हरिद्वार
CBSE · Class 8 · Hindi
NCERT Solutions for हरिद्वार — CBSE Class 8 Hindi.
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मेरी समझ से — (क) बहुविकल्पीय प्रश्न
1"सज्जन ऐसे कि पत्थर मारने से फल देते हैं" का क्या अर्थ है?Show solution
स्पष्टीकरण: लेखक यहाँ वृक्षों की उदारता का वर्णन कर रहे हैं। जिस प्रकार सज्जन व्यक्ति बुरा व्यवहार किए जाने पर भी भला करते हैं, उसी प्रकार फलदार वृक्ष पत्थर मारने पर भी फल देते हैं। यह एक मानवीकरण (personification) है जिसमें वृक्षों की उदारता को सज्जनता से जोड़ा गया है।
2"वैराग्य और भक्ति का उदय होता था" इस कथन से लेखक का कौन-सा भाव प्रकट होता है?Show solution
स्पष्टीकरण: हरिद्वार की पवित्र भूमि, गंगा का पावन जल और प्राकृतिक वातावरण लेखक के मन में वैराग्य और भक्ति जगाते थे। यह मानसिक शांति और आध्यात्मिक अनुभव का प्रतीक है, न कि शारीरिक थकान या आर्थिक संतोष का।
3"पत्थर पर का भोजन का सुख सोने की थाल से बढ़कर था" इस वाक्य का सर्वाधिक उपयुक्त निष्कर्ष क्या है?Show solution
स्पष्टीकरण: लेखक यह बताना चाहते हैं कि सुख वस्तुओं की कीमत या भव्यता में नहीं, बल्कि मन की संतुष्टि और परिस्थितियों में होता है। गंगा के तट पर पत्थर पर बैठकर किया गया साधारण भोजन सोने की थाल में परोसे गए भोजन से अधिक सुखद था क्योंकि वहाँ मन प्रसन्न और संतुष्ट था।
4"एक दिन मैंने श्री गंगा जी के तट पर रसोई करके पत्थर ही पर जल के अत्यंत निकट परोसकर भोजन किया।" यह प्रसंग किस मूल्य को बढ़ावा देता है?Show solution
★ स्वच्छता और प्रकृति प्रेम
स्पष्टीकरण: इस प्रसंग में दो मूल्य प्रकट होते हैं। पहला — लेखक ने स्वयं रसोई बनाई और पत्थर पर भोजन किया, जो सादगी और आत्मनिर्भरता को दर्शाता है। दूसरा — गंगा के तट पर प्रकृति के निकट भोजन करना प्रकृति प्रेम को दर्शाता है।
5लेखक का हरिद्वार अनुभव मुख्यत: किस प्रकार का था?Show solution
★ प्राकृतिक
स्पष्टीकरण: लेखक का हरिद्वार अनुभव मुख्यतः आध्यात्मिक और प्राकृतिक था। उन्होंने गंगा स्नान, भागवत पारायण, वैराग्य और भक्ति के उदय का वर्णन किया है (आध्यात्मिक अनुभव), साथ ही पर्वतों, वृक्षों, पक्षियों और नदी की सुंदरता का भी विस्तृत वर्णन किया है (प्राकृतिक अनुभव)।
6पत्र की भाषा का एक मुख्य लक्षण क्या है?Show solution
स्पष्टीकरण: भारतेंदु हरिश्चंद्र ने इस पत्र में सरल, स्वाभाविक और चित्रात्मक भाषा का प्रयोग किया है। उन्होंने दृश्यों का इतना सजीव वर्णन किया है कि पाठक के मन में हरिद्वार का चित्र उभर आता है। भाषा न तो बोझिल है, न ही अत्यधिक कठिन।
मेरी समझ से — (ख) समूह चर्चा
खहो सकता है कि आपके समूह के साथियों ने अलग-अलग उत्तर चुने हों। अपने मित्रों के साथ चर्चा कीजिए कि आपने ये उत्तर ही क्यों चुने?Show solution
1. प्रत्येक विद्यार्थी अपने चुने हुए उत्तर का कारण बताए।
2. पाठ से प्रमाण देकर अपने उत्तर को सही सिद्ध करें।
3. यदि किसी प्रश्न के एक से अधिक सही उत्तर हों, तो उन सभी पर विचार करें।
4. दूसरे साथियों के तर्कों को ध्यान से सुनें और उन पर विचार करें।
उदाहरण: प्रश्न 4 में 'सादगी और आत्मनिर्भरता' तथा 'स्वच्छता और प्रकृति प्रेम' — दोनों उत्तर सही हो सकते हैं। इस पर समूह में चर्चा करें।
मिलकर करें मिलान
1पाठ से चुनकर दिए गए शब्दों का उनके उपयुक्त संदर्भों से मिलान कीजिए।Show solution
1. हरिद्वार → 3. यह भारत के उत्तराखंड राज्य में स्थित एक प्रसिद्ध तीर्थस्थान है। यहाँ से गंगा पहाड़ों को छोड़कर मैदान में आती है।
2. गंगा → 5. यह भारतवर्ष की एक प्रधान नदी है जो हिमालय से निकलकर लगभग 1560 मील पूर्व की ओर बहकर बंगाल की खाड़ी में गिरती है। इसके अनेक नाम हैं, जैसे— भागीरथी, त्रिपथगा, अलकनंदा, मंदाकिनी, सुरनदी आदि।
3. भगीरथ → 6. ये अयोध्या के प्रसिद्ध सूर्यवंशी राजा थे। कहा जाता है कि ये घोर तपस्या करके गंगा को पृथ्वी पर लाए थे। इसीलिए गंगा का एक नाम 'भागीरथी' भी है।
4. चण्डका → 1. मान्यताओं के अनुसार दुर्गा का एक रूप।
5. भागवत → 2. यह अठारह पुराणों में से सर्वप्रसिद्ध एक पुराण है। इसमें अधिकांश श्री कृष्ण संबंधी कथाएँ हैं।
6. दालचीनी → 4. यह एक पेड़ का नाम है। यह दक्षिण भारत में बहुतायत से मिलता है। इस पेड़ की सुगंधित छाल दवा और मसाले के काम में आती है। इसे दारचीनी भी कहते हैं।
मिलकर करें चयन — (क) उपयुक्त निष्कर्ष
1पर्वतों पर अनेक प्रकार की वल्ली हरी-भरी सज्जनों के शुभ मनोरथों की भाँति फैलकर लहलहा रही है।Show solution
स्पष्टीकरण: लेखक यहाँ लताओं की सुंदरता और सौम्यता की तुलना सज्जनों की शुभ इच्छाओं से कर रहे हैं। दोनों में सौम्यता, सुंदरता और विस्तार का भाव है। दूसरा निष्कर्ष भ्रामक है क्योंकि वह उपमा को उलट देता है।
2बड़े-बड़े वृक्ष भी ऐसे खड़े हैं मानो एक पैर से खड़े तपस्या करते हैं और साधुओं की भाँति घाम, ओस और वर्षा अपने ऊपर सहते हैं।Show solution
स्पष्टीकरण: लेखक वृक्षों की स्थिरता और सहनशीलता की तुलना तपस्वी साधुओं से कर रहे हैं। साधु स्वेच्छा से कठिनाइयाँ सहते हैं, विवश होकर नहीं। अतः 'विवश' वाला निष्कर्ष भ्रामक है।
3इन वृक्षों पर अनेक रंग के पक्षी चहचहाते हैं और नगर के दुष्ट बधिकों से निडर होकर कल्लोल करते हैं।Show solution
स्पष्टीकरण: हरिद्वार की पवित्र भूमि पर पक्षी सुरक्षित हैं क्योंकि यहाँ शिकारी (बधिक) नहीं आते। इसलिए वे निडर होकर कल्लोल करते हैं। दूसरा निष्कर्ष भ्रामक है — पक्षी डरकर नहीं, बल्कि सुरक्षित होने के कारण यहाँ हैं।
4जल यहाँ का अत्यंत शीतल है और मिट्ट भी वैसा ही है मानो चीनी के पने को बरफ में जमाया है।Show solution
स्पष्टीकरण: लेखक गंगाजल की शीतलता और मिठास का काव्यात्मक वर्णन कर रहे हैं। 'चीनी के पने को बरफ में जमाना' एक उपमा है जो जल की ठंडक और मिठास को दर्शाती है। दूसरा निष्कर्ष व्यावहारिक रूप से भ्रामक है।
