बारहमासा (मलिक मुहम्मद जायसी) — NCERT Solutions
Nagaland Board · Class 12 · Hindi
NCERT Solutions for बारहमासा (मलिक मुहम्मद जायसी), Nagaland Board Class 12 Hindi: 11 textbook questions solved step by step.
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प्रश्न-अभ्यास — बारहमासा (मलिक मुहम्मद जायसी)
1अगहन मास की विशेषता बताते हुए विरहिणी (नागमती) की व्यथा-कथा का चित्रण अपने शब्दों में कीजिए।Show solution
दिया गया है: मलिक मुहम्मद जायसी कृत 'बारहमासा' में अगहन मास का वर्णन।
अगहन मास की विशेषता:
अगहन (मार्गशीर्ष) का महीना शीत ऋतु का आरंभ होता है। इस मास में ठंड बढ़ने लगती है, रातें लंबी और दिन छोटे हो जाते हैं। प्रकृति में एक प्रकार की सुस्ती और शीतलता छा जाती है। खेतों में फसल पकने लगती है और वातावरण में हल्की-हल्की ठंडक घर करने लगती है।
विरहिणी नागमती की व्यथा:
अगहन मास में जब सामान्य स्त्रियाँ अपने पतियों के साथ शीत का आनंद लेती हैं, तब नागमती का प्रिय (रत्नसेन) उससे दूर है। ठंड की रातें उसके लिए और भी असह्य हो जाती हैं। शीतल हवाएँ उसके विरह की आग को और भड़काती हैं। जहाँ दूसरी स्त्रियाँ अपने पतियों की गर्म बाँहों में सिमटती हैं, वहाँ नागमती अकेली ठिठुरती रहती है। उसका हृदय विरह की पीड़ा से व्याकुल है। ठंड का प्रत्येक झोंका उसे प्रिय की याद दिलाता है और उसकी वेदना को और गहरा कर देता है। इस प्रकार अगहन मास की शीतलता विरहिणी के लिए काल के समान बन जाती है।
2'जीयत खाइ मुएँ नहिं छाँड़ा' पंक्ति के संदर्भ में नायिका की विरह-दशा का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।Show solution
दिया गया है: 'जीयत खाइ मुएँ नहिं छाँड़ा' — यह पंक्ति विरहिणी नागमती की दारुण दशा का चित्रण करती है।
व्याख्या एवं विरह-दशा का वर्णन:
इस पंक्ति में नागमती कहती है कि विरह की अग्नि ऐसी निर्मम है जो जीते-जी उसे खाए जा रही है और मरने पर भी उसका पीछा नहीं छोड़ती। अर्थात् विरह की पीड़ा इतनी गहरी और असह्य है कि न जीने में चैन है, न मरने में मुक्ति।
नायिका की दशा अत्यंत दयनीय है — उसका शरीर विरह की आग में जल-जलकर क्षीण हो गया है। रक्त सूख गया है, माँस गल गया है और हड्डियाँ शंख के समान सफेद हो गई हैं। वह सारस पक्षी की भाँति अपने प्रिय को पुकार-पुकारकर तड़प रही है। विरह उसे जीवित रहते हुए भी नष्ट कर रहा है। यह पंक्ति विरह की उस चरम अवस्था को व्यक्त करती है जहाँ जीवन और मृत्यु दोनों ही पीड़ादायक हो जाते हैं। नायिका के लिए विरह एक ऐसा शत्रु है जो न जीने देता है, न मरने देता है — यही उसकी सबसे बड़ी त्रासदी है।
3माघ महीने में विरहिणी को क्या अनुभूति होती है?Show solution
दिया गया है: 'बारहमासा' में माघ मास का वर्णन (छंद 3)।
माघ महीने में विरहिणी की अनुभूति:
माघ का महीना शीत ऋतु का सबसे कठोर महीना होता है। इस मास में विरहिणी नागमती को निम्नलिखित अनुभूतियाँ होती हैं —
- पाले की मार: माघ में पाला पड़ने लगता है। विरहिणी के लिए यह पाला विरह-काल (मृत्यु के समान) बन जाता है।
- कँपकँपी और भय: तन पर रुई के वस्त्र ओढ़ने पर भी हृदय थर-थर काँपता रहता है। ठंड इतनी असह्य है कि कोई उपाय काम नहीं आता।
- सूर्य (पति) की कामना: वह कहती है कि यदि उसका प्रिय (सूर्य के समान) आ जाए तो उसके शरीर की ठंड दूर हो सकती है। पति के बिना माघ की ठंड से मुक्ति संभव नहीं।
- नेत्रों से अश्रुपात: उसके नेत्रों से आँसू इस प्रकार बहते हैं जैसे माघ मास में माहुट (माघ की वर्षा) का जल बहता है। वे आँसू शरीर पर लगकर तीर की तरह चुभते हैं।
- ओलों की मार: विरह की पीड़ा ओलों की बूँदों की तरह टूट-टूटकर गिरती है और विरह की पवन झकझोर देती है।
इस प्रकार माघ मास में विरहिणी की पीड़ा चरम पर होती है — बाहर की ठंड और भीतर की विरह-अग्नि दोनों मिलकर उसे असह्य यातना देते हैं।
4वृक्षों से पत्तियाँ तथा वनों से ढाँखें किस माह में गिरते हैं? इससे विरहिणी का क्या संबंध है?Show solution
