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Chapter 35 of 38
NCERT Solutions

जहाँ कोई वापसी नहीं (निर्मल वर्मा)

Nagaland Board · Class 12 · Hindi

NCERT Solutions for जहाँ कोई वापसी नहीं (निर्मल वर्मा) — Nagaland Board Class 12 Hindi.

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निर्मल वर्मा के जीवन की प्रमुख घटनाओं, जैसे जन्म, शिक्षा, चेकोस्लोवाकिया प्रवास, भारत वापसी, और प्रमुख साहित्यिक कार्यों को दर्शाने वाली एक समयरेखा।
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20 Questions Solved · 3 Sections

प्रश्न-अभ्यास

1अमझर से आप क्या समझते हैं? अमझर गाँव में सूनापन क्यों है?Show solution
दिया गया है: निर्मल वर्मा के यात्रा-वृत्तांत 'जहाँ कोई वापसी नहीं' में अमझर गाँव का उल्लेख है।

अमझर का अर्थ: 'अमझर' एक ऐसे गाँव का नाम है जो सिंगरौली क्षेत्र में स्थित था। 'अमझर' शब्द का अर्थ है — वह स्थान जहाँ से आम के पेड़ झर (गिर) गए हों अर्थात् जो उजड़ गया हो।

अमझर में सूनापन के कारण:
औद्योगीकरण और बड़ी-बड़ी परियोजनाओं (जैसे बाँध, कोयला खदान, बिजलीघर आदि) के कारण सिंगरौली क्षेत्र के गाँवों को बार-बार उजाड़ा गया। अमझर गाँव के निवासियों को भी उनकी जमीन और घरों से बेदखल कर दिया गया। लोग विस्थापित होकर इधर-उधर चले गए। जो लोग वहाँ रहते थे, वे अपनी जड़ों से उखड़ गए। इसी कारण अमझर गाँव में गहरा सूनापन छा गया — न घरों में रौनक रही, न खेतों में हलचल। गाँव एक उजड़े हुए खंडहर की तरह हो गया।

निष्कर्ष: अमझर औद्योगीकरण की बलि चढ़े उन अनगिनत गाँवों का प्रतीक है जो विकास के नाम पर उजाड़ दिए गए।
2आधुनिक भारत के 'नए शरणार्थी' किन्हें कहा गया है?Show solution
दिया गया है: लेखक निर्मल वर्मा ने 'नए शरणार्थी' पद का प्रयोग किया है।

'नए शरणार्थी' की अवधारणा:
सामान्यतः 'शरणार्थी' उन्हें कहा जाता है जो युद्ध, दंगे या प्राकृतिक आपदा के कारण अपना देश या घर छोड़ने पर मजबूर हो जाते हैं। किंतु लेखक ने 'नए शरणार्थी' उन लोगों को कहा है जो औद्योगीकरण और विकास परियोजनाओं के कारण अपने घरों, गाँवों और जमीनों से उजाड़े गए हैं।

सिंगरौली जैसे क्षेत्रों में बाँध, कोयला खदान, ताप-विद्युत संयंत्र आदि बनाने के लिए हजारों आदिवासियों और ग्रामीणों को बार-बार विस्थापित किया गया। ये लोग न तो किसी युद्ध के शिकार हैं, न किसी प्राकृतिक आपदा के — बल्कि इन्हें 'विकास' के नाम पर उनकी जड़ों से उखाड़ा गया है। इसीलिए लेखक इन्हें आधुनिक भारत के 'नए शरणार्थी' कहते हैं।

निष्कर्ष: ये वे लोग हैं जो अपनी ही धरती पर बेघर हो गए — विकास की कीमत चुकाने वाले निर्धन, आदिवासी और ग्रामीण।
3प्रकृति के कारण विस्थापन और औद्योगीकरण के कारण विस्थापन में क्या अंतर है?Show solution
दिया गया है: लेखक ने दो प्रकार के विस्थापनों की चर्चा की है।

प्रकृति के कारण विस्थापन:
- बाढ़, भूकंप, सूखा, तूफान जैसी प्राकृतिक आपदाओं के कारण लोग अपना घर छोड़ने पर मजबूर होते हैं।
- यह विस्थापन अस्थायी होता है — आपदा टलने पर लोग वापस लौट सकते हैं।
- इसमें लोगों की वापसी की संभावना बनी रहती है।
- प्रकृति के प्रति मनुष्य का भावनात्मक और सांस्कृतिक जुड़ाव बना रहता है।
- यह विस्थापन किसी की इच्छा या योजना का परिणाम नहीं होता।

