कवितावली (उत्तर कांड से) / लक्ष्मण-मूरच्छा और राम का विलाप
CBSE · Class 12 · Hindi
NCERT Solutions for कवितावली (उत्तर कांड से) / लक्ष्मण-मूरच्छा और राम का विलाप — CBSE Class 12 Hindi.
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1कवितावली में उद्धृत छंदों के आधार पर स्पष्ट करें कि तुलसीदास को अपने युग की आर्थिक विषमता की अच्छी समझ है।Show solution
उत्तर:
तुलसीदास केवल भक्त कवि नहीं थे, वे अपने युग के鋭 सामाजिक-आर्थिक द्रष्टा भी थे। कवितावली के छंदों में उन्होंने अपने समय की आर्थिक विषमता का यथार्थ चित्रण किया है। इसके प्रमाण निम्नलिखित हैं:
1. बेरोज़गारी का चित्रण: तुलसी लिखते हैं कि लोग किसी भी प्रकार का काम करने को तैयार हैं — कोई खेती करता है, कोई मज़दूरी, कोई भीख माँगता है, कोई चोरी करता है। इससे स्पष्ट है कि उस युग में रोज़गार का घोर अभाव था।
2. भूख की विकरालता: *"पेट ही को पचत, बेचत बेटा-बेटकी"* — यह पंक्ति बताती है कि लोग पेट भरने के लिए अपनी संतानों तक को बेचने पर विवश थे। यह आर्थिक विषमता की चरम सीमा है।
3. विभिन्न वर्गों की दुर्दशा: किसान, मज़दूर, कारीगर, भिखारी — सभी वर्गों की दयनीय स्थिति का वर्णन करके तुलसी ने समाज के हर तबके की पीड़ा को उजागर किया है।
4. ऊँच-नीच सभी पीड़ित: *"ऊँचे नीचे करम, धरम-अधरम करि"* — यह पंक्ति दर्शाती है कि आर्थिक संकट ने ऊँच-नीच सभी को प्रभावित किया था और लोग धर्म-अधर्म की परवाह किए बिना पेट भरने में लगे थे।
निष्कर्ष: इस प्रकार तुलसीदास ने अपने युग की आर्थिक विषमता — बेरोज़गारी, भुखमरी, बाल-विक्रय, वर्ग-शोषण — का सजीव चित्रण किया है, जो उनकी गहरी सामाजिक समझ का प्रमाण है।
2पेट की आग का शमन ईश्वर (राम) भक्ति का मेघ ही कर सकता है— तुलसी का यह काव्य-सत्य क्या इस समय का भी युग-सत्य है? तर्कसंगत उत्तर दीजिए।Show solution
उत्तर:
तुलसीदास का यह काव्य-सत्य आंशिक रूप से आज के युग-सत्य से मेल खाता है, परंतु पूर्णतः नहीं। इसे दो दृष्टिकोणों से समझा जा सकता है:
पक्ष में तर्क (हाँ, यह आज भी सत्य है):
- आज भी करोड़ों लोग भुखमरी, बेरोज़गारी और आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं।
- जब भौतिक साधन असफल हो जाते हैं, तब मनुष्य ईश्वर की शरण में जाता है और उसे मानसिक शांति मिलती है।
- भक्ति मनुष्य को निराशा से उबारती है और जीने की शक्ति देती है — यह मनोवैज्ञानिक सत्य आज भी प्रासंगिक है।
- सामाजिक समरसता और नैतिक बल के लिए आध्यात्मिक आधार आज भी आवश्यक है।
विपक्ष में तर्क (नहीं, केवल भक्ति पर्याप्त नहीं):
- आज के युग में भूख की समस्या का समाधान केवल भक्ति से नहीं, बल्कि ठोस आर्थिक नीतियों, रोज़गार सृजन और सामाजिक न्याय से होगा।
- आधुनिक विज्ञान, तकनीक और सरकारी योजनाएँ भूख मिटाने में अधिक सक्षम हैं।
- केवल ईश्वर-भरोसे बैठे रहना पलायनवाद है; कर्म और प्रयास भी आवश्यक हैं।
निष्कर्ष: तुलसी का यह कथन आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक धरातल पर आज भी सत्य है, किंतु व्यावहारिक धरातल पर भक्ति के साथ-साथ सामाजिक-आर्थिक प्रयास भी अनिवार्य हैं। भक्ति आंतरिक शक्ति देती है, बाहरी संघर्ष मनुष्य को स्वयं करना होता है।
3तुलसी ने यह कहने की जरूरत क्यों समझी?