दिया गया है: 'बारहमासा' का चौथा छंद जिसमें फागुन मास का वर्णन है।
माह का नाम:
वृक्षों से पत्तियाँ तथा वनों से ढाँखें (झाड़ियाँ/पत्तियाँ) फागुन (फाल्गुन) मास में गिरती हैं। फागुन में बसंत ऋतु के आगमन से पहले पुराने पत्ते झड़ जाते हैं, वृक्ष पत्रहीन हो जाते हैं और वन की शाखाएँ फूल-फल से रहित हो जाती हैं।
विरहिणी से संबंध:
कवि ने प्रकृति के इस दृश्य को विरहिणी की दशा से जोड़ा है —
- जिस प्रकार वृक्ष पत्तों के झड़ने से सूना और निर्जीव हो जाता है, उसी प्रकार विरहिणी नागमती का तन-मन प्रिय के वियोग में सूना और निस्तेज हो गया है।
- उसका शरीर पीले पत्ते की भाँति हो गया है — पीला, कमज़ोर और मुरझाया हुआ।
- जब सारी वनस्पति नए उल्लास से भर उठती है और लोग फाग खेलते हैं, होली मनाते हैं, तब विरहिणी के लिए यह उत्सव होली की आग की तरह जलाने वाला बन जाता है।
- प्रकृति का यह पतझड़ विरहिणी के जीवन के पतझड़ का प्रतीक है — जैसे शाखाएँ फूल-फल से रहित हो गई हैं, वैसे ही उसका जीवन प्रेम और सुख से रहित हो गया है।
इस प्रकार प्रकृति का पतझड़ और विरहिणी का वियोग एक-दूसरे के पूरक बनकर काव्य में गहरी संवेदना उत्पन्न करते हैं।
5(क)निम्नलिखित पंक्तियों की व्याख्या कीजिए —
(क) पिय सौं कहेहु सँदेसड़ा, ऐ भँवरा ऐ काग।
सो धनि बिरहें जरि मुई, तेहिक धुआँ हम लाग।Show solution
प्रसंग: यह पंक्ति मलिक मुहम्मद जायसी के 'पद्मावत' के 'नागमती वियोग खंड' से ली गई है। विरहिणी नागमती भँवरे और कौए को संदेशवाहक बनाकर अपने प्रिय रत्नसेन को संदेश भेजना चाहती है।
व्याख्या:
नागमती भँवरे और कौए से कहती है — हे भँवरे! हे कौए! तुम मेरे प्रिय (रत्नसेन) के पास जाकर यह संदेश कहना कि उसकी प्रिया (नागमती) विरह की अग्नि में जल-जलकर मर गई है और उसके जलने का धुआँ (अर्थात् उसकी विरह-वेदना की गंध/स्मृति) अब भी वातावरण में व्याप्त है।
काव्य-सौंदर्य:
- 'धुआँ हम लाग' अत्यंत मार्मिक बिम्ब है — जैसे जलती हुई वस्तु का धुआँ दूर-दूर तक फैलता है, वैसे ही विरहिणी की पीड़ा की गंध उसके प्रिय तक पहुँचे।
- भँवरा और काग (कौआ) — दोनों पारंपरिक संदेशवाहक हैं। भँवरा प्रेम का प्रतीक है और कौआ शकुन का।
- 'जरि मुई' में विरह की चरम अवस्था का चित्रण है।
- यह पंक्ति विरहिणी की असहाय दशा और प्रिय के प्रति गहरे प्रेम को एक साथ व्यक्त करती है।
5(ख)निम्नलिखित पंक्तियों की व्याख्या कीजिए —
(ख) रकत ढरा माँसू गरा, हाड़ भए सब संख।
धनि सारस होइ ररि मुई, आइ समेटहु पंख।।Show solution
प्रसंग: यह पंक्ति 'बारहमासा' के कार्तिक मास के वर्णन से संबंधित है जहाँ विरहिणी नागमती की शारीरिक और मानसिक दशा का मार्मिक चित्रण किया गया है।
व्याख्या:
नागमती कहती है — विरह की अग्नि में जलते-जलते उसका रक्त सूख गया है, माँस गल गया है और हड्डियाँ शंख की भाँति सफेद हो गई हैं। वह सारस पक्षी की तरह अपने प्रिय को रट-रटकर (पुकार-पुकारकर) मर गई है। अब वह अपने प्रिय से कहती है — आओ और मेरे पंखों को (अर्थात् मेरे अवशेषों को) समेट लो।
काव्य-सौंदर्य:
- 'रकत ढरा, माँसू गरा, हाड़ भए संख' — यह क्रमिक शारीरिक क्षय का अत्यंत यथार्थ और मार्मिक चित्रण है।
- सारस का प्रतीक अत्यंत सार्थक है — सारस अपने जोड़े के बिछड़ने पर रट-रटकर प्राण त्याग देता है। यह विरहिणी की एकनिष्ठ प्रेम-भावना का प्रतीक है।
- 'हाड़ भए सब संख' में उपमा अलंकार है।
- 'ररि मुई' में विरह की पराकाष्ठा है।
- यह पंक्ति शारीरिक वर्णन के माध्यम से आत्मिक पीड़ा को व्यक्त करती है — यही जायसी की काव्य-कला की विशेषता है।
(ग) तुम्ह बिनु कंता धनि हरुई, तन तिनुवर भा डोल।
तेहि पर बिरह जराई कै, चहै उड़ावा झोल।।
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(घ) यह तन जारौं छार कै, कहौं कि पवन उड़ाउ।
मकु तेहि मारग होइ परौं, कंत धरैं जहाँ पाउ।।
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