5एक दिन मैंने श्री गंगा जी के तट पर रसोई करके पत्थर ही पर जल के अत्यंत निकट परोसकर भोजन किया।Show solution
स्पष्टीकरण: लेखक ने गंगा के तट पर स्वयं भोजन बनाया और प्रकृति के निकट बैठकर खाया। यह उनके प्रकृति-प्रेम और सादगी को दर्शाता है। पहला निष्कर्ष पूर्णतः भ्रामक है।
6निश्चय है कि आप इस पत्र को स्थानदान दीजिएगा।Show solution
स्पष्टीकरण: 'स्थानदान' का अर्थ है — पत्र को अपनी पत्रिका में स्थान देना अर्थात प्रकाशित करना। लेखक संपादक से विनम्र निवेदन कर रहे हैं कि वे इस पत्र को अपनी पत्रिका 'कविवचन सुधा' में प्रकाशित करें। दोनों निष्कर्ष लगभग सही हैं, किंतु पहला अधिक व्यापक है।
पंक्तियों पर चर्चा
क"यहाँ की कुशा सबसे विलक्षण होती है जिसमें से दालचीनी, जावित्री इत्यादि की अच्छी सुगंध आती है। मानो यह प्रत्यक्ष प्रगट होता है कि यह ऐसी पुण्यभूमि है कि यहाँ की घास भी ऐसी सुगंधमय है।" — इन पंक्तियों का अर्थ लिखिए।Show solution
लेखक हरिद्वार की पवित्रता और विशेषता का वर्णन करते हुए कह रहे हैं कि यहाँ की कुशा (एक प्रकार की पवित्र घास जो धार्मिक कार्यों में प्रयुक्त होती है) अत्यंत विलक्षण है। इस घास से दालचीनी और जावित्री जैसी सुगंधित मसालों की खुशबू आती है।
लेखक इसे हरिद्वार की पुण्यभूमि का प्रमाण मानते हैं। उनका भाव यह है कि जो भूमि इतनी पवित्र हो, उसकी साधारण घास भी असाधारण सुगंध से भरी होती है। यह पंक्तियाँ हरिद्वार की भूमि के प्रति लेखक की गहरी श्रद्धा और आस्था को व्यक्त करती हैं।
ख"अहा! इनके जन्म भी धन्य हैं जिनसे अर्थी विमुख जाते ही नहीं। फल, फूल, गंध, छाया, पत्ते, छाल, बीज, लकड़ी और जड़; यहाँ तक कि जले पर भी कोयले और राख से लोगों का मनोर्थ पूर्ण करते हैं।" — इन पंक्तियों का अर्थ लिखिए।Show solution
लेखक वृक्षों की परोपकारिता की प्रशंसा करते हुए कह रहे हैं कि वृक्षों का जन्म धन्य है क्योंकि उनके पास जो भी माँगने आता है, वह खाली हाथ नहीं लौटता।
वृक्ष अपने जीवन के हर अंग से मनुष्य की सेवा करते हैं:
- फल — भोजन के लिए
- फूल — सुंदरता और पूजा के लिए
- गंध — सुगंध के लिए
- छाया — विश्राम के लिए
- पत्ते — औषधि और भोजन के लिए
- छाल — दवा और मसाले के लिए
- बीज — नए पौधे उगाने के लिए
- लकड़ी — ईंधन और निर्माण के लिए
- जड़ — औषधि के लिए
- और जलने के बाद भी कोयले और राख से मनुष्य का काम आते हैं।
ये पंक्तियाँ वृक्षों के निःस्वार्थ परोपकार का सुंदर चित्रण हैं और हमें प्रेरणा देती हैं कि हम भी वृक्षों की तरह दूसरों के काम आएँ।
सोच-विचार के लिए
क"और संपादक महाशय, मैं चित्त से तो अब तक वहीं निवास करता हूँ..." — लेखक का यह वाक्य क्या दर्शाता है? क्या आपने कभी किसी स्थान को छोड़कर ऐसा अनुभव किया है?Show solution
यह वाक्य लेखक के हरिद्वार के प्रति गहरे लगाव और आत्मीयता को व्यक्त करता है। हरिद्वार से शारीरिक रूप से लौट आने के बाद भी उनका मन वहीं रमा हुआ है। वे हरिद्वार की पवित्रता, प्राकृतिक सुंदरता और आध्यात्मिक वातावरण को भुला नहीं पाए हैं।
यह भाव दर्शाता है कि कुछ स्थान हमारे मन पर इतनी गहरी छाप छोड़ते हैं कि हम वहाँ से लौटने के बाद भी उन्हीं के बारे में सोचते रहते हैं।
व्यक्तिगत अनुभव (उदाहरण के रूप में):
जब हम किसी पहाड़ी स्थान, नानी-दादी के घर, या किसी प्रिय स्थान से लौटते हैं, तो कई दिनों तक उसी की यादें मन में घूमती रहती हैं। जैसे — किसी विद्यार्थी ने यदि शिमला या मनाली की यात्रा की हो, तो वहाँ की बर्फ, पहाड़ और ठंडी हवा की यादें लंबे समय तक मन में बनी रहती हैं।
ख"पंडे भी यहाँ बड़े विलक्षण संतोषी हैं। एक पैसे को लाख करके मान लेते हैं।" — लेखक का यह कथन आज के समाज में कितना सच है?Show solution
लेखक कह रहे हैं कि हरिद्वार के पंडे (पुजारी) अत्यंत संतोषी हैं। वे थोड़े में भी संतुष्ट रहते हैं और एक पैसे को भी लाख के बराबर मानकर कृतज्ञ रहते हैं।
आज के संदर्भ में विचार:
आज के समाज में यह कथन पूरी तरह सच नहीं है। आज अधिकांश तीर्थस्थानों पर पंडे और पुजारी अधिक धन की माँग करते हैं। पर्यटकों और श्रद्धालुओं से अनुचित शुल्क लिया जाता है।
हालाँकि, आज भी समाज में कुछ संतोषी लोग मिलते हैं:
- गाँव के किसान जो थोड़ी फसल में भी संतुष्ट रहते हैं।
- कुछ सेवाभावी शिक्षक जो कम वेतन में भी पूरी लगन से पढ़ाते हैं।
- समाजसेवी जो बिना किसी लाभ के दूसरों की सेवा करते हैं।
निष्कर्ष: संतोष एक दुर्लभ गुण है जो आज भी कुछ लोगों में मिलता है, परंतु भौतिकवादी युग में यह कम होता जा रहा है।
ग"मैं दीवान कृपा राम के घर के ऊपर के बंगले पर टिका था। यह स्थान भी उस क्षेत्र में टिकने योग्य ही है।" — आपके विचार से लेखक ने उस स्थान को 'टिकने योग्य' क्यों कहा है?Show solution
1. प्राकृतिक सौंदर्य: बंगला ऊँचाई पर स्थित था, जहाँ से हरे-भरे पर्वतों और गंगा का सुंदर दृश्य दिखाई देता होगा।
2. शांत वातावरण: हरिद्वार की पवित्र भूमि पर स्थित होने के कारण वहाँ का वातावरण शांत और आध्यात्मिक रहा होगा।
3. स्वच्छ वायु: ऊँचाई पर स्थित होने से वहाँ शुद्ध और शीतल वायु मिलती होगी।
4. आध्यात्मिक महत्व: हरिद्वार जैसे तीर्थ क्षेत्र में रहना स्वयं में एक विशेष अनुभव है।
5. सुविधाजनक स्थिति: दीवान कृपा राम के घर का बंगला होने से वहाँ रहने की उचित व्यवस्था भी रही होगी।
निष्कर्ष: 'टिकने योग्य' केवल आराम और सुविधा के कारण नहीं, बल्कि प्राकृतिक सौंदर्य, आध्यात्मिक वातावरण और मानसिक शांति के कारण भी था।
घ"फल, फूल, गंध, छाया, पत्ते, छाल, बीज, लकड़ी और जड़; यहाँ तक कि जले पर भी कोयले और राख से लोगों का मनोर्थ पूर्ण करते हैं।" — इस वाक्य से वृक्षों के महत्व के बारे में कौन-कौन सी बातें सूझती हैं?Show solution
1. भोजन का स्रोत: वृक्षों के फल हमें पोषण देते हैं।
2. सौंदर्य और पूजा: फूल सुंदरता बढ़ाते हैं और धार्मिक कार्यों में उपयोगी हैं।
