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Chapter 18 of 36
NCERT Solutions

उपसर्ग

CBSE · Class 10 · Sanskrit

NCERT Solutions for उपसर्ग — CBSE Class 10 Sanskrit.

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अभ्यासकार्यम् — उपसर्ग (Chapter: उपसर्ग, Sanskrit Class 10)

1अधोलिखितेषु पदेषु उपसर्गान् धातून् च पृथक् कृत्वा लिखत—Show solution
नीचे प्रत्येक क्रियापद का उपसर्ग एवं धातु पृथक् करके लिखा गया है:

| क्रम | क्रियापद | उपसर्ग | धातु |
|---|---|---|---|
| i) | उत्तिष्ठतु | उत् | स्था |
| ii) | निरगच्छन् | निर् (नि:) | गम् |
| iii) | निस्सरतु | निस् (नि:) | सृ |
| iv) | संवदन्ति | सम् | वद् |
| v) | प्रत्यवदत् | प्रति | वद् |
| vi) | सुशोभते | सु | शुभ् |
| vii) | विशिष्यते | वि | शिष् (शिष्) |
| viii) | अन्वकरोत् | अनु | कृ |
| ix) | प्रसीदामि | प्र | सद् |
| x) | अवागच्छत् | अव + आ | गम् |
| xi) | उपविशामः | उप | विश् |
| xii) | उत्थास्यामः | उत् | स्था |
| xiii) | उन्नयनम् | उत् (उन्) | नी |
| xiv) | अपाकुर्वन् | अप + आ | कृ |
| xv) | विजयते | वि | जि |
| xvi) | परितुष्यति | परि | तुष् |

स्पष्टीकरण:
- उपसर्ग वे अव्यय-शब्द हैं जो धातु के पूर्व लगकर उसके अर्थ में परिवर्तन या विशेषता लाते हैं।
- संस्कृत में कुल 22 उपसर्ग माने जाते हैं: प्र, परा, अप, सम्, अनु, अव, आ, नि/नि:, दुर्/दुस्, वि, सु, उत्/उद्, अभि, प्रति, परि, उप, अधि, अपि, अति, आदि।

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2कोष्ठकात् शुद्धपदं चित्वा रिक्तस्थाने लिखत—Show solution
प्रत्येक रिक्तस्थान के लिए शुद्ध पद का चयन एवं कारण:

i) हे प्रभो ! मयि प्रसीदतु
*(प्रासीदतु/प्रसीदतु)*
कारण: 'प्र + सद्' = प्रसीदतु (प्रसन्न होइए)। 'प्रासीदतु' अशुद्ध है क्योंकि 'प्रा' कोई उपसर्ग नहीं है।

ii) गुरु: शिष्यस्य अज्ञानम् अपहरति
*(उपहरति/अपहरति)*
कारण: 'अप + हृ' = अपहरति (दूर करना/हरण करना)। यहाँ अज्ञान को दूर करने का भाव है।

iii) वानरा: जनान् अनुकुर्वन्ति
*(अनुकुर्वन्ति/अन्वकुर्वन्ति)*
कारण: 'अनु + कृ' = अनुकुर्वन्ति (अनुकरण करना, वर्तमान काल)। 'अन्वकुर्वन्' भूतकाल का रूप है।

iv) अहं संस्कृतम् अवजानामि
*(अवजानामि/अवाजानामि)*
कारण: 'अव + ज्ञा' = अवजानामि (तुच्छ समझना)। 'अवाजानामि' अशुद्ध संधि-रूप है।

v) आजीवनम् सत्यम् एव वदनीयम्।
*(आजीवनम्/आजीवन:)*
कारण: 'आजीवनम्' अव्यय-रूप में प्रयुक्त होता है (जीवन-पर्यन्त)। 'आजीवन:' पुल्लिंग संज्ञा-रूप है जो यहाँ उचित नहीं।

vi) अध्यापक: प्रश्नान् पृच्छति। छात्रा: प्रतिवदन्ति
*(प्रतिवदन्ति/संवदन्ति)*
कारण: 'प्रति + वद्' = प्रतिवदन्ति (उत्तर देना)। प्रश्न के उत्तर में 'प्रति' उपसर्ग उचित है। 'संवदन्ति' का अर्थ है 'आपस में बात करना'।

vii) कामात् क्रोध: उद्भवति
*(पराभवति/उद्भवति)*
कारण: 'उत् + भू' = उद्भवति (उत्पन्न होना)। काम से क्रोध उत्पन्न होता है — यह गीता का प्रसिद्ध वचन है।

viii) सभायाम् विद्वांस: एव सुशोभन्ते
*(सुशोभन्ते/सुशोभन्ति)*
कारण: 'शुभ्' धातु आत्मनेपदी है, अतः 'सुशोभन्ते' शुद्ध है।

ix) चौर: रात्रौ धनम् अहरत्
*(व्यहरत्/अहरत्)*
कारण: 'अप + हृ' → यहाँ सामान्य चोरी के अर्थ में 'अहरत्' (हृ धातु, लङ् लकार) उचित है। 'व्यहरत्' का अर्थ 'व्यवहार करना' है।

x) माता पुत्र: च परस्परम् संवदत:
*(प्रतिवदत:/संवदत:)*
कारण: 'सम् + वद्' = संवदत: (आपस में बात करना)। 'परस्परम्' के साथ 'सम्' उपसर्ग उचित है।

xi) गुरु: आश्रमात् निर्गच्छति
*(प्रविशति/निर्गच्छति)*
कारण: 'आश्रमात्' (पञ्चमी विभक्ति = से/बाहर) के साथ 'निर् + गम्' = निर्गच्छति (बाहर जाना) उचित है।

xii) नागरिकाः एव स्वदेशम् उन्नयन्ति
*(उद्द्यन्ति/उन्नयन्ति)*
कारण: 'उत् + नी' = उन्नयन्ति (उन्नत करना)। देश को ऊपर उठाने के अर्थ में यह उचित है।

xiii) वयं चलचित्रं द्रष्टुम् अत्र आगच्छाम
*(अवागच्छाम/आगच्छाम)*
कारण: 'आ + गम्' = आगच्छाम (यहाँ आना)। 'अव + आ + गम्' = अवागच्छाम का अर्थ 'नीचे आना' होगा जो यहाँ उचित नहीं।

xiv) माता पुत्रम् संस्करोति
*(संस्करोति/समकरोति)*
कारण: 'सम् + स् + कृ' = संस्करोति (संस्कार करना)। 'समकरोति' अशुद्ध रूप है।

xv) नदी पर्वतात् प्रवहति
*(प्रवहति/उद्द्वत)*
कारण: 'प्र + वह्' = प्रवहति (प्रवाहित होना)। नदी पर्वत से प्रवाहित होती है। 'उद्द्वत' अशुद्ध रूप है।

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3i) हार:, योग: इति शब्दाभ्यां सह अधोलिखितान् उपसर्गान् संयुज्य प्रत्येक पद्द्यस्य निर्माणं कुरुत। निर्मितै: पदै: च सार्थकवाक्यानि रचयत— उपसर्गाः— आ, वि, प्र, सु, सम्। ii) 'भू' ह, इति एताभ्याम् धातुभ्यां प्राक् अधोलिखितान् उपसर्गान् संयुज्य प्रत्येक पद्द्यस्य निर्माणं कुरुत। निर्मितै: पदै: च सार्थकवाक्यानि रचयत— उपसर्गाः— प्र, अनु, सम्, अप, दुर्।

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