय शक्ति का प्रदर्शन होता है। वहाँ खरीदारी अक्सर दिखावे और आकर्षण से जुड़ जाती है।

सामान्य बाजार में जरूरत की चीजें सहज रूप से मिलती हैं और ग्राहक अपनी सुविधा के अनुसार खरीदता है।

हाट अधिक स्थानीय, सादा और आवश्यक वस्तुओं का बाजार होता है। वहाँ संबंध भी अपेक्षाकृत सीधे और आत्मीय होते हैं।

पर्चेजिंग पावर सबसे अधिक मॉल जैसे बाज़ार में नजर आती है, क्योंकि वहाँ खरीदने की क्षमता और उपभोग-प्रदर्शन प्रमुख होता है।

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4लेखक ने पाठ में संकेत किया है कि कभी-कभी बाजार में आवश्यकता ही शोषण का रूप धारण कर लेती है। क्या आप इस विचार से सहमत हैं? तर्क सहित उत्तर दीजिए।Show solution
हाँ, मैं इस विचार से सहमत हूँ। कई बार बाजार में चीजों की चमक, ब्रांडिंग और कृत्रिम आकर्षण के कारण जरूरत भी शोषण का रूप ले लेती है। ग्राहक सोचता है कि उसे वस्तु की आवश्यकता है, जबकि उसे वस्तुतः प्रचार और दिखावे के माध्यम से खरीदने को उकसाया गया होता है।

जब कोई अपनी वास्तविक जरूरत तय किए बिना बाजार में जाता है, तो वह अनावश्यक चीजें खरीद लेता है। इससे उसके पैसे की हानि होती है और बाजार उसकी कमजोरी का लाभ उठाता है। इसलिए पाठ के अनुसार, आवश्यकता और शोषण के बीच की रेखा बहुत पतली हो सकती है।

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5स्त्री माया न जोड़े यहाँ माया शब्द किस ओर संकेत कर रहा है? स्त्रियों द्वारा माया जोड़ना प्रकृति प्रदत्त नहीं, बल्कि परिस्थितिवश है। वे कौन-सी परिस्थितियाँ हैं जो स्त्री को माया जोड़ने के लिए विवश कर देती हैं?Show solution
यहाँ माया शब्द सामान, संपत्ति, दिखावा और संग्रह की ओर संकेत करता है। अर्थात, स्त्री के संदर्भ में माया जोड़ने का अर्थ केवल वस्तुएँ इकट्ठी करना नहीं, बल्कि गृह-व्यवस्था और जीवन-निर्वाह से जुड़ी जिम्मेदारियाँ निभाना भी हो सकता है।

स्त्रियाँ प्रकृति से माया जोड़ने वाली नहीं होतीं; वे कई परिस्थितियों में ऐसा करने को विवश होती हैं—जैसे:
- परिवार की आर्थिक ज़रूरतें
- घर-गृहस्थी चलाने की जिम्मेदारी
- बच्चों और परिवार की सुरक्षा
- सामाजिक दबाव और असुरक्षा
- भविष्य के लिए संचित करने की आवश्यकता

इसलिए माया जोड़ना अधिकतर परिस्थितिवश होता है, स्वभाववश नहीं।

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आपसदारी

1जरूरत-भर जीरा वहाँ से ले लिया कि फिर सारा चौक उनके लिए आसानी से नहीं के बराबर हो जाता है— भगत जी की इस संतुष्ट निस्पृहता की कबीर की इस सूक्ति से तुलना कीजिए—
4प्रेमचंद की कहानी *ईदगाह* के हामिद और उसके दोस्तों का बाजार से क्या संबंध बनता है? विचार करें।

विज्ञापन की दुनिया

1आपने समाचारपत्रों, टी.वी. आदि पर अनेक प्रकार के विज्ञापन देखे होंगे जिनमें ग्राहकों को हर तरीके से लुभाने का प्रयास किया जाता है। नीचे लिखे बिंदुओं के संदर्भ में किसी एक विज्ञापन की समीक्षा कीजिए और यह भी लिखिए कि आपको विज्ञापन की किस बात ने सामान खरीदने के लिए प्रेरित किया।
2अपने सामान की बिक्री को बढ़ाने के लिए आज किन-किन तरीकों का प्रयोग किया जा रहा है? उदाहरण सहित उनका संक्षिप्त परिचय दीजिए। आप स्वयं किस तकनीक या तौर-तरीके का प्रयोग करना चाहेंगे जिससे बिक्री भी अच्छी हो और उपभोक्ता गुमराह भी न हो।

भाषा की बात

1विभिन्न परिस्थितियों में भाषा का प्रयोग भी अपना रूप बदलता रहता है कभी औपचारिक रूप में आती है तो कभी अनौपचारिक रूप में। पाठ में से दोनों प्रकार के तीन-तीन उदाहरण छाँटकर लिखिए।
2पाठ में अनेक वाक्य ऐसे हैं, जहाँ लेखक अपनी बात कहता है कुछ वाक्य ऐसे हैं जहाँ वह पाठक-वर्ग को संबोधित करता है। सीधे तौर पर पाठक को संबोधित करने वाले पाँच वाक्यों को छाँटिए और सोचिए कि ऐसे संबोधन पाठक से रचना पढ़वा लेने में मददगार होते हैं?
3नीचे दिए गए वाक्यों को पढ़िए।
4नीचे दिए गए वाक्यों के रेखांकित अंश पर ध्यान देते हुए उन्हें पढ़िए—

चर्चा करें

1पर्चेजिंग पावर से क्या अभिप्राय है?

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