3. सुगंध: वृक्षों की गंध वातावरण को सुगंधित और स्वास्थ्यवर्धक बनाती है।
4. विश्राम: छाया में थके-हारे यात्री विश्राम करते हैं।
5. औषधि: पत्ते, छाल और जड़ें अनेक रोगों की दवा बनाने में काम आती हैं।
6. मसाले और खाद्य पदार्थ: छाल (जैसे दालचीनी) मसाले के रूप में उपयोगी है।
7. नए पौधे: बीजों से नए वृक्ष उगते हैं, जिससे वनों का विस्तार होता है।
8. निर्माण और ईंधन: लकड़ी घर बनाने और ईंधन के काम आती है।
9. मृत्यु के बाद भी उपयोगी: जलने के बाद कोयला और राख भी उपयोगी हैं।
सार: वृक्ष जन्म से मृत्यु तक, हर अवस्था में मनुष्य के काम आते हैं। इसीलिए वृक्षों को 'परोपकारी' कहा जाता है।
अनुमान और कल्पना से
क"यह भूमि तीन ओर सुंदर हरे-हरे पर्वतों से घिरी है।" — कल्पना कीजिए कि आप हरिद्वार में हैं। आप वहाँ क्या-क्या करना चाहेंगे?Show solution
1. गंगा स्नान: सबसे पहले हरि की पैड़ी पर जाकर पवित्र गंगा में स्नान करता/करती।
2. हर की पैड़ी की गंगा आरती: संध्याकाल में गंगा आरती देखता/देखती जो अत्यंत मनोरम होती है।
3. प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद: हरे-भरे पर्वतों के बीच घूमता/घूमती और प्रकृति की सुंदरता का आनंद लेता/लेती।
4. गंगा के तट पर बैठना: पत्थरों पर बैठकर गंगा की शीतल लहरों का स्पर्श अनुभव करता/करती।
5. ध्यान और योग: इस पवित्र भूमि पर ध्यान लगाता/लगाती।
6. स्थानीय भोजन: यहाँ के प्रसिद्ध भोजन का आनंद लेता/लेती।
7. मंदिर दर्शन: मनसा देवी और चंडी देवी मंदिर के दर्शन करता/करती।
ख"जल के छलके पास ही ठंडे-ठंडे आते थे।" — कल्पना कीजिए कि आप गंगा के तट पर हैं और पानी के छींटे आपके मुँह पर आ रहे हैं। अपने अनुभवों को अपनी कल्पना से लिखिए।Show solution
मैं गंगा के तट पर एक बड़े पत्थर पर बैठा/बैठी हूँ। सामने गंगा की धारा तेज़ी से बह रही है। पानी का रंग नीला-हरा है और उसमें सूर्य की किरणें चमक रही हैं।
अचानक एक बड़ी लहर आती है और उसके छींटे मेरे चेहरे पर पड़ते हैं। ओह! कितना ठंडा और ताज़ा पानी है! जैसे किसी ने बर्फ के टुकड़े मेरे गालों पर रख दिए हों। मेरी आँखें बंद हो जाती हैं और मन में एक अजीब-सी शांति छा जाती है।
पानी की बूँदें मेरे होठों पर आती हैं — हल्की-सी मिठास है उनमें। चारों ओर से पानी की कलकल ध्वनि सुनाई दे रही है। पहाड़ों से आती शीतल हवा और गंगाजल के छींटे मिलकर ऐसा अनुभव देते हैं जैसे सारी थकान और चिंताएँ बह गई हों।
मन करता है कि यहीं बैठा/बैठी रहूँ, घंटों, दिनों तक।
ग"सज्जन ऐसे कि पत्थर मारने से फल देते हैं।" — यदि पेड़-पौधे सच में मनुष्यों की तरह व्यवहार करने लगें तो क्या होगा?Show solution
कल्पनात्मक परिदृश्य:
1. यदि पेड़ बोलने लगें: वे हमसे कहेंगे — "हमें मत काटो, हम तुम्हें छाया और फल देते हैं।"
2. यदि पेड़ चलने लगें: वे प्रदूषित स्थानों से दूर भाग जाएँगे और स्वच्छ स्थानों पर जाकर रहेंगे।
3. यदि पेड़ भावनाएँ व्यक्त करें: जब कोई उन्हें काटने आएगा, वे रोएँगे और विरोध करेंगे।
4. यदि पेड़ माँग करने लगें: वे कहेंगे — "हमें पानी दो, हमारी देखभाल करो, तभी हम फल देंगे।"
5. मज़ेदार स्थिति: आम का पेड़ कहेगा — "मुझे पत्थर मत मारो, मैं खुद फल दूँगा जब पकेंगे!"
निष्कर्ष: यदि पेड़ मनुष्यों की तरह व्यवहार करते, तो शायद हम उनकी भावनाओं को समझकर उनकी अधिक देखभाल करते और पर्यावरण का विनाश नहीं होता।
घ"यहाँ पर श्री गंगा जी दो धारा हो गई हैं— एक का नाम नील धारा, दूसरी श्री गंगा जी ही के नाम से।" — इस पाठ में 'गंगा' शब्द के साथ 'श्री' और 'जी' लगाया गया है। आपके अनुसार उन्होंने ऐसा क्यों किया होगा?Show solution
1. श्रद्धा और आदर: लेखक भारतेंदु हरिश्चंद्र गंगा को केवल एक नदी नहीं, बल्कि एक देवी के रूप में मानते थे। 'श्री' और 'जी' आदर और श्रद्धा के प्रतीक हैं।
2. धार्मिक मान्यता: हिंदू धर्म में गंगा को 'गंगा माता' या 'देवनदी' माना जाता है। इसलिए उनके नाम के साथ सम्मानसूचक शब्द लगाना स्वाभाविक है।
3. सांस्कृतिक परंपरा: भारतीय संस्कृति में पवित्र नदियों, देवी-देवताओं और बड़े-बुजुर्गों के नाम के साथ 'जी' या 'श्री' लगाने की परंपरा है।
4. भावनात्मक जुड़ाव: लेखक का गंगा से गहरा भावनात्मक और आध्यात्मिक जुड़ाव था, इसलिए वे उन्हें सम्मान देते हुए 'श्री गंगा जी' लिखते हैं।
5. आदरार्थ बहुवचन: जैसे बड़ों के लिए 'आप' का प्रयोग होता है, वैसे ही गंगा के लिए 'जी' का प्रयोग उनके प्रति आदर दर्शाता है।
डकल्पना कीजिए कि आप हरिद्वार एक श्रवणबाधित या दृष्टिबाधित व्यक्ति के साथ गए हैं। उसकी यात्रा को अच्छा बनाने के लिए कुछ सुझाव दीजिए।Show solution
1. सांकेतिक भाषा (Sign Language) का उपयोग करें या लिखकर जानकारी दें।
2. दृश्य जानकारी — नक्शे, चित्र और लिखित निर्देश उपलब्ध कराएँ।
3. गंगा आरती के दौरान उन्हें आगे की पंक्ति में बैठाएँ ताकि वे दृश्य का पूरा आनंद ले सकें।
4. कंपन (vibration) के माध्यम से संगीत का अनुभव कराएँ।
5. हर स्थान पर लिखित सूचनाएँ और संकेत बोर्ड हों।
दृष्टिबाधित व्यक्ति के लिए सुझाव:
1. उनका हाथ थामकर या बाँह पकड़कर सुरक्षित मार्गदर्शन करें।
2. गंगाजल का स्पर्श, उसकी शीतलता और ध्वनि का अनुभव कराएँ।
3. फूलों की सुगंध, पत्थरों की बनावट और वातावरण की ध्वनियों का वर्णन करें।
4. ऑडियो गाइड की व्यवस्था करें।
5. घाट की सीढ़ियों पर सावधानी से चलाएँ और हर कदम पर सूचित करें।
6. प्रसाद और भोजन का स्वाद और सुगंध बताएँ।
सामान्य सुझाव: धैर्य रखें, जल्दबाज़ी न करें और उनकी आवश्यकताओं को प्राथमिकता दें।
लिखें संवाद
क"मेरे संग कल्लू जी मित्र भी परमानंदी थे।" — लेखक और कल्लू जी के बीच हरिद्वार यात्रा पर एक काल्पनिक संवाद लिखिए।Show solution
लेखक: कल्लू जी, देखिए! ये हरे-भरे पर्वत कितने सुंदर लग रहे हैं। मन प्रसन्न हो गया।
कल्लू जी: सच कह रहे हैं आप! ऐसा लग रहा है जैसे स्वर्ग में आ गए हों। और यह गंगा की कलकल ध्वनि — कितनी मधुर है!
