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Chapter 1 of 20
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नमक का दारोगा (प्रेमचंद)

CBSE · Class 11 · Hindi

NCERT Solutions for नमक का दारोगा (प्रेमचंद) — CBSE Class 11 Hindi.

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24 Questions Solved · 5 Sections

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अभ्यास

1कहानी का कौन-सा पात्र आपको सर्वाधिक प्रभावित करता है और क्यों?Show solution
मुझे मुंशी वंशीधर सबसे अधिक प्रभावित करते हैं, क्योंकि वे ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ और निडर हैं। वे लालच के सामने झुकते नहीं और सरकारी हुक्म का पालन करते हुए अलोपीदीन जैसी बड़ी हस्ती को भी पकड़ लेते हैं। कठिन परिस्थितियों में भी वे सत्य के पक्ष में डटे रहते हैं, इसलिए उनका चरित्र प्रेरणादायक लगता है।

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2'नमक का दारोगा' कहानी में पंडित अलोपीदीन के व्यक्तित्व के कौन से दो पहलू (पक्ष) उभरकर आते हैं?Show solution
पंडित अलोपीदीन के व्यक्तित्व के दो प्रमुख पक्ष उभरते हैं—

1. धन-शक्ति और स्वार्थी प्रभावशाली व्यक्ति: वे धन के बल पर लोगों को खरीदने, दबाने और व्यवस्था को अपने पक्ष में करने में विश्वास रखते हैं।
2. अंततः धर्म और ईमानदारी के आगे झुक जाने वाला व्यक्ति: जब वंशीधर रिश्वत नहीं लेते, तो अलोपीदीन उनके ईमान से प्रभावित होते हैं और अंत में उन्हें मैनेजर नियुक्त करते हैं।

इस तरह वे चतुर, धनवान, प्रभावशाली होने के साथ-साथ सत्य और ईमानदारी का सम्मान करने वाले पात्र भी दिखाई देते हैं।

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3कहानी के लगभग सभी पात्र समाज की किसी-न-किसी सच्चाई को उजागर करते हैं। निम्नलिखित पात्रों के संदर्भ में पाठ से उस अंश को उद्धृत करते हुए बताइए कि यह समाज की किस सच्चाई को उजागर करते हैं—Show solution
- वृद्ध मुंशी: “पढ़ना-लिखना सब अकारथ गया।
- यह समाज की उस सच्चाई को उजागर करता है कि लोग ईमानदारी को नहीं, कमाई और ऊपरी आय को महत्व देते हैं। एक ईमानदार व्यक्ति का दुख भी परिवार को बोझ लगने लगता है।

- वकील: “बड़ी तत्परता से इस आक्रमण को रोकने के निमित्त वकीलों की एक सेना तैयार की गई।
- यह समाज की उस सच्चाई को उजागर करता है कि कानून और न्याय भी धनवानों के पक्ष में झुक सकते हैं; वकील पैसे वाले के लिए संगठित होकर खड़े हो जाते हैं।

- शहर की भीड़: “दुनिया सोती थी, पर दुनिया की जीभ जागती थी।
- यह समाज की उस सच्चाई को उजागर करता है कि लोग काम से कम, चर्चा और निंदा से अधिक जुड़े रहते हैं। भीड़ दूसरों के बारे में बोलने में तो जागती है, पर सच्चाई समझने में नहीं।

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4निम्न पंक्तियों को ध्यान से पढ़िए— नौकरी में ओहदे की ओर ध्यान मत देना, यह तो पीर का मज़ार है। निगाह चढ़ावे और चादर पर रखनी चाहिए। ऐसा काम ढूँढ़ना जहाँ कुछ ऊपरी आय हो। मासिक वेतन तो पूर्णमासी का चाँद है जो एक दिन दिखाई देता है और घटते-घटते लुप्त हो जाता है। ऊपरी आय बहता हुआ स्रोत है जिससे सदैव प्यास बुझती है। वेतन मनुष्य देता है, इसी से उसमें वृद्धि नहीं होती। ऊपरी आमदनी ईश्वर देता है, इसी से उसकी बरकत होती है, तुम स्वयं विद्वान हो, तुम्हें क्या समझाऊँ।Show solution
यह उक्ति मुंशीजी (वंशीधर के पिता) की है।

