नमक का दारोगा (प्रेमचंद) — NCERT Solutions
CBSE · Class 11 · Hindi
NCERT Solutions for नमक का दारोगा (प्रेमचंद), CBSE Class 11 Hindi: 24 textbook questions solved step by step. Part of the CBSE Class 11 Hindi syllabus.
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पाठ के साथ
1कहानी का कौन-सा पात्र आपको सर्वाधिक प्रभावित करता है और क्यों?Show solution
सर्वाधिक प्रभावशाली पात्र — वंशीधर
इस कहानी में वंशीधर का पात्र मुझे सर्वाधिक प्रभावित करता है। इसके निम्नलिखित कारण हैं—
- ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा: वंशीधर एक ऐसे युग में जब भ्रष्टाचार सामान्य बात थी, अपने कर्तव्य पर अडिग रहा। उसने धन के लालच में आकर पंडित अलोपीदीन जैसे प्रभावशाली व्यक्ति को नहीं छोड़ा।
- दबाव में न झुकना: जब पूरा प्रशासन, वकील, भीड़ और यहाँ तक कि उसके अधिकारी भी अलोपीदीन के पक्ष में थे, तब भी वंशीधर ने अपना निर्णय नहीं बदला।
- नैतिक साहस: नौकरी जाने के बाद भी उसने अपनी ईमानदारी पर पछतावा नहीं किया। यह उसके दृढ़ चरित्र का प्रमाण है।
- आदर्श का प्रतीक: वह प्रेमचंद के उस आदर्श पुरुष का प्रतिनिधित्व करता है जो धर्म को धन से ऊँचा मानता है।
इस प्रकार वंशीधर का पात्र ईमानदारी, साहस और नैतिकता का जीवंत उदाहरण है, जो पाठक को गहराई से प्रभावित करता है।
2'नमक का दारोगा' कहानी में पंडित अलोपीदीन के व्यक्तित्व के कौन से दो पहलू (पक्ष) उभरकर आते हैं?Show solution
पंडित अलोपीदीन के व्यक्तित्व के दो प्रमुख पहलू निम्नलिखित हैं—
पहला पहलू — धन का दुरुपयोग करने वाला भ्रष्ट व्यक्ति:
अलोपीदीन एक धनी जमींदार हैं जो अपने धन के बल पर कानून को भी खरीद लेते हैं। वे नमक की अवैध तस्करी करते हैं और पकड़े जाने पर अपने वकीलों तथा धन के माध्यम से न्यायालय से बरी हो जाते हैं। उनके लिए न्याय और नीति सब धन के खिलौने हैं। यह पहलू उनके नकारात्मक चरित्र को दर्शाता है।
दूसरा पहलू — ईमानदारी का सम्मान करने वाला विवेकशील व्यक्ति:
कहानी के अंत में अलोपीदीन का दूसरा और सकारात्मक पहलू सामने आता है। वे वंशीधर की ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा से इतने प्रभावित होते हैं कि उन्हें अपनी सारी संपत्ति का स्थायी मैनेजर नियुक्त करते हैं। वे कहते हैं कि ऐसे बेदाग, ऐसे उज्ज्वल रत्न की उन्हें तलाश थी। यह पहलू उनके विवेक और सच्चे मूल्यों की पहचान को दर्शाता है।
इस प्रकार अलोपीदीन एक जटिल पात्र हैं जिनमें भ्रष्टाचार और ईमानदारी के प्रति सम्मान — दोनों एक साथ विद्यमान हैं।
3कहानी के लगभग सभी पात्र समाज की किसी-न-किसी सच्चाई को उजागर करते हैं। निम्नलिखित पात्रों के संदर्भ में पाठ से उस अंश को उद्धृत करते हुए बताइए कि यह समाज की किस सच्चाई को उजागर करते हैं— (क) वृद्ध मुंशी (ख) वकील (ग) शहर की भीड़Show solution
(क) वृद्ध मुंशी:
वृद्ध मुंशी वंशीधर के पिता हैं। वे समाज की उस सच्चाई को उजागर करते हैं जहाँ अनुभवी और बुजुर्ग लोग भी भ्रष्टाचार को जीवन की वास्तविकता मानकर स्वीकार कर लेते हैं। वे अपने पुत्र को सलाह देते हैं—