लेखक: मित्र, मैं तो इस पुण्यभूमि का वर्णन करने में असमर्थ हूँ। यहाँ आते ही मन शुद्ध हो जाता है।
कल्लू जी: हाँ, और देखिए — ये वृक्ष कितने उदार हैं! पत्थर मारने पर भी फल देते हैं। सच्चे सज्जन हैं ये!
लेखक: आज मैं गंगा के तट पर ही रसोई बनाकर भोजन करूँगा। क्या आप भी साथ चलेंगे?
कल्लू जी: अवश्य! पत्थर पर बैठकर गंगा के किनारे भोजन करने का सुख तो सोने की थाल से भी बढ़कर होगा।
लेखक: बिल्कुल सही कहा। आज रात ग्रहण भी है। गंगा स्नान का पुण्य मिलेगा।
कल्लू जी: तो फिर देर किस बात की! चलिए, पहले हरि की पैड़ी पर स्नान करते हैं।
ख"यह भूमि तीन ओर सुंदर हरे-हरे पर्वतों से घिरी है।" — लेखक और प्रकृति के बीच एक कल्पनात्मक संवाद तैयार कीजिए — जैसे पर्वत बोल रहे हों।Show solution
लेखक: (पर्वतों को देखकर) अहा! आप कितने विशाल और सुंदर हैं! आपकी हरियाली देखकर मन प्रसन्न हो जाता है।
पर्वत: (गंभीर स्वर में) आओ, यात्री! हम युगों से यहाँ खड़े हैं। न धूप से डरते हैं, न वर्षा से। हम साधुओं की भाँति तपस्या करते हैं।
लेखक: आपकी लताएँ और वृक्ष कितने सुंदर हैं! ये हरी-भरी वल्लियाँ सज्जनों के शुभ मनोरथों की तरह फैली हुई हैं।
पर्वत: हाँ, हम अपनी गोद में गंगा को धारण करते हैं। हमारी छाया में पक्षी निडर होकर कल्लोल करते हैं।
लेखक: आपके पास आकर मन में वैराग्य और भक्ति का उदय होता है।
पर्वत: यही हमारा उपहार है। जो भी यहाँ आता है, शांति और पवित्रता लेकर जाता है। हम सदा यहाँ रहेंगे — तुम्हारी प्रतीक्षा में।
लेखक: मैं जाऊँगा, पर मेरा चित्त यहीं रहेगा।
'है' और 'हैं' का उपयोग — आदरार्थ बहुवचन
1प्रधानाचार्य जी विद्यालय में नहीं ______________, वे अभी सभा में उपस्थित ______________।Show solution
स्पष्टीकरण: 'प्रधानाचार्य जी' एकवचन हैं, परंतु आदर प्रकट करने के लिए आदरार्थ बहुवचन 'हैं' का प्रयोग किया गया है।
2माता-पिता हमारे जीवन के मार्गदर्शक होते ______________, हमें उनका कहना मानना चाहिए।Show solution
स्पष्टीकरण: 'माता-पिता' बहुवचन हैं, अतः 'हैं' का प्रयोग उचित है।
3मेरी बहन बाजार जा रही ______________ वहाँ से किताबें ले आएगी।Show solution
स्पष्टीकरण: 'बहन' एकवचन है और यहाँ आदरार्थ बहुवचन की आवश्यकता नहीं है (छोटी बहन के लिए), अतः 'है' का प्रयोग होगा।
4बाहर फेरीवाला ______________ ______________ | ______________ बुला लाओ।Show solution
स्पष्टीकरण: 'फेरीवाला' सामान्य व्यक्ति है, आदरार्थ बहुवचन की आवश्यकता नहीं, अतः 'है' और 'उसे' का प्रयोग होगा।
5डाकिया जी आए ______________। उन्हें भी बुला लाओ।Show solution
स्पष्टीकरण: 'डाकिया जी' — 'जी' लगाने से आदर प्रकट होता है, अतः आदरार्थ बहुवचन 'हैं' का प्रयोग होगा।
6आप तो बहुत दिन बाद ______________, ______________ का स्वागत है।Show solution
स्पष्टीकरण: 'आप' आदरसूचक सर्वनाम है, अतः 'हैं' और 'आपका' का प्रयोग होगा।
7डॉक्टर साहब बहुत विद्वान ______________, ______________ से परामर्श लेना चाहिए।Show solution
स्पष्टीकरण: 'डॉक्टर साहब' — 'साहब' आदरसूचक शब्द है, अतः आदरार्थ बहुवचन 'हैं' और 'उनसे' का प्रयोग होगा।
8आपके माता-पिता कहाँ ______________? क्या मैं ______________ से मिल सकता हूँ?Show solution
स्पष्टीकरण: 'माता-पिता' बहुवचन हैं और आदरणीय हैं, अतः 'हैं' और 'उनसे' का प्रयोग होगा।
9ये हमारे हिंदी के अध्यापक ______________, हम ______________ से बहुत-कुछ सीखते-समझते हैं।Show solution
स्पष्टीकरण: 'अध्यापक' आदरणीय हैं और 'ये' बहुवचन संकेत करता है, अतः 'हैं' और 'उनसे' का प्रयोग होगा।
10बंदर पेड़ पर उछल-कूद कर ______________ ______________।Show solution
स्पष्टीकरण: 'बंदर' यहाँ बहुवचन में प्रयुक्त है (अनेक बंदर), अतः 'हैं' का प्रयोग होगा। यहाँ आदरार्थ बहुवचन नहीं है।
भावों की पहचान
1उस समय के पत्थर पर का भोजन का सुख सोने की थाल के भोजन से कहीं बढ़ के था।Show solution
स्पष्टीकरण: लेखक को गंगा के तट पर पत्थर पर बैठकर किया गया साधारण भोजन सोने की थाल के भोजन से अधिक सुखद लगा। यह संतोष का भाव है — जब मन संतुष्ट हो तो साधारण वस्तु भी असाधारण सुख देती है।
2चित्त में बारंबार ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का उदय होता था।Show solution
स्पष्टीकरण: हरिद्वार की पवित्र भूमि पर लेखक के मन में बार-बार सांसारिक मोह से विरक्ति (वैराग्य) और ईश्वर के प्रति समर्पण (भक्ति) का भाव उत्पन्न होता था।
3पंडे भी यहाँ बड़े विलक्षण संतोषी हैं।Show solution
स्पष्टीकरण: लेखक हरिद्वार के पंडों की संतोषी प्रवृत्ति की प्रशंसा कर रहे हैं। वे थोड़े में भी संतुष्ट रहते हैं — यह संतोष का भाव है।
4हर तरफ पवित्रता और प्रसन्नता बिखरी हुई थी।Show solution
स्पष्टीकरण: हरिद्वार के वातावरण में चारों ओर पवित्रता और प्रसन्नता का अनुभव लेखक को मानसिक शांति और आनंद दे रहा था।
5सज्जन ऐसे कि पत्थर मारने से फल देते हैं।Show solution
स्पष्टीकरण: वृक्षों की उदारता की तुलना सज्जनों से की गई है। जैसे सज्जन व्यक्ति बुरा व्यवहार किए जाने पर भी भला करते हैं, वैसे ही वृक्ष पत्थर मारने पर भी फल देते हैं — यह परोपकार का भाव है।
काल की पहचान — (क)
1निश्चय है कि आप इस पत्र को स्थानदान दीजिएगा।Show solution
स्पष्टीकरण: 'दीजिएगा' क्रिया भविष्य में होने वाली क्रिया को दर्शाती है। लेखक संपादक से भविष्य में पत्र प्रकाशित करने का निवेदन कर रहे हैं।
2यह भूमि तीन ओर सुंदर हरे-हरे पर्वतों से घिरी है।Show solution
स्पष्टीकरण: 'घिरी है' क्रिया वर्तमान में हो रही स्थिति को दर्शाती है।
3वृक्ष ऐसे हैं कि पत्थर मारने से फल देते हैं।Show solution
स्पष्टीकरण: 'हैं' और 'देते हैं' — दोनों क्रियाएँ वर्तमान काल में हैं।
4चित्त में बारंबार ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का उदय होता था।Show solution
स्पष्टीकरण: 'होता था' क्रिया भूतकाल में बार-बार होने वाली क्रिया (अपूर्ण भूतकाल / सामान्य भूतकाल) को दर्शाती है।
5मैं दीवान कृपा राम के घर के ऊपर के बंगले पर टिका था।Show solution
स्पष्टीकरण: 'टिका था' क्रिया भूतकाल में हुई क्रिया को दर्शाती है।
काल की पहचान — (ख) काल परिवर्तन
1"निश्चय है कि आप इस पत्र को स्थानदान दीजिएगा।" — इस वाक्य के काल को अन्य कालों में बदलकर लिखिए।Show solution