- मासिक वेतन को पूर्णमासी का चाँद इसलिए कहा गया है क्योंकि वह एक बार मिलता है और फिर घटते-घटते समाप्त हो जाता है
- इसके विपरीत ऊपरी आय को बहता हुआ स्रोत कहा गया है, क्योंकि वह नियमित और लगातार मिलने वाली अतिरिक्त कमाई की तरह मानी गई है।
- मैं इस वक्तव्य से सहमत नहीं हूँ, क्योंकि यह ईमानदारी के स्थान पर भ्रष्टाचार को बढ़ावा देता है। एक पिता का उद्देश्य संतान को सही मार्ग दिखाना होना चाहिए, न कि गलत कमाई की सीख देना।

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5'नमक का दारोगा' कहानी के कोई दो अन्य शीर्षक बताते हुए उसके आधार को भी स्पष्ट कीजिए।Show solution
दो अन्य उपयुक्त शीर्षक हो सकते हैं—

1. धन पर धर्म की जीत
- क्योंकि कहानी में अंततः ईमानदारी और धर्म की जीत होती है।

2. ईमानदारी का पुरस्कार
- क्योंकि वंशीधर की सच्चाई और निष्ठा का सम्मान अंत में अलोपीदीन करते हैं और उन्हें मैनेजर बनाते हैं।

इन शीर्षकों का आधार कहानी का यही संदेश है कि सत्य और ईमानदारी अंत में सम्मान पाते हैं

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6कहानी के अंत में अलोपीदीन के वंशीधर को मैनेजर नियुक्त करने के पीछे क्या कारण हो सकते हैं? तर्क सहित उत्तर दीजिए। आप इस कहानी का अंत किस प्रकार करते?Show solution
अलोपीदीन के वंशीधर को मैनेजर नियुक्त करने के पीछे कई कारण हो सकते हैं—

- वे वंशीधर की ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा से प्रभावित हुए।
- उन्हें समझ आ गया कि धन से सब कुछ नहीं खरीदा जा सकता; सत्य और चरित्र भी बड़ी शक्ति हैं।
- शायद वे वंशीधर को अपनी संपत्ति का प्रबंधक बनाकर एक ऐसे व्यक्ति को साथ रखना चाहते थे जिस पर भरोसा किया जा सके।

यदि मैं कहानी का अंत करता, तो मैं वंशीधर को ईमानदारी के पुरस्कार के रूप में किसी उच्च और सम्मानजनक सरकारी पद पर ही बने रहने देता, या फिर अलोपीदीन के लिए काम स्वीकार करने से पहले उनके चरित्र-सुधार को अधिक स्पष्ट दिखाता।

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पाठ के आस-पास

1दारोगा वंशीधर गैरकानूनी कार्यों की वजह से पंडित अलोपीदीन को गिरफ्तार करता है, लेकिन कहानी के अंत में इसी पंडित अलोपीदीन की सहृदयता पर मुग्ध होकर उसके यहाँ मैनेजर की नौकरी को तैयार हो जाता है। आपके विचार से वंशीधर का ऐसा करना उचित था? आप उसकी जगह होते तो क्या करते?Show solution
मेरे विचार से वंशीधर का अलोपीदीन के यहाँ नौकरी स्वीकार करना कुछ हद तक समझ में आने वाला, लेकिन आदर्श रूप से पूरी तरह उचित नहीं लगता। कहानी में लेखक ने दिखाया है कि अलोपीदीन अंत में वंशीधर की ईमानदारी से प्रभावित होकर उन्हें सम्मान देता है। इसलिए वंशीधर का मन पिघलना स्वाभाविक है।