"नौकरी में ओहदे की ओर ध्यान मत देना, यह तो पीर का मजार है। निगाह चढ़ावे और चादर पर रखनी चाहिए। ऊपरी आय बहता हुआ स्रोत है जिससे सदैव प्यास बुझती है।"
यह अंश समाज की उस कड़वी सच्चाई को उजागर करता है जहाँ भ्रष्टाचार को न केवल स्वीकार किया जाता है, बल्कि उसे अपनाने की सीख भी दी जाती है। जब वंशीधर ने ईमानदारी दिखाई तो उन्होंने कहा — "खेद ऐसी समझ पर! पढ़ना-लिखना सब अकारथ गया।" यह दर्शाता है कि समाज में शिक्षा का मूल्यांकन भी भ्रष्ट मानदंडों से होता है।
(ख) वकील:
वकील समाज की उस सच्चाई को उजागर करते हैं जहाँ कानून और न्याय भी धन के सामने झुक जाते हैं। अलोपीदीन के पक्ष में वकीलों की पूरी फौज खड़ी हो जाती है। पाठ में उल्लेख है कि अलोपीदीन के पक्ष में शहर के सबसे प्रतिष्ठित वकील थे जो अपनी वाचालता और तर्कों से न्यायालय में सच को झूठ और झूठ को सच साबित कर देते हैं। यह दर्शाता है कि न्याय व्यवस्था में भी धन का वर्चस्व है और वकील अपनी विद्वत्ता का उपयोग सत्य की रक्षा के लिए नहीं, बल्कि धनवानों की सेवा के लिए करते हैं।
(ग) शहर की भीड़:
शहर की भीड़ समाज की उस मानसिकता को उजागर करती है जो शक्तिशाली और धनवान व्यक्ति के साथ खड़ी हो जाती है, चाहे वह गलत ही क्यों न हो। पाठ में लिखा है—
"इसलिए नहीं कि अलोपीदीन ने क्यों यह कर्म किया बल्कि इसलिए कि वह कानून के पंजे में कैसे आए... प्रत्येक मनुष्य उनसे सहानुभूति प्रकट करता था।"
यह अंश दर्शाता है कि समाज में नैतिकता और न्याय की परवाह कम लोगों को होती है। भीड़ अपराधी के प्रति सहानुभूति रखती है क्योंकि वह धनवान और प्रभावशाली है। यह भीड़ की मानसिकता समाज की एक कटु सच्चाई है।
4निम्न पंक्तियों को ध्यान से पढ़िए— 'नौकरी में ओहदे की ओर ध्यान मत देना...' (क) यह किसकी उक्ति है? (ख) मासिक वेतन को पूर्णमासी का चाँद क्यों कहा गया है? (ग) क्या आप एक पिता के इस वक्तव्य से सहमत हैं?Show solution
(क) यह किसकी उक्ति है?
यह उक्ति वंशीधर के वृद्ध पिता (वृद्ध मुंशी) की है। जब वंशीधर को नमक विभाग में दारोगा की नौकरी मिलती है, तब उसके पिता उसे विदाई के समय यह व्यावहारिक (किंतु भ्रष्ट) सलाह देते हैं।
(ख) मासिक वेतन को पूर्णमासी का चाँद क्यों कहा गया है?
मासिक वेतन को पूर्णमासी के चाँद की उपमा इसलिए दी गई है क्योंकि—
- पूर्णमासी का चाँद महीने में केवल एक बार दिखाई देता है और उसके बाद धीरे-धीरे घटता जाता है और अंततः अमावस्या को लुप्त हो जाता है।
- उसी प्रकार मासिक वेतन भी महीने में एक बार मिलता है और घर-खर्च, परिवार की जरूरतों में खर्च होते-होते महीने के अंत तक समाप्त हो जाता है।
- इस उपमा के माध्यम से वृद्ध मुंशी यह कहना चाहते हैं कि केवल वेतन पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है, इसलिए 'ऊपरी आय' (रिश्वत) भी लेनी चाहिए।
यह उपमा भाषा की दृष्टि से अत्यंत सटीक और चित्रात्मक है।
(ग) क्या आप एक पिता के इस वक्तव्य से सहमत हैं?
