आओ, मिलकर बचाएँ (निर्मला पुतुल) — NCERT Solutions
CBSE · Class 11 · Hindi
NCERT Solutions for आओ, मिलकर बचाएँ (निर्मला पुतुल), CBSE Class 11 Hindi: 9 textbook questions solved step by step.
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कविता के साथ
1माटी का रंग प्रयोग करते हुए किस बात की ओर संकेत किया गया है?Show solution
दिया गया संदर्भ: कविता में कवयित्री निर्मला पुतुल ने 'माटी का रंग' का प्रयोग किया है।
व्याख्या एवं उत्तर:
'माटी का रंग' से कवयित्री ने आदिवासी समाज की अपनी मूल पहचान, संस्कृति और जड़ों की ओर संकेत किया है। माटी का रंग अर्थात् अपनी धरती से जुड़ाव, अपनी मिट्टी की सोंधी महक और अपने मूल स्वभाव को बनाए रखना। इस प्रयोग के माध्यम से कवयित्री यह कहना चाहती हैं कि आदिवासी समाज को अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान, अपनी परंपराओं और अपने मूल स्वरूप को बचाए रखना चाहिए। आधुनिकता की आँधी में यह 'माटी का रंग' धुँधला पड़ता जा रहा है, इसलिए इसे सहेजना आवश्यक है।
निष्कर्ष: 'माटी का रंग' आदिवासी समाज की अपनी भूमि, अपनी संस्कृति और अपनी मौलिक पहचान का प्रतीक है।
2भाषा में झारखंडीपन से क्या अभिप्राय है?Show solution
दिया गया संदर्भ: कवयित्री निर्मला पुतुल झारखंड की आदिवासी कवयित्री हैं और उन्होंने अपनी भाषा में 'झारखंडीपन' बचाने की बात कही है।
व्याख्या एवं उत्तर:
'भाषा में झारखंडीपन' से अभिप्राय है — झारखंड की आदिवासी भाषाओं की विशिष्ट बोली, लहजे, मुहावरों, लोकोक्तियों और उनकी अपनी भाषाई विशेषताओं को बनाए रखना। झारखंड में संथाली, मुंडारी, हो, कुड़ुख आदि अनेक आदिवासी भाषाएँ बोली जाती हैं। इन भाषाओं में एक विशेष प्रकार की सरलता, सहजता और अपनापन होता है।
आधुनिकता के प्रभाव में आदिवासी युवा अपनी मूल भाषा को भूलते जा रहे हैं और बाहरी भाषाओं को अपनाते जा रहे हैं। कवयित्री चाहती हैं कि इस 'झारखंडीपन' को — अर्थात् अपनी भाषा की विशिष्टता, उसकी मिठास और उसकी पहचान को — बचाया जाए।
निष्कर्ष: भाषा में झारखंडीपन से तात्पर्य झारखंड की आदिवासी भाषाओं की मौलिकता, उनकी विशिष्ट शैली और उनके अपने भाषाई संस्कारों को सुरक्षित रखने से है।
3दिल के भोलेपन के साथ-साथ अक्खड़पन और जुझारूपन को भी बचाने की आवश्यकता पर क्यों बल दिया गया है?Show solution
दिया गया संदर्भ: कवयित्री ने आदिवासी समाज के तीन गुणों — भोलापन, अक्खड़पन और जुझारूपन — को बचाने की बात कही है।
व्याख्या एवं उत्तर:
कवयित्री ने इन तीनों गुणों को बचाने पर बल इसलिए दिया है क्योंकि ये तीनों मिलकर आदिवासी समाज के संपूर्ण व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं:
- दिल का भोलापन — आदिवासी समाज की सरलता, निश्छलता और स्वाभाविक मानवीयता का प्रतीक है।
- अक्खड़पन — इसका अर्थ है अपनी बात पर दृढ़ रहना, किसी के दबाव में न झुकना। यह गुण आदिवासी समाज को शोषण और अन्याय के सामने झुकने से बचाता है।
- जुझारूपन — संघर्ष करने की प्रवृत्ति। यह गुण आदिवासी समाज को अपने अधिकारों के लिए लड़ने की शक्ति देता है।