फिर भी यदि मैं उनकी जगह होता, तो मैं अपनी ईमानदारी बनाए रखते हुए किसी ऐसी नौकरी को चुनता जिसमें मेरी स्वतंत्रता और स्वाभिमान बना रहे। मैं भ्रष्ट व्यवस्था के सामने झुकता नहीं, बल्कि अपने सिद्धांत पर कायम रहता।

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2नमक विभाग के दारोगा पद के लिए बड़ों-बड़ों का जी ललचाता था। वर्तमान समाज में ऐसा कौन-सा पद होगा जिसे पाने के लिए लोग लालायित रहते होंगे और क्यों?Show solution
वर्तमान समाज में उच्च प्रशासनिक पद, आईएएस/पीसीएस, बड़े सरकारी पद, या प्रतिष्ठित कॉर्पोरेट पद पाने के लिए लोग बहुत लालायित रहते हैं। इसका कारण है—

- अधिकार और प्रतिष्ठा
- अच्छी आय
- सामाजिक सम्मान
- निर्णय लेने की शक्ति

अर्थात लोग ऐसे पदों को इसलिए चाहते हैं क्योंकि उनसे सत्ता, पैसा और प्रभाव मिलता है।

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3अपने अनुभवों के आधार पर बताइए कि जब आपके तर्कों ने आपके भ्रम को पुष्ट किया हो।Show solution
कभी-कभी हम किसी बात को लेकर पहले से एक अनुमान बना लेते हैं, और फिर उसी अनुमान के पक्ष में तर्क ढूँढ़ने लगते हैं। उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति किसी दूसरे को संदिग्ध मान ले, तो वह उसकी हर छोटी-बड़ी बात को उसी संदिग्धता के प्रमाण की तरह देखने लगता है। तब तर्क भ्रम को दूर करने के बजाय उसे और मजबूत कर देता है। कहानी में वंशीधर ने रात में गाड़ियों की आवाज सुनकर पहले ही संदेह कर लिया, और फिर उसी संदेह ने उन्हें और निश्चित कर दिया।

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4पढ़ना-लिखना सब अकारथ गया। वृद्ध मुंशी जी द्वारा यह बात एक विशिष्ट संदर्भ में कही गई थी। अपने निजी अनुभवों के आधार पर बताइए—Show solution
मेरे निजी अनुभव में ऐसा तब हुआ जब मैंने किसी विषय को बिना समझे कठिन मान लिया। उदाहरण के लिए, गणित का कोई प्रश्न देखकर मुझे लगा कि यह बहुत मुश्किल है, लेकिन जब मैंने उसे चरण-दर-चरण हल किया तो वह आसान निकला। उस समय मेरे पुराने डर और गलत धारणा के कारण पढ़ना-लिखना व्यर्थ-सा लगा था।

दूसरी ओर, जब मैंने किसी परीक्षा या जीवन-समस्या में पढ़ाई से सीखी बात का उपयोग किया, तब पढ़ना-लिखना बहुत सार्थक लगा। तब समझ आया कि शिक्षा केवल परीक्षा के लिए नहीं, बल्कि सही निर्णय लेने और जीवन को बेहतर बनाने के लिए होती है।

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5लड़कियाँ हैं, वह घास-फूस की तरह बढ़ती चली जाती हैं। वाक्य समाज में लड़कियों की स्थिति की किस वास्तविकता को प्रकट करता है?Show solution
यह वाक्य समाज में लड़कियों की असुरक्षित, उपेक्षित और बोझ समझी जाने वाली स्थिति को प्रकट करता है। इसमें यह वास्तविकता झलकती है कि कई परिवारों में लड़कियों को विकासशील व्यक्ति की तरह नहीं, बल्कि ऐसी जिम्मेदारी की तरह देखा जाता है जिसे समय के साथ बस “बढ़ते” रहना है। यह सोच लैंगिक भेदभाव और पितृसत्तात्मक मानसिकता को दिखाती है।

