भरत-राम का प्रेम / पद (तुलसीदास) — NCERT Solutions
Himachal Pradesh Board · Class 12 · Hindi
NCERT Solutions for भरत-राम का प्रेम / पद (तुलसीदास), Himachal Pradesh Board Class 12 Hindi: 13 textbook questions solved step by step.
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प्रश्न-अभ्यास
1'हारेंहु खेल जितावहिं मोही' भरत के इस कथन का क्या आशय है?Show solution
आशय एवं व्याख्या:
भरत कह रहे हैं कि राम बचपन में उनके साथ खेलते समय जान-बूझकर हार जाते थे और मुझे जिता देते थे। इस कथन में भरत राम के अगाध प्रेम और उनकी उदारता का स्मरण कर रहे हैं।
भाव-विस्तार:
- राम बड़े भाई होते हुए भी छोटे भाई भरत को प्रसन्न करने के लिए खेल में जानबूझकर हार स्वीकार कर लेते थे।
- इससे राम के निःस्वार्थ प्रेम, विनम्रता और भ्रातृवात्सल्य का पता चलता है।
- भरत इस स्मृति के माध्यम से यह भी व्यंजित करते हैं कि ऐसे स्नेहशील बड़े भाई के वन चले जाने पर उनका हृदय कितना व्यथित है।
- यह कथन भरत की कृतज्ञता और राम के प्रति उनकी असीम श्रद्धा को भी प्रकट करता है।
निष्कर्ष: इस पंक्ति का आशय है कि राम का भरत के प्रति प्रेम इतना गहरा था कि वे अपनी जीत की परवाह न करके भरत को खुश करने के लिए खेल में हार जाते थे। यह उनके महान चरित्र का परिचायक है।
2'मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ।' में राम के स्वभाव की किन विशेषताओं की ओर संकेत किया गया है?Show solution
आशय:
भरत कहते हैं — 'मैं अपने स्वामी (राम) के स्वभाव को भली-भाँति जानता हूँ।' इस पंक्ति में राम के स्वभाव की निम्नलिखित विशेषताओं की ओर संकेत किया गया है:
- करुणाशीलता: राम स्वभाव से अत्यंत दयालु और करुणामय हैं। वे दूसरों की पीड़ा को देखकर द्रवित हो जाते हैं।
- क्षमाशीलता: राम किसी के अपराध को मन में नहीं रखते; वे क्षमा करने में सदैव तत्पर रहते हैं।
- निःस्वार्थ प्रेम: राम का प्रेम निःस्वार्थ और निश्छल है। वे अपने प्रियजनों के सुख के लिए स्वयं कष्ट उठाने को तैयार रहते हैं।
- मर्यादाशीलता: राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं — वे सदैव धर्म और मर्यादा का पालन करते हैं।
- सरलता एवं उदारता: राम का स्वभाव सरल, उदार और निष्कपट है।
निष्कर्ष: भरत इस पंक्ति के माध्यम से यह स्पष्ट करते हैं कि राम का स्वभाव इतना उदार और प्रेमपूर्ण है कि वे भरत को कभी दोषी नहीं मानेंगे, भले ही परिस्थितियाँ कुछ भी रही हों।
3राम के प्रति अपने श्रद्धाभाव को भरत किस प्रकार प्रकट करते हैं, स्पष्ट कीजिए।Show solution
भरत का राम के प्रति श्रद्धाभाव:
भरत राम के प्रति अपनी श्रद्धा अनेक प्रकार से प्रकट करते हैं:
- स्वयं को दोषी मानना: भरत स्वयं को राम के वनवास का कारण मानते हैं और इसके लिए अपनी माता कैकेयी को नहीं, बल्कि स्वयं को उत्तरदायी ठहराते हैं। वे कहते हैं कि मैं ही इस अनर्थ की जड़ हूँ।
- राम की पादुकाओं को राजसिंहासन पर स्थापित करना: भरत राम की खड़ाऊँ (पनहियाँ) को सिंहासन पर रखकर उनके नाम पर राज्य का संचालन करते हैं। यह उनकी परम श्रद्धा का प्रतीक है।