धृत कहो, अवधृत कहो, रजपूत कहो, जोलहा कहो कोऊ / काहू की बेटीसों बेटा न ब्याहब, काहूकी जाति बिगार न सोऊ। इस सवैया में काहू के बेटासों बेटी न ब्याहब कहते तो सामाजिक अर्थ में क्या परिवर्तन आता?Show solution
तुलसी को यह कहने की ज़रूरत क्यों पड़ी:
तुलसीदास के युग में जाति-व्यवस्था अत्यंत कठोर थी। समाज में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र आदि जातियों के बीच विवाह-संबंध वर्जित थे। जाति के आधार पर भेदभाव, छुआछूत और सामाजिक उत्पीड़न चरम पर था। तुलसी स्वयं एक ऐसे भक्त थे जो राम-भक्ति को सर्वोपरि मानते थे और जाति-बंधन को व्यर्थ समझते थे।
उन्होंने यह इसलिए कहा क्योंकि:
- समाज में उन पर जाति-भ्रष्ट होने के आरोप लगाए जाते थे।
- वे स्पष्ट करना चाहते थे कि वे किसी की जाति नहीं बिगाड़ रहे — न बेटे का विवाह किसी अन्य जाति में करेंगे, न बेटी का।
- यह उनका आत्मसम्मान और स्वाभिमान का वक्तव्य था।
यदि "काहू के बेटासों बेटी न ब्याहब" कहते तो सामाजिक अर्थ:
यदि तुलसी "बेटी" का विवाह न करने की बात कहते, तो सामाजिक अर्थ में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आता:
1. कन्यादान की परंपरा: भारतीय समाज में बेटी देना (कन्यादान) अधिक संवेदनशील विषय था। बेटी देने में जाति की शुद्धता का प्रश्न अधिक गहरा था।
2. सामाजिक दबाव: बेटी का विवाह अन्य जाति में करना उस समाज में अधिक बड़ा अपराध माना जाता था, क्योंकि इससे "कुल" की मर्यादा पर प्रश्नचिह्न लगता था।
3. स्त्री की स्वायत्तता: बेटी के संदर्भ में यह कथन स्त्री को वस्तु की तरह देखने की परंपरा को और उजागर करता।
4. अर्थ में तीव्रता: "बेटी न ब्याहब" कहने से तुलसी का विद्रोह और अधिक तीखा होता, क्योंकि यह समाज की सबसे संवेदनशील नस को छूता।
निष्कर्ष: तुलसी ने "बेटा" का उल्लेख करके अपेक्षाकृत सौम्य रूप में अपनी बात कही। "बेटी" का उल्लेख करने पर सामाजिक विद्रोह और अधिक प्रखर होता तथा स्त्री की सामाजिक स्थिति पर भी प्रश्न उठता।
4धृत कहो... वाले छंद में ऊपर से सरल व निरीह दिखलाई पड़ने वाले तुलसी की भीतरी असलियत एक स्वाभिमानी भक्त हृदय की है। इससे आप कहाँ तक सहमत हैं?Show solution
उत्तर:
मैं इस कथन से पूर्णतः सहमत हूँ। इसके निम्नलिखित आधार हैं:
1. बाहरी सरलता, भीतरी दृढ़ता:
तुलसीदास की भाषा सरल और सहज है, वे विनम्र भाव से बात करते हैं — "माँगि कै खैबो, मसीत को सोइबो" — अर्थात् माँगकर खाएँगे, मस्जिद में सोएँगे। यह बाहरी निरीहता है। परंतु भीतर से वे अत्यंत दृढ़ और स्वाभिमानी हैं।
2. जाति-प्रथा को चुनौती:
"धृत कहो, अवधृत कहो, रजपूत कहो, जोलहा कहो कोऊ" — यहाँ तुलसी स्पष्ट कह रहे हैं कि समाज चाहे उन्हें किसी भी जाति का कहे, उन्हें कोई फ़र्क नहीं पड़ता। यह एक स्वाभिमानी व्यक्ति का उद्घोष है।
