शिरीष के फूल
Himachal Pradesh Board · Class 12 · Hindi
NCERT Solutions for शिरीष के फूल — Himachal Pradesh Board Class 12 Hindi.
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1लेखक ने शिरीष को कालजयी अवधूत (संन्यासी) की तरह क्यों माना है?Show solution
उत्तर:
लेखक ने शिरीष को कालजयी अवधूत इसलिए माना है क्योंकि शिरीष का वृक्ष उन सभी विशेषताओं से युक्त है जो एक सच्चे अवधूत (संन्यासी) में होती हैं—
1. बाहरी परिस्थितियों से निर्लिप्तता: ज्येष्ठ-आषाढ़ की भीषण गर्मी में, जब लू के थपेड़े चलते हैं और धरती तवे की तरह तपती है, तब भी शिरीष शांत भाव से फूला रहता है। वह न गर्मी से विचलित होता है, न वर्षा से।
2. कोमलता और कठोरता का समन्वय: शिरीष के फूल अत्यंत कोमल होते हैं, किंतु उसके पुराने फलों के खोखे इतने कठोर होते हैं कि नए फूल आने पर भी वे डाल नहीं छोड़ते। यह कोमलता और कठोरता का अद्भुत संयोग अवधूत की पहचान है।
3. वायुमंडल से रस ग्रहण करना: शिरीष वायुमंडल से रस खींचकर जीवित रहता है। वह बाहरी संघर्षों और उथल-पुथल से अप्रभावित रहता है—ठीक उसी प्रकार जैसे एक अवधूत संसार के बीच रहकर भी उससे अलिप्त रहता है।
4. कालजयी स्वभाव: काल की मार से बचते हुए वह दीर्घजीवी बना रहता है। लेखक ने गांधीजी से उसकी तुलना करते हुए कहा है कि जैसे गांधीजी मार-काट, अग्निदाह और खून-खच्चर के बवंडर में भी स्थिर रहे, वैसे ही शिरीष भी विषम परिस्थितियों में अविचल रहता है।
निष्कर्ष: इन्हीं सब कारणों से लेखक ने शिरीष को 'कालजयी अवधूत' की संज्ञा दी है।
2हृदय की कोमलता को बचाने के लिए व्यवहार की कठोरता भी कभी-कभी जरूरी हो जाती है— प्रस्तुत पाठ के आधार पर स्पष्ट करें।Show solution
उत्तर:
लेखक ने शिरीष के माध्यम से यह सिद्ध किया है कि कोमलता और कठोरता परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे की पूरक हैं—
1. शिरीष का उदाहरण: शिरीष के फूल अत्यंत कोमल और नाजुक होते हैं, किंतु उसके पुराने फलों के खोखे इतने कठोर होते हैं कि वे नए फूलों के आने पर भी डाल नहीं छोड़ते। यह कठोरता ही उसकी कोमलता की रक्षा करती है।
2. गांधीजी का उदाहरण: लेखक ने गांधीजी को भी इसी संदर्भ में उद्धृत किया है। गांधीजी का हृदय अत्यंत कोमल था—वे सबसे प्रेम करते थे, सबके दुःख से द्रवित होते थे। किंतु अपने सिद्धांतों और आदर्शों के प्रति वे अत्यंत कठोर थे। अंग्रेजी शासन के विरुद्ध उनका अहिंसक संघर्ष, उनके व्यवहार की कठोरता का ही प्रमाण है। यदि वे कठोर न होते तो उनकी आंतरिक कोमलता को संसार की क्रूरता नष्ट कर देती।
3. साहित्यकार के संदर्भ में: लेखक कहते हैं कि एक सच्चे कवि के लिए भी यही आवश्यक है। उसे अनासक्त योगी की स्थिर प्रज्ञता चाहिए ताकि वह संसार के प्रलोभनों और दबावों से अपनी संवेदनशीलता को बचा सके।
निष्कर्ष: इस प्रकार पाठ यह स्पष्ट करता है कि हृदय की कोमलता की रक्षा के लिए बाहरी व्यवहार में कठोरता आवश्यक है। बिना कठोरता के कोमलता टिक नहीं सकती।
