बाज़ार दर्शन-(जैनेन्द्र कुमार) (Part 2) — NCERT Solutions
CBSE · Class 12 · Hindi
NCERT Solutions for बाज़ार दर्शन-(जैनेन्द्र कुमार) (Part 2), CBSE Class 12 Hindi: 19 textbook questions solved step by step.
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पाठ के साथ
1बाजार का जादू चढ़ने और उतरने पर मनुष्य पर क्या-क्या असर पड़ता है?Show solution
बाजार का जादू चढ़ने पर मनुष्य की आँखों और मन पर असर पड़ता है। उसे लगता है कि उसे और-और चीज़ें चाहिए; वह असंतोष, तृष्णा और ईर्ष्या से भर सकता है। यदि वह ठीक से न जाने कि क्या चाहता है, तो वह हर वस्तु की ओर खिंचता चला जाता है, खोया-सा और कभी-कभी पागल-सा हो जाता है।
बाजार का जादू उतरने पर उसे समझ में आता है कि बहुत-सी फैंसी चीज़ें वास्तव में आराम नहीं बढ़ातीं, बल्कि खलल डालती हैं। तब मनुष्य को अपनी वास्तविक ज़रूरत याद आती है और वह अनावश्यक सामान से बच सकता है।
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2बाजार में भगत जी के व्यक्तित्व का कौन-सा सशक्त पहलू उभरकर आता है? क्या आपकी नजर में उनका आचरण समाज में शांति-स्थापित करने में मददगार हो सकता है?Show solution
बाजार में भगत जी के व्यक्तित्व का सबसे सशक्त पहलू उनकी संतुष्टि, निस्पृहता और आत्मिक दृढ़ता है। वे केवल ज़रूरत भर लेते हैं; बाकी चमक-दमक से प्रभावित नहीं होते। उनके मन में लोभ नहीं, बल्कि आंतरिक तुष्टि है।
हाँ, उनका आचरण समाज में शांति-स्थापित करने में मददगार हो सकता है, क्योंकि यदि लोग केवल आवश्यकता भर लें और अनावश्यक संग्रह तथा दिखावे से बचें तो ईर्ष्या, प्रतिस्पर्धा, कपट और शोषण कम होंगे। ऐसे आचरण से बाजार और समाज दोनों में सद्भाव बढ़ेगा।
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3'बाजारूपन' से क्या तात्पर्य है? किस प्रकार के व्यक्ति बाजार को सार्थकता प्रदान करते हैं अथवा बाजार की सार्थकता किसमें है?Show solution
बाजारूपन से तात्पर्य है बाजार का वह रूप जिसमें लोभ, दिखावा, कपट, संग्रह-प्रवृत्ति और शोषण बढ़ जाता है। ऐसे बाजार में आवश्यकताओं का आदान-प्रदान नहीं होता, बल्कि लोग एक-दूसरे को ठगने की घात में रहते हैं।
बाजार को सार्थकता वे व्यक्ति देते हैं जो जानते हैं कि वे क्या चाहते हैं और ज़रूरत भर खरीदते हैं। अर्थात, बाजार की सार्थकता आवश्यकता के समय काम आने में है। जब ग्राहक अपनी वास्तविक जरूरत के अनुसार खरीदारी करता है, तभी बाजार उपयोगी और अर्थपूर्ण बनता है।
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4बाजार किसी का लिंग, जाति, धर्म या क्षेत्र नहीं देखता; वह देखता है सिर्फ उसकी क्रय शक्ति को। इस रूप में वह एक प्रकार से सामाजिक समता की भी रचना कर रहा है। आप इससे कहाँ तक सहमत हैं?Show solution
इस बात से मैं आंशिक रूप से सहमत हूँ। बाजार वास्तव में लिंग, जाति, धर्म या क्षेत्र नहीं देखता; वह केवल क्रय शक्ति को देखता है। इस अर्थ में वह सभी को एक ही कसौटी पर रखता है।