नहीं, मैं इस वक्तव्य से सहमत नहीं हूँ। इसके निम्नलिखित कारण हैं—
- यह वक्तव्य भ्रष्टाचार को प्रोत्साहित करता है। 'ऊपरी आय' वास्तव में रिश्वत है जो अनैतिक और गैरकानूनी है।
- एक पिता का कर्तव्य है कि वह अपने पुत्र को नैतिक मूल्यों की शिक्षा दे, न कि भ्रष्टाचार की।
- यदि प्रत्येक व्यक्ति इसी सोच को अपना ले तो समाज में ईमानदारी और न्याय का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा।
- वंशीधर ने इस सलाह को नहीं माना और अंत में उसकी ईमानदारी ही उसकी सबसे बड़ी शक्ति बनी — यही कहानी का मूल संदेश है।
हालाँकि यह वक्तव्य उस समय की सामाजिक परिस्थितियों और एक पिता की चिंता को दर्शाता है, फिर भी यह नैतिक दृष्टि से अस्वीकार्य है।
5'नमक का दारोगा' कहानी के कोई दो अन्य शीर्षक बताते हुए उसके आधार को भी स्पष्ट कीजिए।Show solution
इस कहानी के दो अन्य संभावित शीर्षक निम्नलिखित हो सकते हैं—
पहला वैकल्पिक शीर्षक — 'धर्म की जीत'
आधार: इस कहानी का मूल संघर्ष धर्म (ईमानदारी, नैतिकता) और धन (भ्रष्टाचार, लालच) के बीच है। पाठ में स्पष्ट लिखा है — "न्याय के मैदान में धर्म और धन में युद्ध ठन गया।" और अंत में "धर्म ने धन को पैरों तले कुचल डाला।" वंशीधर की ईमानदारी अंततः विजयी होती है — अलोपीदीन उसे मैनेजर नियुक्त करते हैं। अतः 'धर्म की जीत' शीर्षक कहानी के केंद्रीय भाव को पूर्णतः व्यक्त करता है।
दूसरा वैकल्पिक शीर्षक — 'ईमानदारी का पुरस्कार'
आधार: इस कहानी में वंशीधर की ईमानदारी को ही अंततः पुरस्कृत किया जाता है। उसने धन, दबाव और नौकरी जाने के भय के बावजूद अपनी ईमानदारी नहीं छोड़ी। कहानी का अंत इस बात का प्रमाण है कि ईमानदारी का पुरस्कार अवश्य मिलता है — अलोपीदीन ने उसे अपनी सारी संपत्ति का मैनेजर बनाया। अतः 'ईमानदारी का पुरस्कार' शीर्षक भी कहानी के संदेश को सटीक रूप से व्यक्त करता है।
6कहानी के अंत में अलोपीदीन के वंशीधर को मैनेजर नियुक्त करने के पीछे क्या कारण हो सकते हैं? तर्क सहित उत्तर दीजिए। आप इस कहानी का अंत किस प्रकार करते?Show solution
अलोपीदीन द्वारा वंशीधर को मैनेजर नियुक्त करने के कारण:
- ईमानदारी में विश्वास: अलोपीदीन एक अनुभवी व्यापारी थे। उन्होंने जीवन में देखा था कि धन से सब कुछ खरीदा जा सकता है, परंतु वंशीधर ने उनके धन को ठुकरा दिया। ऐसे ईमानदार व्यक्ति पर वे अपनी संपत्ति का भार सौंप सकते थे।
- व्यावहारिक बुद्धि: अलोपीदीन जानते थे कि जो व्यक्ति उनकी रिश्वत नहीं ले सकता, वह उनकी संपत्ति में भी हेराफेरी नहीं करेगा। एक ईमानदार मैनेजर उनकी संपत्ति की सबसे अच्छी रक्षा कर सकता है।
- पश्चाताप और सम्मान: अलोपीदीन के मन में वंशीधर के प्रति सम्मान था। उन्होंने स्वयं कहा — "ऐसे बेदाग, ऐसे उज्ज्वल रत्न की मुझे तलाश थी।" यह उनके हृदय की सच्ची भावना थी।
- सामाजिक प्रतिष्ठा: एक ईमानदार मैनेजर रखने से समाज में उनकी प्रतिष्ठा भी बढ़ती।
यदि मैं कहानी का अंत करता:
मैं कहानी का अंत इस प्रकार करता — वंशीधर अलोपीदीन का प्रस्ताव स्वीकार करता, परंतु एक शर्त के साथ कि वह अपने काम में पूर्ण स्वतंत्रता और ईमानदारी से काम करेगा और किसी भी अवैध कार्य में भागीदार नहीं बनेगा। अलोपीदीन यह शर्त मान लेते और धीरे-धीरे वंशीधर के प्रभाव से स्वयं भी ईमानदारी की राह पर चलने लगते। इस प्रकार कहानी का अंत केवल व्यक्तिगत विजय तक सीमित न रहकर सामाजिक परिवर्तन का संदेश भी देता।
पाठ के आस-पास
1दारोगा वंशीधर गैरकानूनी कार्यों की वजह से पंडित अलोपीदीन को गिरफ्तार करता है, लेकिन कहानी के अंत में इसी पंडित अलोपीदीन की सहृदयता पर मुग्ध होकर उसके यहाँ मैनेजर की नौकरी को तैयार हो जाता है। आपके विचार से वंशीधर का ऐसा करना उचित था? आप उसकी जगह होते तो क्या करते?Show solution
वंशीधर का निर्णय — उचित या अनुचित:
वंशीधर का यह निर्णय एक जटिल प्रश्न उठाता है। एक दृष्टि से यह उचित प्रतीत होता है क्योंकि—
- अलोपीदीन ने वंशीधर की ईमानदारी को सच्चे मन से सम्मान दिया।
- वंशीधर के पास परिवार की जिम्मेदारी थी और नौकरी जाने के बाद उसे आजीविका की आवश्यकता थी।
- मैनेजर के पद पर रहकर वह ईमानदारी से काम कर सकता था।
परंतु दूसरी दृष्टि से यह प्रश्नास्पद भी है क्योंकि—
- जिस व्यक्ति को उसने अपराधी मानकर गिरफ्तार किया, उसी के यहाँ नौकरी करना एक नैतिक विरोधाभास है।
- इससे यह संदेश जा सकता है कि धनवान व्यक्ति अंततः सब कुछ अपने पक्ष में कर लेता है।
यदि मैं वंशीधर की जगह होता:
मैं भी संभवतः यह नौकरी स्वीकार करता, परंतु स्पष्ट शर्तों के साथ। मैं अलोपीदीन से कहता कि मैं केवल ईमानदारी और नैतिकता के दायरे में काम करूँगा। यदि कभी मुझे किसी अवैध कार्य में भाग लेने को कहा गया तो मैं तुरंत नौकरी छोड़ दूँगा। इस प्रकार मैं अपने आत्मसम्मान और नैतिकता को बनाए रखते हुए परिवार की जिम्मेदारी भी निभाता।
2नमक विभाग के दारोगा पद के लिए बड़ों-बड़ों का जी ललचाता था। वर्तमान समाज में ऐसा कौन-सा पद होगा जिसे पाने के लिए लोग लालायित रहते होंगे और क्यों?Show solution
वर्तमान समाज में ऐसे कई पद हैं जिन्हें पाने के लिए लोग लालायित रहते हैं। इनमें प्रमुख हैं—
- सरकारी अधिकारी (IAS/IPS): इन पदों पर व्यापक अधिकार, सामाजिक प्रतिष्ठा और सुरक्षित भविष्य होता है। इन पदों पर रहते हुए कुछ लोग अपने प्रभाव का दुरुपयोग भी करते हैं।
- नगर निगम/पंचायत के पद: इन पदों पर ठेके, परमिट और लाइसेंस देने का अधिकार होता है, जिससे 'ऊपरी आय' की संभावना रहती है।
- राजनीतिक पद (विधायक/सांसद): इन पदों पर सत्ता, धन और प्रतिष्ठा तीनों मिलती हैं।
लोग इन पदों के लिए लालायित क्यों रहते हैं:
- इन पदों पर नियमित वेतन के अतिरिक्त अन्य सुविधाएँ और अधिकार मिलते हैं।
- सामाजिक प्रतिष्ठा और प्रभाव मिलता है।
- कुछ लोग इन पदों का उपयोग व्यक्तिगत लाभ के लिए करते हैं।