3द्विवेदी जी ने शिरीष के माध्यम से कोलाहल व संघर्ष से भरी जीवन-स्थितियों में अविचल रह कर जिजीविषु बने रहने की सीख दी है। स्पष्ट करें।Show solution
उत्तर:
द्विवेदी जी ने शिरीष वृक्ष को जीवन-दर्शन का प्रतीक बनाकर यह सिखाया है कि विषम परिस्थितियों में भी जीने की इच्छा (जिजीविषा) बनाए रखनी चाहिए—
1. प्रतिकूल परिस्थितियों में खिलना: शिरीष ज्येष्ठ-आषाढ़ की भीषण गर्मी में फूलता है, जब अन्य वनस्पतियाँ मुरझा जाती हैं। लू के थपेड़ों और तपती धरती के बीच भी वह अपनी जीवन-शक्ति बनाए रखता है। यह संदेश देता है कि जीवन के कोलाहल और संघर्ष में भी मनुष्य को अपनी जिजीविषा नहीं खोनी चाहिए।
2. अविचलता का गुण: शिरीष न वर्षा की परवाह करता है, न गर्मी की। वह बाहरी उथल-पुथल से निर्लिप्त रहकर अपना काम करता रहता है। यह अविचलता ही उसे दीर्घजीवी बनाती है।
3. गतिशीलता का संदेश: लेखक कहते हैं—'जमे कि मरे।' अर्थात् जो व्यक्ति परिस्थितियों के साथ बदलता नहीं, वह नष्ट हो जाता है। शिरीष की तरह हिलते-डुलते, आगे बढ़ते रहना ही जीवन है।
4. गांधीजी का उदाहरण: देश में मार-काट, अग्निदाह और खून-खच्चर के बवंडर के बीच भी गांधीजी शिरीष की तरह अविचल रहे। उन्होंने जिजीविषा का परिचय दिया।
निष्कर्ष: इस प्रकार द्विवेदी जी ने शिरीष के माध्यम से यह प्रेरणा दी है कि जीवन के संघर्षों में न घबराएँ, न रुकें—अविचल और जिजीविषु बने रहें।
4'हाय, वह अवधूत आज कहाँ है!' ऐसा कहकर लेखक ने आत्मबल पर देह-बल के वर्चस्व की वर्तमान सभ्यता के संकट की ओर संकेत किया है। कैसे?Show solution
उत्तर:
लेखक ने 'हाय, वह अवधूत आज कहाँ है!' कहकर गांधीजी की याद की है और साथ ही वर्तमान सभ्यता के एक गहरे संकट की ओर संकेत किया है—
1. आत्मबल बनाम देह-बल: गांधीजी आत्मबल के प्रतीक थे। उन्होंने बिना किसी शस्त्र के, केवल सत्य और अहिंसा के बल पर अंग्रेजी साम्राज्य को चुनौती दी। वे शिरीष की तरह वायुमंडल से रस खींचकर—अर्थात् जन-जन की भावनाओं और आत्मशक्ति से ऊर्जा लेकर—इतने कोमल और इतने कठोर बन सके।
2. वर्तमान सभ्यता का संकट: आज की सभ्यता में आत्मबल का स्थान देह-बल ने ले लिया है। मार-काट, हिंसा, लूट-पाट, अग्निदाह—ये सब देह-बल के प्रतीक हैं। आज शक्ति का अर्थ शस्त्र-बल, धन-बल और शारीरिक बल हो गया है। आत्मिक शक्ति, नैतिक साहस और सत्य की ताकत को भुला दिया गया है।
3. लेखक की पीड़ा: लेखक को पीड़ा है कि गांधीजी जैसा अवधूत—जो आत्मबल का जीवंत उदाहरण था—आज नहीं रहा। उनके जाने के बाद समाज में देह-बल का वर्चस्व बढ़ता जा रहा है।
निष्कर्ष: इस प्रकार लेखक ने यह संकेत दिया है कि जब तक समाज में आत्मबल की जगह देह-बल को महत्व दिया जाता रहेगा, तब तक सभ्यता का संकट बना रहेगा।
5कवि (साहित्यकार) के लिए अनासक्त योगी की स्थिर प्रज्ञता और विदग्ध प्रेमी का हृदय— एक साथ आवश्यक है। ऐसा विचार प्रस्तुत कर लेखक ने साहित्य-कर्म के लिए बहुत ऊँचा मानदंड निर्धारित किया है। विस्तारपूर्वक समझाएँ।Show solution
उत्तर:
द्विवेदी जी ने साहित्यकार के लिए दो परस्पर विरोधी प्रतीत होने वाले गुणों को एक साथ आवश्यक बताया है—