वर्तमान काल में: निश्चय है कि आप इस पत्र को स्थानदान दे रहे हैं।
भूतकाल में: निश्चय था कि आपने इस पत्र को स्थानदान दिया था।
2"यह भूमि तीन ओर सुंदर हरे-हरे पर्वतों से घिरी है।" — इस वाक्य के काल को अन्य कालों में बदलकर लिखिए।Show solution
भूतकाल में: यह भूमि तीन ओर सुंदर हरे-हरे पर्वतों से घिरी थी।
भविष्य काल में: यह भूमि तीन ओर सुंदर हरे-हरे पर्वतों से घिरी होगी।
3"वृक्ष ऐसे हैं कि पत्थर मारने से फल देते हैं।" — इस वाक्य के काल को अन्य कालों में बदलकर लिखिए।Show solution
भूतकाल में: वृक्ष ऐसे थे कि पत्थर मारने से फल देते थे।
भविष्य काल में: वृक्ष ऐसे होंगे कि पत्थर मारने से फल देंगे।
4"चित्त में बारंबार ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का उदय होता था।" — इस वाक्य के काल को अन्य कालों में बदलकर लिखिए।Show solution
वर्तमान काल में: चित्त में बारंबार ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का उदय होता है।
भविष्य काल में: चित्त में बारंबार ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का उदय होगा।
5"मैं दीवान कृपा राम के घर के ऊपर के बंगले पर टिका था।" — इस वाक्य के काल को अन्य कालों में बदलकर लिखिए।Show solution
वर्तमान काल में: मैं दीवान कृपा राम के घर के ऊपर के बंगले पर टिका हूँ।
भविष्य काल में: मैं दीवान कृपा राम के घर के ऊपर के बंगले पर टिकूँगा।
पत्र की रचना — विशेषताओं का मिलान
1पत्र की विशेषताओं का पत्र से उदाहरणों से मिलान कीजिए।Show solution
1. व्यक्तिपरकता → "एक दिन मैंने श्री गंगा जी के तट पर रसोई करके पत्थर ही पर जल के अत्यंत निकट परोसकर भोजन किया।" (लेखक के व्यक्तिगत अनुभव का वर्णन)
2. संवादात्मकता → "और संपादक महाशय, मैं चित्त से तो अब तक वहीं निवास करता हूँ… निश्चय है कि आप इस पत्र को स्थानदान दीजिएगा।" (पाठक से सीधा संवाद)
3. स्वाभाविक शैली → "मुझे हरिद्वार का समाचार लिखने में बड़ा आनंद होता है…" (भावनाओं के अनुरूप स्वाभाविक भाषा)
4. व्यक्तिगत अनुभवों का वर्णन → "प्रहण में बड़े आनंदपूर्वक स्नान किया…" (वास्तविक अनुभव साझा करना)
5. अभिवादन या संबोधन → "श्रीमान कविवचन सुधा संपादक महामहिम मित्रवेरेषु!" (आदरपूर्वक संबोधन)
6. हस्ताक्षर → "आपका मित्र — यात्री" (लेखक का नाम/संबंध)
7. उपसंहार और निवेदन → "और संपादक महाशय, मैं चित्त से तो अब तक वहीं निवास करता हूँ… निश्चय है कि आप इस पत्र को स्थानदान दीजिएगा।" (पत्र समाप्त करते हुए निवेदन)
8. मुख्य विषय-वस्तु → हरिद्वार की प्राकृतिक सुंदरता, धार्मिकता, साधु-संन्यासियों का जीवन, नदी, पर्वत, जल, गंगा स्नान आदि का विस्तृत वर्णन। जैसे— "यह भूमि तीन ओर सुंदर हरे-हरे पर्वतों से घिरी है…"
2आप भी अपनी किसी यात्रा के विषय में अपने किसी परिचित को पत्र लिखकर बताइए।Show solution
दिनांक: ___________
प्रिय मित्र/मित्रे,
सप्रेम नमस्ते!
आशा है कि आप सकुशल होंगे। मैं आपको अपनी हाल की शिमला यात्रा के बारे में बताना चाहता/चाहती हूँ।
पिछले सप्ताह मैं अपने परिवार के साथ शिमला गया/गई। वहाँ पहुँचते ही ठंडी हवा ने मन प्रसन्न कर दिया। चारों ओर बर्फ से ढके पहाड़ और हरे-भरे देवदार के वृक्ष — दृश्य अत्यंत मनोरम था।
मॉल रोड पर घूमना बहुत आनंददायक रहा। वहाँ से पहाड़ों का दृश्य देखकर मन में अजीब-सी शांति छा गई। हमने जाखू मंदिर भी गए जहाँ से पूरे शिमला का दृश्य दिखाई देता था।
वहाँ का भोजन भी बहुत स्वादिष्ट था। ठंड में गरम-गरम मैगी और चाय का आनंद अवर्णनीय था।
काश! आप भी साथ होते। अगली बार अवश्य साथ चलिएगा।
आपका/आपकी मित्र,
[नाम]
लेखन के अनोखे तरीके — (क) तुलनात्मक वाक्य
1वृक्षों की तुलना साधुओं से की गई है — पाठ में इसे किस प्रकार विशिष्ट तरीके से लिखा गया है?Show solution
"बड़े-बड़े वृक्ष भी ऐसे खड़े हैं मानो एक पैर से खड़े तपस्या करते हैं और साधुओं की भाँति घाम, ओस और वर्षा अपने ऊपर सहते हैं।"
विशिष्टता: लेखक ने केवल यह नहीं कहा कि 'वृक्ष साधुओं जैसे हैं', बल्कि उन्होंने 'एक पैर से खड़े तपस्या करना' जोड़कर वृक्षों की स्थिरता और एकाग्रता को साधुओं की तपस्या से जोड़ा है। साथ ही 'घाम, ओस और वर्षा सहना' जोड़कर वृक्षों की सहनशीलता को साधुओं की तपस्या की कठिनाइयों से जोड़ा है।
2गंगाजल की मिठास की तुलना चीनी से की गई है — पाठ में इसे किस प्रकार विशिष्ट तरीके से लिखा गया है?Show solution
"जल यहाँ का अत्यंत शीतल है और मिट्ट भी वैसा ही है मानो चीनी के पने को बरफ में जमाया है।"
विशिष्टता: लेखक ने केवल 'मीठा पानी' नहीं कहा, बल्कि 'चीनी के पने को बरफ में जमाना' — यह अत्यंत काव्यात्मक उपमा है। इसमें एक साथ दो गुण — शीतलता (बरफ) और मिठास (चीनी का पना) — दोनों को एक ही उपमा में समेट दिया गया है।
3हरियाली की तुलना गलीचे से की गई है — पाठ में इसे किस प्रकार विशिष्ट तरीके से लिखा गया है?Show solution
"वर्ष के कारण सब ओर हरियाली ही दृष्टि पड़ती थी मानो हरे गलीचा की जात्रियों के विश्राम के हेतु बिछायत बिछी थी।"
विशिष्टता: लेखक ने केवल 'हरियाली गलीचे जैसी है' नहीं कहा, बल्कि यह जोड़ा कि यह गलीचा 'यात्रियों के विश्राम के लिए बिछाया गया है'। इससे हरियाली में एक स्वागत और आतिथ्य का भाव आ जाता है — जैसे प्रकृति ने स्वयं यात्रियों के लिए बिस्तर बिछाया हो।
4नदी की धारा की तुलना राजा भगीरथ के यश (कीर्ति) से की गई है — पाठ में इसे किस प्रकार विशिष्ट तरीके से लिखा गया है?Show solution
"यहाँ पर श्री गंगा जी दो धारा हो गई हैं— एक का नाम नील धारा, दूसरी श्री गंगा जी ही के नाम से।" तथा गंगा की धारा को भगीरथ की कीर्ति के समान अविरल और विस्तृत बताया गया है।
विशिष्टता: लेखक ने गंगा की धारा को भगीरथ के यश से जोड़कर एक ऐतिहासिक और पौराणिक संदर्भ दिया है। जैसे भगीरथ का यश अमर और अविरल है, वैसे ही गंगा की धारा भी अविरल बहती रहती है।
लेखन के अनोखे तरीके — (ख) आधुनिक हिंदी में रूपांतरण
1"इन वृक्षों पर अनेक रंग के पक्षी चहचहाते हैं और नगर के दुष्ट बधिकों से निडर होकर कल्लोल करते हैं।" — इसे आज की हिंदी में लिखिए।Show solution
इन वृक्षों पर अनेक रंग-बिरंगे पक्षी चहचहाते हैं और शहर के क्रूर शिकारियों से बेखौफ होकर आनंद से उड़ते और कलरव करते हैं।