केवल भोलापन रहे और अक्खड़पन व जुझारूपन न रहे तो आदिवासी समाज शोषण का शिकार हो जाएगा। इसलिए तीनों गुणों का संतुलन आवश्यक है।
निष्कर्ष: भोलापन उनकी मानवीयता है, अक्खड़पन उनकी आत्मसम्मान की रक्षा है और जुझारूपन उनके अस्तित्व की लड़ाई है — इसलिए तीनों को बचाना जरूरी है।
4प्रस्तुत कविता आदिवासी समाज की किन बुराइयों की ओर संकेत करती है?Show solution
दिया गया संदर्भ: कविता 'आओ, मिलकर बचाएँ' में कवयित्री निर्मला पुतुल ने आदिवासी समाज की कुछ आंतरिक बुराइयों की ओर भी संकेत किया है।
व्याख्या एवं उत्तर:
कविता में आदिवासी समाज की निम्नलिखित बुराइयों की ओर संकेत किया गया है:
- नशाखोरी की प्रवृत्ति — कविता में 'ठंडी होती दिनचर्या' और जीवन की निष्क्रियता का संकेत मिलता है जो नशे की लत से जुड़ा है। आदिवासी समाज में मदिरापान एक गंभीर समस्या है।
- अंधविश्वास और रूढ़िवादिता — समाज में व्याप्त अंधविश्वासों के कारण प्रगति अवरुद्ध होती है।
- आपसी फूट और अविश्वास — 'थोड़ा-सा विश्वास' बचाने की बात से संकेत मिलता है कि समाज में आपसी विश्वास की कमी आ गई है।
- सपनों और उम्मीदों का खोना — युवा पीढ़ी निराशावाद की शिकार होती जा रही है, उनमें जीवन के प्रति उत्साह कम हो रहा है।
- अपनी संस्कृति और भाषा से दूरी — आदिवासी युवा अपनी जड़ों से कट रहे हैं।
निष्कर्ष: कवयित्री ने इन बुराइयों की ओर संकेत करते हुए समाज को सचेत किया है कि इनसे बचकर अपनी मूल पहचान को बनाए रखें।
5'इस दौर में भी बचाने को बहुत कुछ बचा है' — से क्या आशय है?Show solution
दिया गया संदर्भ: यह पंक्ति कविता के अंत में आती है जो कविता का केंद्रीय भाव प्रस्तुत करती है।
व्याख्या एवं उत्तर:
इस पंक्ति का आशय है कि आज के इस आधुनिकता और भूमंडलीकरण के दौर में, जब सब कुछ तेजी से बदल रहा है, तब भी आदिवासी समाज के पास बचाने योग्य बहुत कुछ शेष है। अभी सब कुछ नष्ट नहीं हुआ है।
कवयित्री आशावादी दृष्टिकोण अपनाते हुए कहती हैं कि:
- अभी भी उनकी भाषा, संस्कृति और परंपराएँ पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं।
- अभी भी उनके दिलों में भोलापन, अक्खड़पन और जुझारूपन बचा है।
- अभी भी थोड़ा-सा विश्वास, थोड़ी-सी उम्मीद और थोड़े-से सपने जीवित हैं।
यह पंक्ति निराशा नहीं, बल्कि सकारात्मक आह्वान है। कवयित्री कहना चाहती हैं कि देर नहीं हुई है, अभी भी सामूहिक प्रयास से अपनी विरासत को बचाया जा सकता है।
निष्कर्ष: यह पंक्ति आदिवासी समाज को एकजुट होकर अपनी सांस्कृतिक धरोहर की रक्षा करने का आशावादी संदेश देती है।
(क) ठंडी होती दिनचर्या में / जीवन की गर्माहट
(ख) थोड़ा-सा विश्वास / थोड़ी-सी उम्मीद / थोड़े-से सपने / आओ, मिलकर बचाएँ।
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Frequently Asked Questions
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Sources & Official References
- NCERT Official — ncert.nic.in
- CBSE Academic — cbseacademic.nic.in
- CBSE Official — cbse.gov.in
- National Education Policy 2020 — education.gov.in
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