1. अनासक्त योगी की स्थिर प्रज्ञता:
- 'अनासक्त' का अर्थ है—विषय-भोग, लोभ, मोह और सांसारिक प्रलोभनों से ऊपर उठा हुआ।
- 'स्थिर प्रज्ञता' का अर्थ है—अविचल बुद्धि, जो सुख-दुःख, लाभ-हानि, यश-अपयश में समान रहे।
- एक साहित्यकार को इसलिए यह गुण चाहिए ताकि वह संसार की क्षणिक घटनाओं, राजनीतिक दबावों, आर्थिक प्रलोभनों और व्यक्तिगत स्वार्थों से प्रभावित हुए बिना सत्य का साक्षात्कार कर सके।
- जो कवि 'किए-कराए का लेखा-जोखा मिलाने में उलझ गया', वह सच्चा कवि नहीं हो सकता।
2. विदग्ध प्रेमी का हृदय:
- 'विदग्ध' का अर्थ है—अच्छी तरह तपा हुआ, परिपक्व।
- एक प्रेमी का हृदय संवेदनशील होता है—वह दूसरों के दुःख-सुख को अनुभव करता है, प्रकृति की सुंदरता से आनंदित होता है, मानवीय पीड़ा से द्रवित होता है।
- बिना इस संवेदनशीलता के साहित्य निर्जीव हो जाता है।
दोनों का समन्वय क्यों आवश्यक है:
- यदि केवल अनासक्ति हो तो साहित्यकार ठंडा और निर्भाव हो जाएगा—उसकी रचना में जीवन नहीं होगा।
- यदि केवल प्रेमी का हृदय हो तो वह भावनाओं में बह जाएगा, वस्तुनिष्ठता खो देगा।
- दोनों का संयोग ही महान साहित्य की रचना करता है—जैसे शिरीष कोमल भी है और कठोर भी।
ऊँचा मानदंड: लेखक ने यह कहकर साहित्य-कर्म को एक साधना बताया है। यह मानदंड इसलिए ऊँचा है क्योंकि इन दोनों गुणों को एक साथ साधना अत्यंत कठिन है।
निष्कर्ष: इस प्रकार द्विवेदी जी ने साहित्यकार के लिए एक आदर्श निर्धारित किया है जो उसे सामान्य लेखक से ऊपर उठाकर एक दार्शनिक-संवेदनशील व्यक्तित्व बनाता है।
6सर्वप्रासी काल की मार से बचते हुए वही दीर्घजीवी हो सकता है, जिसने अपने व्यवहार में जड़ता छोड़कर नित बदल रही स्थितियों में निरंतर अपनी गतिशीलता बनाए रखी है। पाठ के आधार पर स्पष्ट करें।Show solution
उत्तर:
लेखक ने इस विचार को शिरीष वृक्ष और जीवन-दर्शन के माध्यम से स्पष्ट किया है—
1. काल की अनिवार्यता:
काल (समय) सर्वभक्षी है—वह सबको निगल जाता है। जो इसके साथ नहीं चलता, वह नष्ट हो जाता है। लेखक कहते हैं—'दुरंत प्राणधारा और सर्वव्यापक कालाग्नि का संघर्ष निरंतर चल रहा है।'
2. जड़ता = मृत्यु:
जो व्यक्ति या समाज एक ही स्थान पर जमा रहता है, परिवर्तन को स्वीकार नहीं करता, वह काल की मार से नहीं बच सकता। लेखक ने स्पष्ट कहा है—'जमे कि मरे।'
3. गतिशीलता = जीवन:
शिरीष इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। वह ऋतु के अनुसार बदलता है—गर्मी में फूलता है, वर्षा में हरा-भरा रहता है। वह परिस्थितियों के साथ अपनी गतिशीलता बनाए रखता है। इसीलिए वह दीर्घजीवी है।
4. व्यावहारिक संदेश:
लेखक कहते हैं—'हिलते-डुलते रहो, स्थान बदलते रहो, आगे की ओर मुँह किए रहो तो कोड़े की मार से बच भी सकते हो।' अर्थात् जो व्यक्ति नई परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढालता है, नए विचारों को अपनाता है और आगे बढ़ता रहता है—वही काल की मार से बचता है।
5. सभ्यता के संदर्भ में:
यही बात समाज और सभ्यता पर भी लागू होती है। जो सभ्यताएँ जड़ हो गईं, वे नष्ट हो गईं। जो गतिशील रहीं, वे दीर्घजीवी हुईं।
निष्कर्ष: इस प्रकार पाठ यह सिखाता है कि जड़ता त्यागकर, परिवर्तन को स्वीकार करते हुए और गतिशील बने रहकर ही मनुष्य काल की मार से बच सकता है और दीर्घजीवी हो सकता है।
7(क)आशय स्पष्ट कीजिए— दुरंत प्राणधारा और सर्वव्यापक कालाग्नि का संघर्ष निरंतर चल रहा है। मूर्ख समझते हैं कि जहाँ बने हैं, वहीं देर तक बने रहें तो कालदेवता की आँख बचा पाएँगे। भोले हैं वे। हिलते-डुलते रहो, स्थान बदलते रहो, आगे की ओर मुँह किए रहो तो कोड़े की मार से बच भी सकते हो। जमे कि मरे।Show solution
आशय:
इस अंश में लेखक ने जीवन और काल के शाश्वत संघर्ष को व्यक्त किया है—
1. 'दुरंत प्राणधारा और सर्वव्यापक कालाग्नि का संघर्ष': जीवन (प्राणधारा) और मृत्यु/काल (कालाग्नि) के बीच निरंतर संघर्ष चलता रहता है। काल सर्वभक्षी है—वह सबको नष्ट करता है। किंतु जीवन भी दुरंत (अजेय) है—वह बार-बार नए रूप में उभरता है।
2. 'मूर्ख समझते हैं... कालदेवता की आँख बचा पाएँगे': जो लोग सोचते हैं कि एक ही स्थान पर जमे रहने से, परिवर्तन न करने से वे काल से बच जाएँगे—वे मूर्ख हैं। जड़ता कभी भी काल से नहीं बचाती।
3. 'हिलते-डुलते रहो... आगे की ओर मुँह किए रहो': लेखक का संदेश है कि गतिशीलता ही जीवन है। जो व्यक्ति परिस्थितियों के साथ बदलता है, नई दिशाओं में आगे बढ़ता है, वही काल की मार से कुछ हद तक बच सकता है।
4. 'जमे कि मरे': यह पंक्ति पूरे अंश का सार है। जड़ता और ठहराव मृत्यु के समान है। जो रुक गया, वह मर गया—चाहे वह व्यक्ति हो, समाज हो या सभ्यता।
निष्कर्ष: यह अंश जीवन में गतिशीलता, परिवर्तनशीलता और प्रगतिशीलता का संदेश देता है।
7(ख)आशय स्पष्ट कीजिए— जो कवि अनासक्त नहीं रह सका, जो फक्कड़ नहीं बन सका, जो किए-कराए का लेखा-जोखा मिलाने में उलझ गया, वह भी क्या कवि है?...मैं कहता हूँ कवि बनना है मेरे दोस्तो, तो फक्कड़ बनो।Show solution
आशय:
इस अंश में लेखक ने सच्चे कवि/साहित्यकार की परिभाषा दी है—
1. 'अनासक्त नहीं रह सका': जो कवि सांसारिक मोह-माया, लोभ, यश और पुरस्कार की लालसा से मुक्त नहीं हो सका, वह सच्चा कवि नहीं है। अनासक्ति का अर्थ है—फल की चिंता किए बिना सृजन करना।
2. 'फक्कड़ नहीं बन सका': 'फक्कड़' का अर्थ है—निश्चिंत, मस्त, बेपरवाह। जो कवि समाज की परवाह किए बिना, आलोचना-प्रशंसा से निर्लिप्त होकर सत्य नहीं लिख सकता, वह कवि नहीं है।
3. 'किए-कराए का लेखा-जोखा मिलाने में उलझ गया': जो कवि अपने लाभ-हानि का हिसाब लगाता रहता है—कि इस रचना से क्या मिलेगा, कौन नाराज होगा, कौन खुश होगा—वह सच्चा साहित्यकार नहीं हो सकता।
4. 'फक्कड़ बनो': लेखक का आह्वान है कि सच्चे कवि को फक्कड़ होना चाहिए—शिरीष की तरह, जो बिना किसी की परवाह किए भीषण गर्मी में भी फूलता रहता है।
निष्कर्ष: यह अंश साहित्य-सृजन की स्वतंत्रता और निर्भीकता का संदेश देता है। सच्चा कवि वही है जो अनासक्त, निर्लोभ और फक्कड़ हो।