यह स्थिति दर्शाती है कि प्रेमचंद की कहानी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है।
3अपने अनुभवों के आधार पर बताइए कि जब आपके तर्कों ने आपके भ्रम को पुष्ट किया हो।Show solution
यह प्रश्न व्यक्तिगत अनुभव पर आधारित है। एक उदाहरण के रूप में—
एक बार परीक्षा की तैयारी के दौरान मुझे लगा कि एक विशेष अध्याय परीक्षा में नहीं आएगा क्योंकि पिछले वर्षों में उससे प्रश्न नहीं पूछे गए थे। मैंने अपने इस भ्रम को तर्कों से पुष्ट किया — 'पिछले तीन वर्षों में यह अध्याय नहीं आया', 'शिक्षक ने भी इस पर कम ध्यान दिया', 'यह अध्याय कठिन है इसलिए परीक्षक इसे नहीं पूछेंगे।' इन सभी तर्कों ने मेरे भ्रम को और मजबूत किया और मैंने वह अध्याय नहीं पढ़ा। परीक्षा में उसी अध्याय से प्रश्न आया और मैं उत्तर नहीं दे सका।
इस अनुभव से मुझे समझ आया कि जब हम किसी निष्कर्ष पर पहले से पहुँच जाते हैं, तो हमारा मन उसी के पक्ष में तर्क ढूँढने लगता है। यही 'तर्क ने भ्रम को पुष्ट किया' का अर्थ है।
4'पढ़ना-लिखना सब अकारथ गया।' वृद्ध मुंशी जी द्वारा यह बात एक विशिष्ट संदर्भ में कही गई थी। अपने निजी अनुभवों के आधार पर बताइए— (क) जब आपको पढ़ना-लिखना व्यर्थ लगा हो। (ख) जब आपको पढ़ना-लिखना सार्थक लगा हो। (ग) 'पढ़ना-लिखना' को किस अर्थ में प्रयुक्त किया गया होगा : साक्षरता अथवा शिक्षा?Show solution
(क) जब पढ़ना-लिखना व्यर्थ लगा:
एक बार जब मैंने बहुत परिश्रम से परीक्षा की तैयारी की, परंतु परीक्षा में प्रश्नपत्र अपेक्षा से अलग आया और परिणाम अच्छा नहीं रहा, तब ऐसा लगा कि इतनी मेहनत व्यर्थ गई। इसी प्रकार जब कभी देखते हैं कि कम पढ़े-लिखे लोग अनुचित तरीकों से अधिक सफल हो जाते हैं, तब भी पढ़ाई व्यर्थ लगती है।
(ख) जब पढ़ना-लिखना सार्थक लगा:
जब किसी कठिन समस्या का समाधान अपने ज्ञान और विवेक से किया, जब किसी को सही जानकारी देकर उसकी मदद की, जब किसी प्रतियोगिता में सफलता मिली — तब पढ़ाई सार्थक लगी। शिक्षा ने न केवल रोजगार दिलाया बल्कि सही-गलत की पहचान करने की शक्ति भी दी।
(ग) 'पढ़ना-लिखना' का अर्थ — साक्षरता या शिक्षा:
वृद्ध मुंशी के संदर्भ में 'पढ़ना-लिखना' का अर्थ शिक्षा से है, न कि केवल साक्षरता से। वे यह कह रहे थे कि इतनी शिक्षा पाकर भी वंशीधर ने व्यावहारिक बुद्धि नहीं सीखी — रिश्वत लेना नहीं सीखा।
साक्षरता और शिक्षा में अंतर: साक्षरता का अर्थ है पढ़ने-लिखने की क्षमता, जबकि शिक्षा का अर्थ है ज्ञान, विवेक, नैतिकता और जीवन-मूल्यों का विकास। ये दोनों समान नहीं हैं। एक व्यक्ति साक्षर हो सकता है परंतु शिक्षित नहीं, और कभी-कभी एक अनपढ़ व्यक्ति भी अपने अनुभव और विवेक से शिक्षित व्यक्ति से अधिक समझदार हो सकता है।
5'लड़कियाँ हैं, वह घास-फूस की तरह बढ़ती चली जाती हैं।' वाक्य समाज में लड़कियों की स्थिति की किस वास्तविकता को प्रकट करता है?Show solution
यह वाक्य समाज में लड़कियों की स्थिति की निम्नलिखित कटु वास्तविकताओं को प्रकट करता है—
