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Chapter 35 of 39
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हे भूख! मत मचल / हे मेरे जूही के फूल जैसे ईश्वर (अक्कमहादेवी)

CBSE · Class 11 · Hindi

NCERT Solutions for हे भूख! मत मचल / हे मेरे जूही के फूल जैसे ईश्वर (अक्कमहादेवी) — CBSE Class 11 Hindi.

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6 Questions Solved · 2 Sections

कविता के साथ

1लक्ष्य प्राप्ति में इंद्रियाँ बाधक होती हैं— इसके संदर्भ में अपने तर्क दीजिए।Show solution
दिया गया संदर्भ: अक्कमहादेवी की कविता 'हे भूख! मत मचल' में कवयित्री ने इंद्रियों की चंचलता को ईश्वर-प्राप्ति के मार्ग में बाधक बताया है।

तर्क एवं स्पष्टीकरण:

मनुष्य की पाँच ज्ञानेंद्रियाँ — आँख, कान, नाक, जीभ और त्वचा — सदैव बाहरी विषयों की ओर आकर्षित रहती हैं। जब तक ये इंद्रियाँ अपने-अपने विषयों (रूप, शब्द, गंध, रस, स्पर्श) में उलझी रहती हैं, तब तक मन एकाग्र नहीं हो सकता।

- भूख (जिह्वा की लालसा): जब पेट भोजन की माँग करता है और जीभ स्वाद में लिप्त रहती है, तो साधक का ध्यान ईश्वर से हट जाता है। इसीलिए कवयित्री कहती हैं — *'हे भूख! मत मचल।'*
- प्यास (तृष्णा): शारीरिक और मानसिक तृष्णा मनुष्य को संसार के मोह में बाँधे रखती है।
- मद (अहंकार व नशा): इंद्रियों का मद मनुष्य को अंधा कर देता है और वह सत्य से दूर हो जाता है।

निष्कर्ष: इंद्रियों पर नियंत्रण किए बिना आत्मा का परमात्मा से मिलन संभव नहीं। जब साधक इंद्रियों के पाश से मुक्त होता है, तभी वह अपने लक्ष्य — ईश्वर-प्राप्ति — की ओर अग्रसर हो सकता है। अतः इंद्रियाँ लक्ष्य-प्राप्ति में निश्चित रूप से बाधक हैं।
2ओ चराचर! मत चूक अवसर — इस पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।Show solution
प्रयुक्त शब्दों का अर्थ:
- चराचर = जड़ और चेतन, अर्थात् संपूर्ण सृष्टि
- अवसर = ईश्वर-प्राप्ति का सुअवसर

आशय:

कवयित्री अक्कमहादेवी इस पंक्ति में संपूर्ण सृष्टि को — चाहे वह जड़ हो या चेतन — संबोधित करते हुए कहती हैं कि ईश्वर का साक्षात्कार करने का यह दुर्लभ अवसर बार-बार नहीं आता। यह मानव-जीवन ही वह क्षण है जब आत्मा परमात्मा से मिल सकती है।

कवयित्री का भाव है कि —
1. ईश्वर की कृपा और उनका सान्निध्य एक अनमोल अवसर है।
2. यदि इस जीवन में इंद्रियों और सांसारिक मोह को त्यागकर ईश्वर की ओर नहीं मुड़े, तो यह सुअवसर हाथ से निकल जाएगा।
3. सृष्टि के प्रत्येक कण को चाहिए कि वह इस दिव्य मिलन के क्षण को पहचाने और उसका लाभ उठाए।

निष्कर्ष: यह पंक्ति एक आध्यात्मिक जागरण का आह्वान है। कवयित्री समस्त जगत को सचेत करती हैं कि ईश्वर-भक्ति और आत्म-साक्षात्कार का यह सुनहरा अवसर व्यर्थ न जाने दें।
3ईश्वर के लिए किस दृष्टांत का प्रयोग किया गया है। ईश्वर और उसके साम्य का आधार बताइए।Show solution
दृष्टांत:

कवयित्री अक्कमहादेवी ने दूसरी कविता 'हे मेरे जूही के फूल जैसे ईश्वर' में ईश्वर (चन्नमल्लिकार्जुन/शिव) की तुलना जूही के फूल से की है।

साम्य का आधार (समानता के बिंदु):

| जूही का फूल | ईश्वर |
|---|---|
| अत्यंत कोमल और सुंदर होता है | ईश्वर भी परम सुंदर और कोमल हृदय हैं |
| सुगंध से सारे वातावरण को महका देता है | ईश्वर की कृपा से जीवन आनंदमय हो जाता है |
| छोटा और सरल दिखता है, पर प्रभाव गहरा होता है | ईश्वर निराकार और सूक्ष्म हैं, पर सर्वव्यापी हैं |
| फूल निःस्वार्थ भाव से सुगंध बाँटता है | ईश्वर भी निःस्वार्थ प्रेम और कृपा बरसाते हैं |

निष्कर्ष: जूही का फूल जिस प्रकार अपनी सुकोमलता, सुगंध और सौंदर्य से मन को मोह लेता है, उसी प्रकार ईश्वर भी अपनी दिव्य सुंदरता और प्रेम से भक्त के हृदय को आकर्षित करते हैं। यह दृष्टांत ईश्वर के प्रति कवयित्री के कोमल, प्रेमपूर्ण और भावनात्मक संबंध को व्यक्त करता है।
4अपना घर से क्या तात्पर्य है? इसे भूलने की बात क्यों कही गई है?Show solution
'अपना घर' का तात्पर्य:

यहाँ 'अपना घर' से तात्पर्य सांसारिक घर, परिवार, रिश्ते-नाते और भौतिक जीवन से है। इसके साथ ही इसका गहरा अर्थ शरीर और अहंकार से भी है — वह 'घर' जिसमें आत्मा बंधी हुई है और जो उसे परमात्मा से दूर रखता है।

इसे भूलने की बात क्यों कही गई है:

कवयित्री अक्कमहादेवी एक विरागी भक्त हैं। उनके अनुसार —

1. सांसारिक मोह बंधन है: घर-परिवार का मोह आत्मा को संसार-चक्र में बाँधे रखता है और ईश्वर-प्राप्ति में बाधा डालता है।
2. भक्ति के लिए समर्पण आवश्यक है: जब तक साधक 'मेरा घर', 'मेरा परिवार' की भावना से मुक्त नहीं होता, तब तक वह पूर्ण रूप से ईश्वर को समर्पित नहीं हो सकता।
3. अहंकार का त्याग: 'अपना घर' अहंकार का प्रतीक भी है। इसे भूलने का अर्थ है — 'मैं' और 'मेरे' की भावना को छोड़कर ईश्वर में लीन हो जाना।

निष्कर्ष: कवयित्री का संदेश है कि ईश्वर-प्राप्ति के लिए सांसारिक आसक्ति और अहंकार का त्याग अनिवार्य है। 'अपना घर' भूलना वास्तव में मुक्ति और परमानंद की ओर पहला कदम है।
5दूसरे वचन में ईश्वर से क्या कामना की गई है और क्यों?Show solution
दूसरा वचन: 'हे मेरे जूही के फूल जैसे ईश्वर'

की गई कामना:

कवयित्री अक्कमहादेवी इस वचन में अपने आराध्य चन्नमल्लिकार्जुन (शिव) से निम्नलिखित कामनाएँ करती हैं —

1. निर्धनता में भी संतोष: वे ईश्वर से प्रार्थना करती हैं कि यदि उनके पास खाने को कुछ न हो, तो वे भूखी रह सकती हैं — परंतु ईश्वर उनके साथ रहें।
2. एकांत में दिव्य संगति: यदि उनके पास ओढ़ने-बिछाने को कुछ न हो, तो वे धरती पर सो सकती हैं — बस ईश्वर का सान्निध्य मिले।
3. पूर्ण समर्पण और मिलन: वे चाहती हैं कि ईश्वर उनके भीतर और बाहर — सर्वत्र व्याप्त हों। वे उनसे पूर्ण आत्मिक मिलन की कामना करती हैं।

ऐसी कामना क्यों:

- कवयित्री एक सच्ची भक्त हैं जिनके लिए सांसारिक सुख-सुविधाएँ गौण हैं।
- उनके लिए ईश्वर का प्रेम और सान्निध्य ही सबसे बड़ा धन है।
- वे मानती हैं कि भौतिक वस्तुओं की चाह ईश्वर-भक्ति में बाधा डालती है, इसलिए वे केवल ईश्वर को ही माँगती हैं।

निष्कर्ष: यह वचन कवयित्री की निष्काम भक्ति और पूर्ण वैराग्य का प्रमाण है। वे संसार की किसी भी वस्तु की नहीं, केवल ईश्वर के प्रेम और उपस्थिति की कामना करती हैं।

कविता के आस-पास

1क्या अक्क महादेवी को कन्नड़ की मीरा कहा जा सकता है? चर्चा करें।Show solution
हाँ, अक्कमहादेवी को कन्नड़ की मीरा कहा जा सकता है। इस तुलना के पक्ष में निम्नलिखित बिंदु प्रस्तुत हैं —

समानताएँ:

| आधार | मीरा | अक्कमहादेवी |
|---|---|---|
| काल | 16वीं शताब्दी (राजस्थान) | 12वीं शताब्दी (कर्नाटक) |
| आराध्य | श्रीकृष्ण | चन्नमल्लिकार्जुन (शिव) |
| भक्ति-भाव | पति-भाव (माधुर्य भक्ति) | पति-भाव (शिव को पति माना) |
| सांसारिक त्याग | राजमहल और पति का त्याग | पति कौशिक का त्याग, वस्त्र तक त्याग दिए |
| काव्य-रचना | पदों की रचना | वचनों की रचना |
| विद्रोह | सामाजिक रूढ़ियों का विरोध | पितृसत्तात्मक समाज का विरोध |
| भाव | विरह और मिलन की तड़प | विरह और समर्पण की तड़प |

विशेष तथ्य:
- अक्कमहादेवी ने शिव को अपना पति मानकर सांसारिक विवाह को अस्वीकार किया — ठीक वैसे ही जैसे मीरा ने कृष्ण को अपना पति माना।
- दोनों ने अपनी भक्ति-रचनाओं में स्त्री-स्वतंत्रता और आत्मिक प्रेम को सर्वोच्च स्थान दिया।
- दोनों की भाषा सरल, भावपूर्ण और हृदयस्पर्शी है।

निष्कर्ष: भक्ति, त्याग, विरह-वेदना, ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण और सामाजिक रूढ़ियों के विरुद्ध विद्रोह — इन सभी दृष्टियों से अक्कमहादेवी और मीरा में गहरी समानता है। इसीलिए अक्कमहादेवी को 'कन्नड़ की मीरा' कहना पूर्णतः उचित और सार्थक है।

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Frequently Asked Questions

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