औद्योगीकरण के कारण विस्थापन:
- बाँध, खदान, कारखाने, बिजलीघर आदि बनाने के लिए लोगों को जबरन उजाड़ा जाता है।
- यह विस्थापन स्थायी होता है — लोग कभी वापस नहीं लौट सकते, इसीलिए पाठ का शीर्षक है 'जहाँ कोई वापसी नहीं'।
- इसमें लोगों की जड़ें हमेशा के लिए कट जाती हैं।
- यह विस्थापन मनुष्य की संस्कृति, परंपरा और पहचान को भी नष्ट कर देता है।
- यह मानव-निर्मित और योजनाबद्ध होता है।

निष्कर्ष: प्रकृति के कारण विस्थापन में वापसी की उम्मीद होती है, जबकि औद्योगीकरण के कारण विस्थापन में मनुष्य अपनी जमीन, संस्कृति और अस्मिता सब कुछ खो देता है।
4यूरोप और भारत की पर्यावरण संबंधी चिंताएँ किस प्रकार भिन्न हैं?Show solution
दिया गया है: लेखक ने यूरोप और भारत की पर्यावरण-चिंताओं की तुलना की है।

यूरोप की पर्यावरण संबंधी चिंता:
- यूरोप में पर्यावरण का प्रश्न मुख्यतः मनुष्य और भूगोल के बीच संतुलन बनाए रखने का है।
- वहाँ सांस्कृतिक विरासत म्यूजियम और संग्रहालयों में सुरक्षित है, इसलिए पर्यावरण की चिंता केवल भौतिक और भौगोलिक स्तर पर है।
- यूरोप में प्रकृति और संस्कृति अलग-अलग हैं — संस्कृति को बचाने के लिए प्रकृति को बचाना अनिवार्य नहीं।

भारत की पर्यावरण संबंधी चिंता:
- भारत में पर्यावरण का प्रश्न केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि मनुष्य और उसकी संस्कृति के बीच पारंपरिक संबंध बनाए रखने का है।
- भारत की सांस्कृतिक विरासत म्यूजियम में नहीं, बल्कि मनुष्य के अपनी धरती, जंगलों, नदियों से जीवंत रिश्तों में बसी है।
- यहाँ अतीत का मिथक-संसार पोथियों में नहीं, रिश्तों की अदृश्य लिपि में जीवित है।
- इसलिए भारत में पर्यावरण नष्ट होने का अर्थ है — संस्कृति और परंपरा का भी नष्ट होना

निष्कर्ष: यूरोप में पर्यावरण-चिंता भौतिक है, जबकि भारत में यह सांस्कृतिक और आत्मिक भी है।
5लेखक के अनुसार स्वातंत्र्योत्तर भारत की सबसे बड़ी 'ट्रेजेडी' क्या है?Show solution
दिया गया है: लेखक निर्मल वर्मा ने स्वतंत्रता के बाद के भारत की सबसे बड़ी त्रासदी का उल्लेख किया है।

स्वातंत्र्योत्तर भारत की सबसे बड़ी 'ट्रेजेडी':
लेखक के अनुसार स्वतंत्र भारत की सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं है कि शासक वर्ग ने औद्योगीकरण का मार्ग चुना। औद्योगिक विकास आवश्यक भी था।

सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि हमारे पश्चिम-शिक्षित सत्ताधारियों ने पश्चिम की देखादेखी और नकल में योजनाएँ बनाते समय यह कभी नहीं सोचा कि —
- प्रकृति, मनुष्य और संस्कृति के बीच का नाजुक संतुलन किस प्रकार बनाए रखा जाए।
- भारत की अपनी शर्तों और मर्यादाओं के आधार पर औद्योगिक विकास का भारतीय स्वरूप निर्धारित किया जा सकता था, किंतु ऐसा कभी नहीं हुआ।
- पश्चिम को मॉडल मानकर चलने से भारत की सांस्कृतिक जड़ें कट गईं और लाखों लोग विस्थापित हो गए।

निष्कर्ष: लेखक की दृष्टि में असली त्रासदी यह है कि विकास की प्रक्रिया में भारतीय संदर्भ, संस्कृति और मानवीय संवेदना को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया।
6औद्योगीकरण ने पर्यावरण का संकट पैदा कर दिया है, क्यों और कैसे?Show solution
दिया गया है: लेखक ने सिंगरौली क्षेत्र के उदाहरण से औद्योगीकरण और पर्यावरण-संकट का संबंध स्पष्ट किया है।