3. राम-भक्ति ही पहचान:
तुलसी की असली पहचान उनकी राम-भक्ति है, जाति नहीं। वे कहते हैं — "तुलसी सरनाम गुलाम है राम को" — अर्थात् वे केवल राम के दास हैं। यह भक्त का परम स्वाभिमान है।
4. सामाजिक दबाव से निर्भयता:
उस युग में जाति-व्यवस्था के विरुद्ध बोलना साहस का काम था। तुलसी ने निर्भीकता से कहा कि वे किसी के दबाव में नहीं आएँगे — न विवाह-संबंध बदलेंगे, न अपनी भक्ति।
5. "लैबोको एकु न दैबको दोऊ":
यह पंक्ति दर्शाती है कि तुलसी न किसी से कुछ लेने की चाह रखते हैं, न देने की — यह पूर्ण आत्मनिर्भरता और स्वाभिमान का प्रतीक है।
निष्कर्ष: तुलसीदास की यह भीतरी असलियत — एक स्वाभिमानी, निर्भीक, राम-शरणागत भक्त की — उनके काव्य में स्पष्ट झलकती है। वे बाहर से जितने विनम्र हैं, भीतर से उतने ही दृढ़ और आत्मसम्मानी हैं।
5व्याख्या करें—
(क) मर्म हित लागि तजेहु पितु माता। सहेहु बिपिन हिम आतप बाता।
जी जनतेऊँ बन बंधु बिछोह। पितु बचन मनतेऊँ नहिं ओह।।
(ख) जथा पंख बिनु खग अति दीना। मनि बिनु फनि करिबर कर हीना।
अस मम जिवन बंधु बिनु तोही। जी जड़ दैव जिआवै मोही।।
(ग) माँगि कै खैबो, मसीत को सोइबो, लैबोको एकु न दैबको दोऊ।।
(घ) ऊँचे नीचे करम, धरम-अधरम करि, पेट ही को पचत, बेचत बेटा-बेटकी।।Show solution
मूल पंक्तियाँ: *मर्म हित लागि तजेहु पितु माता। सहेहु बिपिन हिम आतप बाता।
जी जनतेऊँ बन बंधु बिछोह। पितु बचन मनतेऊँ नहिं ओह।।*
प्रसंग: लक्ष्मण के मूर्छित होने पर राम विलाप करते हुए कहते हैं।
व्याख्या: राम कहते हैं — हे लक्ष्मण! तुमने मेरे (भाई के) प्रेम के लिए माता-पिता को त्याग दिया। वन में ठंड, धूप और तूफान सहे। यदि मुझे पहले से पता होता कि वन में भाई का वियोग होगा, तो मैं पिता की आज्ञा कभी नहीं मानता। यह राम की पश्चाताप-भरी वेदना है। वे स्वयं को लक्ष्मण के कष्टों का उत्तरदायी मानते हैं। यहाँ भ्रातृप्रेम की गहराई और राम की मानवीय संवेदनशीलता का मार्मिक चित्रण है।
---
(ख) व्याख्या:
मूल पंक्तियाँ: *जथा पंख बिनु खग अति दीना। मनि बिनु फनि करिबर कर हीना।
अस मम जिवन बंधु बिनु तोही। जी जड़ दैव जिआवै मोही।।*
प्रसंग: राम लक्ष्मण की मूर्छा पर विलाप करते हुए उपमाएँ देते हैं।
व्याख्या: राम कहते हैं — जैसे पंखों के बिना पक्षी अत्यंत दीन-हीन हो जाता है, जैसे नागमणि के बिना साँप और सूँड के बिना हाथी असहाय हो जाता है — ठीक उसी प्रकार हे भाई! तुम्हारे बिना मेरा जीवन निरर्थक है। फिर भी यह निष्ठुर विधाता मुझे जीवित रखे हुए है। यहाँ तीन सुंदर उपमाओं के माध्यम से राम की विवशता और लक्ष्मण के प्रति उनके अगाध प्रेम को व्यक्त किया गया है।
---
(ग) व्याख्या:
मूल पंक्तियाँ: *माँगि कै खैबो, मसीत को सोइबो, लैबोको एकु न दैबको दोऊ।।*
प्रसंग: तुलसीदास अपनी स्वतंत्र जीवन-शैली का वर्णन करते हैं।
व्याख्या: तुलसी कहते हैं — मैं माँगकर खाऊँगा, मस्जिद में सोऊँगा (अर्थात् किसी के भी आश्रय में रहूँगा), न किसी से कुछ लेने की इच्छा है, न किसी को कुछ देने की। यह पंक्ति तुलसी की निर्लिप्तता, स्वाभिमान और सांसारिक बंधनों से मुक्ति की भावना को व्यक्त करती है। वे किसी पर आश्रित नहीं रहना चाहते और न ही किसी को कुछ देने का दायित्व लेना चाहते। यह उनकी फकीराना वृत्ति और आत्मनिर्भरता का प्रतीक है।
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(घ) व्याख्या:
मूल पंक्तियाँ: *ऊँचे नीचे करम, धरम-अधरम करि, पेट ही को पचत, बेचत बेटा-बेटकी।।*
प्रसंग: तुलसी अपने युग की आर्थिक विपन्नता का चित्रण करते हैं।
व्याख्या: तुलसी कहते हैं — लोग ऊँचे-नीचे सभी प्रकार के काम करते हैं, धर्म-अधर्म की परवाह किए बिना, केवल पेट भरने के लिए। यहाँ तक कि वे अपने बेटे-बेटियों को भी बेच देते हैं। यह पंक्ति तुलसी के युग की भयावह आर्थिक विषमता का यथार्थ चित्र है। भूख इतनी भयंकर है कि मनुष्य नैतिकता, धर्म और पारिवारिक संबंध सब भूल जाता है। यह आज भी उतना ही प्रासंगिक है।
6भ्रातृशोक में हुई राम की दशा को कवि ने प्रभु की नर लीला की अपेक्षा सच्ची मानवीय अनुभूति के रूप में रचा है। क्या आप इससे सहमत हैं? तर्कपूर्ण उत्तर दीजिए।Show solution
उत्तर:
हाँ, मैं इस कथन से पूर्णतः सहमत हूँ। तुलसीदास ने राम के भ्रातृशोक को दैवीय लीला के रूप में नहीं, बल्कि एक सच्चे मानव की वेदना के रूप में चित्रित किया है। इसके निम्नलिखित प्रमाण हैं:
1. पश्चाताप की भावना:
राम कहते हैं — *"जी जनतेऊँ बन बंधु बिछोह। पितु बचन मनतेऊँ नहिं ओह।"* — यदि पहले जानता कि वन में भाई का वियोग होगा, तो पिता की आज्ञा न मानता। यह एक सामान्य मनुष्य का पश्चाताप है, ईश्वर का नहीं।
2. आत्म-दोष:
राम स्वयं को लक्ष्मण के कष्टों का कारण मानते हैं — "मेरे कारण तुमने माता-पिता छोड़े, वन के कष्ट सहे।" यह मानवीय अपराध-बोध है।
3. उपमाओं में मानवीय संवेदना:
*"जथा पंख बिनु खग अति दीना"* — पंखहीन पक्षी, मणिहीन साँप, सूँडहीन हाथी की उपमाएँ देकर राम अपनी असहायता व्यक्त करते हैं। यह एक भाई की वेदना है।
4. सांसारिक चिंताएँ:
राम सोचते हैं — *"जैहऊँ अवध कवन मुहुँ लाई"* — अयोध्या किस मुँह से जाऊँगा? माँ सुमित्रा को क्या उत्तर दूँगा? यह एक पुत्र और भाई की लौकिक चिंता है।
5. "नारि हेतु प्रिय भाइ गँवाई":
राम स्वयं को धिक्कारते हैं कि स्त्री (सीता) के लिए प्रिय भाई खो दिया। यह आत्म-ग्लानि पूर्णतः मानवीय है।
