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Chapter 13 of 13
NCERT Solutions

वर्णोच्चारण-शिक्षा १

CBSE · Class 8 · Sanskrit

NCERT Solutions for वर्णोच्चारण-शिक्षा १ — CBSE Class 8 Sanskrit.

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20 Questions Solved · 1 Section

अभ्यासात् जायते सिद्धिः — वर्णोच्चारण-शिक्षा १

1(क)उरसि किं तन्त्रं भवति ?Show solution
दिया गया: उरस् (वक्षस्थल) के विषय में प्रश्न है।

उत्तर: उरसि श्वासकोशतन्त्रं भवति।

(वक्षस्थल में श्वास-कोश का तन्त्र होता है।)
1(ख)नाभिप्रदेशे स्थिताः मांसपेश्यः किं नोदयन्ति ?Show solution
दिया गया: नाभि-प्रदेश की मांसपेशियों के कार्य के विषय में प्रश्न है।

उत्तर: नाभिप्रदेशे स्थिताः मांसपेश्यः वायुं नोदयन्ति।

(नाभि-प्रदेश में स्थित मांसपेशियाँ वायु को प्रेरित/धकेलती हैं।)
1(ग)आस्यस्य आभ्यन्तरे वाणीनाम् उत्पत्यर्थ द्वितीयं तत्त्वं किम् अस्ति ?Show solution
दिया गया: मुख के भीतर वाणी की उत्पत्ति के लिए द्वितीय तत्त्व के विषय में प्रश्न है।

उत्तर: आस्यस्य आभ्यन्तरे वाणीनाम् उत्पत्यर्थं द्वितीयं तत्त्वं करणम् अस्ति।

(मुख के भीतर वाणी की उत्पत्ति के लिए दूसरा तत्त्व 'करण' है।)
1(घ)आस्ये कति स्थानानि सन्ति ?Show solution
दिया गया: मुख में स्थानों की संख्या के विषय में प्रश्न है।

उत्तर: आस्ये पञ्च स्थानानि सन्ति।

(मुख में पाँच स्थान होते हैं — कण्ठ, तालु, मूर्धा, दन्त, ओष्ठ।)
1(ङ)स्थानस्य कार्यानिदर्शनार्थ किं समुचितम् उदाहरणम् अस्ति ?Show solution
दिया गया: स्थान के कार्य के उदाहरण के विषय में प्रश्न है।

उत्तर: स्थानस्य कार्यानिदर्शनार्थं मुरली (वंशी) समुचितम् उदाहरणम् अस्ति।

(स्थान के कार्य को दर्शाने के लिए मुरली/बाँसुरी उचित उदाहरण है।)
1(च)करणानि मुरल्याः कस्य भागम् इव व्यवहरन्ति ?Show solution
दिया गया: करण और मुरली के सम्बन्ध के विषय में प्रश्न है।

उत्तर: करणानि मुरल्याः अङ्गुलिच्छिद्राणाम् भागम् इव व्यवहरन्ति।

(करण मुरली के अँगुली-छिद्रों के भाग की तरह कार्य करते हैं।)
2(क)करणं किं भवति ?Show solution
दिया गया: करण की परिभाषा के विषय में प्रश्न है।

उत्तर: यत् अङ्गं स्थानं स्पृशति, तत् करणं भवति।

अर्थात् — जो अंग स्थान को स्पर्श करता है, वह 'करण' कहलाता है। उदाहरणार्थ — जिह्वा (जीभ) प्रमुख करण है जो तालु, मूर्धा, दन्त आदि स्थानों को स्पर्श करती है।
2(ख)उरः श्वासकोशस्थितं वायुं कुत्र निःसारयति ?Show solution
दिया गया: उरस् के कार्य के विषय में प्रश्न है।

उत्तर: उरः श्वासकोशस्थितं वायुं कण्ठं प्रति निःसारयति।

(वक्षस्थल श्वास-कोश में स्थित वायु को कण्ठ की ओर निकालता/भेजता है।)
2(ग)मुरल्याः अङ्गुलिच्छिद्राणि कीदृशं व्यवहरन्ति ?Show solution
दिया गया: मुरली के अँगुली-छिद्रों के व्यवहार के विषय में प्रश्न है।

उत्तर: मुरल्याः अङ्गुलिच्छिद्राणि करणानि इव व्यवहरन्ति। यथा मुरल्याः नलिकायां वायुः प्रवहति, तथैव अङ्गुलयः छिद्राणि स्पृशन्ति, तेन विविधाः स्वराः उत्पद्यन्ते।

(मुरली के अँगुली-छिद्र 'करण' की तरह व्यवहार करते हैं — जैसे अँगुलियाँ छिद्रों को स्पर्श करने से विभिन्न स्वर उत्पन्न होते हैं।)
2(घ)केषां वाणीनाम् उच्चारणे जिह्वा प्रायः निष्क्रिया भवति ?Show solution
दिया गया: जिह्वा की निष्क्रियता के विषय में प्रश्न है।

