सूक्तिमौक्तिकम्
CBSE · Class 9 · Sanskrit
NCERT Solutions for सूक्तिमौक्तिकम् — CBSE Class 9 Sanskrit.
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सूक्तिमौक्तिकम् — अभ्यासः
1(क)वित्ततः क्षीणः कौदृशः भवति?Show solution
उत्तर: वित्ततः क्षीणः अक्षीणः भवति।
(अर्थात् जो धन से क्षीण होता है, वह वास्तव में क्षीण नहीं होता।)
1(ख)कस्य प्रतिकूलानि कार्याणि परेषां न समाचरेत्?Show solution
उत्तर: आत्मनः प्रतिकूलानि कार्याणि परेषां न समाचरेत्।
1(ग)कुत्र दरिद्रता न भवेत्?Show solution
उत्तर: वचने दरिद्रता न भवेत्।
1(घ)वृक्षः स्वयं कानि न खादन्ति?Show solution
उत्तर: वृक्षाः स्वयं फलानि न खादन्ति।
1(ङ)का पुरा लघ्वी भवति?Show solution
उत्तर: खलसज्जनानां मैत्री (दिनस्य परार्द्धभिन्ना छाया इव) पुरा लघ्वी भवति।
2(क)यत्नेन किं रक्षेत् वित्तं वृत्तं वा?Show solution
उत्तर: यत्नेन वृत्तं रक्षेत्। वित्तं तु वृत्तेन रक्षितं भवति।
(अर्थात् प्रयत्नपूर्वक चरित्र की रक्षा करनी चाहिए, क्योंकि चरित्र से नष्ट हुआ व्यक्ति वास्तव में नष्ट हो जाता है।)
2(ख)अस्माभिः कौदृशम् आचरणं न कर्तव्यम्?Show solution
उत्तर: अस्माभिः आत्मनः प्रतिकूलम् आचरणं परेषां न कर्तव्यम्।
(अर्थात् जो आचरण हमें स्वयं को अप्रिय लगे, वैसा आचरण दूसरों के साथ नहीं करना चाहिए।)
2(ग)जन्तवः केन तुष्यन्ति?Show solution
उत्तर: जन्तवः प्रियवाक्यप्रदानेन तुष्यन्ति।
(अर्थात् सभी प्राणी मधुर वचन सुनकर प्रसन्न होते हैं।)
2(घ)सज्जनानां मैत्री कौदृशी भवति?Show solution
उत्तर: सज्जनानां मैत्री दिनस्य परार्द्धभिन्ना छाया इव भवति — पुरा (प्रारम्भे) लघ्वी, पश्चात् च वृद्धिमती।
(अर्थात् सज्जनों की मित्रता दिन के उत्तरार्ध की छाया के समान होती है — पहले छोटी, बाद में बढ़ती जाती है।)
2(ङ)सरोवराणां हानिः कदा भवति?Show solution
उत्तर: सरोवराणां हानिः यदा मरालैः (हंसैः) सह विप्रयोगः भवति तदा भवति।
(अर्थात् जब हंस सरोवर को छोड़कर चले जाते हैं, तब सरोवर की हानि होती है।)
3'क' स्तम्भे विशेषणानि 'ख' स्तम्भे च विशेष्याणि दत्तानि, तानि यथोचितं योजयत।Show solution
'क' स्तम्भ — (क) आस्वाद्यतोयाः, (ख) गुणयुक्तः, (ग) दिनस्य पूर्वार्द्धभिन्ना, (घ) दिनस्य परार्द्धभिन्ना
'ख' स्तम्भ — (1) खलानां मैत्री, (2) सज्जनानां मैत्री, (3) नद्यः, (4) दरिद्रः
उचित योजना:
| 'क' स्तम्भ (विशेषण) | 'ख' स्तम्भ (विशेष्य) |
|---|---|
| (क) आस्वाद्यतोयाः | (3) नद्यः |
| (ख) गुणयुक्तः | (4) दरिद्रः |
| (ग) दिनस्य पूर्वार्द्धभिन्ना | (1) खलानां मैत्री |
| (घ) दिनस्य परार्द्धभिन्ना | (2) सज्जनानां मैत्री |
4(क)निम्नलिखित श्लोक का आशय हिन्दी में लिखिए —
आरम्भगुर्वी क्षयिणी क्रमेण
लघ्वी पुरा वृद्धिमती च पश्चात्।
दिनस्य पूर्वार्द्धपरार्द्धभिन्ना
छायेव मैत्री खलसज्जनानाम्।।Show solution
इस श्लोक में दुर्जनों और सज्जनों की मित्रता की तुलना दिन की छाया से की गई है।
जिस प्रकार दिन के पूर्वार्ध (पहले भाग) में छाया बड़ी होती है और धीरे-धीरे घटती जाती है, उसी प्रकार दुर्जनों (खलों) की मित्रता प्रारम्भ में बहुत बड़ी और घनिष्ठ दिखती है, किन्तु क्रमशः क्षीण होती जाती है।
इसके विपरीत, जिस प्रकार दिन के परार्ध (दूसरे भाग) में छाया पहले छोटी होती है और धीरे-धीरे बढ़ती जाती है, उसी प्रकार सज्जनों की मित्रता प्रारम्भ में भले ही छोटी लगे, किन्तु समय के साथ वह बढ़ती और गहरी होती जाती है।
सार: दुर्जन की मित्रता पर विश्वास नहीं करना चाहिए; सज्जन की मित्रता ही स्थायी और लाभकारी होती है।
4(ख)निम्नलिखित श्लोक का आशय हिन्दी में लिखिए —
प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः।
तस्मात्तदेव वक्तव्यं वचने का दरिद्रता।।Show solution
इस श्लोक में मधुर वाणी के महत्त्व पर प्रकाश डाला गया है।
प्रिय और मधुर वचन बोलने से सभी प्राणी — चाहे वे मनुष्य हों या पशु-पक्षी — प्रसन्न हो जाते हैं। मधुर वाणी बोलने में कोई धन नहीं लगता, कोई कठिनाई नहीं होती। जब मीठे बोल बोलने में कुछ भी खर्च नहीं होता, तो फिर वचन में कंजूसी क्यों करें?