7(ग)आशय स्पष्ट कीजिए— फूल हो या पेड़, वह अपने-आप में समाप्त नहीं है। वह किसी अन्य वस्तु को दिखाने के लिए उठी हुई अँगुली है। वह इशारा है।Show solution
आशय:
इस अंश में लेखक ने प्रकृति और साहित्य के प्रतीकात्मक महत्व को व्यक्त किया है—
1. 'फूल हो या पेड़, वह अपने-आप में समाप्त नहीं है': प्रकृति की कोई भी वस्तु—फूल, पेड़, नदी, पहाड़—केवल अपने भौतिक अस्तित्व तक सीमित नहीं है। उसका एक गहरा अर्थ और संदेश होता है।
2. 'उठी हुई अँगुली है': जैसे उठी हुई अँगुली किसी दिशा की ओर संकेत करती है, उसी प्रकार शिरीष का फूल भी केवल एक फूल नहीं है—वह जीवन के एक गहरे सत्य की ओर इशारा करता है। वह अवधूत की जीवन-शैली का, अनासक्ति का, जिजीविषा का प्रतीक है।
3. 'वह इशारा है': लेखक कहना चाहते हैं कि शिरीष का पूरा निबंध केवल एक फूल का वर्णन नहीं है—यह जीवन-दर्शन का इशारा है। यह गांधीजी जैसे महापुरुषों की ओर, आत्मबल की ओर, अविचलता की ओर संकेत है।
4. साहित्यिक दृष्टि से: यह अंश यह भी बताता है कि महान साहित्य भी 'इशारा' होता है—वह सीधे उपदेश नहीं देता, बल्कि प्रतीकों और बिंबों के माध्यम से गहरे सत्य की ओर संकेत करता है।
निष्कर्ष: इस प्रकार लेखक ने यह बताया है कि प्रकृति की प्रत्येक वस्तु एक व्यापक सत्य की प्रतीक है और उसे उस व्यापक अर्थ में देखना ही सच्ची दृष्टि है।
पाठ के आसपास
1शिरीष के पुष्प को शीतपुष्प भी कहा जाता है। ज्येष्ठ माह की प्रचंड गरमी में फूलने वाले फूल को शीतपुष्प संज्ञा किस आधार पर दी गई होगी?Show solution
शिरीष के पुष्प को 'शीतपुष्प' संज्ञा संभवतः निम्नलिखित आधारों पर दी गई होगी—
1. स्पर्श की शीतलता: शिरीष के फूल अत्यंत कोमल और नाजुक होते हैं। उनके रेशे-रेशे इतने मुलायम होते हैं कि उन्हें छूने पर शीतलता का अनुभव होता है। भीषण गर्मी में इनका स्पर्श मन को शांति और ठंडक देता है।
2. मानसिक शीतलता: ज्येष्ठ की प्रचंड गर्मी में जब चारों ओर तपन और बेचैनी होती है, तब शिरीष के फूल अपनी सुंदरता और कोमलता से मन को शीतल करते हैं। वे आँखों को ठंडक देते हैं।
3. प्रतीकात्मक शीतलता: शिरीष की अविचलता और शांत स्वभाव उसे 'शीतल' बनाता है। जैसे एक शांत व्यक्ति अपने आसपास के वातावरण को शीतल बना देता है, वैसे ही शिरीष भी गर्मी के बीच शीतलता का प्रतीक है।
4. औषधीय गुण: संभव है कि शिरीष के फूलों में कोई शीतल औषधीय गुण हों जिसके कारण इसे 'शीतपुष्प' कहा गया हो।
निष्कर्ष: इस प्रकार गर्मी के मौसम में खिलने के बावजूद अपनी कोमलता, सुंदरता और मानसिक शांति प्रदान करने की क्षमता के कारण शिरीष को 'शीतपुष्प' कहा गया होगा।
2कोमल और कठोर दोनों भाव किस प्रकार गांधीजी के व्यक्तित्व की विशेषता बन गए।Show solution
गांधीजी के व्यक्तित्व में कोमलता और कठोरता का अद्भुत समन्वय था—
कोमलता के रूप:
1. गांधीजी का हृदय अत्यंत संवेदनशील था। वे गरीबों, दलितों और पीड़ितों के दुःख से तुरंत द्रवित हो जाते थे।
2. वे सबसे—यहाँ तक कि अपने विरोधियों से भी—प्रेम करते थे। अहिंसा उनके जीवन का मूल सिद्धांत था।
3. वे बच्चों और महिलाओं के प्रति विशेष रूप से कोमल थे।