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6इसलिए नहीं कि अलोपीदीन ने क्यों यह कर्म किया बल्कि इसलिए कि वह कानून के पंजे में कैसे आए। ऐसा मनुष्य जिसके पास असाध्य साधन करनेवाला धन और अनन्य वाचालता हो, वह क्यों कानून के पंजे में आए। प्रत्येक मनुष्य उनसे सहानुभूति प्रकट करता था। अपने आस-पास अलोपीदीन जैसे व्यक्तियों को देखकर आपकी क्या प्रतिक्रिया होगी? उपर्युक्त टिप्पणी को ध्यान में रखते हुए लिखें।Show solution
यदि मेरे आसपास अलोपीदीन जैसे व्यक्ति हों, तो मैं उनकी धन-शक्ति, चतुराई और सामाजिक प्रभाव को पहचानते हुए भी उनके गलत कार्यों का समर्थन नहीं करूँगा। मैं यह मानूँगा कि धनवान व्यक्ति भी कानून से ऊपर नहीं है।

उपर्युक्त टिप्पणी से यह बात स्पष्ट होती है कि समाज अक्सर अपराध करने वाले के बजाय उसके प्रभाव और पद को देखता है। इसलिए लोग न्याय से अधिक उसकी प्रतिष्ठा से प्रभावित हो जाते हैं। मेरी प्रतिक्रिया होगी कि मैं सत्य और न्याय के पक्ष में रहूँ, चाहे सामने कितना भी शक्तिशाली व्यक्ति क्यों न हो।

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समझाइए तो जरा

1नौकरी में ओहदे की ओर ध्यान मत देना, यह तो पीर की मजार है। निगाह चढ़ावे और चादर पर रखनी चाहिए।
2इस विस्तृत संसार में उनके लिए धैर्य अपना मित्र, बुद्धि अपनी पथप्रदर्शक और आत्मावलंबन ही अपना सहायक था।
3तर्क ने भ्रम को पुष्ट किया।
4न्याय और नीति सब लक्ष्मी के ही खिलौने हैं, इन्हें वह जैसे चाहती हैं, नचाती हैं।
5दुनिया सोती थी, पर दुनिया की जीभ जागती थी।
6खेद ऐसी समझ पर! पढ़ना-लिखना सब अकारथ गया।
7धर्म ने धन को पैरों तले कुचल डाला।
8न्याय के मैदान में धर्म और धन में युद्ध ठन गया।

भाषा की बात

1भाषा की चित्रात्मकता, लोकोक्तियों और मुहावरों के जानदार उपयोग तथा हिंदी-उर्दू के साझा रूप एवं बोलचाल की भाषा के लिहाज से यह कहानी अद्भुत है। कहानी में से ऐसे उदाहरण छाँटकर लिखिए और यह भी बताइए कि इनके प्रयोग से किस तरह कहानी का कथ्य अधिक असरदार बना है?
2कहानी में मासिक वेतन के लिए किन-किन विशेषणों का प्रयोग किया गया है? इसके लिए आप अपनी ओर से दो-दो विशेषण और बताइए। साथ ही विशेषणों के आधार को तर्क सहित पुष्ट कीजिए।
3(क) बाबूजी आशीर्वाद!
(ख) सरकारी हुक्म!
(ग) दातागंज के!
(घ) कानपुर!

दी गई विशिष्ट अभिव्यक्तियाँ एक निश्चित संदर्भ में निश्चित अर्थ देती हैं। संदर्भ बदलते ही अर्थ भी परिवर्तित हो जाता है। अब आप किसी अन्य संदर्भ में इन भाषिक अभिव्यक्तियों का प्रयोग करते हुए समझाइए।

चर्चा करें

1इस कहानी को पढ़कर बड़ी-बड़ी डिग्रियों, न्याय और विद्वता के बारे में आपकी क्या धारणा बनती है? वर्तमान समय को ध्यान में रखते हुए इस विषय पर शिक्षकों के साथ एक परिचर्चा आयोजित करें।

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