- तपस्वी जीवन जीना: भरत राजमहल छोड़कर नंदिग्राम में कुटिया बनाकर तपस्वी की भाँति रहते हैं — वल्कल वस्त्र पहनते हैं, फल-मूल खाते हैं और राम की प्रतीक्षा करते हैं।
- राम को 'नाथ' कहना: भरत राम को अपना स्वामी (नाथ) मानते हैं और उनके प्रति पूर्ण समर्पण का भाव रखते हैं।
- राम के गुणों का स्मरण: भरत बार-बार राम के स्नेह, उनकी उदारता और बचपन की स्मृतियों का स्मरण करते हैं।
निष्कर्ष: भरत का राम के प्रति श्रद्धाभाव अनन्य, निःस्वार्थ और अटूट है। वे राम को ईश्वर तुल्य मानते हैं और उनकी सेवा को ही अपना धर्म समझते हैं।
4'महीं सकल अनरथ कर मूला' पंक्ति द्वारा भरत के विचारों-भावों का स्पष्टीकरण कीजिए।Show solution
पंक्ति का अर्थ:
'महीं सकल अनरथ कर मूला' — अर्थात् 'मैं ही समस्त अनर्थों की जड़ हूँ।'
भरत के विचार एवं भाव:
- आत्म-ग्लानि: भरत को गहरी आत्म-ग्लानि है। वे मानते हैं कि उनके जन्म लेने के कारण ही उनकी माता कैकेयी ने राम को वनवास दिलाया। इसलिए वे स्वयं को सभी अनर्थों का मूल कारण मानते हैं।
- निर्दोष होते हुए भी दोष स्वीकारना: वास्तव में भरत इस षड्यंत्र में सम्मिलित नहीं थे, फिर भी वे अपनी माता के कृत्य का दोष स्वयं पर लेते हैं। यह उनकी महानता और उत्तरदायित्व की भावना को दर्शाता है।
- पश्चाताप की भावना: भरत के मन में गहरा पश्चाताप है। वे सोचते हैं कि यदि वे न होते तो राम को वन नहीं जाना पड़ता, पिता दशरथ की मृत्यु न होती और अयोध्या में यह शोक न छाता।
- विनम्रता एवं समर्पण: इस पंक्ति में भरत की विनम्रता झलकती है। वे राज्य, सुख या किसी भी लाभ की कामना नहीं करते, बल्कि स्वयं को दोषी मानकर प्रायश्चित करते हैं।
निष्कर्ष: इस पंक्ति के माध्यम से तुलसीदास ने भरत के उस उदात्त चरित्र को उजागर किया है जो स्वयं निर्दोष होते हुए भी दोष स्वीकार करता है — यही उनकी महानता है।
5'फरह कि कोदव बालि सुसाली। मुकता प्रसव कि सबुक काली'। पंक्ति में छिपे भाव और शिल्प सौंदर्य को स्पष्ट कीजिए।Show solution
पंक्ति का अर्थ:
'क्या कोदों (जंगली घास) की बाली में सुंदर धान (सुसाली) उत्पन्न हो सकती है? क्या घोंघे (संबुक) की काली सीप में मोती उत्पन्न हो सकते हैं?'
भाव-सौंदर्य:
- भरत यहाँ यह कहना चाहते हैं कि जिस प्रकार कोदों की बाली से उत्तम धान और काले घोंघे से मोती उत्पन्न नहीं हो सकते, उसी प्रकार उनके जैसे (जो स्वयं को दोषी मानते हैं) से राम जैसा महान पुत्र उत्पन्न नहीं हो सकता — अर्थात् वे राम की महानता के सामने स्वयं को तुच्छ मानते हैं।
- यह पंक्ति भरत की गहरी आत्म-ग्लानि और राम के प्रति उनकी असीम श्रद्धा को व्यक्त करती है।
- इसमें यह भाव भी है कि कुटिल माता (कैकेयी) से ऐसे सद्गुणी पुत्र (भरत) का जन्म कैसे संभव है — भरत स्वयं को अयोग्य सिद्ध करने का प्रयास करते हैं।
शिल्प-सौंदर्य:
- अलंकार: इस पंक्ति में प्रश्नालंकार (अर्थान्तरन्यास) का सुंदर प्रयोग है। प्रश्न के रूप में उत्तर स्वयंसिद्ध है।
- दृष्टांत अलंकार: कोदों-सुसाली और घोंघे-मोती के दृष्टांत देकर भाव को स्पष्ट किया गया है।
- अवधी भाषा: तुलसीदास ने सरल, प्रवाहमयी अवधी भाषा का प्रयोग किया है।
