बिरजू महाराज से साक्षात्कार -विद्यार्थियों द्वारा — NCERT Solutions
CBSE · Class 7 · Hindi
NCERT Solutions for बिरजू महाराज से साक्षात्कार -विद्यार्थियों द्वारा, CBSE Class 7 Hindi: 30 textbook questions solved step by step.
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मेरी समझ से
1(1)बिरजू महाराज ने गंडा बाँधने की परंपरा में परिवर्तन क्यों किया होगा?
- वे गुरु के प्रति शिष्य के निष्ठा भाव को परखना चाहते थे।
- वे नृत्य शिक्षण के लिए इस परंपरा को महत्वपूर्ण नहीं मानते थे।
- वे नृत्य के प्रति शिष्य के लगन व समर्पण भाव को जाँचना चाहते थे।
- वे शिष्य की भेंट देने की सामर्थ्य को परखना चाहते थे।Show solution
सही उत्तर: वे नृत्य के प्रति शिष्य के लगन व समर्पण भाव को जाँचना चाहते थे।
कारण: बिरजू महाराज का मानना था कि नृत्य सीखने के लिए सबसे ज़रूरी है शिष्य का नृत्य के प्रति सच्चा लगाव और समर्पण। गंडा बाँधने की परंपरा में परिवर्तन करके वे यह देखना चाहते थे कि शिष्य केवल औपचारिकता के लिए नहीं, बल्कि सच्ची लगन से नृत्य सीखना चाहता है या नहीं। भेंट देने की सामर्थ्य या केवल गुरु-भक्ति उनकी कसौटी नहीं थी।
1(2)"जीवन में उतार चढ़ाव तो होता ही है।" बिरजू महाराज के जीवन में किस तरह के उतार-चढ़ाव आए?
- पिता के देहांत के बाद आर्थिक अभावों का सामना करना पड़ा।
- कोई भी संस्था नृत्य प्रस्तुतियों के लिए आमंत्रित नहीं करती थी।
- किसी समय विशेष में घर में सुख-समृद्धि थी।
- नृत्य के औपचारिक प्रशिक्षण के अवसर बहुत ही सीमित हो गए थे।Show solution
सही उत्तर: पिता के देहांत के बाद आर्थिक अभावों का सामना करना पड़ा। तथा नृत्य के औपचारिक प्रशिक्षण के अवसर बहुत ही सीमित हो गए थे।
कारण: बिरजू महाराज के पिता के निधन के बाद परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत कठिन हो गई थी। इस कारण नृत्य का औपचारिक प्रशिक्षण प्राप्त करने के अवसर भी सीमित हो गए। ये दोनों उतार-चढ़ाव उनके जीवन में वास्तव में आए थे। 'कोई संस्था आमंत्रित नहीं करती थी' या 'घर में सुख-समृद्धि थी' — ये तथ्य पाठ में स्पष्ट रूप से उल्लिखित नहीं हैं।
1(3)बिरजू महाराज के अनुसार बच्चों को लय के साथ खेलने की अनुशंसा क्यों की जानी चाहिए?
- संगीत, नृत्य, नाटक और सभी कलाएँ बच्चों में मानवीय मूल्यों का विकास नहीं करती हैं।
- कला संबंधी विषयों से जुड़ाव बच्चों के बौद्धिक विकास के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
- कला भी एक खेल है, जिसमें बहुत कुछ सीखने को मिलता है।
- वर्तमान समय में कला भी एक सफल माध्यम नहीं है।Show solution
सही उत्तर: कला संबंधी विषयों से जुड़ाव बच्चों के बौद्धिक विकास के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। तथा कला भी एक खेल है, जिसमें बहुत कुछ सीखने को मिलता है।
कारण: बिरजू महाराज का मानना था कि बच्चों को लय, संगीत और नृत्य से जोड़ना चाहिए क्योंकि इससे उनका बौद्धिक और भावनात्मक विकास होता है। कला को वे खेल की तरह मानते थे जिसमें सीखने का आनंद मिलता है। पहला विकल्प (कलाएँ मानवीय मूल्यों का विकास नहीं करतीं) और चौथा विकल्प (कला सफल माध्यम नहीं है) — दोनों गलत हैं।
1(ख)अब अपने मित्रों के साथ चर्चा कीजिए और कारण बताइए कि आपने ये उत्तर ही क्यों चुनें?Show solution
यह एक चर्चा-आधारित गतिविधि है। विद्यार्थी अपने मित्रों के साथ निम्नलिखित बिंदुओं पर चर्चा करें:
- प्रश्न (1) के लिए: बिरजू महाराज ने गंडा बाँधने की परंपरा में इसलिए परिवर्तन किया क्योंकि वे चाहते थे कि शिष्य नृत्य के प्रति सच्ची लगन और समर्पण से आए, न कि केवल परंपरा निभाने के लिए।