निष्कर्ष: तुलसीदास ने राम को यहाँ अवतार के रूप में नहीं, बल्कि एक प्रेमी भाई के रूप में चित्रित किया है। यही इस काव्य की विशेषता है — राम की दिव्यता के साथ-साथ उनकी मानवीयता का यह चित्रण पाठक के हृदय को गहराई से स्पर्श करता है।
7शोकप्रस्त माहौल में हनुमान के अवतरण को करुण रस के बीच वीर रस का आविर्भाव क्यों कहा गया है?Show solution
उत्तर:
लक्ष्मण की मूर्छा के कारण पूरे वातावरण में शोक और निराशा का साम्राज्य था। राम विलाप कर रहे थे, वानर-सेना भयभीत और दुखी थी, सुग्रीव आदि भी शोकाकुल थे। यह पूरा दृश्य करुण रस से ओत-प्रोत था।
ऐसे में हनुमान का संजीवनी बूटी लेकर आगमन एक नाटकीय परिवर्तन लाता है:
1. वीरता का प्रदर्शन:
हनुमान ने अकेले हिमालय जाकर संजीवनी लाने का दुष्कर कार्य किया। यह असाधारण वीरता और पराक्रम का कार्य था।
2. निराशा से आशा की ओर:
जब सब निराश थे, हनुमान ने अपने बल और बुद्धि से असंभव को संभव कर दिखाया। यह वीर रस का मूल भाव है — संकट में भी निर्भीक रहना।
3. शोक का अंत:
हनुमान के आते ही करुण रस का वातावरण बदल गया। लक्ष्मण को होश आया, राम का विलाप थमा और सेना में उत्साह का संचार हुआ।
4. रस-परिवर्तन:
काव्यशास्त्र में जब एक रस के बीच दूसरा रस प्रकट होता है, तो वह संचारी भाव की तरह कार्य करता है। यहाँ करुण रस के बीच वीर रस का आविर्भाव काव्य को और अधिक प्रभावशाली बनाता है।
निष्कर्ष: हनुमान का यह अवतरण शोक-संतप्त वातावरण में आशा, उत्साह और वीरता का संचार करता है। इसीलिए इसे करुण रस के बीच वीर रस का आविर्भाव कहा गया है — यह काव्य की रस-योजना का सुंदर उदाहरण है।
8जैहऊँ अवध कवन मुहुँ लाई। नारि हेतु प्रिय भाइ गँवाई।।
बरु अपजस सहतेऊँ जग माहीं। नारि हानि बिसेष छति नाहीं।।
भाई के शोक में डूबे राम के इस प्रलाप-वचन में स्त्री के प्रति कैसा सामाजिक दृष्टिकोण संभावित है?Show solution
उत्तर:
इन पंक्तियों में राम कहते हैं — "स्त्री (पत्नी) के लिए प्रिय भाई को खो दिया। चाहे जग में अपयश सहना पड़ता, पर स्त्री की हानि कोई विशेष क्षति नहीं होती।"
इन वचनों में स्त्री के प्रति निम्नलिखित सामाजिक दृष्टिकोण परिलक्षित होता है:
1. स्त्री को गौण मानना:
राम के इस कथन में स्त्री (पत्नी) की तुलना में भाई को अधिक महत्त्व दिया गया है। यह पितृसत्तात्मक समाज की उस सोच को दर्शाता है जहाँ स्त्री को पुरुष की तुलना में कम महत्त्वपूर्ण माना जाता था।
2. स्त्री की हानि को कम आँकना:
"नारि हानि बिसेष छति नाहीं" — यह कथन स्त्री को एक प्रतिस्थापनीय वस्तु की तरह देखने की मानसिकता को उजागर करता है। यह तत्कालीन समाज में स्त्री की निम्न स्थिति का प्रतिबिंब है।
3. संदर्भ का महत्त्व:
हालाँकि यह ध्यान रखना आवश्यक है कि ये "प्रलाप-वचन" हैं — अर्थात् शोक में डूबे व्यक्ति के तर्कहीन उद्गार। राम इस समय अत्यंत व्याकुल हैं और जो मन में आ रहा है, वह कह रहे हैं। इसे उनका सुविचारित मत नहीं माना जाना चाहिए।
