पद (विद्यापति)
CBSE · Class 12 · Hindi
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See them allप्रश्न-अभ्यास
1प्रियतमा के दुख के क्या कारण हैं?Show solution
उत्तर:
प्रियतमा के दुख के निम्नलिखित कारण हैं—
1. प्रियतम का वियोग: नायिका का प्रिय (माधव) उससे दूर है। उसके बिना भवन में अकेले रहना उसे असह्य लगता है।
2. सावन का महीना: सावन का मास प्रेम और मिलन का प्रतीक है, किंतु प्रियतम के बिना यह ऋतु नायिका की पीड़ा को और बढ़ा देती है।
3. प्रकृति का विरोधाभासी प्रभाव: कुसुमित वन, कोयल का कलरव और भौरों की गुनगुनाहट — ये सब मिलन के प्रतीक हैं, परंतु विरह में ये नायिका की वेदना को और तीव्र कर देते हैं।
4. नयनों की अतृप्ति: जन्म भर प्रिय को देखते रहने पर भी नेत्र तृप्त नहीं हुए और अब प्रिय सामने नहीं है।
5. शरीर का क्षीण होना: प्रियतम के विरह में नायिका का शरीर चतुर्दशी के चाँद की तरह दिन-प्रतिदिन घटता जा रहा है।
निष्कर्ष: प्रियतम का वियोग ही प्रियतमा के समस्त दुखों का मूल कारण है।
2कवि 'नयन न तिरपित भेल' के माध्यम से विरहिणी नायिका की किस मनोदशा को व्यक्त करना चाहता है?Show solution
प्रयुक्त भाव: विरह-वेदना एवं प्रेम की अनंतता।
उत्तर:
इस पंक्ति के माध्यम से कवि विद्यापति विरहिणी नायिका की अतृप्त प्रेम-पिपासा को व्यक्त करना चाहते हैं। नायिका कहती है कि उसने जन्म भर अपने प्रिय का रूप निहारा, फिर भी उसके नेत्र तृप्त नहीं हुए। इसका आशय यह है कि सच्चा प्रेम कभी तृप्त नहीं होता — जितना अधिक प्रिय को देखो, उतनी ही और देखने की लालसा बढ़ती जाती है।
नायिका की मनोदशा यह है कि —
- प्रिय का सौंदर्य इतना अपार है कि आँखें उसे देखते-देखते कभी संतुष्ट नहीं हो सकीं।
- अब जब प्रिय सामने नहीं है, तो यह अतृप्ति और भी पीड़ादायक हो गई है।
- नायिका की विरह-वेदना इसी अतृप्ति के कारण असह्य है।
निष्कर्ष: कवि यह बताना चाहता है कि प्रेम की कोई सीमा नहीं होती; वह जितना मिलता है, उतनी ही उसकी चाह बढ़ती जाती है।
3नायिका के प्राण तृप्त न हो पाने का कारण अपने शब्दों में लिखिए।Show solution
उत्तर:
नायिका के प्राण तृप्त न हो पाने के निम्नलिखित कारण हैं—
1. नेत्रों की अतृप्ति: नायिका ने जन्म भर प्रिय का रूप देखा, परंतु नेत्र कभी तृप्त नहीं हुए। प्रिय का सौंदर्य इतना अनंत था कि देखते-देखते भी मन नहीं भरा।
2. कानों की अतृप्ति: प्रिय की मधुर वाणी को कानों से सुना, किंतु वह मधुर ध्वनि कानों के रास्ते हृदय तक पहुँचकर भी प्राणों को तृप्त न कर सकी — 'सुति पथ परस न गेल' अर्थात् श्रुति-मार्ग से वह स्पर्श नहीं हो पाया जो आत्मा को तृप्त करे।
3. प्रेम की अनंतता: सच्चे प्रेम की यही विशेषता है कि वह जितना मिलता है, उतनी ही और पाने की इच्छा जागती है। इसलिए प्रिय के साथ बिताए क्षण भी प्राणों को पूर्ण तृप्ति नहीं दे सके।
निष्कर्ष: प्रेम की असीमितता और प्रिय के अनंत सौंदर्य के कारण नायिका के प्राण कभी तृप्त नहीं हो पाए।
4'सेह पिरित अनुराग बखानिअ तिल-तिल नूतन होए' से लेखक का क्या आशय है?Show solution
शब्दार्थ: पिरित = प्रीत/प्रेम; अनुराग = अनुराग; बखानिअ = बखान करना/वर्णन करना; तिल-तिल = पल-पल; नूतन = नया।
आशय:
इस पंक्ति में कवि विद्यापति उस प्रेम और अनुराग का वर्णन कर रहे हैं जो पल-पल नया होता रहता है। आशय यह है कि —