सार: मनुष्य को सदा मधुर और प्रिय वचन बोलने चाहिए, क्योंकि इससे सभी प्रसन्न होते हैं और इसमें कोई व्यय भी नहीं होता।
5(क)अधोलिखितपदेभ्यः भिन्नप्रकृतिकं पदं चित्वा लिखत —
वक्तव्यम्, कर्तव्यम्, सर्वस्वम्, हन्तव्यम्।Show solution
- वक्तव्यम् — तव्यत् प्रत्यय (विधि-अर्थक)
- कर्तव्यम् — तव्यत् प्रत्यय (विधि-अर्थक)
- सर्वस्वम् — 'सर्व + स्व' (नामपद, विधि-अर्थक नहीं)
- हन्तव्यम् — तव्यत् प्रत्यय (विधि-अर्थक)
भिन्नप्रकृतिकं पदम् = सर्वस्वम्
5(ख)अधोलिखितपदेभ्यः भिन्नप्रकृतिकं पदं चित्वा लिखत —
यत्नेन, वचने, प्रियवाक्यप्रदानेन, मरालेन।Show solution
- यत्नेन — तृतीया विभक्ति, एकवचन
- वचने — सप्तमी विभक्ति, एकवचन (अन्य सभी तृतीया में हैं)
- प्रियवाक्यप्रदानेन — तृतीया विभक्ति, एकवचन
- मरालेन — तृतीया विभक्ति, एकवचन
भिन्नप्रकृतिकं पदम् = वचने
5(ग)अधोलिखितपदेभ्यः भिन्नप्रकृतिकं पदं चित्वा लिखत —
श्रूयताम्, अवधार्यताम्, धनवताम्, क्षम्यताम्।Show solution
- श्रूयताम् — लोट्लकार, कर्मवाच्य (आज्ञार्थक)
- अवधार्यताम् — लोट्लकार, कर्मवाच्य (आज्ञार्थक)
- धनवताम् — षष्ठी विभक्ति, बहुवचन (धनवत् शब्द, विशेषण/नामपद)
- क्षम्यताम् — लोट्लकार, कर्मवाच्य (आज्ञार्थक)
भिन्नप्रकृतिकं पदम् = धनवताम्
5(घ)अधोलिखितपदेभ्यः भिन्नप्रकृतिकं पदं चित्वा लिखत —
जन्तवः, नद्यः, विभूतयः, परितः।Show solution
- जन्तवः — प्रथमा विभक्ति, बहुवचन (जन्तु शब्द)
- नद्यः — प्रथमा विभक्ति, बहुवचन (नदी शब्द)
- विभूतयः — प्रथमा विभक्ति, बहुवचन (विभूति शब्द)
- परितः — अव्यय (चारों ओर)
भिन्नप्रकृतिकं पदम् = परितः
6(क)स्थूलपदमधिकृत्य प्रश्नवाक्यनिर्माणं कुरुत — वृत्ततः क्षीणः हतः भवति।Show solution
(अथवा: वृत्ततः क्षीणः कौदृशः भवति?)
6(ख)स्थूलपदमधिकृत्य प्रश्नवाक्यनिर्माणं कुरुत — धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा अवधार्यताम्।Show solution
6(ग)स्थूलपदमधिकृत्य प्रश्नवाक्यनिर्माणं कुरुत — वृक्षाः फलं न खादन्ति।Show solution
6(घ)स्थूलपदमधिकृत्य प्रश्नवाक्यनिर्माणं कुरुत — खलानाम् मैत्री आरम्भगुर्वी भवति।Show solution
7अधोलिखितानि वाक्यानि लोट्लकारे परिवर्तयत —
(क) नद्यः आस्वाद्यतोयाः सन्ति।
(ख) सः सदैव प्रियवाक्यं वदति।
(ग) त्वं परेषां प्रतिकूलानि न समाचरसि।
(घ) ते वृत्तं यत्नेन संरक्षन्ति।
(ङ) अहं परोपकाराय कार्यं करोमि।Show solution
नियम: लट्लकार (वर्तमान काल) → लोट्लकार (आज्ञार्थक/विधि)
(क) नद्यः आस्वाद्यतोयाः सन्ति।
(ख) सः सदैव प्रियवाक्यं वदति।
(ग) त्वं परेषां प्रतिकूलानि न समाचरसि।
(घ) ते वृत्तं यत्नेन संरक्षन्ति।
(ङ) अहं परोपकाराय कार्यं करोमि।
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Sources & Official References
- NCERT Official — ncert.nic.in
- CBSE Academic — cbseacademic.nic.in
- CBSE Official — cbse.gov.in
- National Education Policy 2020 — education.gov.in
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