श्रम विभाजन और जाति-प्रथा / मेरी कल्पना का आदर्श समाज-( बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर) (Part 2) — NCERT Solutions
Himachal Pradesh Board · Class 12 · Hindi
NCERT Solutions for श्रम विभाजन और जाति-प्रथा / मेरी कल्पना का आदर्श समाज-( बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर) (Part 2), Himachal Pradesh Board Class 12 Hindi: 8.
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पाठ के साथ
1जाति प्रथा को श्रम-विभाजन का ही एक रूप न मानने के पीछे आंबेडकर के क्या तर्क हैं?Show solution
दिया गया है: डॉ. भीमराव आंबेडकर के निबंध 'श्रम विभाजन और जाति-प्रथा' में जाति प्रथा और श्रम-विभाजन के संबंध पर विचार किया गया है।
आंबेडकर के तर्क:
- अस्वाभाविक विभाजन: सामान्य श्रम-विभाजन श्रमिकों को विभिन्न वर्गों में विभाजित करता है, परंतु जाति प्रथा श्रमिकों के साथ-साथ उनकी सामाजिक हैसियत का भी ऊँच-नीच के आधार पर विभाजन करती है। यह विभाजन अस्वाभाविक एवं अमानवीय है।
- रुचि व क्षमता की उपेक्षा: सामान्य श्रम-विभाजन में व्यक्ति अपनी रुचि, योग्यता और क्षमता के अनुसार कार्य चुनता है, किंतु जाति प्रथा में व्यक्ति को जन्म के आधार पर पेशा निर्धारित कर दिया जाता है। उसकी व्यक्तिगत रुचि या दक्षता का कोई महत्त्व नहीं होता।
- पेशे में लचीलेपन का अभाव: जाति प्रथा में पेशा बदलने की कोई स्वतंत्रता नहीं होती। यदि बाज़ार में किसी पेशे की माँग समाप्त हो जाए, तो भी व्यक्ति को वही पेशा अपनाए रखना पड़ता है, जिससे वह भूखा मरने को विवश हो जाता है।
- पूर्व-निर्धारित एवं थोपा गया विभाजन: श्रम-विभाजन स्वेच्छा पर आधारित होता है, जबकि जाति प्रथा में श्रम-विभाजन जन्म से ही थोप दिया जाता है। यह व्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन है।
निष्कर्ष: इस प्रकार आंबेडकर का तर्क है कि जाति प्रथा श्रम-विभाजन का स्वाभाविक रूप नहीं है, बल्कि यह मनुष्य की स्वतंत्रता, गरिमा और कार्यकुशलता को नष्ट करने वाली एक अमानवीय व्यवस्था है।
2जाति प्रथा भारतीय समाज में बेरोजगारी व भुखमरी का भी एक कारण कैसे बनती रही है? क्या यह स्थिति आज भी है?Show solution
दिया गया है: आंबेडकर ने जाति प्रथा और बेरोजगारी के संबंध पर विस्तार से विचार किया है।
जाति प्रथा और बेरोजगारी/भुखमरी का संबंध:
जाति प्रथा में व्यक्ति का पेशा जन्म से निर्धारित होता है। यदि किसी कारणवश उस पेशे की बाज़ार में माँग घट जाए या वह पेशा अनुपयोगी हो जाए, तो भी व्यक्ति को वही पेशा करते रहना पड़ता है। वह अपनी इच्छा या आवश्यकता के अनुसार दूसरा पेशा नहीं अपना सकता। इस प्रकार:
- वह बेरोजगार हो जाता है।
- आजीविका का कोई वैकल्पिक साधन न होने से भुखमरी की स्थिति उत्पन्न होती है।
- उसकी प्रतिभा और क्षमता का उचित उपयोग नहीं हो पाता।
क्या यह स्थिति आज भी है?