औद्योगीकरण द्वारा पर्यावरण-संकट के कारण और तरीके:

(i) वनों की कटाई: कारखानों, खदानों और बाँधों के निर्माण के लिए घने जंगल काटे गए, जिससे वन्य जीवन और पारिस्थितिकी तंत्र नष्ट हुआ।

(ii) नदियों का प्रदूषण: औद्योगिक कचरा और रसायन नदियों में बहाए गए, जिससे जल-प्रदूषण बढ़ा और जलीय जीवन समाप्त होने लगा।

(iii) भूमि का विनाश: खनन कार्यों से भूमि की उर्वरता नष्ट हुई और बड़े-बड़े गड्ढे बन गए।

(iv) वायु प्रदूषण: कोयला आधारित बिजलीघरों और कारखानों से निकलने वाले धुएँ ने वायु को प्रदूषित किया।

(v) मानव-विस्थापन: लाखों लोगों को उनकी जमीन से उजाड़ा गया, जिससे मनुष्य और प्रकृति का परंपरागत संबंध टूट गया।

(vi) सांस्कृतिक विनाश: प्रकृति के साथ मनुष्य की संस्कृति भी नष्ट हुई क्योंकि भारत में दोनों अविभाज्य हैं।

निष्कर्ष: औद्योगीकरण ने केवल भौतिक पर्यावरण को ही नहीं, बल्कि मनुष्य के सांस्कृतिक और सामाजिक पर्यावरण को भी गहरी क्षति पहुँचाई है।
7क्या स्वच्छता अभियान की जरूरत गाँव से ज्यादा शहरों में है? (विस्थापित लोगों, मजदूर बस्तियों, स्लमस क्षेत्रों, शहरों में बसी झुग्गी बस्तियों के संदर्भ में लिखिए।)Show solution
दिया गया है: यह प्रश्न विस्थापित लोगों और शहरी झुग्गी बस्तियों के संदर्भ में स्वच्छता की आवश्यकता पर विचार करने को कहता है।

विचार:
स्वच्छता अभियान की आवश्यकता गाँव और शहर दोनों में है, किंतु शहरों में विस्थापित मजदूर बस्तियों और झुग्गी-झोपड़ियों में यह आवश्यकता कहीं अधिक गंभीर और तात्कालिक है।

कारण:

(i) अत्यधिक जनसंख्या घनत्व: झुग्गी बस्तियों में बहुत कम जगह में बहुत अधिक लोग रहते हैं, जिससे गंदगी तेजी से फैलती है।

(ii) मूलभूत सुविधाओं का अभाव: इन बस्तियों में शौचालय, स्वच्छ पेयजल, नाली और कूड़ा-निपटान की व्यवस्था नहीं होती।

(iii) बीमारियों का खतरा: गंदगी के कारण हैजा, टाइफाइड, मलेरिया जैसी बीमारियाँ तेजी से फैलती हैं।

(iv) विस्थापित मजदूरों की दुर्दशा: औद्योगिक परियोजनाओं के लिए विस्थापित लोग शहरों में मजदूर बस्तियों में रहने को मजबूर हैं जहाँ स्वच्छता की कोई व्यवस्था नहीं।

(v) सरकारी उपेक्षा: गाँवों में स्वच्छता अभियान पहुँचता है, किंतु शहरी झुग्गियाँ प्रायः उपेक्षित रहती हैं।

निष्कर्ष: स्वच्छता अभियान को शहरी झुग्गी बस्तियों और मजदूर कॉलोनियों पर विशेष ध्यान देना चाहिए क्योंकि ये लोग पहले से ही विस्थापन की पीड़ा झेल रहे हैं और अस्वच्छ वातावरण उनकी दुर्दशा को और बढ़ाता है।
8(क)निम्नलिखित पंक्तियों का आशय स्पष्ट कीजिए — (क) आदमी उजड़ेंगे तो पेड़ जीवित रहकर क्या करेंगे?Show solution
दिया गया है: यह पंक्ति निर्मल वर्मा के पाठ 'जहाँ कोई वापसी नहीं' से ली गई है।

आशय:
इस पंक्ति में लेखक ने मनुष्य और प्रकृति के अन्योन्याश्रित संबंध को बड़े मार्मिक ढंग से व्यक्त किया है।

सामान्यतः पर्यावरण आंदोलन में यह तर्क दिया जाता है कि पेड़ों को बचाने के लिए मनुष्यों को हटाया जाए। किंतु लेखक इस तर्क को उलटते हुए कहते हैं कि यदि मनुष्य ही उजड़ जाएगा — अपनी जड़ों से, अपनी संस्कृति से, अपनी धरती से — तो पेड़ों का जीवित रहना किस काम का?