उत्तर: कण्ठ्यानां, ओष्ठ्यानां, नासिक्यानां च वाणीनाम् उच्चारणे जिह्वा प्रायः निष्क्रिया भवति।

(कण्ठ्य, ओष्ठ्य और नासिक्य वर्णों के उच्चारण में जीभ प्रायः निष्क्रिय रहती है।)
2(ङ)तालव्यानां, मूर्धन्यानां, दन्त्यानां च वर्णानाम् उच्चारणार्थं सामान्यं करणं किम् अस्ति ?Show solution
दिया गया: तालव्य, मूर्धन्य और दन्त्य वर्णों के उच्चारण के सामान्य करण के विषय में प्रश्न है।

उत्तर: तालव्यानां, मूर्धन्यानां, दन्त्यानां च वर्णानाम् उच्चारणार्थं सामान्यं करणं जिह्वा अस्ति।

(तालव्य, मूर्धन्य और दन्त्य वर्णों के उच्चारण के लिए सामान्य करण 'जिह्वा' (जीभ) है।)
2(च)कण्ठ्यानां, ओष्ठ्यानां, नासिक्यानां च वर्णानाम् उच्चारणार्थं स्थानस्य करणस्य च मध्ये किं भवति ?Show solution
दिया गया: कण्ठ्य, ओष्ठ्य और नासिक्य वर्णों के उच्चारण में स्थान और करण के सम्बन्ध के विषय में प्रश्न है।

उत्तर: कण्ठ्यानां, ओष्ठ्यानां, नासिक्यानां च वर्णानाम् उच्चारणार्थं स्थानस्य करणस्य च मध्ये अभेदः (अर्थात् स्वस्थानमेव करणं भवति) भवति।

(इन वर्णों के उच्चारण में स्थान और करण में कोई भेद नहीं होता — स्थान स्वयं ही करण का कार्य करता है, इसे 'स्वस्थानं करणम्' कहते हैं।)
3(क)श्वासकोशस्थितः वायुः ऊर्ध्वं चरन् पूर्वम् आस्यं प्राप्नोति । (आम् / न)Show solution
विचार: श्वासकोश से वायु ऊपर जाते हुए पहले कण्ठ को प्राप्त होती है, आस्य (मुख) को नहीं।

उत्तर: न

(श्वासकोश से वायु ऊपर चलते हुए पहले कण्ठ को प्राप्त होती है, मुख को नहीं।)
3(ख)सर्वप्रथमं नाभि-प्रदेशे स्थिताः मांसपेश्याः कण्ठं नोदयन्ति । (आम् / न)Show solution
विचार: नाभि-प्रदेश की मांसपेशियाँ वायु को नोदित करती हैं, कण्ठ को नहीं।

उत्तर: न

(नाभि-प्रदेश की मांसपेशियाँ कण्ठ को नहीं, अपितु वायुं नोदयन्ति।)
3(ग)आस्यस्य आभ्यन्तरे वाणीनाम् उत्पत्यर्थम् आभ्यन्तर-प्रयत्नः आवश्यकम् अस्ति । (आम् / न)Show solution
विचार: मुख के भीतर वाणी की उत्पत्ति के लिए स्थान और करण दोनों आवश्यक हैं; आभ्यन्तर-प्रयत्न भी आवश्यक होता है।

उत्तर: आम्

(मुख के भीतर वाणी की उत्पत्ति के लिए आभ्यन्तर-प्रयत्न आवश्यक है — यह कथन सत्य है।)
3(घ)तालव्य-वर्णानाम् उच्चारणार्थं दन्तः स्थानं स्पृशति । (आम् / न)Show solution
विचार: तालव्य वर्णों के उच्चारण में जिह्वा का मध्यभाग तालु को स्पर्श करता है, दन्त नहीं।

उत्तर: न

(तालव्य वर्णों के उच्चारण में जिह्वामध्यः तालु स्थान को स्पृशति, न तु दन्तः।)
3(ङ)मूर्धन्यानां वर्णानाम् उच्चारणार्थं जिह्वा स्थानं स्पृशति । (आम् / न)Show solution
विचार: मूर्धन्य वर्णों के उच्चारण में जिह्वा का अग्रभाग (जिह्वाग्र) मूर्धा को स्पर्श करता है।

उत्तर: आम्

(मूर्धन्य वर्णों के उच्चारण में जिह्वा (विशेषतः जिह्वाग्र) मूर्धा स्थान को स्पर्श करती है — यह कथन सत्य है।)
3(च)तत्स्थानस्य एव कश्चित् पूर्वभागः, तत्स्थानस्य परभागं स्पृशति । (आम् / न)Show solution
विचार: पाठ के अनुसार स्थान का पूर्वभाग उसी स्थान के परभाग को स्पर्श करता है — यह विशेष-करण की व्याख्या में कहा गया है।