4. तुलसी के युग का प्रतिबिंब:
तुलसीदास के युग में स्त्री की सामाजिक स्थिति अधीनस्थ थी। यह कथन उस युग की सामाजिक मानसिकता का प्रतिबिंब है, न कि आदर्श।
5. आधुनिक दृष्टिकोण:
आज के संदर्भ में यह दृष्टिकोण स्वीकार्य नहीं है। स्त्री और पुरुष समान हैं और किसी की भी हानि समान रूप से महत्त्वपूर्ण है।
निष्कर्ष: ये पंक्तियाँ तत्कालीन समाज में स्त्री की गौण स्थिति को उजागर करती हैं। यद्यपि ये शोक में कहे गए प्रलाप-वचन हैं, फिर भी इनमें पितृसत्तात्मक सोच की झलक मिलती है जो आज के समतामूलक समाज में अस्वीकार्य है।
पाठ के आसपास
1कालिदास के रघुवंश महाकाव्य में पत्नी (इंदुमती) के मृत्यु-शोक पर आज तथा निराला की सरोज-स्मृति में पुत्री (सरोज) के मृत्यु-शोक पर पिता के करुण उद्गार निकले हैं। उनसे भ्रातृशोक में डूबे राम के इस विलाप की तुलना करें।Show solution
उत्तर:
तीनों शोक-काव्यों की तुलना:
| पक्ष | कालिदास (रघुवंश) | निराला (सरोज-स्मृति) | तुलसी (राम-विलाप) |
|---|---|---|---|
| शोक का विषय | पत्नी इंदुमती की मृत्यु | पुत्री सरोज की मृत्यु | भाई लक्ष्मण की मूर्छा |
| संबंध | पति-पत्नी | पिता-पुत्री | भाई-भाई |
| भाव | वियोग-शृंगार, करुण | पितृ-वात्सल्य, करुण | भ्रातृप्रेम, करुण |
समानताएँ:
- तीनों में करुण रस की प्रधानता है।
- तीनों में प्रिय के वियोग की असहनीय पीड़ा व्यक्त हुई है।
- तीनों में उपमाओं और प्रतीकों का सुंदर प्रयोग है।
- तीनों में शोकाकुल व्यक्ति की मानवीय संवेदना उभरकर आती है।
अंतर:
- कालिदास का शोक संस्कृत की परिष्कृत भाषा में है, अलंकार-प्रधान है।
- निराला का शोक व्यक्तिगत अनुभव पर आधारित है, आत्मकथात्मक है और आधुनिक संवेदना से युक्त है।
- तुलसी का राम-विलाप भक्ति-काव्य की परंपरा में है, किंतु मानवीय भावनाएँ उतनी ही सच्ची हैं।
निष्कर्ष: तीनों काव्यों में शोक की सार्वभौमिक मानवीय अनुभूति है। तुलसी का राम-विलाप भ्रातृप्रेम की दृष्टि से अनूठा है — यह संबंध पति-पत्नी या पिता-पुत्री से भिन्न, किंतु उतना ही गहरा है।
2पेट ही को पचत, बेचत बेटा-बेटकी तुलसी के युग का ही नहीं आज के युग का भी सत्य है। भुखमरी में किसानों की आत्महत्या और संतानों (खासकर बेटियों) को भी बेच डालने की हृदय-विदारक घटनाएँ हमारे देश में घटती रही हैं। वर्तमान परिस्थितियों और तुलसी के युग की तुलना करें।Show solution
उत्तर:
तुलसी के युग की परिस्थितियाँ:
- मुगल शासन काल में किसानों पर भारी कर का बोझ था।
- अकाल और सूखे की स्थिति में सरकारी सहायता नहीं मिलती थी।
- बेरोज़गारी व्यापक थी, रोज़गार के साधन सीमित थे।