आज संवैधानिक प्रावधानों, शिक्षा के प्रसार और आरक्षण नीति के कारण स्थिति में कुछ सुधार अवश्य हुआ है। लोग अपनी जाति से इतर पेशे अपना रहे हैं। परंतु ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में आज भी जाति के आधार पर पेशा निर्धारित होता है। दलित और पिछड़े वर्गों को अभी भी सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है। अतः यह समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।
निष्कर्ष: जाति प्रथा आज भी किसी न किसी रूप में बेरोजगारी और असमानता का कारण बनी हुई है।
3लेखक के मत से 'दासता' की व्यापक परिभाषा क्या है?Show solution
दिया गया है: आंबेडकर ने 'दासता' की परिभाषा को उसके पारंपरिक अर्थ से आगे बढ़ाकर व्यापक रूप में प्रस्तुत किया है।
'दासता' की व्यापक परिभाषा:
सामान्यतः 'दासता' का अर्थ केवल कानूनी रूप से किसी व्यक्ति को दास बनाना समझा जाता है, अर्थात् जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति की संपत्ति हो।
किंतु आंबेडकर के मत से दासता की परिभाषा केवल इतनी सीमित नहीं है। उनके अनुसार:
अर्थात् जब किसी व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध, जन्म के आधार पर कोई कार्य करने के लिए बाध्य किया जाए — चाहे इसके लिए कोई कानूनी बंधन हो या न हो — तो वह भी दासता का ही एक रूप है।
जाति प्रथा में व्यक्ति को जन्म से ही एक निश्चित पेशे में बाँध दिया जाता है। वह अपनी रुचि, योग्यता या परिस्थिति के अनुसार पेशा नहीं बदल सकता। यह स्थिति भी दासता के समान ही है।
निष्कर्ष: आंबेडकर के अनुसार दासता केवल शारीरिक बंधन नहीं, बल्कि पेशे की स्वतंत्रता का हनन भी दासता है।
4शारीरिक वंश-परंपरा और सामाजिक उत्तराधिकार की दृष्टि से मनुष्यों में असमानता संभावित रहने के बावजूद आंबेडकर 'समता' को एक व्यवहार्य सिद्धांत मानने का आग्रह क्यों करते हैं? इसके पीछे उनके क्या तर्क हैं?Show solution
दिया गया है: आंबेडकर 'समता' को एक व्यावहारिक और आवश्यक सिद्धांत मानते हैं, भले ही मनुष्यों में प्राकृतिक असमानता हो।
आंबेडकर के तर्क:
- असमानता एक तथ्य, समता एक आदर्श: आंबेडकर स्वीकार करते हैं कि शारीरिक वंश-परंपरा और सामाजिक उत्तराधिकार के कारण मनुष्यों में असमानता स्वाभाविक रूप से विद्यमान है। परंतु समाज को इस असमानता को स्वीकार करके नहीं चलना चाहिए।
- समाज का नैतिक दायित्व: समाज का यह कर्तव्य है कि वह प्रत्येक व्यक्ति को अपनी क्षमता विकसित करने का समान अवसर प्रदान करे। यदि किसी को जन्म के कारण अवसर से वंचित किया जाए, तो यह अन्यायपूर्ण है।
- व्यवहार्यता का आधार: समता का सिद्धांत इसलिए व्यवहार्य है क्योंकि इसका उद्देश्य सभी को एक जैसा बनाना नहीं, बल्कि सभी को समान अवसर, समान अधिकार और समान सम्मान देना है।
- लोकतंत्र की आवश्यकता: लोकतांत्रिक समाज की स्थापना के लिए समता अनिवार्य है। बिना समता के स्वतंत्रता और बंधुत्व का कोई अर्थ नहीं।
- मानवीय गरिमा: प्रत्येक मनुष्य में एक मूलभूत मानवीय गरिमा होती है। समता का सिद्धांत इसी गरिमा की रक्षा करता है।
निष्कर्ष: आंबेडकर का मानना है कि असमानता एक यथार्थ हो सकती है, परंतु समता एक ऐसा आदर्श है जिसे समाज को अपना लक्ष्य बनाना चाहिए, क्योंकि इसी से न्यायपूर्ण और मानवीय समाज की स्थापना संभव है।
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Frequently Asked Questions
What are the important topics in श्रम विभाजन और जाति-प्रथा / मेरी कल्पना का आदर्श समाज-( बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर) for Himachal Pradesh Board Class 12 Hindi?
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