लेकिन यह सामाजिक समता पूरी तरह नहीं है, क्योंकि यहाँ समानता मानवता के आधार पर नहीं, बल्कि पैसे के आधार पर है। जिसके पास अधिक क्रय शक्ति है, वही अधिक खरीद सकता है। इसलिए यह समता बाहरी और सीमित है। यह सामाजिक न्याय नहीं, बल्कि आर्थिक क्षमता पर आधारित व्यवस्था है।
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5आप अपने तथा समाज से कुछ ऐसे प्रसंग का उल्लेख करें—(क) जब पैसा शक्ति के परिचायक के रूप में प्रतीत हुआ।
(ख) जब पैसे की शक्ति काम नहीं आई।
Show solution
(क) जब पैसा शक्ति के परिचायक के रूप में प्रतीत हुआ।
(ख) जब पैसे की शक्ति काम नहीं आई।
(क) एक बार परिवार में किसी सदस्य को अचानक इलाज की जरूरत पड़ी। पैसे होने से दवा, जाँच और अस्पताल तक पहुँचने का प्रबंध तुरंत हो सका। समाज में भी धन से विद्यालय, अस्पताल और सड़क जैसी उपयोगी सुविधाएँ बनाई जा सकती हैं। ऐसे अवसरों पर पैसा शक्ति और काम पूरा करने की क्षमता का परिचायक लगता है।
(ख) दूसरी ओर, पैसा अपने-आप बीमारी ठीक नहीं कर सकता और न ही सच्चा स्नेह, विश्वास या मन की शांति खरीद सकता है। कठिन समय में किसी अपने का साथ और संवेदना कई बार धन से अधिक सहारा देते हैं। इसलिए पैसे की शक्ति हर जगह काम नहीं आती।
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पाठ के आसपास
1बाजार दर्शन पाठ में बाजार जाने या न जाने के संदर्भ में मन की कई स्थितियों का जिक्र आया है। आप इन स्थितियों से जुड़े अपने अनुभवों का वर्णन कीजिए।(क) मन खाली हो (ख) मन खाली न हो
(ग) मन बंद हो (घ) मन में नकार हो
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(क) मन खाली हो (ख) मन खाली न हो
(ग) मन बंद हो (घ) मन में नकार हो
(क) मन खाली हो तो बिना किसी तय जरूरत के बाजार जाने पर सजाई हुई चीजें आकर्षित करती हैं। एक बार बिना सूची बनाए खरीदारी करने पर मुझे कई ऐसी चीजें पसंद आने लगीं जिनकी मुझे खास जरूरत नहीं थी।
(ख) मन खाली न हो, यानी जरूरत और लक्ष्य स्पष्ट हों, तो बाजार में खरीदारी आसान रहती है। सूची बनाकर जाने पर मैं जरूरी सामान लेकर लौटता/लौटती हूँ और बाकी आकर्षक चीजों से विचलित नहीं होता/होती।
(ग) मन बंद हो तो व्यक्ति नई बात या दूसरे की सलाह सुनने से इनकार कर सकता है। ऐसा कठोर रवैया समस्या का सही हल खोजने में बाधा बनता है।
(घ) मन में नकार हो और व्यक्ति हर इच्छा को दबाने की कोशिश करे, तो इच्छा मिटने के बजाय मन में बनी रह सकती है। बेहतर है कि जरूरत को समझकर विवेक से निर्णय लिया जाए—न बाजार के आकर्षण में बहें, न मन को जबरन बंद करें।
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2बाजार दर्शन पाठ में किस प्रकार के ग्राहकों की बात हुई है? आप स्वयं को किस श्रेणी का ग्राहक मानते/मानती हैं?Show solution
पाठ में मुख्यतः दो तरह के ग्राहकों की बात हुई है—
- वे ग्राहक जो अपनी जरूरत जानते हैं और उतना ही खरीदते हैं जितना आवश्यक है।
- वे ग्राहक जो बाजार की चमक-दमक में फँस जाते हैं और बिना जरूरत के चीजें खरीदते चले जाते हैं।