- सामाजिक सुरक्षा का कोई तंत्र नहीं था।
- लोग पेट भरने के लिए संतानों को बेचने पर विवश होते थे।
आज की परिस्थितियाँ:
- किसानों की आत्महत्याएँ आज भी जारी हैं — कर्ज़, सूखा, फसल नष्ट होना प्रमुख कारण हैं।
- बेटियों की तस्करी और बाल-विक्रय की घटनाएँ अभी भी होती हैं।
- बेरोज़गारी की समस्या आज भी गंभीर है।
- आर्थिक असमानता बढ़ी है — अमीर और अमीर, गरीब और गरीब होते जा रहे हैं।
समानताएँ:
- दोनों युगों में गरीबी और भूख की समस्या विद्यमान है।
- दोनों युगों में आर्थिक विषमता है।
- दोनों युगों में कमज़ोर वर्ग सबसे अधिक पीड़ित है।
अंतर:
- आज सरकारी योजनाएँ (मनरेगा, पीडीएस, आदि) हैं, तब नहीं थीं।
- आज जागरूकता और कानूनी सुरक्षा अधिक है।
- आज मीडिया और सामाजिक संगठन सक्रिय हैं।
निष्कर्ष: तुलसी की यह पंक्ति आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। समस्या का स्वरूप बदला है, परंतु मूल कारण — आर्थिक विषमता और सामाजिक उपेक्षा — आज भी विद्यमान है।
3तुलसी के युग की बेकारी के क्या कारण हो सकते हैं? आज की बेकारी की समस्या के कारणों के साथ उसे मिलाकर कक्षा में परिचर्चा करें।Show solution
उत्तर:
तुलसी के युग (16वीं-17वीं शताब्दी) में बेकारी के कारण:
1. युद्ध और अस्थिरता: मुगल शासन में निरंतर युद्धों के कारण कृषि और व्यापार प्रभावित होते थे।
2. प्राकृतिक आपदाएँ: अकाल, बाढ़, सूखे से फसलें नष्ट होती थीं।
3. सीमित उद्योग: कुटीर उद्योगों के अलावा रोज़गार के साधन नहीं थे।
4. जाति-व्यवस्था: जाति के आधार पर काम निर्धारित था, जिससे गतिशीलता नहीं थी।
5. भारी कर: किसानों पर अत्यधिक कर लगाए जाते थे।
6. शिक्षा का अभाव: सामान्य जन को शिक्षा नहीं मिलती थी।
आज की बेकारी के कारण:
1. जनसंख्या विस्फोट: रोज़गार की तुलना में जनसंख्या अधिक तेज़ी से बढ़ रही है।
2. तकनीकी बेरोज़गारी: मशीनीकरण और ऑटोमेशन से मानव श्रम की माँग घटी है।
3. शिक्षा-रोज़गार का अंतर: शिक्षा व्यावहारिक कौशल से दूर है।
4. कृषि संकट: किसानों को उचित मूल्य नहीं मिलता।
5. आर्थिक असमानता: पूँजी का केंद्रीकरण।
परिचर्चा बिंदु: दोनों युगों में बेकारी का मूल कारण — संसाधनों का असमान वितरण — एक ही है। समाधान के लिए नीतिगत सुधार, शिक्षा और सामाजिक न्याय आवश्यक हैं।
4राम कौशल्या के पुत्र थे और लक्ष्मण सुमित्रा के। इस प्रकार वे परस्पर सहोदर (एक ही माँ के पेट से जन्मे) नहीं थे। फिर, राम ने उन्हें लक्ष्य कर ऐसा क्यों कहा— "मिलइ न जगत सहोदर भ्राता"? इस पर विचार करें।Show solution
उत्तर:
यह एक अत्यंत विचारणीय प्रश्न है। राम और लक्ष्मण एक ही माँ के पुत्र नहीं थे — राम कौशल्या के और लक्ष्मण सुमित्रा के पुत्र थे। फिर भी राम ने "सहोदर" शब्द का प्रयोग किया। इसके निम्नलिखित कारण हो सकते हैं:
1. भावनात्मक सहोदरता:
सहोदर का शाब्दिक अर्थ है — एक ही उदर (माँ के गर्भ) से जन्मे। परंतु राम यहाँ इसका प्रयोग भावनात्मक अर्थ में कर रहे हैं। लक्ष्मण ने जो समर्पण, त्याग और प्रेम दिखाया, वह किसी सगे भाई से भी बढ़कर था।
2. लक्ष्मण का असाधारण समर्पण:
लक्ष्मण ने राम के लिए माता-पिता, राजसुख सब छोड़ा। वन में 14 वर्ष तक राम की सेवा की। ऐसा समर्पण सहोदर से भी दुर्लभ है।
3. शोक में अतिशयोक्ति:
शोक की अवस्था में मनुष्य अतिशयोक्तिपूर्ण भाषा का प्रयोग करता है। राम यहाँ यह कहना चाहते हैं कि लक्ष्मण जैसा भाई संसार में कहीं नहीं मिलेगा।
4. भारतीय परंपरा:
भारतीय परंपरा में एक ही पिता के पुत्रों को भी सहोदर माना जाता है। दशरथ के सभी पुत्र एक ही पिता के थे, इसलिए सांस्कृतिक दृष्टि से वे सहोदर थे।
निष्कर्ष: राम का "सहोदर" शब्द का प्रयोग यह सिद्ध करता है कि रक्त-संबंध से अधिक महत्त्वपूर्ण प्रेम और समर्पण का संबंध होता है। लक्ष्मण ने अपने कर्म से सहोदर से भी बढ़कर भाई होने का प्रमाण दिया था।
5यहाँ कवि तुलसी के दोहा, चौपाई, सोरठा, कवित, सवैया—ये पाँच छंद प्रयुक्त हैं। इसी प्रकार तुलसी साहित्य में और छंद तथा काव्य-रूप आए हैं। ऐसे छंदों व काव्य-रूपों की सूची बनाएँ।Show solution
उत्तर:
तुलसीदास ने अपने विभिन्न ग्रंथों में अनेक छंदों और काव्य-रूपों का प्रयोग किया है। उनकी सूची निम्नलिखित है:
प्रमुख छंद:
| छंद | विशेषता | प्रयोग |
|---|---|---|
| दोहा | अर्धसम मात्रिक, 13+11 मात्राएँ | रामचरितमानस, दोहावली |
| चौपाई | सम मात्रिक, 16+16 मात्राएँ | रामचरितमानस |
| सोरठा | दोहे का उलटा रूप | रामचरितमानस |
| कवित (मनहरण) | वार्णिक, 31 वर्ण प्रति चरण | कवितावली |
| सवैया | वार्णिक, 22-26 वर्ण | कवितावली |
| हरिगीतिका | मात्रिक छंद | विनयपत्रिका |
| छप्पय | 6 पंक्तियों का छंद | विभिन्न रचनाएँ |
| बरवै | अर्धसम मात्रिक | बरवै रामायण |
| झूलना | वार्णिक छंद | गीतावली |
प्रमुख काव्य-रूप:
1. महाकाव्य — रामचरितमानस
2. मुक्तक काव्य — दोहावली, कवितावली
3. गीत-काव्य — विनयपत्रिका, गीतावली
4. खंडकाव्य — बरवै रामायण, पार्वती मंगल
5. स्तुति-काव्य — हनुमान चालीसा, संकटमोचन
निष्कर्ष: तुलसीदास की छंद-विविधता उनकी काव्य-प्रतिभा का प्रमाण है। उन्होंने अवधी और ब्रजभाषा दोनों में विभिन्न छंदों का कुशलतापूर्वक प्रयोग किया।
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Sources & Official References
- NCERT Official — ncert.nic.in
- CBSE Academic — cbseacademic.nic.in
- CBSE Official — cbse.gov.in
- National Education Policy 2020 — education.gov.in
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