- उपेक्षा और तुच्छता का भाव: 'घास-फूस' की उपमा दर्शाती है कि उस समय के समाज में लड़कियों को महत्त्वहीन और बोझ समझा जाता था। जैसे घास-फूस अपने आप उगती है और उस पर कोई ध्यान नहीं देता, वैसे ही लड़कियों की परवरिश पर ध्यान नहीं दिया जाता था।
- दहेज की समस्या: वृद्ध मुंशी के लिए लड़कियों का बढ़ना आर्थिक बोझ का बढ़ना था क्योंकि उन्हें दहेज देकर विदा करना होता था।
- लिंग-भेद: यह वाक्य पितृसत्तात्मक समाज की उस मानसिकता को दर्शाता है जहाँ लड़कों को संपत्ति और लड़कियों को बोझ माना जाता था।
- आज की स्थिति: यद्यपि आज समाज में काफी परिवर्तन आया है और लड़कियाँ हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं, फिर भी कुछ स्थानों पर यह मानसिकता अभी भी विद्यमान है।
यह वाक्य प्रेमचंद की सामाजिक चेतना का प्रमाण है — वे इस मानसिकता की आलोचना करते हैं।
6'इसलिए नहीं कि अलोपीदीन ने क्यों यह कर्म किया बल्कि इसलिए कि वह कानून के पंजे में कैसे आए...' अपने आस-पास अलोपीदीन जैसे व्यक्तियों को देखकर आपकी क्या प्रतिक्रिया होगी?Show solution
यह अंश समाज की एक अत्यंत दुखद वास्तविकता को उजागर करता है। इसे पढ़कर और अपने आस-पास ऐसे व्यक्तियों को देखकर मेरी निम्नलिखित प्रतिक्रियाएँ होंगी—
- दुख और निराशा: जब समाज किसी अपराधी के प्रति इसलिए सहानुभूति रखता है क्योंकि वह धनवान है, तो यह न्याय व्यवस्था और सामाजिक मूल्यों के पतन का संकेत है। यह देखकर मन में गहरी निराशा होती है।
- क्रोध: जब ईमानदार व्यक्ति को दंड मिलता है और भ्रष्ट व्यक्ति को सहानुभूति — यह अन्याय क्रोध उत्पन्न करता है।
- सजगता: ऐसे व्यक्तियों को देखकर मैं सजग रहूँगा कि उनके प्रभाव में न आऊँ और उनके अवैध कार्यों में सहयोग न करूँ।
- सकारात्मक प्रयास: मैं अपने स्तर पर ईमानदारी का समर्थन करूँगा और यदि संभव हो तो ऐसे व्यक्तियों के विरुद्ध उचित कानूनी मार्ग अपनाऊँगा।
- सामाजिक जागरूकता: समाज को यह समझाने का प्रयास करूँगा कि धन और शक्ति के आधार पर किसी के अपराध को उचित नहीं ठहराया जा सकता।
प्रेमचंद का यह अंश आज भी उतना ही प्रासंगिक है — धनवान और प्रभावशाली लोगों के प्रति समाज की यह अंध-सहानुभूति एक गंभीर सामाजिक समस्या है।
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What are the important topics in नमक का दारोगा (प्रेमचंद) for CBSE Class 11 Hindi?
Are these NCERT Solutions for नमक का दारोगा (प्रेमचंद) free?
How should I revise नमक का दारोगा (प्रेमचंद) for Class 11 exams?
Sources & Official References
- NCERT Official — ncert.nic.in
- CBSE Academic — cbseacademic.nic.in
- CBSE Official — cbse.gov.in
- National Education Policy 2020 — education.gov.in
Content is aligned to the official syllabus. Refer to the board website for the latest curriculum.
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