उत्तर: आम्

(उसी स्थान का कोई पूर्वभाग उसी स्थान के परभाग को स्पर्श करता है — यह कथन सत्य है।)
8मुखे उपलभ्यमानानि स्थानानि बहिष्ठात् अन्तः यथाक्रमं (अर्थात् विपरीत-क्रमेण) लिखन्तु।Show solution
दिया गया: मुख में उपलब्ध स्थानों को बाहर से भीतर की ओर क्रम में लिखना है।

अवधारणा: मुख में पाँच उच्चारण-स्थान होते हैं। बाहर से भीतर की ओर (विपरीत-क्रम) इस प्रकार हैं —

ओष्ठःदन्तःमूर्धातालुकण्ठः\text{ओष्ठः} \rightarrow \text{दन्तः} \rightarrow \text{मूर्धा} \rightarrow \text{तालु} \rightarrow \text{कण्ठः}

विस्तृत क्रम:

| क्रम | स्थान | विशेष-स्थान |
|------|-------|-------------|
| १ (बाहर) | ओष्ठः | उत्तरोष्ठः / अधरोष्ठः |
| २ | दन्तः | दन्तमूलम् |
| ३ | मूर्धा | नासिकामूलस्य उपरिभागः |
| ४ | तालु | तालुमध्यम् |
| ५ (भीतर) | कण्ठः | कण्ठस्य पृष्ठभागः |

(नासिका भी एक स्थान है जो अनुनासिक वर्णों के उच्चारण में प्रयुक्त होती है।)
9यथायोग्यं मेलनं कुरुत — सामान्य-स्थानम्, विशेष-स्थानम्, सामान्य-करणम्, विशेष-करणम् का मिलान करें।Show solution
दिया गया: छः स्थानों के सामान्य-स्थान, विशेष-स्थान, सामान्य-करण और विशेष-करण का मिलान करना है।

अवधारणा: प्रत्येक उच्चारण-स्थान का एक सामान्य स्थान, एक विशेष स्थान, एक सामान्य करण और एक विशेष करण होता है।

उत्तर (मेलन):

| सामान्य-स्थानम् | विशेष-स्थानम् | सामान्य-करणम् | विशेष-करणम् |
|---|---|---|---|
| ओष्ठः | उत्तरोष्ठः | स्वस्थानं करणम् | अधरोष्ठः |
| दन्तः | दन्तः | जिह्वा करणम् | जिह्वाग्रः |
| नासिका | नासिकामूलस्य उपरिभागः | स्वस्थानं करणम् | नासिकामूलस्य अधोभागः |
| कण्ठः | कण्ठस्य पृष्ठभागः | स्वस्थानं करणम् | कण्ठस्य अग्रभागः |
| मूर्धा | नासिकामूलस्य उपरिभागः | जिह्वा करणम् | जिह्वोपाग्रः |
| तालु | तालु | जिह्वा करणम् | जिह्वामध्यः |

स्पष्टीकरण:
- ओष्ठ्य वर्ण (प, फ, ब, भ, म): सामान्य स्थान = ओष्ठः; विशेष स्थान = उत्तरोष्ठः; सामान्य करण = स्वस्थानं करणम्; विशेष करण = अधरोष्ठः।
- दन्त्य वर्ण (त, थ, द, ध, न): सामान्य स्थान = दन्तः; विशेष स्थान = दन्तः; सामान्य करण = जिह्वा करणम्; विशेष करण = जिह्वाग्रः।
- नासिक्य वर्ण: सामान्य स्थान = नासिका; विशेष स्थान = नासिकामूलस्य उपरिभागः; सामान्य करण = स्वस्थानं करणम्; विशेष करण = नासिकामूलस्य अधोभागः।
- कण्ठ्य वर्ण (क, ख, ग, घ, ङ): सामान्य स्थान = कण्ठः; विशेष स्थान = कण्ठस्य पृष्ठभागः; सामान्य करण = स्वस्थानं करणम्; विशेष करण = कण्ठस्य अग्रभागः।
- मूर्धन्य वर्ण (ट, ठ, ड, ढ, ण): सामान्य स्थान = मूर्धा; विशेष स्थान = नासिकामूलस्य उपरिभागः; सामान्य करण = जिह्वा करणम्; विशेष करण = जिह्वोपाग्रः।
- तालव्य वर्ण (च, छ, ज, झ, ञ): सामान्य स्थान = तालु; विशेष स्थान = तालु; सामान्य करण = जिह्वा करणम्; विशेष करण = जिह्वामध्यः।

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