मैं स्वयं को पहली श्रेणी का ग्राहक मानना/मानती हूँ, क्योंकि मैं आवश्यकता और उपयोगिता देखकर ही खरीदने की कोशिश करता/करती हूँ।
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3आप बाजार की भिन्न-भिन्न प्रकार की संस्कृति से अवश्य परिचित होंगे। मॉल की संस्कृति और सामान्य बाजार और हाट की संस्कृति में आप क्या अंतर पाते हैं? पर्चेजिंग पावर आपको किस तरह के बाजार में नजर आती है?Show solution
मॉल की संस्कृति में चमक-दमक, ब्रांड, सजावट, मनोरंजन और बड़ी क्रय शक्ति का प्रदर्शन होता है। वहाँ खरीदारी अक्सर दिखावे और आकर्षण से जुड़ जाती है।
सामान्य बाजार में जरूरत की चीजें सहज रूप से मिलती हैं और ग्राहक अपनी सुविधा के अनुसार खरीदता है।
हाट अधिक स्थानीय, सादा और आवश्यक वस्तुओं का बाजार होता है। वहाँ संबंध भी अपेक्षाकृत सीधे और आत्मीय होते हैं।
पर्चेजिंग पावर सबसे अधिक मॉल जैसे बाज़ार में नजर आती है, क्योंकि वहाँ खरीदने की क्षमता और उपभोग-प्रदर्शन प्रमुख होता है।
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4लेखक ने पाठ में संकेत किया है कि कभी-कभी बाजार में आवश्यकता ही शोषण का रूप धारण कर लेती है। क्या आप इस विचार से सहमत हैं? तर्क सहित उत्तर दीजिए।Show solution
हाँ, मैं इस विचार से सहमत हूँ। कई बार बाजार में चीजों की चमक, ब्रांडिंग और कृत्रिम आकर्षण के कारण जरूरत भी शोषण का रूप ले लेती है। ग्राहक सोचता है कि उसे वस्तु की आवश्यकता है, जबकि उसे वस्तुतः प्रचार और दिखावे के माध्यम से खरीदने को उकसाया गया होता है।
जब कोई अपनी वास्तविक जरूरत तय किए बिना बाजार में जाता है, तो वह अनावश्यक चीजें खरीद लेता है। इससे उसके पैसे की हानि होती है और बाजार उसकी कमजोरी का लाभ उठाता है। इसलिए पाठ के अनुसार, आवश्यकता और शोषण के बीच की रेखा बहुत पतली हो सकती है।
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5स्त्री माया न जोड़े यहाँ माया शब्द किस ओर संकेत कर रहा है? स्त्रियों द्वारा माया जोड़ना प्रकृति प्रदत्त नहीं, बल्कि परिस्थितिवश है। वे कौन-सी परिस्थितियाँ हैं जो स्त्री को माया जोड़ने के लिए विवश कर देती हैं?Show solution
यहाँ माया शब्द सामान, संपत्ति, दिखावा और संग्रह की ओर संकेत करता है। अर्थात, स्त्री के संदर्भ में माया जोड़ने का अर्थ केवल वस्तुएँ इकट्ठी करना नहीं, बल्कि गृह-व्यवस्था और जीवन-निर्वाह से जुड़ी जिम्मेदारियाँ निभाना भी हो सकता है।
स्त्रियाँ प्रकृति से माया जोड़ने वाली नहीं होतीं; वे कई परिस्थितियों में ऐसा करने को विवश होती हैं—जैसे:
- परिवार की आर्थिक ज़रूरतें
- घर-गृहस्थी चलाने की जिम्मेदारी
- बच्चों और परिवार की सुरक्षा
- सामाजिक दबाव और असुरक्षा
- भविष्य के लिए संचित करने की आवश्यकता
इसलिए माया जोड़ना अधिकतर परिस्थितिवश होता है, स्वभाववश नहीं।
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आपसदारी
चाह गई चिंता गई मनुओं बेपरवाह
जाके कछु न चाहिए सोई सहसाहा।
—कबीर
