सुभाषितान्ति
CBSE · Class 10 · Sanskrit
NCERT Solutions for सुभाषितान्ति — CBSE Class 10 Sanskrit.
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अभ्यास — सुभाषितानि (Chapter: सुभाषितान्ति, Class 10 Sanskrit)
1एकपदेन उत्तरं लिखत—
(क) मनुष्याणां महान् रिपुः कः?
(ख) गुणी किं वेत्ति?
(ग) केषां सम्पत्तौ च विपत्तौ च महताम् एकरूपता?
(घ) पशुना अपि कौद्दशः गृह्यते?
(ङ) उदयसमये अस्तसमये च कः रक्तः भवति?Show solution
(ख) गुणी — गुणम् वेत्ति।
(ग) महताम् सम्पत्तौ च विपत्तौ च एकरूपता भवति।
(घ) पशुना अपि उदीरितम् अर्थम् गृह्यते।
(ङ) उदयसमये अस्तसमये च सविता (सूर्यः) रक्तः भवति।
2अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत—
(क) केन समः बन्धुः नास्ति?
(ख) वसन्तस्य गुणं कः जानाति?
(ग) बुद्धयः कौद्दृश्यः भवन्ति?
(घ) नराणां प्रथमः शत्रुः कः?
(ङ) सुधियः सख्यं केन सह भवति?
(च) अस्माभिः कौद्दृशः वृक्षः सेवितव्यः?Show solution
उद्यम (परिश्रम) के समान कोई बन्धु नहीं है।
(ख) वसन्तस्य गुणं पिकः जानाति।
वसन्त के गुण को कोयल जानती है।
(ग) बुद्धयः परेषां विपत्तिषु विभिन्नाः भवन्ति।
(अथवा: बुद्धयः परेषु विपत्तिषु भिन्नाः भवन्ति।)
बुद्धियाँ दूसरों की विपत्ति में भिन्न-भिन्न होती हैं।
(घ) नराणां प्रथमः शत्रुः आलस्यम् अस्ति।
मनुष्यों का पहला शत्रु आलस्य है।
(ङ) सुधियः सख्यं सुधियैः सह भवति।
बुद्धिमानों की मित्रता बुद्धिमानों के साथ होती है।
(च) अस्माभिः महावृक्षः सेवितव्यः।
हमें महान् (विशाल) वृक्ष का आश्रय लेना चाहिए।
3अधोलिखिते अन्वयद्वये रिक्तस्थानपूर्ति कुरुत—
(क) यः ... उद्दिश्य प्रकुप्यति तस्य ... सः ध्रुवं प्रसीदति। यस्य मनः अकारणद्वेषि अस्ति, ... तं कथं परितोष्यिप्यति?
(ख) ... संसारे खलु ... निरर्थकम् नास्ति। अश्वः चेत् ... वीरः, खरः ... वहने (वीरः) (भवति)।Show solution
भावार्थ: जो किसी कारण को लक्ष्य करके क्रोध करता है, उस कारण के दूर होने पर वह निश्चित रूप से प्रसन्न हो जाता है। किन्तु जिसका मन बिना कारण द्वेष करने वाला है, उसे कौन कैसे प्रसन्न करेगा?
(ख) विचित्रे संसारे खलु किञ्चित् निरर्थकम् नास्ति। अश्वः चेत् धावने वीरः, खरः भारस्य वहने (वीरः) (भवति)।
भावार्थ: इस विचित्र संसार में कुछ भी निरर्थक नहीं है। यदि घोड़ा दौड़ने में वीर है, तो गधा भार वहन करने में वीर है।
4अधोलिखितानां वाक्यानां कृते समानार्थकान् श्लोकांशान् पाठात् चित्वा लिखत—
(क) विद्वान् स एव भवति यः अनुक्तम् अपि तथ्यं जानाति।
(ख) मनुष्यः समस्वभावैः जनैः सह मित्रतां करोति।
(ग) परिश्रमं कुर्वाण: नर: कदापि दु:खं न प्राप्नोति।
(घ) महान्त: जना: सर्वदैव समप्रकृतय: भवन्ति।Show solution
जो व्यक्ति बिना कहे भी तथ्य को जान लेता है, वही पण्डित (विद्वान्) होता है।
(ख) "सहजं किल यत् सुधीभिः सख्यम्" अथवा "समशीलव्यसनेषु सख्यम्"
समान स्वभाव वाले लोगों में स्वाभाविक रूप से मित्रता होती है।
(ग) "उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥"
परिश्रम करने वाला मनुष्य कभी दुःख नहीं पाता, क्योंकि उद्यम से ही कार्य सिद्ध होते हैं।
(घ) "महतां सम्पत्तौ च विपत्तौ च एकरूपता" अथवा "सविता उदये रक्तः तथैव अस्तमये च रक्तः"
महान् लोग सदैव सम्पत्ति और विपत्ति दोनों में समान स्वभाव वाले होते हैं।
5यथानिर्देशं परिवर्तनं विधाय वाक्यानि रचयत—
(क) गुणी गुणं जानाति। (बहुवचने)
(ख) पशु: उदीरितम् अर्थं गृह्णाति। (कर्मवाच्ये)
(ग) मृगा: मृगै: सह अनुब्रजन्ति। (एकवचने)
(घ) क: छायां निवारयति। (कर्मवाच्ये)
(ङ) तेन एव वहिना शरीरं दह्यते। (कर्तृवाच्ये)Show solution
गुणिनः गुणान् जानन्ति।
(गुणवान् लोग गुणों को जानते हैं।)
(ख) कर्मवाच्ये:
पशुना उदीरितः अर्थः गृह्यते।
(पशु के द्वारा कहा गया अर्थ ग्रहण किया जाता है।)
(ग) एकवचने:
मृगः मृगेण सह अनुब्रजति।
(हिरण हिरण के साथ चलता है।)
(घ) कर्मवाच्ये:
केन छाया निवार्यते?