4. उनकी भाषा में मिठास और करुणा थी।
कठोरता के रूप:
1. अपने सिद्धांतों—सत्य और अहिंसा—के प्रति वे अत्यंत कठोर थे। किसी भी दबाव में वे इनसे नहीं डिगे।
2. अंग्रेजी साम्राज्य के विरुद्ध उनका संघर्ष अटल था। जेल, यातना और कष्ट भी उन्हें नहीं तोड़ सके।
3. वे अपने आश्रम के नियमों और जीवन-शैली के प्रति कठोर अनुशासन रखते थे।
4. जब भी उन्हें लगा कि कोई अन्याय हो रहा है, तो वे बिना किसी भय के उसका विरोध करते थे।
लेखक का दृष्टिकोण: द्विवेदी जी ने गांधीजी की तुलना शिरीष से की है—दोनों वायुमंडल से रस खींचकर कोमल भी हैं और कठोर भी। यही उनकी महानता का रहस्य है।
निष्कर्ष: गांधीजी का व्यक्तित्व इस बात का प्रमाण है कि सच्ची कोमलता और सच्ची कठोरता एक-दूसरे की विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं।
3आजकल अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय फूलों की बहुत माँग है। बहुत से किसान साग-सब्जी व अन्न उत्पादन छोड़ फूलों की खेती की ओर आकर्षित हो रहे हैं। इसी मुद्दे को विषय बनाते हुए वाद-विवाद प्रतियोगिता का आयोजन करें।Show solution
यह एक गतिविधि-आधारित प्रश्न है। वाद-विवाद प्रतियोगिता के लिए निम्नलिखित बिंदु सहायक होंगे—
पक्ष में तर्क (फूलों की खेती के समर्थन में):
1. फूलों की खेती से किसानों को अधिक आर्थिक लाभ मिलता है।
2. अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय फूलों की माँग से विदेशी मुद्रा अर्जित होती है।
3. फूलों की खेती में कम पानी और कम लागत लगती है।
4. रोजगार के नए अवसर उत्पन्न होते हैं।
विपक्ष में तर्क (फूलों की खेती के विरोध में):
1. अन्न और सब्जी उत्पादन कम होने से खाद्य सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है।
2. देश की जनसंख्या को पोषण के लिए अन्न की आवश्यकता है, फूलों की नहीं।
3. फूलों की खेती बाजार की माँग पर निर्भर है—माँग घटने पर किसान को नुकसान होगा।
4. कृषि भूमि का उपयोग खाद्यान्न उत्पादन के लिए होना चाहिए।
निष्कर्ष: दोनों पक्षों के तर्कों को सुनकर एक संतुलित नीति बनाई जानी चाहिए—जिसमें खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए फूलों की खेती को भी प्रोत्साहन दिया जाए।
4हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इस पाठ की तरह ही वनस्पतियों के संदर्भ में कई व्यक्तित्व व्यंजक ललित निबंध और भी लिखे हैं—कुटज, आम फिर बौरा गए, अशोक के फूल, देवदारु आदि। शिक्षक की सहायता से इन्हें ढूँढ़िए और पढ़िए।Show solution
यह एक स्वाध्याय-आधारित गतिविधि है। विद्यार्थियों को निम्नलिखित निबंधों को पढ़ने का प्रयास करना चाहिए—
1. कुटज — इसमें द्विवेदी जी ने कुटज (एक पहाड़ी पौधे) के माध्यम से जीवन की कठिनाइयों में भी अपनी पहचान बनाए रखने का संदेश दिया है।
2. आम फिर बौरा गए — इसमें आम के बौराने के माध्यम से जीवन की नवीनता और उत्साह का वर्णन है।
3. अशोक के फूल — इसमें अशोक वृक्ष के सांस्कृतिक और साहित्यिक महत्व का वर्णन है।
4. देवदारु — इसमें देवदार वृक्ष के माध्यम से जीवन-दर्शन प्रस्तुत किया गया है।