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गड़रिया बगैर कहे ही उस के दिल की बात समझ गया,
पर अँगूठी कबूल नहीं की। काली दाढ़ी के बीच पीले दाँतों
की हँसी हँसते हुए बोला— 'मैं कोई राजा नहीं हूँ जो न्याय
की कीमत वसूल करूँ। मैंने तो अटका काम निकाल
दिया। और यह अँगूठी मेरे किस काम की! न यह
अँगुलियों में आती है, न तड़े में। मेरी भेड़ें भी मेरी तरह
गँवार हैं। घास तो खाती हैं, पर सोना सूँघती तक नहीं।
बेकार की वस्तुएँ तुम अमीरों को ही शोभा देती हैं।'
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विज्ञापन की दुनिया
- विज्ञापन में सम्मिलित चित्र और विषय-वस्तु
- विज्ञापन में आए पात्र व उनका औचित्य
- विज्ञापन की भाषा
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भाषा की बात
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- (क) पैसा पावर है।
- (ख) पैसे की उस पर्चेजिंग पावर के प्रयोग में ही पावर का रस है।
- (ग) मित्र ने सामने मनीबैग फैला दिया।
- (घ) पेशगी ऑर्डर कोई नहीं लेते।
ऊपर दिए गए इन वाक्यों की संरचना तो हिंदी भाषा की है लेकिन वाक्यों में एकाध शब्द अंग्रेजी भाषा के आए हैं। इस तरह के प्रयोग को कोड मिक्सिंग कहते हैं। एक भाषा के शब्दों के साथ दूसरी भाषा के शब्दों का मेलजोल! अब तक आपने जो पाठ पढ़े उसमें से ऐसे कोई पाँच उदाहरण चुनकर लिखिए। यह भी बताइए कि आगत शब्दों की जगह उनके हिंदी पर्यायों का ही प्रयोग किया जाए तो संप्रेषणीयता पर क्या प्रभाव पड़ता है।
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(क) निर्बल ही धन की ओर झुकता है।
(ख) लोग संयमी भी होते हैं।
(ग) सभी कुछ तो लेने को जी होता था।
ऊपर दिए गए वाक्यों के रेखांकित अंश 'ही', 'भी', 'तो' निपात हैं जो अर्थ पर बल देने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। वाक्य में इनके होने-न-होने और स्थान क्रम बदल देने से वाक्य के अर्थ पर प्रभाव पड़ता है, जैसे—
मुझे भी किताब चाहिए। (मुझे महत्वपूर्ण है।)
मुझे किताब भी चाहिए। (किताब महत्वपूर्ण है।)
आप निपात (ही, भी, तो) का प्रयोग करते हुए तीन-तीन वाक्य बनाइए। साथ ही ऐसे दो वाक्यों का भी निर्माण कीजिए जिसमें ये तीनों निपात एक साथ आते हों।
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चर्चा करें
बाजार की चकाचौंध से दूर पर्चेजिंग पावर का सकारात्मक उपयोग किस प्रकार किया जा सकता है? आपकी मदद के लिए संकेत दिया जा रहा है—
(क) सामाजिक विकास के कार्यों में।
(ख) ग्रामीण आर्थिक व्यवस्था को सुदृढ़ करने में...
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Sources & Official References
- NCERT Official — ncert.nic.in
- CBSE Academic — cbseacademic.nic.in
- CBSE Official — cbse.gov.in
- National Education Policy 2020 — education.gov.in
Content is aligned to the official syllabus. Refer to the board website for the latest curriculum.
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