गलता लोहा (शेखर जोशी) — NCERT Solutions
CBSE · Class 11 · Hindi
NCERT Solutions for गलता लोहा (शेखर जोशी), CBSE Class 11 Hindi: 15 textbook questions solved step by step. Part of the CBSE Class 11 Hindi syllabus.
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पाठ के साथ
1कहानी के उस प्रसंग का उल्लेख करें, जिसमें किताबों की विद्या और घन चलाने की विद्या का जिक्र आया है।Show solution
प्रसंग का उल्लेख:
कहानी में यह प्रसंग तब आता है जब मोहन पाठशाला में पढ़ता था और धनराम लुहार के बेटे के रूप में अपने पिता के साथ लोहे का काम सीख रहा था। मास्टर त्रिलोक सिंह कक्षा में पढ़ाते समय धनराम से कोई प्रश्न पूछते हैं, किंतु धनराम उत्तर नहीं दे पाता। इस पर मास्टर जी व्यंग्यपूर्वक कहते हैं कि "किताबों की विद्या तुम्हारे बूते की नहीं, जाओ घन चलाओ।" अर्थात् पढ़ाई-लिखाई तुम्हारे लिए नहीं है, तुम तो लोहार का काम ही करो।
इस कथन में मास्टर जी ने जाति-आधारित पूर्वाग्रह को उजागर किया। उनका आशय था कि धनराम जैसे लोहार-पुत्र के लिए किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि हथौड़ा चलाने का काम ही उचित है। यह प्रसंग कहानी में जातिगत भेदभाव और शिक्षा-व्यवस्था की संकीर्णता को दर्शाता है।
2धनराम मोहन को अपना प्रतिद्वंद्वी क्यों नहीं समझता था?Show solution
कारण:
धनराम मोहन को अपना प्रतिद्वंद्वी इसलिए नहीं समझता था क्योंकि दोनों की सामाजिक स्थिति, जाति और जीवन-लक्ष्य बिल्कुल अलग-अलग थे।
- जातिगत भेद: धनराम लोहार जाति का था और मोहन ब्राह्मण परिवार से। उस समय की सामाजिक व्यवस्था में दोनों के बीच कोई प्रतिस्पर्धा संभव नहीं मानी जाती थी।
- भिन्न क्षेत्र: मोहन पढ़ाई-लिखाई में आगे था और उसका लक्ष्य शिक्षा प्राप्त करना था, जबकि धनराम का काम लोहारगीरी था। दोनों के कार्यक्षेत्र अलग थे।
- श्रद्धाभाव: धनराम मोहन की बुद्धिमत्ता और विद्वत्ता का सम्मान करता था। वह मोहन को एक श्रेष्ठ व्यक्ति मानता था, इसलिए उसके मन में प्रतिस्पर्धा का भाव नहीं था।
इस प्रकार जातिगत विभाजन और भिन्न जीवन-पथ के कारण धनराम मोहन को कभी अपना प्रतिद्वंद्वी नहीं समझता था।
3धनराम को मोहन के किस व्यवहार पर आश्चर्य होता है और क्यों?Show solution
आश्चर्य का कारण:
जब मोहन लखनऊ से वापस गाँव आता है और धनराम की लोहार की दुकान पर आकर स्वयं हथौड़ा उठाकर लोहा पीटने लगता है, तब धनराम को बहुत आश्चर्य होता है।
आश्चर्य के कारण:
- सामाजिक पृष्ठभूमि: मोहन ब्राह्मण परिवार का था और ब्राह्मण का लोहार का काम करना उस समय की सामाजिक मान्यताओं के विरुद्ध था।
- शिक्षित व्यक्ति का शारीरिक श्रम: मोहन पढ़ा-लिखा था, उसने उच्च शिक्षा प्राप्त की थी। ऐसे व्यक्ति का लोहार की भट्टी पर हथौड़ा चलाना धनराम की कल्पना से परे था।
- अहंकार का अभाव: मोहन ने बिना किसी संकोच या अहंकार के धनराम के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया। एक पढ़े-लिखे ब्राह्मण का इस प्रकार निम्न समझे जाने वाले काम में हाथ बँटाना धनराम को अचंभित कर गया।
इस व्यवहार से धनराम को लगा कि जीवन के संघर्ष ने मोहन को बदल दिया है और वह अब जातिगत भेदभाव से ऊपर उठ चुका है।
4मोहन के लखनऊ आने के बाद के समय को लेखक ने उसके जीवन का एक नया अध्याय क्यों कहा है?Show solution
