Skip to main content
Chapter 4 of 20
NCERT Solutions

राजस्थान की रजत बूँदें (अनुपम मिश्र) (Part 2) — NCERT Solutions

CBSE · Class 11 · Hindi

NCERT Solutions for राजस्थान की रजत बूँदें (अनुपम मिश्र) (Part 2), CBSE Class 11 Hindi: 5 textbook questions solved step by step.

44 questions32 flashcards5 concepts

Interactive on Super Tutor

Studying राजस्थान की रजत बूँदें (अनुपम मिश्र)? Get the full interactive chapter.

Quizzes, flashcards, AI doubt-solver and a step-by-step study plan — built for NCERT solutions and more.

Free trial, no card needed.

5 Questions Solved · 1 Section

The first 3 solutions are open to read. The other 2 are free with a Super Tutor account.

अभ्यास — राजस्थान की रजत बूँदें (अनुपम मिश्र)

1राजस्थान में कुंई किसे कहते हैं? इसकी गहराई और व्यास तथा सामान्य कुओं की गहराई और व्यास में क्या अंतर होता है?Show solution

दिया गया है: पाठ 'राजस्थान की रजत बूँदें' में कुंई का विस्तृत वर्णन किया गया है।

कुंई क्या है:
राजस्थान के रेगिस्तानी क्षेत्रों में वर्षा का जल रेत में समा जाता है और खड़िया पत्थर की पट्टी के ऊपर एकत्र हो जाता है। इस नमी को संग्रहीत करने के लिए जो छोटी-छोटी संरचनाएँ बनाई जाती हैं, उन्हें कुंई कहते हैं। कुंई में वर्षा का पानी सीधे नहीं आता, बल्कि रेत में समाई हुई नमी रिस-रिसकर कुंई में एकत्र होती है। यह पानी मीठा और स्वच्छ होता है।

कुंई और सामान्य कुएँ में अंतर:

आधारकुंईसामान्य कुआँ
गहराईअपेक्षाकृत कम गहरी (लगभग 15 से 20 फुट)बहुत अधिक गहरा (कई सौ फुट तक)
व्यासबहुत कम — केवल 4 से 5 हाथ (लगभग 3–4 फुट)बहुत अधिक — कई फुट चौड़ा
जल-स्रोतरेत में समाई वर्षा की नमी (रेजाणीपानी)भूमिगत जल (पातालपानी)
उद्देश्यनमी को रिसाकर एकत्र करनाभूजल को सीधे खींचना

निष्कर्ष: कुंई का व्यास इतना कम इसलिए रखा जाता है ताकि वाष्पीकरण कम हो और पानी सुरक्षित रहे। इसकी गहराई खड़िया पत्थर की पट्टी तक ही होती है।

2दिनोदिन बढ़ती पानी की समस्या से निपटने में यह पाठ आपकी कैसे मदद कर सकता है तथा देश के अन्य राज्यों में इसके लिए क्या उपाय हो रहे हैं? जानें और लिखें।Show solution

दिया गया है: पाठ में राजस्थान की पारंपरिक जल-संग्रह प्रणाली का वर्णन है।

पाठ से प्राप्त सहायता:
यह पाठ हमें सिखाता है कि —

  1. स्थानीय संसाधनों का उपयोग करके जल-संकट से निपटा जा सकता है।
  2. वर्षाजल संग्रहण (Rain Water Harvesting) की परंपरागत विधियाँ आज भी प्रासंगिक हैं।
  3. समाज की सामूहिक भागीदारी से जल-प्रबंधन संभव है।
  4. प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर जल की एक-एक बूँद बचाई जा सकती है।
  5. कुंई जैसी संरचनाएँ हमें प्रेरित करती हैं कि हम भी अपने क्षेत्र की भौगोलिक विशेषताओं के अनुसार जल-संग्रह की विधियाँ अपनाएँ।

देश के अन्य राज्यों में जल-संरक्षण के उपाय:

  • महाराष्ट्र: 'पानी फाउंडेशन' द्वारा जलयुक्त शिवार अभियान — तालाब, बाँध और नालों का निर्माण।
  • तमिलनाडु: छत पर वर्षाजल संग्रहण (Rooftop Rainwater Harvesting) को कानूनी रूप से अनिवार्य किया गया है।
  • हिमाचल प्रदेश: 'कुहल' नामक पारंपरिक नहर प्रणाली द्वारा जल-वितरण।
  • मेघालय: बाँस की नलियों से जल-संग्रह की परंपरागत विधि।
  • उत्तर प्रदेश एवं बिहार: तालाबों का पुनरुद्धार एवं चेकडैम निर्माण।