- लोकजीवन से उदाहरण: कोदों, धान, घोंघा, मोती — ये सभी लोकजीवन से लिए गए उदाहरण हैं जो भाव को सहज और प्रभावशाली बनाते हैं।
- संगीतात्मकता: पंक्ति में तुकबंदी (सुसाली-काली) से संगीतात्मकता उत्पन्न होती है।
निष्कर्ष: यह पंक्ति भाव और शिल्प दोनों दृष्टियों से अत्यंत सुंदर है। इसमें भरत की विनम्रता, आत्म-ग्लानि और राम-भक्ति का सुंदर समन्वय है।
पद — प्रश्न-अभ्यास
1राम के वन-गमन के बाद उनकी वस्तुओं को देखकर माँ कौशल्या कैसा अनुभव करती हैं? अपने शब्दों में वर्णन कीजिए।Show solution
कौशल्या की मनोदशा:
राम के वन चले जाने के बाद माँ कौशल्या उनकी बचपन की वस्तुओं — बाल-धनुष (धनुहियाँ), जूतियाँ (पनहियाँ) आदि — को देखकर अत्यंत व्यथित और विह्वल हो जाती हैं।
- स्मृतियों में डूब जाना: राम की प्रत्येक वस्तु उन्हें राम के बचपन की याद दिलाती है। वे उन वस्तुओं को देखकर राम के बाल-रूप का स्मरण करती हैं।
- चित्रलिखी-सी स्थिति: कौशल्या उन वस्तुओं को देखकर चित्र में बनी आकृति की भाँति स्थिर और निश्चेष्ट हो जाती हैं — न रो पाती हैं, न कुछ बोल पाती हैं।
- गहरी वेदना: उनके हृदय में असीम वेदना है। राम को उन्होंने दूध पिलाया, पाला-पोसा, उनकी प्रत्येक वस्तु उनके ममत्व की साक्षी है।
- मूक पीड़ा: कौशल्या की पीड़ा शब्दों में व्यक्त नहीं होती — वे मूक होकर केवल उन वस्तुओं को निहारती रहती हैं।
- ममता का उद्रेक: राम की छोटी-छोटी वस्तुएँ उनकी ममता को जगाती हैं और वे विलाप करने लगती हैं।
निष्कर्ष: तुलसीदास ने कौशल्या की मातृ-वेदना का अत्यंत मार्मिक और हृदयस्पर्शी चित्रण किया है। एक माँ का अपने पुत्र की वस्तुओं को देखकर विह्वल हो जाना — यह भाव पाठक के हृदय को भी द्रवित कर देता है।
2'रहि चिकि चित्रलिखी सौ' पंक्ति का मर्म अपने शब्दों में स्पष्ट कीजिए।Show solution
पंक्ति का अर्थ:
'रहि चिकि चित्रलिखी सौ' — अर्थात् 'चित्र में बनी आकृति की भाँति स्थिर और निश्चेष्ट रह गईं।'
मर्म-स्पष्टीकरण:
इस पंक्ति में माँ कौशल्या की उस मनोदशा का वर्णन है जब वे राम की बचपन की वस्तुओं को देखती हैं।
- भावातिरेक की स्थिति: जब दुःख इतना अधिक हो जाता है कि व्यक्ति न रो सके, न बोल सके, न हिल-डुल सके — तब वह चित्र में बनी आकृति की भाँति स्थिर हो जाता है। कौशल्या की यही दशा है।
- मूक वेदना: चित्र में बनी आकृति में जीवन नहीं होता — वह न बोल सकती है, न रो सकती है, न हिल सकती है। कौशल्या भी उसी प्रकार स्तब्ध हो गई हैं।
- माँ की असहाय स्थिति: एक माँ जो अपने पुत्र को वन जाने से रोक नहीं सकी, जो उसे वापस नहीं बुला सकती — वह केवल उसकी वस्तुओं को देखकर पत्थर की मूर्ति-सी हो जाती है।
- उपमा का सौंदर्य: 'चित्रलिखी सौ' एक अत्यंत सटीक और मार्मिक उपमा है जो कौशल्या की निश्चेष्ट, जड़वत् स्थिति को पूर्णतः व्यक्त करती है।
निष्कर्ष: यह पंक्ति तुलसीदास की काव्य-प्रतिभा का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसमें मातृ-वेदना की चरम अवस्था को एक छोटी-सी उपमा के माध्यम से अत्यंत प्रभावशाली ढंग से व्यक्त किया गया है।
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