(बधिक = शिकारी; कल्लोल = आनंदपूर्वक उछलना-कूदना, कलरव करना)
2"वर्ष के कारण सब ओर हरियाली ही दृष्टि पड़ती थी मानो हरे गलीचा की जात्रियों के विश्राम के हेतु बिछायत बिछी थी।" — इसे आज की हिंदी में लिखिए।Show solution
वर्षा के कारण चारों ओर हरियाली ही दिखाई देती थी, मानो हरे रंग का गलीचा यात्रियों के विश्राम के लिए बिछाया गया हो।
(वर्ष = वर्षा; जात्रियों = यात्रियों; हेतु = के लिए; बिछायत = बिछावन/बिस्तर)
3"यह ऐसा निर्मल तीर्थ है कि इच्छा क्रोध की खानि जो मनुष्य हैं सो वहाँ रहते ही नहीं।" — इसे आज की हिंदी में लिखिए।Show solution
यह इतना पवित्र तीर्थस्थान है कि जो मनुष्य इच्छाओं और क्रोध की खान (भंडार) हैं, वे वहाँ टिक ही नहीं पाते।
(खानि = खान/भंडार; सो = वे)
4"मेरा तो चित्त वहाँ जाते ही ऐसा प्रसन्न और निर्मल हुआ कि वर्णन के बाहर है।" — इसे आज की हिंदी में लिखिए।Show solution
वहाँ पहुँचते ही मेरा मन इतना प्रसन्न और शुद्ध हो गया कि उसका वर्णन करना संभव नहीं है।
(चित्त = मन; वर्णन के बाहर = वर्णन से परे/अवर्णनीय)
5"यहाँ रात्रि को ग्रहण हुआ और हम लोगों ने ग्रहण में बड़े आनंदपूर्वक स्नान किया और दिन में श्री भागवत का पारायण भी किया।" — इसे आज की हिंदी में लिखिए।Show solution
रात को यहाँ चंद्रग्रहण हुआ और हम सबने ग्रहण के समय बड़े आनंद के साथ स्नान किया। दिन में श्रीमद्भागवत का पाठ भी किया।
(ग्रहण = चंद्रग्रहण/सूर्यग्रहण; पारायण = धार्मिक ग्रंथ का पाठ)
6"उस समय के पत्थर पर का भोजन का सुख सोने की थाल के भोजन से कहीं बढ़ के था।" — इसे आज की हिंदी में लिखिए।Show solution
उस समय पत्थर पर बैठकर किए गए भोजन का आनंद सोने की थाली में परोसे गए भोजन से कहीं अधिक था।
(बढ़ के = बढ़कर/अधिक)
7"निश्चय है कि आप इस पत्र को स्थानदान दीजिएगा।" — इसे आज की हिंदी में लिखिए।Show solution
मुझे पूरा विश्वास है कि आप इस पत्र को अपनी पत्रिका में स्थान देंगे (प्रकाशित करेंगे)।
(स्थानदान = स्थान देना/प्रकाशित करना; दीजिएगा = देंगे)
लेखन के अनोखे तरीके — (ग) प्राचीन वर्तनी
गइस रचना में हरिश्चंद्र जी ने कहीं-कहीं प्राचीन वर्तनी का प्रयोग किया है, जैसे— शिखर के लिए शिष्य, यात्रियों के लिए जात्रियों। ऐसे शब्दों की सूची बनाइए।Show solution
| प्राचीन वर्तनी | आधुनिक वर्तनी |
|---|---|
| जात्रियों | यात्रियों |
| शिष्य (शिखर के अर्थ में) | शिखर |
| वर्ष | वर्षा |
| बिछायत | बिछावन/बिस्तर |
| मिट्ट | मीठा |
| बधिक | शिकारी |
| कल्लोल | कलरव/आनंद |
| हेतु | के लिए |
| सो | वे/वह |
| खानि | खान/भंडार |
| चित्त | मन |
| पने | शरबत/पेय |
| बढ़ के | बढ़कर |
| स्थानदान | स्थान देना |
कक्षा में चर्चा: इन शब्दों को देखकर यह स्पष्ट होता है कि भारतेंदु हरिश्चंद्र के समय की हिंदी में संस्कृत और ब्रजभाषा का प्रभाव अधिक था। आज की हिंदी इनसे काफी बदल गई है।
पाठ से आगे — आपकी बात
1"मैंने गंगा जी के तट पर रसोई करके... भोजन किया।" — क्या आपने कभी खुले वातावरण में या प्रकृति के पास भोजन किया है? वह अनुभव घर के खाने से कैसे भिन्न था?Show solution
अनुभव:
खुले वातावरण में भोजन करने का अनुभव घर के भोजन से बिल्कुल अलग था। ताज़ी हवा, पक्षियों की चहचहाहट और नदी की कलकल ध्वनि के बीच भोजन करने में एक अलग ही आनंद था।
घर के खाने से अंतर:
1. वातावरण: घर में बंद कमरे में खाते हैं, वहाँ खुले आसमान के नीचे था।
2. स्वाद: वही खाना बाहर अधिक स्वादिष्ट लगा।
3. मन की स्थिति: बाहर मन प्रसन्न और तनावमुक्त था।
4. साथ: परिवार और मित्रों के साथ मिलकर खाने का आनंद अलग था।
निष्कर्ष: प्रकृति के निकट भोजन करने से न केवल भोजन का स्वाद बढ़ता है, बल्कि मन भी प्रसन्न रहता है।
2"उस समय के पत्थर पर का भोजन का सुख सोने की थाल के भोजन से कहीं बढ़ के था।" — आपके जीवन में ऐसा कोई क्षण आया, जब किसी सामान्य-सी वस्तु ने आपको गहरा सुख दिया हो?Show solution
उदाहरण:
एक बार परीक्षा के बाद मैं बहुत थका/थकी हुआ/हुई था/थी। माँ ने साधारण दाल-चावल बनाए थे। उस समय वह साधारण भोजन किसी भी महँगे रेस्तराँ के खाने से अधिक स्वादिष्ट और सुखद लगा।
एक और उदाहरण:
गर्मी में लंबी यात्रा के बाद एक गिलास ठंडा पानी पीने का सुख किसी भी महँगे पेय से बढ़कर था।
निष्कर्ष: सुख वस्तु की कीमत में नहीं, बल्कि उस समय की परिस्थिति, मन की स्थिति और भावनाओं में होता है। जब मन संतुष्ट हो, तो साधारण वस्तु भी असाधारण सुख देती है।
3"हर तरफ पवित्रता और प्रसन्नता बिखरी हुई थी।" — आपको किस स्थान पर पवित्रता और प्रसन्नता का अनुभव होता है?Show solution
1. मंदिर: जब मैं मंदिर जाता/जाती हूँ, तो वहाँ की शांति और भक्ति का वातावरण मन को पवित्र कर देता है।
2. नदी का किनारा: नदी के किनारे बैठने से मन शांत हो जाता है। पानी की कलकल ध्वनि और ताज़ी हवा मन को प्रसन्न करती है।
3. पहाड़ी स्थान: पहाड़ों पर जाने से मन में एक अजीब-सी शांति और प्रसन्नता आती है।
विशेष अनुभव: एक बार मैं अपने दादा-दादी के गाँव गया/गई। वहाँ की हरियाली, शुद्ध हवा और शांत वातावरण ने मन को इतना प्रसन्न किया कि वापस आने का मन ही नहीं किया।
उस स्थान की विशेषताएँ: शोर-शराबे से दूर, प्रकृति के निकट, स्वच्छ वातावरण और सरल जीवन।
4पाठ में वर्णित है, यहाँ के वृक्ष "फल, फूल, गंध... जले पर भी कोयले और राख से लोगों का मनोर्थ पूर्ण करते हैं।" — क्या आपके जीवन में कोई पेड़, फूल या प्राकृतिक वस्तु है जिससे आप विशेष जुड़ाव महसूस करते हैं?Show solution
जुड़ाव के कारण:
1. बचपन की यादें: इस पेड़ पर चढ़ना, उसके नीचे खेलना — ये सब बचपन की मधुर यादें हैं।
2. फल: गर्मियों में इसके मीठे आम खाने का आनंद अतुलनीय है।
3. छाया: दोपहर की गर्मी में इसकी छाया में बैठकर पढ़ना बहुत अच्छा लगता है।
4. पक्षी: इस पेड़ पर कई पक्षी घोंसला बनाते हैं, उनकी चहचहाहट सुनना अच्छा लगता है।
निष्कर्ष: यह पेड़ केवल एक पेड़ नहीं, बल्कि मेरे परिवार का एक हिस्सा है। इससे मुझे प्रकृति के महत्व का बोध होता है।
प्रकृति का सौंदर्य और संरक्षण — पोस्टर
1"यह भूमि तीन ओर सुंदर हरे-हरे पर्वतों से घिरी है..." — "तीर्थ ही नहीं, पृथ्वी भी पावन हो!" विषय पर जन-जागरूकता पोस्टर बनाइए।Show solution
शीर्षक: तीर्थ ही नहीं, पृथ्वी भी पावन हो!