- सच्चा प्रेम कभी पुराना नहीं पड़ता; वह प्रतिपल नवीन और ताज़ा बना रहता है।
- जिस प्रेम और अनुराग की बात की जा रही है, वह इतना विशेष है कि उसका जितना भी बखान किया जाए, वह कम है — क्योंकि वह प्रेम हर क्षण नए रूप में प्रकट होता है।
- नायिका और माधव के बीच का प्रेम-संबंध ऐसा ही है — वह समय के साथ घटता नहीं, बल्कि और अधिक गहरा और नवीन होता जाता है।
निष्कर्ष: कवि का आशय है कि सच्चा प्रेम शाश्वत और नित्य नूतन होता है — वह जितना पुराना होता है, उतना ही अधिक ताज़ा और प्रगाढ़ लगता है।
5कोयल और भौरों के कलरव का नायिका पर क्या प्रभाव पड़ता है?Show solution
उत्तर:
सामान्यतः कोयल का कलरव और भौरों की गुनगुनाहट प्रेम और मिलन के प्रतीक माने जाते हैं तथा मन को आनंदित करते हैं। परंतु विरहिणी नायिका पर इनका विपरीत और पीड़ादायक प्रभाव पड़ता है —
1. कानों पर हाथ रख लेना: कोयल का मधुर स्वर और भौरों की गुनगुनाहट सुनकर नायिका अपने कानों पर हाथ रख लेती है, क्योंकि ये ध्वनियाँ उसे प्रिय के साथ बिताए सुखद क्षणों की याद दिलाती हैं।
2. विरह-वेदना का तीव्र होना: ये मधुर ध्वनियाँ नायिका की विरह-पीड़ा को और अधिक बढ़ा देती हैं। जो वस्तु दूसरों के लिए आनंददायक है, वही विरहिणी के लिए असह्य यंत्रणा का कारण बन जाती है।
3. नेत्रों का मुँदना: फूलों से भरे वन को देखकर भी नायिका की आँखें बंद हो जाती हैं, क्योंकि यह सौंदर्य उसे प्रिय की याद दिलाता है।
निष्कर्ष: विरह की स्थिति में प्रकृति की मधुर ध्वनियाँ और सौंदर्य नायिका की पीड़ा को और गहरा कर देते हैं।
6कातर दृष्टि से चारों तरफ प्रियतम को ढूँढ़ने की मनोदशा को कवि ने किन शब्दों में व्यक्त किया है?Show solution
उत्तर:
कवि विद्यापति ने नायिका की इस मनोदशा को निम्नलिखित शब्दों में व्यक्त किया है —
भावार्थ:
- 'कातर दिठि करि' — नायिका की दृष्टि दुखी और व्याकुल है। उसकी आँखों में आतुरता और पीड़ा है।
- 'चौदिस हेरि-हेरि' — वह चारों दिशाओं में बार-बार देखती है, प्रियतम को ढूँढ़ती है, परंतु वह कहीं नहीं मिलता।
- 'नयन गरए जल-धारा' — प्रिय के न मिलने पर उसके नेत्रों से अश्रुधारा बह निकलती है।
इसके अतिरिक्त — 'धरनी धरि धनि कत बेरि बइसइ, पुनि तहि उठइ न पारा' — नायिका बार-बार धरती पर बैठ जाती है और फिर उठ भी नहीं पाती — यह उसकी शारीरिक और मानसिक दुर्बलता को दर्शाता है।
निष्कर्ष: कवि ने अत्यंत मार्मिक शब्दों में नायिका की व्याकुल, कातर और अश्रुपूर्ण दशा का चित्रण किया है।
7निम्नलिखित शब्दों के तत्सम रूप लिखिए— तिरपित, छन, बिदगध, निहारल, पिरित, साओन, अपजस, छिन, तोहारा, कातिकShow solution
नियम: तत्सम रूप वह संस्कृत मूल शब्द होता है जिससे ये प्रादेशिक/अपभ्रंश रूप बने हैं।
| मैथिली/अपभ्रंश शब्द | तत्सम रूप |
|---|---|
| तिरपित | तृप्त |
| छन | क्षण |
| बिदगध | विदग्ध |
| निहारल | निहारना (दृष्टि/निरीक्षण) |
| पिरित | प्रीति |
| साओन | श्रावण |
| अपजस | अपयश |
| छिन | क्षीण |
| तोहारा | तुम्हारा (युष्मद्) |
| कातिक | कार्तिक |
8(क)निम्नलिखित का आशय स्पष्ट कीजिए— (क) एकसरि भवन पिआ बिनु रे मोहि रहलो न जाए। सखि अनकर दुख दारून रे जग के पतिआए।।Show solution