- प्रश्न (2) के लिए: पाठ में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि पिता के देहांत के बाद आर्थिक कठिनाइयाँ आईं और प्रशिक्षण के अवसर सीमित हुए।
- प्रश्न (3) के लिए: बिरजू महाराज ने कहा कि कला बच्चों के विकास के लिए आवश्यक है और यह एक प्रकार का खेल ही है जिसमें सीखने का आनंद है।
(नोट: यह उत्तर विद्यार्थी अपने अनुभव और समझ के अनुसार कक्षा में प्रस्तुत करें।)
मिलकर करें मिलान
1नीचे दिए गए शब्दों को उनके सही संदर्भों या अवधारणाओं से मिलाइए:
1. कर्नाटक संगीत शैली
2. घराना
3. शास्त्रीय संगीत
4. हिंदुस्तानी संगीत शैली
5. कनछेदन
6. लोक नृत्यShow solution
सही मिलान इस प्रकार है:
| शब्द | संदर्भ या अवधारणा |
|---|---|
| 1. कर्नाटक संगीत शैली | 2. भारतीय शास्त्रीय संगीत की एक शैली, जो मुख्य रूप से दक्षिण भारत के राज्यों में प्रचलित है। इसमें स्वर शैली की प्रधानता होती है। जल तरंगम, वीणा, मृदंग, मंडोलिन वाद्ययंत्रों से संगत दी जाती है। |
| 2. घराना | 4. हिंदुस्तानी संगीत में कलाकारों का एक समुदाय या कुटुंब, जो संगीत-नृत्य की विशिष्ट शैली साझा करते हैं। संगीत या नृत्य की परंपरा, जिसमें सिद्धांत और शैली पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रशिक्षण के द्वारा आगे बढ़ती है। |
| 3. शास्त्रीय संगीत | 1. भारत की प्राचीन गायन-वादन गीत-नृत्य अभिनय परंपरा का अभिन्न अंग है। इसमें शब्दों की अपेक्षा सुरों का महत्व होता है। इसमें नियमों की प्रधानता होती है। |
| 4. हिंदुस्तानी संगीत शैली | 6. भारतीय शास्त्रीय संगीत की एक शैली, जो मुख्य रूप से उत्तर भारत के राज्यों में प्रचलित है। तबला, सारंगी, सितार, संतूर वाद्ययंत्रों से संगत दी जाती है। इसके प्रमुख रागों की संख्या छह है। |
| 5. कनछेदन | 3. हिंदू धर्म के 16 संस्कारों में एक है, यह कान में सोने या चाँदी का तार पहनाने से संबंधित है। |
| 6. लोक नृत्य | 5. किसी क्षेत्र विशेष में लोक द्वारा किए जाने वाले पारंपरिक नृत्य। लोक नृत्य, क्षेत्र विशेष की संस्कृति एवं रीति-रिवाजों को दर्शाते हैं। ये विशेष रूप से फसल कटाई, उत्सवों आदि के अवसर पर किए जाते हैं। |
शीर्षक
1इस पाठ का शीर्षक 'बिरजू महाराज से साक्षात्कार' है। यदि आप इस साक्षात्कार को कोई अन्य नाम देना चाहते हैं तो क्या नाम देंगे? आपने यह नाम क्यों सोचा? लिखिए।Show solution
वैकल्पिक शीर्षक: 'कथक के महारथी: बिरजू महाराज' अथवा 'लय, ताल और जीवन' अथवा 'नृत्य की साधना'
कारण: इस साक्षात्कार में बिरजू महाराज ने अपने जीवन के संघर्ष, कथक नृत्य के प्रति अपनी साधना और समर्पण, तथा नृत्य में लय-ताल के महत्व के बारे में विस्तार से बताया है। 'कथक के महारथी' शीर्षक उनकी कथक नृत्य में महारत को दर्शाता है। 'लय, ताल और जीवन' शीर षक इसलिए उचित है क्योंकि उन्होंने अपने पूरे जीवन को नृत्य की लय और ताल के साथ जोड़ा है। 'नृत्य की साधना' शीर्षक उनके नृत्य के प्रति तपस्या-भाव को व्यक्त करता है।
(नोट: विद्यार्थी अपनी समझ के अनुसार कोई भी उचित शीर्षक दे सकते हैं और उसका कारण बता सकते हैं।)
पंक्तियों पर चर्चा
1"तुम नौकरी में बँट जाओगे। तुम्हारे अंदर का नर्तक पूरी तरह पनप नहीं पाएगा।" — इस पंक्ति का क्या अर्थ है?Show solution
इस पंक्ति का अर्थ:
बिरजू महाराज यहाँ यह कहना चाहते हैं कि यदि कोई नर्तक नौकरी करने लगे तो उसका ध्यान और समय दो भागों में बँट जाएगा — एक ओर नौकरी की जिम्मेदारियाँ और दूसरी ओर नृत्य। नृत्य एक ऐसी कला है जिसके लिए पूर्ण समर्पण, एकाग्रता और निरंतर अभ्यास आवश्यक है। जब व्यक्ति का ध्यान बँटा होगा तो वह नृत्य में वह ऊँचाई नहीं प्राप्त कर सकेगा जो पूर्ण समर्पण से मिलती है। अर्थात् किसी भी कला में श्रेष्ठता के लिए उसे ही अपना एकमात्र लक्ष्य बनाना होगा।
2"नृत्य में शरीर, ध्यान और तपस्या का साधन होता है।" — इस पंक्ति का क्या अर्थ है?Show solution
इस पंक्ति का अर्थ:
बिरजू महाराज के अनुसार नृत्य केवल शरीर की गतिविधि नहीं है। इसमें तीन तत्वों का समन्वय होता है:
- शरीर — नृत्य के लिए शरीर को साधन (माध्यम) के रूप में प्रयोग किया जाता है। शरीर की प्रत्येक भाव-भंगिमा, हाथ-पैर की गतिविधि नृत्य का हिस्सा है।
- ध्यान — नृत्य करते समय मन की एकाग्रता अत्यंत आवश्यक है। बिना ध्यान के नृत्य में भाव नहीं आ सकता।
- तपस्या — नृत्य में वर्षों की कठोर साधना और अभ्यास की आवश्यकता होती है, जो एक प्रकार की तपस्या ही है।
इस प्रकार नृत्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक साधना है।
3"कथक में गर्दन को हल्के से हिलाया जाता है, चिराग की लौ के समान।" — इस पंक्ति का क्या अर्थ है?Show solution
इस पंक्ति का अर्थ:
बिरजू महाराज यहाँ कथक नृत्य की एक विशेष तकनीक का वर्णन कर रहे हैं। कथक में गर्दन की गति बहुत सूक्ष्म, कोमल और लयबद्ध होती है। जिस प्रकार दीपक की लौ हवा के हल्के झोंके से धीरे-धीरे, लयबद्ध रूप से हिलती है — न बहुत तेज़, न बहुत धीमी — ठीक उसी प्रकार कथक नर्तक की गर्दन भी हल्के और लयबद्ध तरीके से हिलती है।
यह उपमा बहुत सटीक है क्योंकि दीपक की लौ में एक स्वाभाविक, सहज और कोमल गति होती है जो कथक की गर्दन-गति की विशेषता को पूरी तरह व्यक्त करती है। इससे नृत्य में सौंदर्य और भाव दोनों उत्पन्न होते हैं।
सोच-विचार के लिए
1(क)बिरजू महाराज नृत्य का औपचारिक प्रशिक्षण आरंभ होने से पहले ही कथक कैसे सीख गए थे?Show solution
उत्तर:
बिरजू महाराज के पिता स्वयं एक महान कथक नर्तक थे। बचपन से ही बिरजू महाराज अपने पिता को नृत्य करते हुए देखते थे और उनके साथ रहते थे। घर का वातावरण ही नृत्यमय था। वे अपने पिता की नृत्य कक्षाओं में बैठते थे और देखते-देखते कथक की बारीकियाँ सीखते जाते थे। इस प्रकार बिना किसी औपचारिक प्रशिक्षण के, केवल अवलोकन और अनुकरण के माध्यम से उन्होंने कथक की नींव बचपन में ही प्राप्त कर ली थी। यह उनकी प्रतिभा और पारिवारिक वातावरण दोनों का परिणाम था।
1(ख)नृत्य सीखने के लिए संगीत की समझ होना क्यों अनिवार्य है?Show solution
उत्तर:
नृत्य और संगीत एक-दूसरे के पूरक हैं। नृत्य सीखने के लिए संगीत की समझ इसलिए अनिवार्य है क्योंकि:
- नृत्य की प्रत्येक गति लय और ताल पर आधारित होती है। यदि नर्तक को सुर-ताल की समझ नहीं होगी तो वह सही समय पर सही गति नहीं कर पाएगा।
- बिरजू महाराज के अनुसार — "अगर नर्तक को सुर-ताल की समझ है तो वह जान पाएगा कि यह लहरा ठीक नहीं है, इसके माध्यम से नृत्य अंगों में प्रवेश नहीं करेगा।"
- संगीत की समझ के बिना नर्तक केवल यांत्रिक रूप से हाथ-पैर हिला सकता है, लेकिन नृत्य में भाव और आत्मा नहीं ला सकता।
- नृत्य में संगीत के साथ तालमेल बिठाना आवश्यक है, जो तभी संभव है जब नर्तक को संगीत की गहरी समझ हो।
1(ग)नृत्य के अतिरिक्त बिरजू महाराज को और किन-किन कार्यों में रुचि थी?Show solution
उत्तर:
बिरजू महाराज बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। नृत्य के अतिरिक्त उन्हें निम्नलिखित कार्यों में रुचि थी:
- संगीत — उन्हें गायन और वादन में गहरी रुचि थी। वे तबला और पखावज भी बजाते थे।