भारत में मनुष्य और प्रकृति का संबंध केवल भौतिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और आत्मिक है। पेड़-पौधे, नदियाँ, जंगल — ये सब मनुष्य की संस्कृति, परंपरा और जीवन-दर्शन से जुड़े हैं। यदि मनुष्य ही विस्थापित हो जाए तो प्रकृति का संरक्षण निरर्थक हो जाता है।

निष्कर्ष: यह पंक्ति बताती है कि पर्यावरण-संरक्षण और मानव-कल्याण साथ-साथ चलने चाहिए। मनुष्य को उजाड़कर पेड़ बचाना वास्तविक पर्यावरण-चेतना नहीं है।
8(ख)निम्नलिखित पंक्तियों का आशय स्पष्ट कीजिए — (ख) प्रकृति और इतिहास के बीच यह गहरा अंतर है?Show solution
दिया गया है: यह पंक्ति निर्मल वर्मा के पाठ से ली गई है।

आशय:
इस पंक्ति में लेखक प्रकृति और इतिहास की प्रकृति (स्वभाव) में मूलभूत अंतर को स्पष्ट करते हैं।

इतिहास का स्वभाव है — आगे बढ़ना, परिवर्तन होना। इतिहास में जो एक बार नष्ट हो जाता है, वह वापस नहीं आता। इतिहास की घटनाएँ अपरिवर्तनीय होती हैं।

प्रकृति का स्वभाव है — पुनर्जन्म, पुनरुत्थान। प्रकृति में नष्ट होने के बाद भी पुनः जीवन संभव है — बाढ़ के बाद धरती फिर हरी होती है, सूखे के बाद वर्षा आती है, जंगल जलने के बाद फिर उगते हैं।

किंतु जब औद्योगीकरण के कारण प्रकृति का विनाश होता है, तो वह विनाश इतिहास की तरह स्थायी और अपरिवर्तनीय हो जाता है — खदानें खुद जाती हैं, नदियाँ प्रदूषित हो जाती हैं, जंगल हमेशा के लिए कट जाते हैं। इस अर्थ में प्रकृति और इतिहास के बीच का अंतर मिट जाता है।

निष्कर्ष: यह पंक्ति बताती है कि मानव-जनित विनाश प्रकृति की पुनर्जीवन-शक्ति को भी नष्ट कर देता है, जो एक गहरी त्रासदी है।
9(क)निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखिए — (क) आधुनिक शरणार्थीShow solution
आधुनिक शरणार्थी

पारंपरिक अर्थ में 'शरणार्थी' वे लोग होते हैं जो युद्ध, दंगे या प्राकृतिक आपदा के कारण अपना घर-देश छोड़ने पर विवश होते हैं। किंतु निर्मल वर्मा ने 'आधुनिक शरणार्थी' की एक नई अवधारणा प्रस्तुत की है।

आधुनिक भारत में औद्योगीकरण और विकास परियोजनाओं — जैसे बाँध, कोयला खदान, ताप-विद्युत संयंत्र, राजमार्ग आदि — के निर्माण के लिए लाखों आदिवासियों, किसानों और ग्रामीणों को उनकी जमीन और घरों से जबरन विस्थापित किया गया। ये लोग किसी बाहरी शत्रु के नहीं, बल्कि अपने ही देश की विकास-नीतियों के शिकार हैं।

सिंगरौली क्षेत्र इसका ज्वलंत उदाहरण है जहाँ एक ही परिवार को कई बार उजाड़ा गया। ये 'आधुनिक शरणार्थी' न तो किसी देश की सीमा पार करते हैं, न किसी शिविर में रहते हैं — वे अपनी ही धरती पर बेघर होकर भटकते हैं। इनकी न कोई सुनता है, न इनके लिए कोई अंतर्राष्ट्रीय सहायता आती है।

निष्कर्ष: आधुनिक शरणार्थी विकास की क्रूर विडंबना के प्रतीक हैं — जो लोग देश की समृद्धि के लिए सबसे अधिक कुर्बानी देते हैं, वे ही सबसे अधिक उपेक्षित और बेसहारा रहते हैं।
9(ख)निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखिए — (ख) औद्योगीकरण की अनिवार्यताShow solution
औद्योगीकरण की अनिवार्यता