शब्दार्थ: एकसरि = अकेली; पिआ = प्रिय/पति; रहलो न जाए = रहा नहीं जाता; अनकर = दूसरे का; दारून = भयंकर/असह्य; पतिआए = विश्वास करे।
आशय:
नायिका अपनी सखी से कह रही है — 'हे सखी! प्रिय के बिना इस घर में अकेले रहना मुझसे नहीं हो पाता। यह घर अब मुझे काटने को दौड़ता है।'
दूसरी पंक्ति में नायिका की विवशता और एकाकीपन की पीड़ा और भी गहरी हो जाती है — 'दूसरे के दुख को इस संसार में कौन विश्वास करता है?' अर्थात् विरह की पीड़ा इतनी व्यक्तिगत और असह्य होती है कि उसे दूसरा कोई समझ ही नहीं सकता। दूसरों का दुख कितना भी भयंकर हो, संसार उस पर विश्वास नहीं करता।
काव्य-सौंदर्य: इन पंक्तियों में नायिका की एकाकीपन की पीड़ा और विरह की असह्यता का मार्मिक चित्रण है। साथ ही यह भी व्यक्त किया गया है कि प्रेम की पीड़ा को केवल प्रेमी ही समझ सकता है, संसार नहीं।
8(ख)निम्नलिखित का आशय स्पष्ट कीजिए— (ख) जनम अवधि हम रूप निहारल नयन न तिरपित भेल।। सेहो मधुर बोल स्वनहि सूनल सुति पथ परस न गेल।।Show solution
शब्दार्थ: जनम अवधि = जन्म भर; निहारल = देखा; तिरपित = तृप्त; भेल = हुए; सेहो = वही; स्वनहि = कानों से; सूनल = सुना; सुति पथ = श्रुति-मार्ग (कानों का रास्ता); परस न गेल = स्पर्श नहीं हुआ।
आशय:
नायिका कहती है — 'मैंने जन्म भर अपने प्रिय का रूप देखा, फिर भी मेरे नेत्र तृप्त नहीं हुए।' इसका अर्थ है कि प्रिय का सौंदर्य इतना अनंत और अपार था कि आँखें देखते-देखते कभी संतुष्ट नहीं हो सकीं।
दूसरी पंक्ति में — 'उनकी वही मधुर वाणी को कानों से सुना, परंतु वह मधुर ध्वनि कानों के रास्ते से होकर भी हृदय की गहराई तक स्पर्श नहीं कर पाई।' अर्थात् प्रेम की तृप्ति केवल इंद्रियों से नहीं होती — वह आत्मा की गहराई तक पहुँचनी चाहिए, जो संभव नहीं हो पाई।
काव्य-सौंदर्य: इन पंक्तियों में प्रेम की अनंतता और अतृप्ति का सुंदर चित्रण है। कवि यह बताना चाहते हैं कि सच्चा प्रेम कभी पूर्णतः तृप्त नहीं होता — वह सदा और अधिक पाने की लालसा जगाता रहता है।
8(ग)निम्नलिखित का आशय स्पष्ट कीजिए— (ग) कुसुमित कानन हेरि कमलमुखि, मृदि रहए दु नयान। कोकिल-कलरव, मधुकर-धुनि सुनि, कर देइ झाँपइ कान।।Show solution
शब्दार्थ: कुसुमित = फूलों से भरा; कानन = वन; हेरि = देखकर; कमलमुखि = कमल के समान मुख वाली (नायिका); मृदि रहए = मुँद जाती हैं; दु नयान = दोनों नेत्र; कोकिल-कलरव = कोयल का कलरव; मधुकर-धुनि = भौरों की गुनगुनाहट; कर देइ झाँपइ = हाथ से ढक लेती है।
आशय:
इन पंक्तियों में विरहिणी नायिका की मार्मिक दशा का चित्रण है। कवि कहते हैं —
- फूलों से लदे वन को देखकर कमल-मुखी नायिका की दोनों आँखें मुँद जाती हैं। यह वन उसे प्रिय के साथ बिताए सुखद क्षणों की याद दिलाता है, जो उसकी विरह-पीड़ा को और बढ़ा देता है।
- कोयल का मधुर कलरव और भौरों की गुनगुनाहट सुनकर नायिका अपने कानों पर हाथ रख लेती है, क्योंकि ये मधुर ध्वनियाँ उसे प्रिय की याद दिलाकर और अधिक व्याकुल कर देती हैं।
काव्य-सौंदर्य: यहाँ विरोधाभास का सुंदर प्रयोग है — जो वस्तुएँ सामान्यतः आनंद देती हैं (फूलों से भरा वन, कोयल का गान, भौरों की गुनगुनाहट), वही विरहिणी के लिए असह्य पीड़ा का कारण बन जाती हैं। यह विरह की तीव्रता को बड़े प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करता है।
योग्यता-विस्तार