कारण:
लेखक ने मोहन के लखनऊ आने के बाद के समय को उसके जीवन का 'नया अध्याय' इसलिए कहा है क्योंकि इस समय से उसके जीवन में पूर्णतः नए प्रकार के संघर्ष, अनुभव और परिस्थितियाँ आरंभ हुईं:
- नया परिवेश: गाँव की सरल जिंदगी छोड़कर शहर की जटिल और प्रतिस्पर्धी दुनिया में प्रवेश करना एक बड़ा बदलाव था।
- आर्थिक संघर्ष: लखनऊ में मोहन को आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। उसे दूसरों के घरों में रहना पड़ा और छोटे-छोटे काम करने पड़े।
- सामाजिक अपमान: शहर में उसे अपनी जाति और स्थिति के कारण अनेक अपमानजनक स्थितियों से गुजरना पड़ा।
- स्वप्न और यथार्थ का टकराव: गाँव में जो सपने देखे थे, शहर में उनका यथार्थ से टकराव हुआ। उच्च शिक्षा के बावजूद उचित नौकरी न मिलना उसके जीवन की त्रासदी बन गई।
- व्यक्तित्व का रूपांतरण: इन सब अनुभवों ने मोहन को एक नया इंसान बना दिया — जातिगत अहंकार से मुक्त और श्रम की गरिमा को समझने वाला।
इन्हीं कारणों से लेखक ने इस काल को मोहन के जीवन का नया अध्याय कहा है।
5मास्टर त्रिलोक सिंह के किस कथन को लेखक ने जबान के चाबुक कहा है और क्यों?Show solution
कथन:
मास्टर त्रिलोक सिंह ने धनराम से कहा था — "किताबों की विद्या तुम्हारे बूते की नहीं, जाओ घन चलाओ।"
लेखक ने इस कथन को 'जबान के चाबुक' कहा है।
कारण:
- मानसिक आघात: जिस प्रकार चाबुक शरीर पर गहरी चोट करता है, उसी प्रकार मास्टर जी के इस कथन ने धनराम के मन पर गहरी चोट की। यह शब्द उसके आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाने वाले थे।
- जातिगत अपमान: इस कथन में यह भाव निहित था कि लोहार का बेटा पढ़ने-लिखने के योग्य नहीं है। यह जातिगत पूर्वाग्रह पर आधारित अपमानजनक वक्तव्य था।
- स्थायी प्रभाव: चाबुक का घाव जल्दी भर जाता है, किंतु शब्दों का घाव गहरा और स्थायी होता है। धनराम के मन में यह बात जीवनभर के लिए बैठ गई।
- शिक्षक का दायित्व-भंग: एक शिक्षक का कर्तव्य है कि वह विद्यार्थी को प्रोत्साहित करे, किंतु मास्टर जी ने इसके विपरीत धनराम को हतोत्साहित किया — यही उनके शब्दों को 'चाबुक' बनाता है।
इस प्रकार लेखक ने इस कथन को 'जबान के चाबुक' कहकर भाषा की मार की पीड़ा को बखूबी व्यक्त किया है।
6(1)"बिरादरी का यही सहारा होता है।" — क. किसने किससे कहा? ख. किस प्रसंग में कहा? ग. किस आशय से कहा? घ. क्या कहानी में यह आशय स्पष्ट हुआ है?Show solution
क. किसने किससे कहा:
यह कथन मोहन के पिता (वंशीधर पंडित) ने अपने किसी परिचित या संबंधी से कहा, जब वे मोहन को लखनऊ में किसी बिरादरी वाले के यहाँ रहने की व्यवस्था करा रहे थे।
ख. किस प्रसंग में कहा:
जब मोहन उच्च शिक्षा के लिए लखनऊ जाने वाला था, तब उसके पिता ने वहाँ अपनी बिरादरी के एक परिचित व्यक्ति के घर उसके रहने की व्यवस्था की। उसी संदर्भ में यह कथन कहा गया।
ग. किस आशय से कहा:
इस कथन का आशय था कि जब कोई व्यक्ति अपने घर-गाँव से दूर किसी अनजान शहर में जाता है, तो उसकी अपनी जाति या बिरादरी के लोग ही उसकी मदद करते हैं। बिरादरी का बंधन एक सामाजिक सुरक्षा-कवच का काम करता है।
घ. क्या कहानी में यह आशय स्पष्ट हुआ:
कहानी में यह आशय पूरी तरह स्पष्ट नहीं हुआ, बल्कि इसके विपरीत चित्र उभरा। लखनऊ में बिरादरी वाले के घर रहते हुए मोहन को सम्मान नहीं मिला, बल्कि उसे घरेलू नौकर की तरह काम करना पड़ा। इस प्रकार 'बिरादरी का सहारा' व्यवहार में खोखला साबित हुआ और कहानी ने इस सामाजिक धारणा पर प्रश्नचिह्न लगाया।
6(2)"उसकी आँखों में एक सर्जक की चमक थी" — क. किसके लिए कहा गया है? ख. किस प्रसंग में कहा गया है? ग. यह पात्र-विशेष के किन चारित्रिक पहलुओं को उजागर करता है?Show solution
क. किसके लिए कहा गया है:
यह वाक्य धनराम के लिए कहा गया है।
ख. किस प्रसंग में कहा गया है:
जब मोहन धनराम की लोहार की दुकान पर आता है और दोनों मिलकर लोहे को गर्म करके हथौड़े से पीटते हैं, उस समय धनराम जब लोहे को आकार देने में तल्लीन होता है — उसी प्रसंग में लेखक ने यह वाक्य कहा है।
ग. चारित्रिक पहलू:
- सृजनशीलता: 'सर्जक की चमक' से स्पष्ट होता है कि धनराम केवल यंत्रवत् काम नहीं करता, बल्कि वह अपने काम में कलाकार की तरह सृजन का आनंद लेता है।
- कार्य के प्रति समर्पण: उसकी आँखों की चमक यह बताती है कि वह अपने पेशे से प्रेम करता है और उसमें पूरी निष्ठा से लगा रहता है।
- आत्मसम्मान: यह वाक्य यह भी दर्शाता है कि शारीरिक श्रम करने वाला व्यक्ति भी उतना ही गरिमामय और प्रतिभाशाली हो सकता है जितना कोई पढ़ा-लिखा व्यक्ति।
- जातिगत पूर्वाग्रह का खंडन: मास्टर जी ने धनराम को 'किताबों की विद्या के अयोग्य' कहा था, किंतु 'सर्जक की चमक' यह सिद्ध करती है कि धनराम की प्रतिभा किसी से कम नहीं — बस उसका माध्यम अलग है।
पाठ के आस-पास
1गाँव और शहर, दोनों जगहों पर चलने वाले मोहन के जीवन-संघर्ष में क्या फ़र्क है? चर्चा करें और लिखें।Show solution
मोहन के जीवन-संघर्ष की तुलना:
गाँव में संघर्ष:
- गाँव में मोहन का संघर्ष मुख्यतः आर्थिक अभाव और सामाजिक सीमाओं से था।
- पिता वंशीधर पंडित की पुरोहिताई से परिवार का गुजारा मुश्किल से होता था।
- गाँव में शिक्षा के सीमित साधन थे, फिर भी मोहन ने अपनी कुशाग्र बुद्धि से आगे बढ़ने की कोशिश की।
- गाँव का संघर्ष अपेक्षाकृत सरल और परिचित परिवेश में था — लोग जानते-पहचानते थे।
- जातिगत व्यवस्था स्पष्ट थी, इसलिए अपेक्षाएँ भी सीमित थीं।
शहर (लखनऊ) में संघर्ष:
- शहर में संघर्ष अधिक जटिल, अपमानजनक और अकेलेपन से भरा था।
- बिरादरी वाले के घर रहते हुए उसे नौकर जैसा व्यवहार सहना पड़ा।
- उच्च शिक्षा के बावजूद उचित रोजगार न मिलना उसकी सबसे बड़ी पीड़ा थी।
- शहर में व्यक्ति अनजान होता है — न कोई अपना, न कोई सहारा।
- शहरी संघर्ष ने मोहन के स्वाभिमान को बार-बार आहत किया।
निष्कर्ष: गाँव का संघर्ष भौतिक अभाव का था, जबकि शहर का संघर्ष आत्मसम्मान, पहचान और अस्तित्व का था। शहर ने मोहन को तोड़ा भी और नया बनाया भी।
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Frequently Asked Questions
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Sources & Official References
- NCERT Official — ncert.nic.in
- CBSE Academic — cbseacademic.nic.in
- CBSE Official — cbse.gov.in
- National Education Policy 2020 — education.gov.in
Content is aligned to the official syllabus. Refer to the board website for the latest curriculum.
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