विशेषता: इन सभी निबंधों में द्विवेदी जी ने वनस्पतियों को केवल प्रकृति के रूप में नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया है। इन्हें पढ़कर विद्यार्थी उनकी ललित निबंध-शैली और प्रकृति-प्रेम को समझ सकते हैं।
5द्विवेदी जी की वनस्पतियों में ऐसी रुचि का क्या कारण हो सकता है? आज साहित्यिक रचना-फलक पर प्रकृति की उपस्थिति न्यून से न्यून होती जा रही है। तब ऐसी रचनाओं का महत्व बढ़ गया है। प्रकृति के प्रति आपका दृष्टिकोण रुचिपूर्ण है या उपेक्षामय? इसका मूल्यांकन करें।Show solution
द्विवेदी जी की वनस्पतियों में रुचि के कारण:
1. संस्कृत साहित्य का प्रभाव: द्विवेदी जी संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे। संस्कृत साहित्य में प्रकृति का विस्तृत वर्णन है। इससे उनमें वनस्पतियों के प्रति गहरी रुचि जागी।
2. ग्रामीण परिवेश: उनका बचपन प्रकृति के करीब बीता। इससे वनस्पतियों से उनका गहरा लगाव था।
3. दार्शनिक दृष्टि: वे प्रकृति में जीवन-दर्शन देखते थे। प्रत्येक वनस्पति उनके लिए एक प्रतीक थी।
4. मानवीय संदेश: वे वनस्पतियों के माध्यम से मानवीय जीवन को समझाना चाहते थे।
आज प्रकृति-साहित्य का महत्व:
आज जब साहित्य में प्रकृति की उपस्थिति कम हो रही है और मनुष्य प्रकृति से दूर होता जा रहा है, तब ऐसी रचनाएँ और भी महत्वपूर्ण हो जाती हैं। ये रचनाएँ हमें प्रकृति से जोड़ती हैं और पर्यावरण के प्रति सचेत करती हैं।
प्रकृति के प्रति दृष्टिकोण (स्वमूल्यांकन):
प्रकृति के प्रति रुचिपूर्ण दृष्टिकोण ही उचित है। प्रकृति हमारी माँ है—वह हमें जीवन देती है, भोजन देती है, सौंदर्य देती है। उपेक्षामय दृष्टिकोण न केवल पर्यावरण के लिए हानिकारक है, बल्कि हमारी आत्मा को भी रूखा बना देता है। प्रकृति से जुड़ाव मनुष्य को संवेदनशील और जीवंत बनाता है।
भाषा की बात
1'दस दिन फूले और फिर खंखड़-खंखड़' इस लोकोक्ति से मिलते-जुलते कई वाक्यांश पाठ में हैं। उन्हें छाँट कर लिखें।Show solution
पाठ 'शिरीष के फूल' में निम्नलिखित वाक्यांश इस लोकोक्ति से मिलते-जुलते हैं—
1. 'जमे कि मरे' — यह वाक्यांश बताता है कि जो जड़ हो गया, वह नष्ट हो गया। यह 'खंखड़-खंखड़' होने की स्थिति को व्यक्त करता है।
2. 'फूलों को मार डालो' — पुराने फलों के खोखे नए फूलों को जगह नहीं देते—यह भी उसी भाव को व्यक्त करता है।
3. 'हिलते-डुलते रहो, स्थान बदलते रहो' — यह वाक्यांश 'दस दिन फूले' की स्थिति से बचने का उपाय बताता है।
4. 'कालदेवता की आँख बचा पाएँगे' — यह वाक्यांश भी उसी भाव का है कि काल से कोई नहीं बच सकता।
5. 'अवसर चूकना' — जो समय पर नहीं चला, वह पीछे रह गया—यह भी उसी लोकोक्ति का भाव है।
6. 'कोड़े की मार' — काल की मार से बचने का संदर्भ भी इसी भाव से जुड़ा है।
विशेष: इन सभी वाक्यांशों में यह भाव है कि जीवन क्षणभंगुर है और जो समय के साथ नहीं चलता, वह नष्ट हो जाता है—ठीक उसी प्रकार जैसे 'दस दिन फूलकर खंखड़-खंखड़' हो जाना।
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