स्वतंत्रता के बाद भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी — करोड़ों लोगों की गरीबी दूर करना, रोजगार देना और देश को आत्मनिर्भर बनाना। इसके लिए औद्योगीकरण अनिवार्य था।

लेखक निर्मल वर्मा भी यह स्वीकार करते हैं कि औद्योगीकरण का मार्ग चुनना गलत नहीं था। बड़े बाँध, कोयला खदानें, बिजलीघर, इस्पात संयंत्र — ये सब देश की प्रगति के लिए आवश्यक थे। बिना ऊर्जा और उद्योग के आधुनिक राष्ट्र का निर्माण संभव नहीं था।

किंतु लेखक का आपत्ति-बिंदु यह है कि औद्योगीकरण किस तरह किया गया। पश्चिम की अंधी नकल में यह नहीं सोचा गया कि भारत की अपनी परिस्थितियाँ, संस्कृति और मानवीय संवेदनाएँ भिन्न हैं। यदि भारतीय शर्तों और मर्यादाओं के आधार पर औद्योगिक विकास का भारतीय मॉडल बनाया जाता, तो प्रकृति, मनुष्य और संस्कृति के बीच का संतुलन बना रह सकता था।

निष्कर्ष: औद्योगीकरण अनिवार्य था, किंतु उसकी प्रक्रिया में मानवीय और सांस्कृतिक संवेदनशीलता का अभाव ही असली समस्या है।
9(ग)निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखिए — (ग) प्रकृति, मनुष्य और संस्कृति के बीच आपसी संबंधShow solution
प्रकृति, मनुष्य और संस्कृति के बीच आपसी संबंध

निर्मल वर्मा के अनुसार भारत में प्रकृति, मनुष्य और संस्कृति तीनों एक-दूसरे से अविभाज्य रूप से जुड़े हैं। यह त्रिकोणीय संबंध भारतीय जीवन-दर्शन की आधारशिला है।

प्रकृति और मनुष्य का संबंध: भारत में मनुष्य ने सदा प्रकृति को माँ, देवी और जीवन-दाता माना है। नदियाँ, पहाड़, वन, पशु-पक्षी — सब मनुष्य के जीवन का अभिन्न अंग रहे हैं। यह संबंध केवल आर्थिक नहीं, बल्कि आत्मिक और भावनात्मक है।

प्रकृति और संस्कृति का संबंध: भारत की सांस्कृतिक विरासत — त्योहार, लोकगीत, मिथक, परंपराएँ — सब प्रकृति से जुड़े हैं। अतीत का समूचा मिथक-संसार पोथियों में नहीं, बल्कि मनुष्य के अपनी धरती, जंगलों और नदियों से जीवंत रिश्तों में बसा है।

मनुष्य और संस्कृति का संबंध: मनुष्य की पहचान उसकी संस्कृति से है। जब मनुष्य विस्थापित होता है, तो उसकी संस्कृति भी नष्ट होती है।

निष्कर्ष: जब औद्योगीकरण इस त्रिकोणीय संबंध को तोड़ता है, तो केवल पर्यावरण नहीं, बल्कि मनुष्य की आत्मा और सभ्यता भी नष्ट होती है। इसीलिए लेखक इस संतुलन को बनाए रखने पर बल देते हैं।
10(क)निम्नलिखित पंक्तियों का भाव-सौंदर्य लिखिए — (क) कभी-कभी किसी इलाके की संपदा ही उसका अभिशाप बन जाती है।Show solution
दिया गया है: यह पंक्ति निर्मल वर्मा के पाठ 'जहाँ कोई वापसी नहीं' से ली गई है।

भाव-सौंदर्य:

भाव: इस पंक्ति में एक गहरी विडंबना व्यक्त की गई है। सिंगरौली क्षेत्र कोयले और खनिज संपदा से भरपूर था। यही संपदा उसके लिए वरदान होनी चाहिए थी, किंतु यही उसके लिए अभिशाप बन गई। इस संपदा के कारण वहाँ बड़ी-बड़ी औद्योगिक परियोजनाएँ आईं और वहाँ के निवासियों को बार-बार उजाड़ा गया।