- चित्रकारी — उन्हें चित्र बनाने का शौक था।
- कविता लेखन — वे कविताएँ भी लिखते थे।
- अभिनय — नृत्य के साथ-साथ अभिनय में भी उनकी रुचि थी।
- शिक्षण — वे नृत्य सिखाने में भी बहुत रुचि लेते थे और अपनी कला को आगे बढ़ाना चाहते थे।
इस प्रकार बिरजू महाराज केवल नर्तक ही नहीं, बल्कि एक संपूर्ण कलाकार थे।
1(घ)बिरजू महाराज ने बच्चों की शिक्षा और रुचियों के बारे में अभिभावकों से क्या कहा है?Show solution
उत्तर:
बिरजू महाराज ने अभिभावकों से कहा कि वे अपने बच्चों को केवल पढ़ाई तक सीमित न रखें। उन्होंने कहा कि:
- बच्चों को लय के साथ खेलने दें। संगीत और नृत्य बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए आवश्यक हैं।
- कला, संगीत, नृत्य और नाटक जैसी गतिविधियाँ बच्चों में मानवीय मूल्यों का विकास करती हैं और उनके बौद्धिक विकास में सहायक होती हैं।
- अभिभावकों को चाहिए कि वे बच्चों की रुचि को पहचानें और उसे प्रोत्साहित करें। यदि बच्चे में नृत्य या संगीत की प्रतिभा है तो उसे दबाएँ नहीं।
- कला को भी एक सफल जीवन-मार्ग के रूप में स्वीकार करें और बच्चों को उनकी पसंद की कला सीखने का अवसर दें।
2(क)पाठ में से उन प्रसंगों की पहचान कर चर्चा कीजिए जिनसे पता चलता है कि बिरजू महाराज बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे।Show solution
उत्तर:
बिरजू महाराज की बहुमुखी प्रतिभा के प्रमाण:
- नृत्य में महारत — वे कथक नृत्य के सर्वश्रेष्ठ कलाकार थे। उन्होंने कथक की पुरानी परंपरा को बनाए रखते हुए उसके प्रस्तुतीकरण में नए प्रयोग किए।
- संगीत की गहरी समझ — वे न केवल नृत्य करते थे बल्कि संगीत की बारीकियाँ भी जानते थे। तबला और पखावज बजाने में भी दक्ष थे।
- चित्रकारी और कविता — उन्हें चित्र बनाने और कविता लिखने का भी शौक था।
- शिक्षण प्रतिभा — वे एक उत्कृष्ट गुरु भी थे जिन्होंने अनेक शिष्यों को कथक की शिक्षा दी।
- फिल्मों में योगदान — उन्होंने हिंदी फिल्मों में भी नृत्य निर्देशन किया।
इन सभी प्रसंगों से स्पष्ट होता है कि बिरजू महाराज केवल एक नर्तक नहीं, बल्कि एक संपूर्ण और बहुमुखी कलाकार थे।
2(ख)पाठ में से उन प्रसंगों की पहचान कर चर्चा कीजिए जिनसे पता चलता है कि बिरजू महाराज को नृत्य की ऊँचाइयों तक पहुँचाने में उनकी माँ का बहुत योगदान रहा।Show solution
उत्तर:
बिरजू महाराज की माँ के योगदान के प्रसंग:
- पिता के देहांत के बाद सहारा — जब बिरजू महाराज के पिता का देहांत हुआ, तब वे बहुत छोटे थे। उस कठिन समय में उनकी माँ ने उन्हें संभाला और नृत्य की साधना जारी रखने के लिए प्रोत्साहित किया।
- आर्थिक कठिनाइयों में साथ — पिता के जाने के बाद परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत कठिन हो गई थी। माँ ने इन परिस्थितियों में भी बिरजू महाराज का मनोबल बनाए रखा।
- नृत्य के प्रति प्रोत्साहन — माँ ने कभी भी बिरजू महाराज को नृत्य छोड़कर कोई और काम करने के लिए नहीं कहा। उन्होंने हमेशा उनकी कला को प्रोत्साहित किया।
इस प्रकार माँ का त्याग और प्रोत्साहन बिरजू महाराज की सफलता की नींव बना।
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Sources & Official References
- NCERT Official — ncert.nic.in
- CBSE Academic — cbseacademic.nic.in
- CBSE Official — cbse.gov.in
- National Education Policy 2020 — education.gov.in
Content is aligned to the official syllabus. Refer to the board website for the latest curriculum.
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