(किसके द्वारा छाया रोकी जाती है?)
(ङ) कर्तृवाच्ये:
सः एव वह्निः शरीरं दहति।
(वही अग्नि शरीर को जलाती है।)
6(अ)सन्धिं/सन्धिविच्छेदं कुरुत—
(क) न + अस्ति + उद्यमसम:
(ख) …… + …… – तस्यापगमे
(ग) अनुक्तम् + अपि + ऊहति
(घ) …… + ……… – गावश्च
(ङ) …… + ……… – नास्ति
(च) रक्त: + च + अस्तमये
(छ) …… + ……… – योजकस्तत्रShow solution
(न + अस्ति = नास्ति; नास्ति + उद्यमसमः = नास्त्युद्यमसमः — दीर्घ सन्धि + यण् सन्धि)
(ख)
(दीर्घ सन्धि: अ + अ = आ)
(ग)
(अपि + ऊहति → अप्यूहति — यण् सन्धि: इ + ऊ = य्+ऊ)
(घ)
(विसर्ग सन्धि: ः + च = श्च)
(ङ)
(दीर्घ सन्धि: अ + अ = आ)
(च)
(विसर्ग सन्धि: ः + च = श्च; च + अ = चा)
(छ)
(विसर्ग सन्धि: ः + त = स्त)
6(आ)समस्तपदं/विग्रहं लिखत—
(क) उद्यमसम:
(ख) शरीरे स्थित:
(ग) निर्बल:
(घ) देहस्य विनाशनाय
(ङ) महावृक्ष:
(च) समानं शीलं व्यसनं येषां तेषु
(छ) अयोग्य:Show solution
(ख) शरीरे स्थितः — शरीरस्थः (सप्तमी तत्पुरुष समास)
(ग) निर्बलः — विग्रह: बलं नास्ति यस्य सः (बहुव्रीहि) अथवा निर्गतं बलं यस्मात् सः (नञ् तत्पुरुष)
(घ) देहस्य विनाशनाय — देहविनाशनाय (षष्ठी तत्पुरुष समास)
(ङ) महावृक्षः — विग्रह: महान् च असौ वृक्षः (कर्मधारय समास)
(च) समानं शीलं व्यसनं येषां तेषु — समशीलव्यसनेषु (बहुव्रीहि समास)
(छ) अयोग्यः — विग्रह: न योग्यः (नञ् तत्पुरुष समास)
7(अ)अधोलिखितानां पदानां विलोमपदानि पाठात् चित्वा लिखत—
(क) प्रसीदति
(ख) मूर्खः
(ग) बली
(घ) सुलभः
(ङ) संपत्तौ
(च) अस्तमये
(छ) सार्थकम्Show solution
(प्रसन्न होना ↔ क्रोध करना)
(ख) मूर्खः — विलोम: पण्डितः / सुधीः
(मूर्ख ↔ विद्वान्)
(ग) बली — विलोम: निर्बलः
(बलवान् ↔ निर्बल)
(घ) सुलभः — विलोम: दुर्लभः
(सहज प्राप्य ↔ कठिनता से प्राप्य)
(ङ) संपत्तौ — विलोम: विपत्तौ
(सम्पत्ति ↔ विपत्ति)
(च) अस्तमये — विलोम: उदये
(अस्त होना ↔ उदय होना)
(छ) सार्थकम् — विलोम: निरर्थकम्
(सार्थक ↔ निरर्थक)
7(आ)संस्कृतेन वाक्यप्रयोगं कुरुत—
(क) वायसः
(ख) निमित्तम्
(ग) सूर्यः
(घ) पिकः
(ङ) वह्निःShow solution
वायसः वृक्षे उपविशति।
(कौआ वृक्ष पर बैठता है।)
(ख) निमित्तम् (कारण):
यः निमित्तम् उद्दिश्य प्रकुप्यति सः तस्य अपगमे प्रसीदति।
(जो कारण को लक्ष्य करके क्रोध करता है, वह उसके दूर होने पर प्रसन्न हो जाता है।)
(ग) सूर्यः (सूर्य):
सूर्यः उदये अस्तमये च रक्तः भवति।
(सूर्य उदय और अस्त दोनों समय लाल होता है।)
(घ) पिकः (कोयल):
पिकः वसन्तस्य गुणं जानाति।
(कोयल वसन्त के गुण को जानती है।)
(ङ) वह्निः (अग्नि):
वह्निः शरीरं दहति।
(अग्नि शरीर को जलाती है।)
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Sources & Official References
- NCERT Official — ncert.nic.in
- CBSE Academic — cbseacademic.nic.in
- CBSE Official — cbse.gov.in
- National Education Policy 2020 — education.gov.in
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