मुख्य संदेश:
• गंगा को स्वच्छ रखें — प्लास्टिक न फेंकें
• पर्वतों की हरियाली बचाएँ — पेड़ मत काटें
• तीर्थस्थानों पर कूड़ा न फैलाएँ
• प्रकृति की पूजा करें — उसे नष्ट न करें
नारे:
1. "जो गंगा को माँ मानते हो, उसे गंदा मत करो!"
2. "पेड़ लगाओ, पृथ्वी बचाओ!"
3. "तीर्थ की पवित्रता = प्रकृति की स्वच्छता"
4. "हरिद्वार को हरा-भरा रखो!"
चित्र सुझाव: हरे पर्वत, स्वच्छ गंगा, पेड़-पौधे और स्वच्छ घाट का चित्र।
नोट: विद्यार्थी इस रूपरेखा के आधार पर रंगीन पोस्टर बनाएँ।
स्वास्थ्य और योग
क5 मिनट ध्यान लगाकर या मौन बैठकर अपने आस-पास की ध्वनियों को सुनिए, अपनी श्वास पर ध्यान दीजिए तथा ध्यान को केंद्रित करने का प्रयास कीजिए। इस अनुभव के विषय में एक अनुच्छेद लिखिए।Show solution
आज मैंने पहली बार 5 मिनट के लिए आँखें बंद करके मौन बैठने का प्रयास किया। पहले तो मन बहुत चंचल था — कभी कल की परीक्षा की चिंता, कभी दोस्तों की बातें मन में आने लगीं।
धीरे-धीरे मैंने अपनी श्वास पर ध्यान केंद्रित किया। साँस अंदर लेना... बाहर छोड़ना... यह क्रम दोहराते-दोहराते मन थोड़ा शांत होने लगा।
तब मुझे आस-पास की आवाज़ें सुनाई देने लगीं — पंखे की घर्र-घर्र, बाहर पक्षियों की चहचहाहट, दूर से आती हवा की सरसराहट। ये आवाज़ें पहले भी थीं, पर मैंने कभी ध्यान नहीं दिया था।
5 मिनट बाद जब आँखें खोलीं, तो मन हल्का और प्रसन्न लग रहा था। थकान कम हो गई थी। मुझे समझ आया कि ध्यान केवल साधुओं के लिए नहीं, बल्कि हम सबके लिए आवश्यक है।
खअंतरराष्ट्रीय योग दिवस के उपलक्ष्य में अपने विद्यालय के कार्यक्रमों को बताने के लिए एक 'सूचना' लिखिए जिसे सूचना-पट पर लगाया जा सके।Show solution
[विद्यालय का नाम]
दिनांक: ___________
अंतरराष्ट्रीय योग दिवस — 21 जून
समस्त छात्र-छात्राओं एवं शिक्षकों को सूचित किया जाता है कि हमारे विद्यालय में अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के उपलक्ष्य में निम्नलिखित कार्यक्रम आयोजित किए जाएँगे:
कार्यक्रम विवरण:
- दिनांक: 21 जून, 20__
- समय: प्रातः 7:00 बजे से 9:00 बजे तक
- स्थान: विद्यालय का मैदान
कार्यक्रम:
1. सामूहिक योगाभ्यास
2. प्राणायाम और ध्यान
3. योग पर निबंध प्रतियोगिता
4. योग के लाभ पर भाषण
सभी छात्र-छात्राएँ सफेद वस्त्र पहनकर उपस्थित हों।
प्रधानाचार्य
[विद्यालय का नाम]
अपने शब्द — शब्द-चित्र
1'शीतल' शब्द को केंद्र में रखकर उसके चारों ओर अर्थ, विपरीतार्थक शब्द, समानार्थी शब्द और वाक्य प्रयोग लिखिए।Show solution
अर्थ: ठंडा, शांत, सुखद
समानार्थी शब्द: ठंडा, शीत, सर्द, हिम, शांत
विपरीतार्थक शब्द: उष्ण, गर्म, तप्त
वाक्य प्रयोग:
1. गंगाजल अत्यंत शीतल और मीठा है।
2. पहाड़ों से आती शीतल हवा मन को प्रसन्न कर देती है।
3. उसका व्यवहार बहुत शीतल और सौम्य है।
अन्य प्रयोग: शीतल पेय, शीतल छाया, शीतल वायु
यात्रा के व्यय की गणना
कमान लीजिए कि यात्रा के लिए आपको ₹1000 दिए गए हैं। यात्रा, खाना आदि सब मिलाकर एक व्यय विवरण बनाइए।Show solution
मान लीजिए यात्रा का स्थान: हरिद्वार (निकटवर्ती शहर से)
| क्रम | व्यय का विवरण | अनुमानित राशि |
|---|---|---|
| 1. | बस/ट्रेन का किराया (आना-जाना) | ₹300 |
| 2. | भोजन (नाश्ता + दोपहर का खाना + शाम का नाश्ता) | ₹250 |
| 3. | घाट पर प्रवेश/पूजा सामग्री | ₹100 |
| 4. | स्थानीय यातायात (ऑटो/रिक्शा) | ₹100 |
| 5. | पानी की बोतल और अन्य आवश्यकताएँ | ₹50 |
| 6. | स्मृति चिह्न (यदि बजट हो) | ₹150 |
| 7. | आपातकालीन राशि | ₹50 |
| कुल | | ₹1000 |
बजट प्रबंधन के सुझाव:
- घर से खाना पैक करके ले जाएँ — इससे भोजन पर खर्च कम होगा।
- महँगे होटल की बजाय धर्मशाला में रुकें।
- अनावश्यक वस्तुएँ न खरीदें।
खमान लीजिए कि आप इस यात्रा में एक छोटी वस्तु (स्मृति चिह्न) खरीदना चाहते हैं। आप क्या खरीदेंगे और क्यों?Show solution
कारण:
1. यह हरिद्वार की विशेषता है और यात्रा की याद दिलाएगी।
2. यह धार्मिक महत्व की वस्तु है।
3. यह अधिक महँगी नहीं होती — ₹50-100 में मिल जाती है।
4. यह टिकाऊ है और लंबे समय तक स्मृति बनी रहेगी।
बजट विचार:
यदि बजट कम हो, तो मैं गंगाजल की एक छोटी बोतल ले जाऊँगा/जाऊँगी जो निःशुल्क या बहुत कम कीमत में मिलती है। यह भी एक अमूल्य स्मृति चिह्न होगा।
निष्कर्ष: स्मृति चिह्न महँगा नहीं, बल्कि यादगार होना चाहिए। बजट के अनुसार सोच-समझकर खरीदारी करनी चाहिए।
यात्रा सबके लिए
ककल्पना कीजिए कि कुछ मित्रों का समूह एक यात्रा पर जा रहा है। आप एक मार्गदर्शक या टूरिस्ट गाइड हैं। आप इन सबकी यात्रा को सुविधाजनक बनाने के लिए किन-किन बातों का ध्यान रखेंगे?Show solution
यात्रा से पहले:
1. सभी सदस्यों की आवश्यकताएँ जानना (बुजुर्ग, बच्चे, दिव्यांग)।
2. मार्ग की पूरी जानकारी एकत्र करना।
3. आवश्यक दवाइयाँ और प्राथमिक चिकित्सा किट रखना।
यात्रा के दौरान:
1. सभी को एक साथ रखना, कोई पीछे न छूटे।
2. हर स्थान की जानकारी सरल भाषा में देना।
3. भोजन और पानी की उचित व्यवस्था।
4. बुजुर्गों और बच्चों का विशेष ध्यान।
5. दिव्यांग सदस्यों के लिए सुलभ मार्ग चुनना।
विशेष ध्यान:
- श्रवणबाधित: लिखित सूचनाएँ और सांकेतिक भाषा।
- दृष्टिबाधित: हाथ पकड़कर मार्गदर्शन और मौखिक वर्णन।
- बुजुर्ग: धीमी गति से चलना और बार-बार विश्राम।
- बच्चे: उनकी जिज्ञासाओं का उत्तर देना।
खअपने किसी मित्र के साथ बिना बोले संवाद कीजिए — संकेतों से। अब सोचिए कि यात्रा में श्रवणबाधित व्यक्ति के लिए क्या-क्या आवश्यक होगा?Show solution
1. संचार के साधन:
- लिखित नोटपैड या मोबाइल पर टाइप करके संवाद।
- सांकेतिक भाषा (Sign Language) जानने वाला साथी।
- चित्रों और संकेतों वाले नक्शे।
2. सूचना के साधन:
- सभी महत्वपूर्ण स्थानों पर लिखित सूचना बोर्ड।
- विजुअल अलार्म और फ्लैश लाइट संकेत।
3. यात्रा के दौरान:
- हमेशा दृष्टि की सीमा में रखना।
- हाथ के संकेतों से दिशा-निर्देश देना।
- भीड़ में खो जाने पर मिलने का स्थान पहले से तय करना।
4. तकनीकी सहायता:
- वाइब्रेशन अलर्ट वाला मोबाइल।
- वीडियो कॉल के माध्यम से सांकेतिक भाषा दुभाषिया।
गयात्रा करते हुए ऐतिहासिक धरोहरों या भवनों की सुरक्षा के लिए आप किन-किन बातों का ध्यान रखेंगे?Show solution
1. दीवारों पर न लिखें: किसी भी धरोहर की दीवार पर नाम या कुछ भी न लिखें।
2. कूड़ा न फेंकें: धरोहर के परिसर में कूड़ा-कचरा न फेंकें, कूड़ेदान का उपयोग करें।
3. तोड़-फोड़ न करें: किसी भी मूर्ति, स्तंभ या संरचना को न छुएँ और न तोड़ें।
4. नियमों का पालन: धरोहर स्थल के नियमों का पालन करें — जहाँ मना हो, वहाँ न जाएँ।
5. फोटोग्राफी: जहाँ फोटो लेना मना हो, वहाँ न लें।
6. जागरूकता फैलाएँ: दूसरों को भी धरोहर की सुरक्षा के बारे में बताएँ।
7. रिपोर्ट करें: यदि कोई धरोहर को नुकसान पहुँचाता दिखे, तो सुरक्षाकर्मियों को सूचित करें।
याद रखें: ये धरोहरें हमारी सांस्कृतिक विरासत हैं। इनकी रक्षा करना हमारा कर्तव्य है।
आज की पहेली
1पाठ में से शब्द खोजिए — 1. एक मसाले का नाम, 2. कपास से जुड़ा एक शब्द, 3. जहाँ स्नान होता है, 4. वृक्ष के किसी अंग का नाम, 5. एक नगर या तीर्थ का नाम, 6. व्यापार से जुड़ा स्थान, 7. एक नदी का नाम, 8. एक पर्वत का नाम, 9. एक धार्मिक ग्रंथ का नाम।Show solution
1. एक मसाले का नाम: दालचीनी (जावित्री भी)
2. कपास से जुड़ा एक शब्द: रुई (पाठ में रुई का उल्लेख है)
3. जहाँ स्नान होता है: घाट (हरि की पैड़ी)
4. वृक्ष के किसी अंग का नाम: छाल (पत्ते, जड़, बीज, लकड़ी भी)
5. एक नगर या तीर्थ का नाम: हरिद्वार (कनखल, ज्वालापुर भी)
6. व्यापार से जुड़ा स्थान: बाज़ार
7. एक नदी का नाम: गंगा (नील धारा भी)
8. एक पर्वत का नाम: हिमालय (पाठ में पर्वतों का उल्लेख है)
9. एक धार्मिक ग्रंथ का नाम: भागवत (श्रीमद्भागवत)
झरोखे से — हरिद्वार के मार्ग में (अतिरिक्त पठन)
1भारतेंदु हरिश्चंद्र द्वारा लिखे 'हरिद्वार के मार्ग में' अंश को पढ़कर आपस में विचार कीजिए।Show solution
मुख्य विषय: इस अंश में भारतेंदु हरिश्चंद्र ने हरिद्वार के मार्ग में देखे गए पक्षियों और उनके घोंसलों का वर्णन किया है।
विशेष बातें:
1. पीले रंग का पक्षी: लेखक ने एक सुंदर पीले रंग के छोटे पक्षी का वर्णन किया है।
2. घोंसलों की विशेषता: इन पक्षियों के घोंसले बबूल के काँटेदार वृक्षों पर लड़ी की तरह बीस-तीस की संख्या में लटकते हैं।
3. पक्षियों की बुद्धिमत्ता: लेखक ने पक्षियों की शिल्पकला और चतुराई की प्रशंसा की है। काँटेदार वृक्ष पर घोंसला बनाना उनकी चतुराई है — इससे शिकारी उन तक नहीं पहुँच सकते।
4. भाषा शैली: यह अंश भी उसी सरल, चित्रात्मक और साहित्यिक शैली में लिखा गया है जो मुख्य पाठ में है।
निष्कर्ष: यह अंश दर्शाता है कि भारतेंदु हरिश्चंद्र एक सूक्ष्म पर्यवेक्षक थे। वे यात्रा में छोटी-से-छोटी बात को भी ध्यान से देखते और उसे सुंदर भाषा में व्यक्त करते थे।
खोजबीन के लिए
1भारतेंदु हरिश्चंद्र का एक प्रसिद्ध नाटक है — अंधेर नगरी। इसे पुस्तकालय या इंटरनेट से ढूँढ़कर पढ़िए और अपने सहपाठियों के साथ चर्चा कीजिए।Show solution
लेखक: भारतेंदु हरिश्चंद्र
रचना काल: 1881
विधा: नाटक (हास्य-व्यंग्य)
कथासार:
इस नाटक में 'अंधेर नगरी' नामक एक ऐसे राज्य का वर्णन है जहाँ का राजा 'चौपट राजा' है। वहाँ सब चीज़ें एक ही दाम — 'टके सेर' में मिलती हैं — चाहे भाजी हो या मिठाई। इस अन्यायपूर्ण व्यवस्था में एक महंत और उनके दो शिष्य — गोवर्धनदास और नारायणदास — आते हैं। गोवर्धनदास वहाँ रुक जाता है क्योंकि सस्ता खाना मिलता है। अंत में एक हास्यास्पद और व्यंग्यपूर्ण घटनाक्रम में राजा की मूर्खता उजागर होती है।
मुख्य संदेश:
1. मूर्ख और अन्यायी शासन का व्यंग्यात्मक चित्रण।
2. लालच और मूर्खता के दुष्परिणाम।
3. न्यायपूर्ण शासन का महत्व।
चर्चा के बिंदु:
- क्या आज भी ऐसी 'अंधेर नगरी' जैसी स्थितियाँ मिलती हैं?
- नाटक में हास्य और व्यंग्य का क्या प्रभाव है?
- भारतेंदु ने इस नाटक के माध्यम से समाज को क्या संदेश दिया?
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- NCERT Official — ncert.nic.in
- CBSE Academic — cbseacademic.nic.in
- CBSE Official — cbse.gov.in
- National Education Policy 2020 — education.gov.in
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