निष्कर्ष: यह पाठ हमें यह संदेश देता है कि जल-संरक्षण के लिए महँगी तकनीक से अधिक आवश्यक है — सामाजिक चेतना और पारंपरिक ज्ञान का सम्मान।

3चेजारो के साथ गाँव समाज के व्यवहार में पहले की तुलना में आज क्या फर्क आया है? पाठ के आधार पर बताइए।Show solution

दिया गया है: पाठ में चेजारो (कुंई खोदने वाले कुशल कारीगर) के प्रति समाज के बदलते व्यवहार का उल्लेख है।

चेजारो कौन हैं:
चेजारो वे विशेष कारीगर होते हैं जो कुंई खोदने का कठिन और कुशलतापूर्ण कार्य करते हैं। यह कार्य अत्यंत जोखिम भरा होता है क्योंकि संकरी कुंई में उतरकर खुदाई करनी पड़ती है।

पहले का व्यवहार:

  • पहले चेजारो को समाज में विशेष सम्मान और आदर दिया जाता था।
  • उनकी कला को दैवीय वरदान माना जाता था।
  • कुंई निर्माण के बाद उन्हें नेग (पारिश्रमिक) के रूप में अनाज, वस्त्र और अन्य उपहार दिए जाते थे।
  • उन्हें केवल एक बार का मजदूर नहीं, बल्कि परिवार का सदस्य जैसा दर्जा दिया जाता था।
  • त्योहारों और विशेष अवसरों पर उन्हें भेंट और सम्मान मिलता था।
  • कुंई से पानी निकालते समय भी उन्हें हिस्सा दिया जाता था।

आज का व्यवहार:

  • आज चेजारो के प्रति वह पारंपरिक आदर-भाव कम हो गया है।
  • उन्हें अब केवल मजदूर समझा जाने लगा है।
  • नेग और सम्मान की परंपरा धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है।
  • आधुनिकता और बदलती सोच के कारण उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा घटी है।

निष्कर्ष: लेखक इस बदलाव के माध्यम से यह संकेत देते हैं कि जब हम अपनी परंपराओं और उन्हें जीवित रखने वाले लोगों का सम्मान करना भूल जाते हैं, तो वे परंपराएँ भी धीरे-धीरे नष्ट हो जाती हैं।

4निजी होते हुए भी सार्वजनिक क्षेत्र में कुंईयों पर ग्राम समाज का अंकुश लगा रहता है। लेखक ने ऐसा क्यों कहा होगा?

Free with a Super Tutor account

5कुंई निर्माण से संबंधित निम्न शब्दों के बारे में जानकारी प्राप्त करें — पालरपानी, पातालपानी, रेजाणीपानी

Free with a Super Tutor account

2 more solved questions in राजस्थान की रजत बूँदें (अनुपम मिश्र)

They are free with a Super Tutor account, along with practice quizzes and flashcards for this chapter. Free to start, no card needed.

Frequently Asked Questions

What are the important topics in राजस्थान की रजत बूँदें (अनुपम मिश्र) for CBSE Class 11 Hindi?
Key topics in राजस्थान की रजत बूँदें (अनुपम मिश्र) include कुँई और कुआँ: मूल अंतर, जल के तीन रूप, खड़िया पत्थर की पट्टी और मरुभूमि की रेत, कुँई की खुदाई और निर्माण तकनीक. Study these first, then practise questions on each for Class 11 exams.
Are these NCERT Solutions for राजस्थान की रजत बूँदें (अनुपम मिश्र) free?
The first 3 of the 5 solutions on this page are open to read. The other 2 are free with a Super Tutor account — signing up is free and needs no card.
How should I revise राजस्थान की रजत बूँदें (अनुपम मिश्र) for Class 11 exams?
Learn the core ideas first, then work through the 44 practice questions on राजस्थान की रजत बूँदें (अनुपम मिश्र). Revise definitions regularly and use flashcards for quick recall before the exam.

Sources & Official References

Content is aligned to the official syllabus. Refer to the board website for the latest curriculum.

For serious students

Get the full राजस्थान की रजत बूँदें (अनुपम मिश्र) chapter — start free.

Quizzes, flashcards, an AI doubt solver and a study plan for CBSE Class 11 Hindi. Free to start, no card needed.