1पठित पाठ के आधार पर विद्यापति के काव्य में प्रयुक्त भाषा की पाँच विशेषताएँ उदाहरण सहित लिखिए।Show solution
1. मैथिली भाषा का प्रयोग:
विद्यापति ने संस्कृत की जगह लोकभाषा मैथिली में काव्य-रचना की। यह भाषा सरल, मधुर और संगीतात्मक है।
*उदाहरण:* 'एकसरि भवन पिआ बिनु रे मोहि रहलो न जाए।'
2. संस्कृत के तत्सम शब्दों का मिश्रण:
मैथिली के साथ-साथ संस्कृत के तत्सम शब्दों का भी प्रयोग है, जिससे भाषा में गरिमा आती है।
*उदाहरण:* 'कोकिल-कलरव, मधुकर-धुनि' — यहाँ 'कोकिल', 'कलरव', 'मधुकर' तत्सम शब्द हैं।
3. संगीतात्मकता और लय:
विद्यापति के पद गेय हैं। उनमें लय, ताल और संगीत का अद्भुत समन्वय है।
*उदाहरण:* 'तोहर बिरह दिन छन-छन तनु छिन — चौदसि-चाँद-समान।'
4. अनुप्रास और पुनरुक्ति अलंकार:
भाषा में अनुप्रास और पुनरुक्ति का सुंदर प्रयोग है जो काव्य को प्रभावशाली बनाता है।
*उदाहरण:* 'हेरि-हेरि', 'गुनि-गुनि', 'छन-छन' — पुनरुक्ति के उदाहरण।
5. प्रतीकात्मक और चित्रात्मक भाषा:
कवि ने प्रकृति के प्रतीकों का सुंदर उपयोग किया है जो भावों को दृश्यमान बना देते हैं।
*उदाहरण:* 'तोहर बिरह दिन छन-छन तनु छिन — चौदसि-चाँद-समान' — चतुर्दशी के चाँद की तरह नायिका का शरीर घटता जा रहा है।
2विद्यापति के गीतों का आडियो रिकार्ड बाजार में उपलब्ध हैं, उसको सुनिए।Show solution
विद्यार्थियों को निर्देश दिया जाता है कि वे विद्यापति के गीतों के उपलब्ध ऑडियो रिकॉर्ड को सुनें। इससे निम्नलिखित लाभ होंगे —
- विद्यापति की काव्य-भाषा (मैथिली) की संगीतात्मकता का अनुभव होगा।
- उनके पदों की लय, ताल और भाव-सौंदर्य को बेहतर समझा जा सकेगा।
- मैथिली लोक-संगीत की परंपरा से परिचय होगा।
*(यह प्रश्न स्व-अध्ययन एवं श्रवण-कौशल विकास के लिए है।)*
3विद्यापति और जायसी प्रेम के कवि हैं। दोनों की तुलना कीजिए।Show solution
| आधार | विद्यापति | जायसी |
|---|---|---|
| काल | 14वीं-15वीं शताब्दी | 16वीं शताब्दी |
| भाषा | मैथिली | अवधी |
| प्रमुख रचना | पदावली | पद्मावत |
| प्रेम का स्वरूप | श्रृंगारिक प्रेम (राधा-कृष्ण) | रहस्यवादी/सूफी प्रेम (नायक-नायिका के माध्यम से ईश्वर-प्रेम) |
| परंपरा | वैष्णव भक्ति परंपरा | सूफी प्रेम-परंपरा |
| विरह-चित्रण | नायिका की विरह-वेदना का मार्मिक चित्रण | विरह को आत्मा की परमात्मा से दूरी के रूप में चित्रित किया |
| प्रकृति-चित्रण | प्रकृति विरह को तीव्र करती है | प्रकृति प्रेम का माध्यम बनती है |
| शैली | गीत-शैली, संगीतात्मक | महाकाव्यात्मक शैली |
समानताएँ:
- दोनों ने प्रेम को अपने काव्य का केंद्र बनाया।
- दोनों ने विरह-वेदना का मार्मिक चित्रण किया।
- दोनों के काव्य में लोकभाषा का प्रयोग है।
- दोनों के काव्य में प्रेम की अनंतता और तीव्रता का वर्णन है।
निष्कर्ष: विद्यापति का प्रेम मुख्यतः श्रृंगारिक और लौकिक है, जबकि जायसी का प्रेम सूफी दर्शन से प्रभावित होकर आध्यात्मिक और रहस्यवादी बन जाता है।
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Sources & Official References
- NCERT Official — ncert.nic.in
- CBSE Academic — cbseacademic.nic.in
- CBSE Official — cbse.gov.in
- National Education Policy 2020 — education.gov.in
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