व्यापक संदर्भ: यह विडंबना केवल सिंगरौली तक सीमित नहीं है। जहाँ भी खनिज, तेल, जल या वन-संपदा होती है, वहाँ के मूल निवासी सबसे अधिक पीड़ित होते हैं। उनकी संपदा उनके लिए नहीं, बल्कि बाहरी शक्तियों के लिए उपयोगी होती है।

भाषा-सौंदर्य: 'संपदा' और 'अभिशाप' दो विपरीत शब्दों का एक ही वाक्य में प्रयोग विरोधाभास अलंकार का सुंदर उदाहरण है। यह पंक्ति अपनी संक्षिप्तता में एक बड़ी सामाजिक-आर्थिक सच्चाई को उजागर करती है।

निष्कर्ष: यह पंक्ति उन सभी वंचित समुदायों की त्रासदी को वाणी देती है जो अपनी ही धरती की संपदा के कारण बेघर हो जाते हैं।
10(ख)निम्नलिखित पंक्तियों का भाव-सौंदर्य लिखिए — (ख) अतीत का समूचा मिथक संसार पोथियों में नहीं, इन रिश्तों की अदृश्य लिपि में मौजूद रहता था।Show solution
दिया गया है: यह पंक्ति निर्मल वर्मा के पाठ 'जहाँ कोई वापसी नहीं' से ली गई है।

भाव-सौंदर्य:

भाव: इस पंक्ति में लेखक ने भारतीय सांस्कृतिक विरासत की विशिष्टता को अत्यंत गहराई से व्यक्त किया है। यूरोप में संस्कृति पुस्तकों, संग्रहालयों और दस्तावेजों में सुरक्षित है। किंतु भारत में संस्कृति किसी पोथी या ग्रंथ में नहीं, बल्कि मनुष्य के अपनी धरती, नदियों, जंगलों और परिवेश के साथ जीवंत रिश्तों में बसी है।

यह 'अदृश्य लिपि' वह भाषा है जो लिखी नहीं जाती, पढ़ी नहीं जाती — बल्कि जी जाती है। जब कोई किसान अपनी धरती से जुड़ा होता है, जब कोई आदिवासी अपने जंगल को पहचानता है — तभी यह लिपि जीवित रहती है।

भाषा-सौंदर्य: 'अदृश्य लिपि' एक अत्यंत काव्यात्मक और मौलिक बिंब है। यह रूपक भारतीय संस्कृति की जीवंतता और उसकी अलिखित प्रकृति को एक साथ व्यक्त करता है। 'पोथियों' और 'अदृश्य लिपि' का विरोधाभास भाषा को और प्रभावशाली बनाता है।

निष्कर्ष: यह पंक्ति बताती है कि भारत की संस्कृति को बचाने के लिए उसके मनुष्यों को उनकी धरती और परिवेश से जोड़े रखना अनिवार्य है।

भाषा-शिल्प

1पाठ के संदर्भ में निम्नलिखित अभिव्यक्तियों का अर्थ स्पष्ट कीजिए — मूक सत्याग्रह, पवित्र खुलापन, स्वच्छ मांसलता, औद्योगीकरण का चक्का, नाजुक संतुलनShow solution
मूक सत्याग्रह:
जब कोई व्यक्ति या समुदाय बिना कुछ बोले, बिना किसी विरोध-प्रदर्शन के, केवल अपनी उपस्थिति और मौन से अपना प्रतिरोध व्यक्त करता है। पाठ में विस्थापित लोगों का चुप रहकर अपनी पीड़ा सहना 'मूक सत्याग्रह' है — वे न लड़ते हैं, न बोलते हैं, बस सहते हैं।

पवित्र खुलापन:
प्रकृति का वह निर्मल, निश्छल और अनावृत स्वरूप जो किसी कृत्रिमता से मुक्त हो। जंगलों, नदियों और खुले आकाश में जो स्वाभाविक विस्तार और पारदर्शिता होती है, उसे 'पवित्र खुलापन' कहा गया है।

स्वच्छ मांसलता:
प्रकृति की वह जीवंत, स्वस्थ और निरोग भौतिकता जो किसी प्रदूषण या विकृति से अछूती हो। यह अभिव्यक्ति प्रकृति के स्वस्थ और सुंदर शरीर का बोध कराती है।

औद्योगीकरण का चक्का:
औद्योगीकरण की वह अपरिहार्य और निरंतर चलने वाली प्रक्रिया जो एक बार शुरू होने पर रुकती नहीं और अपने रास्ते में आने वाली हर चीज को — मनुष्य, प्रकृति, संस्कृति — कुचलती चली जाती है। 'चक्का' यहाँ गाड़ी के पहिए का रूपक है।

नाजुक संतुलन:
प्रकृति, मनुष्य और संस्कृति के बीच का वह कोमल और संवेदनशील संतुलन जो बहुत सावधानी से बना होता है और जरा-सी असावधानी से टूट सकता है। यह संतुलन भारतीय जीवन-पद्धति की आत्मा है।
2इन मुहावरों पर ध्यान दीजिए — मटियामेट होना, आफत टलना, न फटकनाShow solution
मटियामेट होना:
अर्थ: पूरी तरह नष्ट हो जाना, बर्बाद हो जाना।
वाक्य-प्रयोग: औद्योगीकरण की आँधी में सिंगरौली के गाँवों की पूरी व्यवस्था मटियामेट हो गई।

आफत टलना:
अर्थ: मुसीबत या संकट का दूर हो जाना।
वाक्य-प्रयोग: जब बाढ़ का पानी उतर गया तो ग्रामीणों ने राहत की साँस ली कि चलो आफत टली।

न फटकना:
अर्थ: किसी स्थान या व्यक्ति के पास बिल्कुल न जाना, दूर रहना।
वाक्य-प्रयोग: विस्थापित मजदूरों की बस्तियों के पास सरकारी अधिकारी कभी नहीं फटकते।
3'किंतु यह भ्रम है ………' 'दूब जाती हैं।' इस गद्यांश को भूतकाल की क्रिया के साथ अपने शब्दों में लिखिए।Show solution
मूल गद्यांश का भाव (वर्तमान काल में): किंतु यह भ्रम है कि प्रकृति सब कुछ सह लेती है और अपने घावों को स्वयं भर लेती है। बाढ़ आती है, पानी उतरता है और धरती फिर हरी हो जाती है। जंगल जलते हैं और फिर उग आते हैं। नदियाँ सूखती हैं और फिर भर जाती हैं। घास और दूब जाती हैं।

भूतकाल में रूपांतरण:
किंतु यह भ्रम था कि प्रकृति सब कुछ सह लेती थी और अपने घावों को स्वयं भर लेती थी। बाढ़ आई थी, पानी उतरा था और धरती फिर हरी हो गई थी। जंगल जले थे और फिर उग आए थे। नदियाँ सूखी थीं और फिर भर गई थीं। घास और दूब चली गई थीं।

टिप्पणी: भूतकाल में रूपांतरण से यह भाव उभरता है कि जो प्रकृति की पुनर्जीवन-शक्ति पहले थी, वह अब औद्योगीकरण के कारण समाप्त हो गई है — अर्थात् अब वह स्थिति नहीं रही।

योग्यता-विस्तार

1विस्थापन की समस्या से आप कहाँ तक परिचित हैं? किसी विस्थापन संबंधी परियोजना पर रिपोर्ट लिखिए।Show solution
विस्थापन की समस्या से परिचय:
विस्थापन की समस्या भारत में बहुत व्यापक है। बाँध, खदान, राजमार्ग, औद्योगिक क्षेत्र आदि के निर्माण में लाखों लोग विस्थापित होते हैं।

नर्मदा बचाओ आंदोलन — एक रिपोर्ट (नमूना)

परियोजना: सरदार सरोवर बाँध, नर्मदा नदी
स्थान: मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र

पृष्ठभूमि: नर्मदा नदी पर सरदार सरोवर बाँध के निर्माण से मध्य प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र के सैकड़ों गाँव जलमग्न हो गए।

विस्थापन का विवरण: लगभग 2-3 लाख लोग विस्थापित हुए। इनमें अधिकांश आदिवासी और गरीब किसान थे। उन्हें उचित मुआवजा और पुनर्वास नहीं मिला।

समस्याएँ:
- पुनर्वास स्थलों पर बुनियादी सुविधाओं का अभाव
- जमीन का उचित मुआवजा न मिलना
- सांस्कृतिक और सामाजिक जड़ों का उखड़ना
- रोजगार का नुकसान

आंदोलन: मेधा पाटकर के नेतृत्व में 'नर्मदा बचाओ आंदोलन' ने इन विस्थापितों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया।

निष्कर्ष: विकास परियोजनाओं में विस्थापितों के पुनर्वास की उचित व्यवस्था होनी चाहिए और उनकी सहमति अनिवार्य होनी चाहिए।
2लेखक ने दुर्घटनाग्रस्त मजदूरों को अस्पताल पहुँचाने में मदद की है। आपकी दृष्टि में दुर्घटना-राहत और बचाव कार्य के लिए क्या-क्या करना चाहिए?Show solution
दुर्घटना-राहत और बचाव कार्य के लिए आवश्यक उपाय:

(i) तत्काल प्राथमिक चिकित्सा:
- दुर्घटनास्थल पर तुरंत प्राथमिक उपचार देना चाहिए।
- प्रत्येक औद्योगिक क्षेत्र में प्रशिक्षित प्राथमिक चिकित्सा दल होना चाहिए।

(ii) आपातकालीन संपर्क:
- एम्बुलेंस, पुलिस और अग्निशमन सेवाओं को तुरंत सूचित करना चाहिए।
- हेल्पलाइन नंबर (108, 112) का व्यापक प्रचार होना चाहिए।

(iii) अस्पताल तक पहुँचाना:
- घायलों को सुरक्षित तरीके से निकटतम अस्पताल पहुँचाना चाहिए।
- रक्तदान शिविर और रक्त-बैंक की व्यवस्था होनी चाहिए।

(iv) प्रशिक्षण:
- स्थानीय लोगों को प्राथमिक चिकित्सा और बचाव कार्य का प्रशिक्षण देना चाहिए।
- स्कूलों और कॉलेजों में आपदा-प्रबंधन की शिक्षा होनी चाहिए।

(v) सरकारी व्यवस्था:
- औद्योगिक क्षेत्रों में अनिवार्य रूप से चिकित्सा केंद्र होने चाहिए।
- मजदूरों का बीमा और मुआवजे की व्यवस्था होनी चाहिए।

निष्कर्ष: दुर्घटना-राहत के लिए व्यक्तिगत सजगता, सामुदायिक सहयोग और सरकारी तंत्र — तीनों का समन्वय आवश्यक है।
3अपने क्षेत्र की पर्यावरण संबंधी समस्याओं और उनके समाधान हेतु संभावित उपायों पर एक रिपोर्ट तैयार कीजिए।Show solution
क्षेत्रीय पर्यावरण समस्याओं पर रिपोर्ट (नमूना)

क्षेत्र: दिल्ली-एनसीआर (विद्यार्थी अपने क्षेत्र के अनुसार परिवर्तन कर सकते हैं)

प्रमुख पर्यावरण समस्याएँ:

(i) वायु प्रदूषण: वाहनों, कारखानों और पराली जलाने से वायु प्रदूषण गंभीर स्तर पर है। AQI (वायु गुणवत्ता सूचकांक) प्रायः खतरनाक स्तर पर रहता है।

(ii) जल प्रदूषण: यमुना नदी में औद्योगिक और घरेलू कचरा बहाया जाता है। भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है।

(iii) ठोस कचरा: कूड़े के पहाड़ बन रहे हैं। कचरे का उचित निपटान नहीं हो रहा।

(iv) हरित क्षेत्र का ह्रास: निर्माण कार्यों के लिए पेड़ काटे जा रहे हैं।

समाधान के उपाय:
- सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देना और इलेक्ट्रिक वाहनों का उपयोग
- कारखानों में प्रदूषण नियंत्रण उपकरण अनिवार्य करना
- वृक्षारोपण अभियान चलाना
- जल-संरक्षण और वर्षा-जल संचयन
- कचरे का वैज्ञानिक निपटान और पुनर्चक्रण
- पर्यावरण-शिक्षा का प्रसार

निष्कर्ष: पर्यावरण-संरक्षण के लिए सरकार, उद्योग और नागरिक — सभी को मिलकर प्रयास करने होंगे।

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Frequently Asked Questions

What are the important topics in जहाँ कोई वापसी नहीं (निर्मल वर्मा) for Nagaland Board Class 12 Hindi?
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How to score full marks in जहाँ कोई वापसी नहीं (निर्मल वर्मा) — Nagaland Board Class 12 Hindi?
Understand the core concepts first, then work through the 41 practice questions available for this chapter. Revise formulas and definitions regularly, and use flashcards for quick recall before the exam.
Where can I get free NCERT Solutions for जहाँ कोई वापसी नहीं (निर्मल वर्मा) Class 12 Hindi?
This page has free step-by-step NCERT Solutions for every exercise question in जहाँ कोई वापसी नहीं (निर्मल वर्मा) (Nagaland Board Class 12 Hindi) — written the way examiners award marks: given, formula, working, answer.

Sources & Official References

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